विस्तृत उत्तर
नारदजी ज्ञान और भक्ति के संबंध को बहुत स्पष्ट करते हैं। वे कहते हैं कि निर्मल ज्ञान, जो मोक्ष का प्रत्यक्ष साधन है, यदि अच्युत भगवान के भाव से रहित हो तो उतना शोभित नहीं होता। इसका अर्थ है कि केवल बौद्धिक समझ या मुक्ति की चर्चा पूर्ण नहीं है, जब तक उसमें भगवान के प्रति भाव, स्मरण और भक्ति न जुड़ी हो। फिर वे कर्म की बात करते हैं: जो कर्म भगवान को अर्पित नहीं है, वह चाहे निःस्वार्थ जैसा दिखे, फिर भी कैसे सुशोभित हो सकता है। इसलिए स्रोत के अनुसार ज्ञान का सौंदर्य और पूर्णता भगवान से संबंध में है। भक्ति के बिना ज्ञान सूखा और अधूरा रह जाता है; भगवान से जुड़कर वही ज्ञान जीव को कल्याण की दिशा देता है।
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