विस्तृत उत्तर
श्रीमद्भागवतमाहात्म्य में मोक्ष का मार्ग कलियुग के संदर्भ में बहुत स्पष्ट किया गया है। नारदजी कहते हैं कि सत्य, त्रेता और द्वापर में ज्ञान और वैराग्य मुक्ति के साधन थे, पर कलियुग में केवल भक्ति ही सायुज्य यानी मोक्ष कराने वाली है। वे यह भी कहते हैं कि तप, वेदाध्ययन, ज्ञान और कर्म से भगवान वश में नहीं होते; भगवान केवल भक्ति से वश में होते हैं। इसी भक्ति को एकमात्र मुक्ति देने वाली कहा गया है। बाद में सनकादि ऋषि बताते हैं कि यज्ञ, तपोयज्ञ, योगयज्ञ आदि स्वर्गादि फल की ओर संकेत करते हैं, पर ज्ञानयज्ञ के रूप में श्रीमद्भागवत का पारायण मुक्ति देने वाला सत्कर्म है। उसके शब्द सुनने से भक्ति, ज्ञान और वैराग्य को बल मिलता है। इसलिए स्रोत के अनुसार मोक्ष के लिये भक्ति, कृष्ण-स्मरण और श्रीमद्भागवत पारायण प्रमुख साधन हैं।
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