विस्तृत उत्तर
विष्णु जी ने वृंदा का सतीत्व निजी इच्छा या वासना से नहीं, बल्कि धर्म-संकट के कारण भंग किया। वृंदा का अखंड पतिव्रत जालंधर को अजेय बनाए हुए था। जालंधर ने देवताओं को परास्त किया, विष्णु को अपने नगर में रहने को विवश किया और अंततः पार्वती की मर्यादा पर भी दृष्टि डाली। जब तक वृंदा का सतीत्व अक्षुण्ण था, शिव भी जालंधर का वध नहीं कर सकते थे। इसलिए लोक-रक्षा और धर्म-स्थापना के लिए विष्णु ने योगमाया से जालंधर का रूप धारण किया। यह कार्य भगवान के लिए भी अत्यंत पीड़ादायक था, इसलिए उन्होंने बाद में वृंदा का श्राप स्वीकार किया।
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