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श्रीमद्भागवत📜 श्रीमद्भागवतमाहात्म्य 4, श्लोक 27-31⏱ 1 मिनट पठन

आत्मदेव ने जीवन को धिक्कार क्यों कहा?

अंतिम अपडेट: 29 मई 2026
संक्षिप्त उत्तर

आत्मदेव ने संतानहीन जीवन, घर, धन और कुल को धिक्कार कहा क्योंकि संतान-अभाव से उन्हें सब व्यर्थ लग रहा था।

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विस्तृत उत्तर

आत्मदेव के मन में संतान के अभाव का दुख इतना तीव्र था कि वे जीवन को ही धिक्कार कहने लगे। वे संन्यासी से कहते हैं कि संतानहीन जीवन धिक्कार है, संतानहीन घर धिक्कार है, संतानहीन धन धिक्कार है और संतानहीन कुल भी धिक्कार है। उनके लिये जीवन की सारी उपलब्धियाँ संतान न होने से खाली लग रही थीं। वे आगे अपने अभाग्य के उदाहरण देते हैं: वे जिस गाय को पालते हैं वह बाँझ हो जाती है, जो पेड़ लगाते हैं वह फल-फूल नहीं देता और घर में आया फल भी जल्दी सड़ जाता है। इस मानसिक स्थिति में उन्हें अपना जीवन व्यर्थ और असह्य लगने लगता है।

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शास्त्रीय स्रोत
श्रीमद्भागवतमाहात्म्य 4, श्लोक 27-31
उत्तर को थोड़ा और स्पष्ट करें

आत्मदेव ने जीवन को धिक्कार क्यों कहा को संदर्भ सहित समझें

आत्मदेव ने जीवन को धिक्कार क्यों कहा का सबसे सीधा सार यह है: आत्मदेव ने संतानहीन जीवन, घर, धन और कुल को धिक्कार कहा क्योंकि संतान-अभाव से उन्हें सब व्यर्थ लग रहा था।

श्रीमद्भागवत जैसे विषयों में यह देखना जरूरी होता है कि बात किस परिस्थिति में लागू होती है, किन नियमों के साथ मान्य होती है और व्यवहार में इसका सही अर्थ क्या निकलता है. उपलब्ध स्रोत श्रीमद्भागवतमाहात्म्य 4, श्लोक 27-31 इस दिशा को मजबूत आधार देता है।

इसी विषय पर 5 संबंधित प्रश्न और 6 विस्तृत लेख भी उपलब्ध हैं। इसलिए इस उत्तर को शुरुआती निष्कर्ष मानें और नीचे दिए गए अगले पन्नों से पूरा संदर्भ जोड़ें।

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उत्तर का शास्त्रीय आधार देखने के लिए श्रीमद्भागवतमाहात्म्य 4, श्लोक 27-31 के उल्लेख को ध्यान से पढ़ें।

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श्रीमद्भागवत श्रेणी के दूसरे प्रश्न इस उत्तर की सीमा और उपयोग दोनों स्पष्ट करते हैं।

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यदि विस्तृत विधि या पृष्ठभूमि चाहिए, तो नीचे दिए गए लेख पहले खोलें।

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