विस्तृत उत्तर
धुंधुकारी अपने कुकर्मों के कारण प्रेत बना और बवंडर के रूप में दसों दिशाओं में भटकता रहा। वह भूख-प्यास और शीत-घाम से पीड़ित था, पर उसे कहीं आश्रय नहीं मिला। गोकर्ण ने उसे अनाथ समझकर गया में श्राद्ध किया और जहाँ-जहाँ गए, वहाँ उसका श्राद्ध करते रहे, फिर भी वह मुक्त नहीं हुआ। जब धुंधुकारी प्रेत रूप में गोकर्ण के सामने आया, तब गोकर्ण ने मंत्रित जल छिड़ककर उसे बोलने योग्य बनाया। धुंधुकारी ने मुक्ति की याचना की। अंत में सूर्यदेव के कहने पर श्रीमद्भागवत सप्ताह कराया गया। सात दिन एकाग्र श्रवण और मनन से वह प्रेत पीड़ा से मुक्त होकर दिव्य रूप में प्रकट हुआ।
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