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श्रीमद्भागवत📜 श्रीमद्भागवतमाहात्म्य 4, श्लोक 73-76, 79⏱ 1 मिनट पठन

गोकर्ण ने संसार को असार क्यों कहा?

अंतिम अपडेट: 29 मई 2026
संक्षिप्त उत्तर

गोकर्ण ने संसार को दुखरूप, मोहक और क्षणभंगुर कहा; पुत्र, धन और शरीर को स्थायी मानना अज्ञान बताया।

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विस्तृत उत्तर

गोकर्ण संसार को असार इसलिए कहते हैं क्योंकि आत्मदेव पुत्र और धन के मोह से दुखी हो चुके थे। वे समझाते हैं कि संसार दुखरूप और मोह में डालने वाला है। पुत्र किसका है और धन किसका है; स्नेह में पड़ा मनुष्य रात-दिन जलता रहता है। गोकर्ण यह भी कहते हैं कि सुख इंद्र या चक्रवर्ती राजा को भी नहीं, बल्कि विरक्त और एकांतजीवी मुनि को है। वे आत्मदेव से कहते हैं कि शरीर हड्डी, मांस और रक्त का पिंड है; इसे अपना स्वरूप मानना छोड़ दो। पत्नी-पुत्र आदि में ममता न रखो और संसार को क्षणभंगुर देखो। इस तरह संसार की असारता नश्वरता, मोह और दुख से समझाई गई है।

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शास्त्रीय स्रोत
श्रीमद्भागवतमाहात्म्य 4, श्लोक 73-76, 79
उत्तर को थोड़ा और स्पष्ट करें

गोकर्ण ने संसार को असार क्यों कहा को संदर्भ सहित समझें

गोकर्ण ने संसार को असार क्यों कहा का सबसे सीधा सार यह है: गोकर्ण ने संसार को दुखरूप, मोहक और क्षणभंगुर कहा; पुत्र, धन और शरीर को स्थायी मानना अज्ञान बताया।

श्रीमद्भागवत जैसे विषयों में यह देखना जरूरी होता है कि बात किस परिस्थिति में लागू होती है, किन नियमों के साथ मान्य होती है और व्यवहार में इसका सही अर्थ क्या निकलता है. उपलब्ध स्रोत श्रीमद्भागवतमाहात्म्य 4, श्लोक 73-76, 79 इस दिशा को मजबूत आधार देता है।

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उत्तर का शास्त्रीय आधार देखने के लिए श्रीमद्भागवतमाहात्म्य 4, श्लोक 73-76, 79 के उल्लेख को ध्यान से पढ़ें।

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श्रीमद्भागवत श्रेणी के दूसरे प्रश्न इस उत्तर की सीमा और उपयोग दोनों स्पष्ट करते हैं।

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यदि विस्तृत विधि या पृष्ठभूमि चाहिए, तो नीचे दिए गए लेख पहले खोलें।

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