विस्तृत उत्तर
गोकर्ण ने धुंधुकारी को अनाथ जानकर गया में उसका श्राद्ध किया था। वे जहाँ-जहाँ तीर्थों में गए, वहाँ भी उसका श्राद्ध करते रहे। फिर भी जब धुंधुकारी प्रेत रूप में सामने आया, तब गोकर्ण को आश्चर्य हुआ और उन्होंने पूछा कि विधिपूर्वक गया पिंडदान के बाद भी तुम मुक्त क्यों नहीं हुए। धुंधुकारी ने उत्तर दिया कि सैकड़ों गया-श्राद्ध करने पर भी उसकी मुक्ति नहीं होगी। उसने गोकर्ण से कोई और उपाय सोचने को कहा। इस प्रसंग में कारण का विस्तार अलग से नहीं दिया गया, पर कथा यह दिखाती है कि उसके कुकर्म इतने भारी थे कि सामान्य श्राद्ध से मुक्ति नहीं मिली। आगे सूर्यदेव ने श्रीमद्भागवत सप्ताह को मुक्ति का उपाय बताया।
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