विस्तृत उत्तर
श्रीमद्भागवत के अनुसार नारदजी का अभिप्राय सुनकर वेदव्यासजी सरस्वती नदी के पवित्र तट पर अपने शम्याप्रास आश्रम में बैठे। उन्होंने आचमन करके मन को समाहित किया और भक्ति-योग से मन को निर्मल तथा एकाग्र किया। उस स्थिति में उन्होंने आदिपुरुष परमात्मा और उनके आश्रय में रहने वाली माया को देखा। उसी माया से मोहित होकर जीव, तीन गुणों से परे होते हुए भी, अपने को गुणमय मानता है और उससे उत्पन्न अनर्थ भोगता है। वेदव्यासजी ने समझा कि इन अनर्थों की शांति का सीधा साधन भगवान का भक्ति-योग है, पर संसार के लोग इसे नहीं जानते। इसी करुणा से उन्होंने परमहंसों की संहिता श्रीमद्भागवत की रचना की और फिर उसे अपने पुत्र शुकदेवजी को पढ़ाया।
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