विस्तृत उत्तर
भागवत सप्ताह के बाद गीता पाठ का विधान विरक्त श्रोता के लिये बताया गया है। कथा समाप्ति पर पुस्तक और वक्ता की पूजा, प्रसाद-तुलसी, कीर्तन, जयघोष, शंखध्वनि और दान के बाद आगे श्रोता की स्थिति के अनुसार नियम आता है। यदि श्रोता विरक्त हो, तो कर्म की शांति के लिये दूसरे दिन गीता पाठ करे। यदि श्रोता गृहस्थ हो, तो हवन करे। इससे समापन विधि श्रोता की जीवन-स्थिति के अनुसार भिन्न होती है। विरक्त के लिये गीता पाठ कर्म-शांति का साधन है, जबकि गृहस्थ के लिये अग्निहोत्र रूप हवन का विधान है। दोनों का लक्ष्य सप्ताह के बाद शुद्धि और पूर्णता देना है।
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