विस्तृत उत्तर
आत्मदेव के मन में संतान के अभाव का दुख इतना तीव्र था कि वे जीवन को ही धिक्कार कहने लगे। वे संन्यासी से कहते हैं कि संतानहीन जीवन धिक्कार है, संतानहीन घर धिक्कार है, संतानहीन धन धिक्कार है और संतानहीन कुल भी धिक्कार है। उनके लिये जीवन की सारी उपलब्धियाँ संतान न होने से खाली लग रही थीं। वे आगे अपने अभाग्य के उदाहरण देते हैं: वे जिस गाय को पालते हैं वह बाँझ हो जाती है, जो पेड़ लगाते हैं वह फल-फूल नहीं देता और घर में आया फल भी जल्दी सड़ जाता है। इस मानसिक स्थिति में उन्हें अपना जीवन व्यर्थ और असह्य लगने लगता है।
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