विस्तृत उत्तर
मनुष्य का सबसे श्रेष्ठ धर्म वही बताया गया है जिससे भगवान श्रीकृष्ण में भक्ति हो। वह भक्ति किसी फल, लाभ या कामना पर आधारित नहीं होनी चाहिए। पाठ में उसे अहैतुकी कहा गया है, अर्थात जिसका कोई स्वार्थपूर्ण कारण न हो। वह अप्रतिहत भी होनी चाहिए, यानी बाधाओं से टूटने वाली नहीं, निरंतर बनी रहने वाली हो। ऐसी भक्ति से हृदय आनंदस्वरूप परमात्मा को पाकर कृतकृत्य हो जाता है। इसलिए सच्ची भक्ति केवल पूजा की बाहरी क्रिया नहीं, बल्कि निस्वार्थ, स्थिर, अखंड और भगवान कृष्ण में केंद्रित प्रेम है, जिससे आत्मा को वास्तविक संतोष मिलता है।
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