विस्तृत उत्तर
नारदजी बुद्धिमान मनुष्य को समझाते हैं कि उसे उसी वस्तु की प्राप्ति के लिए प्रयत्न करना चाहिए जो ऊपर-नीचे सभी योनियों में कर्मफल से आने-जाने पर भी अपने आप नहीं मिलती। संसार के विषय-सुख को वे अंतिम लक्ष्य नहीं मानते, क्योंकि वह तो कर्म और काल के प्रभाव से अपने आप मिल जाता है। जैसे बिना विशेष इच्छा के दुख आता है, वैसे ही सुख भी कर्मफल से मिल जाता है। इसलिए केवल दुनियावी सुख के पीछे भागना मनुष्य के दुर्लभ अवसर को छोटा कर देता है। मनुष्य को उस परम वस्तु की ओर प्रयत्न करना चाहिए जो भक्ति, भगवान के चरणसेवन और कृष्ण-स्मरण से जुड़ी है। यह दृष्टि सुख को नकारती नहीं, बल्कि उसे अंतिम लक्ष्य मानने से रोकती है।
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