विस्तृत उत्तर
श्रीमद्भागवत में बताया गया है कि वेदव्यासजी ने भक्ति-योग से भगवान और उनकी माया का दर्शन करके जीवों के अनर्थ का उपाय जाना। लोक उस उपाय को नहीं जानता था, इसलिए उन्होंने श्रीमद्भागवत संहिता की रचना की। उसी के बाद वेदव्यासजी ने श्रीमद्भागवत-संहिता की पुनरावृत्ति करके इसे अपने पुत्र शुकदेवजी को पढ़ाया। शुकदेवजी को निवृत्तिपरायण मुनि कहा गया है, अर्थात वे संसार की अपेक्षाओं से हटे हुए, आत्मा में रमण करने वाले और अत्यंत विरक्त थे। इसलिए वेदव्यासजी द्वारा भागवत का उपदेश केवल वंशगत शिक्षा नहीं था; यह भगवान की भक्ति, शोक-मोह-भय नाश और जीव-कल्याण से जुड़ी परमहंस संहिता का हस्तांतरण था।
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