विस्तृत उत्तर
भगवान की भक्ति से मन की शांति का क्रम स्पष्ट है। पहले कहा गया कि मनुष्य का श्रेष्ठ धर्म वही है जिससे भगवान कृष्ण में निष्काम और निरंतर भक्ति हो; ऐसी भक्ति से आत्मा आनंदस्वरूप परमात्मा को पाकर कृतकृत्य होती है। आगे बताया गया कि भागवत या भगवद्कथा के निरंतर सेवन से अशुभ वासनाएँ नष्ट होती हैं और भगवान के प्रति स्थायी प्रेम उत्पन्न होता है। तब काम, लोभ आदि रजोगुण-तमोगुण के भाव शांत होते हैं, चित्त निर्मल होकर सत्त्व में स्थित होता है। भगवान की प्रेममयी भक्ति से संसार की आसक्तियाँ मिटती हैं, हृदय आनंद से भरता है और आत्मप्रसाद प्राप्त होता है। यही मन की वास्तविक शांति है।
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