विस्तृत उत्तर
श्रीमद्भागवतमाहात्म्य के तीसरे वर्णन के अंत में भक्ति पूछती है कि अब वह कहाँ रहे। सनकादि उसे कहते हैं कि वह धैर्य धारण करके नित्य वैष्णव भक्तों के हृदय में निवास करे। वे भक्ति को भगवान का स्वरूप देने वाली, अनन्य प्रेम उत्पन्न करने वाली और संसाररोग को नष्ट करने वाली बताते हैं। वे यह भी कहते हैं कि कलियुग के दोष भले सारे संसार पर प्रभाव डालें, पर भक्तों के हृदय में स्थित भक्ति को छू नहीं सकेंगे। उनकी आज्ञा पाकर भक्ति तुरंत हरिदासों के हृदय में विराजमान हो जाती है। स्रोत के अनुसार जिनके हृदय में श्रीहरि की भक्ति रहती है, वे निर्धन होने पर भी धन्य हैं।
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