विस्तृत उत्तर
श्रीमद्भागवतमाहात्म्य में धर्म के घटने का कारण कलियुग के प्रभाव और मनुष्य के बिगड़े आचरण से जोड़ा गया है। नारदजी कहते हैं कि पृथ्वी पर सत्य, तप, शौच, दया और दान नहीं रहे। जीव पेट-पालन में लगे हुए हैं, असत्य बोलते हैं, आलसी और मंदबुद्धि हो गए हैं। जो साधु कहे जाते हैं, उनमें भी पाखंड और संग्रह की प्रवृत्ति बताई गई है। घरों में कलह, लोभ और अधर्म बढ़ने का वर्णन है। आगे नारदजी कहते हैं कि कुकर्मों के कारण पृथ्वी के पदार्थ बीजहीन भूसी की तरह सारहीन हो गए हैं। कथा धन-लोभ से कराई जाने लगी है, तीर्थों में अधर्मी लोग रहने लगे हैं, तप में काम-क्रोध-लोभ प्रवेश कर गया है और ध्यानयोग का फल मन-वश न होने, दंभ, पाखंड और शास्त्र-अभ्यास की कमी से नष्ट हो रहा है। इसलिए स्रोत के अनुसार धर्म इसलिए घटता है क्योंकि सदाचार और साधना का आंतरिक भाव कम होकर लोभ, पाखंड और कुकर्म बढ़ जाते हैं।
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