विस्तृत उत्तर
मरने के बाद प्रेत योनि का कारण इस प्रसंग में धुंधुकारी के कुकर्म बताए गए हैं। वह पहले ही दुष्ट जीवन जी रहा था, फिर पाँच वेश्याओं के साथ रहते हुए क्रूर कर्म करता रहा। उसके मरने के बाद वह अपने कुकर्मों के कारण भयंकर प्रेत बना। बाद में जब गोकर्ण ने उससे पूछा, तो धुंधुकारी ने स्वयं स्वीकार किया कि वह गोकर्ण का भाई है, उसने अपने दोष से ब्राह्मणत्व नष्ट किया और उसके कर्मों की गिनती नहीं। वह लोगों की हिंसा करता था और अंत में स्त्रियों ने उसे कष्ट देकर मार डाला। इसी से वह प्रेत योनि में पड़ा और दैवाधीन कर्मफल भोगते हुए वायु-आहार से जीवित रहा।
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