विस्तृत उत्तर
श्रीमद्भागवतमाहात्म्य में नारदजी भगवान को प्रसन्न करने का मर्म बताते हैं। वे कहते हैं कि तप, वेदाध्ययन, ज्ञान और कर्म आदि किसी भी साधन से भगवान वश में नहीं किये जा सकते; भगवान केवल भक्ति से वश में होते हैं। इस बात के प्रमाण के रूप में वे गोपियों का उल्लेख करते हैं। आगे वे कहते हैं कि मनुष्य के सहस्र जन्मों के पुण्य से भक्ति में अनुराग होता है। कलियुग में भक्ति ही सार है और भक्ति से साक्षात श्रीकृष्ण सामने उपस्थित हो जाते हैं। स्रोत के अनुसार भगवान को प्रसन्न करने का मूल साधन बाहरी तप या ज्ञान का अहंकार नहीं, बल्कि प्रेमपूर्ण भक्ति है।
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