विस्तृत उत्तर
नारदजी भगवदर्थ कर्म के मार्ग में भगवान के गुण और नामों के कीर्तन-स्मरण की बात करते हैं। उसी क्रम में वे मंत्र कहते हैं: भगवान वासुदेव को नमस्कार है, हम उनका ध्यान करते हैं; प्रद्युम्न, अनिरुद्ध और संकर्षण को भी नमस्कार है। इसके बाद बताया गया है कि जो पुरुष इन चतुर्व्यूह रूप नामों से प्रकृत मूर्ति से रहित अप्राकृत मंत्रमूर्ति भगवान यज्ञपुरुष की पूजा करता है, उसका ज्ञान पूर्ण और यथार्थ है। इसलिए यह मंत्र केवल सामान्य संबोधन नहीं है। यह वासुदेव, प्रद्युम्न, अनिरुद्ध और संकर्षण रूप भगवान के ध्यान, नमस्कार और पूजा से जुड़ा है, और भगवदर्थ कर्म तथा नाम-स्मरण की परंपरा में आता है।
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