विस्तृत उत्तर
श्रीमद्भागवतमाहात्म्य में वैराग्य को भक्ति का पुत्र बताया गया है, जो कलियुग में उपेक्षा के कारण उत्साहहीन और वृद्ध हो गया था। नारदजी उसे जगाने का प्रयास करते हैं, पर वेद, वेदांत और गीता-पाठ से भी वैराग्य पूरी तरह जागता नहीं। आकाशवाणी कहती है कि एक सत्कर्म करना होगा। सनकादि ऋषि उस सत्कर्म को श्रीमद्भागवत का पारायण बताते हैं। उनके अनुसार भागवत के शब्द सुनने से भक्ति, ज्ञान और वैराग्य को बड़ा बल मिलेगा, ज्ञान-वैराग्य का कष्ट मिटेगा और भक्ति को आनंद होगा। वे यह भी बताते हैं कि श्रीमद्भागवत वेद और उपनिषदों के सार से बनी हुई कथा है और व्यासदेव ने इसे भक्ति, ज्ञान और वैराग्य की स्थापना के लिये प्रकाशित किया। इसलिए स्रोत के अनुसार वैराग्य लाने का मार्ग श्रीमद्भागवत सुनना, भक्ति को हृदय में स्थापित करना और सत्संग से विवेक जगाना है।
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