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श्रीमद्भागवत📜 श्रीमद्भागवतमाहात्म्य 4, श्लोक 32-36⏱ 1 मिनट पठन

संन्यासी ने आत्मदेव को क्या बताया?

अंतिम अपडेट: 29 मई 2026
संक्षिप्त उत्तर

संन्यासी ने आत्मदेव को पुत्र-मोह छोड़ने, कर्म की गति को प्रबल मानने और विवेक से संसार-वासना त्यागने को कहा।

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विस्तृत उत्तर

जब संन्यासी आत्मदेव का दुख सुनते हैं, तो उनके हृदय में करुणा उत्पन्न होती है। वे योगी थे, इसलिए ललाट की रेखाएँ देखकर आत्मदेव का वृत्तांत समझ लेते हैं। वे आत्मदेव से कहते हैं कि पुत्र-प्राप्ति का मोह छोड़ दो, क्योंकि कर्म की गति बहुत प्रबल है। विवेक का आश्रय लेकर संसार की वासना छोड़नी चाहिए। वे बताते हैं कि आत्मदेव के प्रारब्ध में सात जन्म तक पुत्र नहीं है। फिर वे राजा सगर और राजा अंग का उदाहरण देकर कहते हैं कि संतान के कारण बड़े लोगों को भी दुख मिला। इसलिए आत्मदेव को कुटुंब की आशा छोड़कर संन्यास में सुख खोजने की सलाह दी जाती है।

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शास्त्रीय स्रोत
श्रीमद्भागवतमाहात्म्य 4, श्लोक 32-36
उत्तर को थोड़ा और स्पष्ट करें

संन्यासी ने आत्मदेव को क्या बताया को संदर्भ सहित समझें

संन्यासी ने आत्मदेव को क्या बताया का सबसे सीधा सार यह है: संन्यासी ने आत्मदेव को पुत्र-मोह छोड़ने, कर्म की गति को प्रबल मानने और विवेक से संसार-वासना त्यागने को कहा।

श्रीमद्भागवत जैसे विषयों में यह देखना जरूरी होता है कि बात किस परिस्थिति में लागू होती है, किन नियमों के साथ मान्य होती है और व्यवहार में इसका सही अर्थ क्या निकलता है. उपलब्ध स्रोत श्रीमद्भागवतमाहात्म्य 4, श्लोक 32-36 इस दिशा को मजबूत आधार देता है।

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उत्तर का शास्त्रीय आधार देखने के लिए श्रीमद्भागवतमाहात्म्य 4, श्लोक 32-36 के उल्लेख को ध्यान से पढ़ें।

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