विस्तृत उत्तर
सूतजी बताते हैं कि जब उद्धवजी ने भगवान कृष्ण से भक्तों के सहारे की चिंता कही, तब भगवान ने विचार किया कि भक्तों के अवलंबन के लिये क्या व्यवस्था की जाए। तब भगवान ने अपना सारा तेज श्रीमद्भागवत में रख दिया और अंतर्धान होकर भागवत-सागर में प्रवेश कर गए। इसी कारण श्रीमद्भागवत को भगवान हरि की साक्षात वाङ्मयी मूर्ति कहा गया है। इसके सेवन, श्रवण, पाठ और दर्शन से पाप नष्ट होते हैं। इसलिए स्रोत के अनुसार कृष्ण भागवत में अपने तेज और शब्दमय स्वरूप के रूप में स्थित हैं।
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