विस्तृत उत्तर
श्रीमद्भागवतमाहात्म्य में ध्यानयोग कठिन होने का कारण नारदजी स्पष्ट बताते हैं। वे कहते हैं कि मन को वश में न करने के कारण, लोभ के कारण, दंभ और पाखंड का आश्रय लेने के कारण तथा शास्त्रों का अभ्यास न करने से ध्यानयोग का फल चला गया है। यह कथन कलियुग के उसी वर्णन में आता है जिसमें सत्य, तप, शौच, दया, दान और सदाचार के क्षय की बात कही गई है। ध्यानयोग का फल केवल बाहरी अभ्यास से नहीं, बल्कि मन-संयम, शास्त्र-अभ्यास और पाखंड-रहित साधना से जुड़ा है। जब मन वश में न हो, लोभ प्रधान हो और साधना में दंभ आ जाए, तब ध्यानयोग फलहीन हो जाता है। इसलिए स्रोत के अनुसार कलियुग में ध्यानयोग कठिन इसलिए है क्योंकि मन की स्थिरता, शुद्धता और सच्चे अभ्यास की कमी हो जाती है।
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