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श्रीमद्भागवत📜 श्रीमद्भागवत 1.5, श्लोक 18⏱ 1 मिनट पठन

दुनियावी सुख के पीछे भागना क्यों ठीक नहीं?

अंतिम अपडेट: 29 मई 2026
संक्षिप्त उत्तर

नारदजी कहते हैं कि विषय-सुख कर्मफल से अपने आप मिलते हैं, जैसे दुख मिल जाता है; बुद्धिमान को परम लक्ष्य के लिए प्रयत्न करना चाहिए।

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विस्तृत उत्तर

नारदजी बुद्धिमान मनुष्य को समझाते हैं कि उसे उसी वस्तु की प्राप्ति के लिए प्रयत्न करना चाहिए जो ऊपर-नीचे सभी योनियों में कर्मफल से आने-जाने पर भी अपने आप नहीं मिलती। संसार के विषय-सुख को वे अंतिम लक्ष्य नहीं मानते, क्योंकि वह तो कर्म और काल के प्रभाव से अपने आप मिल जाता है। जैसे बिना विशेष इच्छा के दुख आता है, वैसे ही सुख भी कर्मफल से मिल जाता है। इसलिए केवल दुनियावी सुख के पीछे भागना मनुष्य के दुर्लभ अवसर को छोटा कर देता है। मनुष्य को उस परम वस्तु की ओर प्रयत्न करना चाहिए जो भक्ति, भगवान के चरणसेवन और कृष्ण-स्मरण से जुड़ी है। यह दृष्टि सुख को नकारती नहीं, बल्कि उसे अंतिम लक्ष्य मानने से रोकती है।

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शास्त्रीय स्रोत
श्रीमद्भागवत 1.5, श्लोक 18
उत्तर को थोड़ा और स्पष्ट करें

दुनियावी सुख के पीछे भागना क्यों ठीक नहीं को संदर्भ सहित समझें

दुनियावी सुख के पीछे भागना क्यों ठीक नहीं का सबसे सीधा सार यह है: नारदजी कहते हैं कि विषय-सुख कर्मफल से अपने आप मिलते हैं, जैसे दुख मिल जाता है; बुद्धिमान को परम लक्ष्य के लिए प्रयत्न करना चाहिए।

श्रीमद्भागवत जैसे विषयों में यह देखना जरूरी होता है कि बात किस परिस्थिति में लागू होती है, किन नियमों के साथ मान्य होती है और व्यवहार में इसका सही अर्थ क्या निकलता है. उपलब्ध स्रोत श्रीमद्भागवत 1.5, श्लोक 18 इस दिशा को मजबूत आधार देता है।

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उत्तर का शास्त्रीय आधार देखने के लिए श्रीमद्भागवत 1.5, श्लोक 18 के उल्लेख को ध्यान से पढ़ें।

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श्रीमद्भागवत श्रेणी के दूसरे प्रश्न इस उत्तर की सीमा और उपयोग दोनों स्पष्ट करते हैं।

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यदि विस्तृत विधि या पृष्ठभूमि चाहिए, तो नीचे दिए गए लेख पहले खोलें।

श्रीमद्भागवत प्रश्नोत्तर
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