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श्रीमद्भागवत📜 श्रीमद्भागवतमाहात्म्य 1, श्लोक 31-36, 72-76⏱ 2 मिनट पठन

कलियुग में पाप और पाखंड क्यों बढ़ता है?

अंतिम अपडेट: 29 मई 2026
संक्षिप्त उत्तर

स्रोत के अनुसार लोभ, असत्य, सदाचार का अभाव, शास्त्र-अभ्यास की कमी और दिखावे से पाप-पाखंड बढ़ता है।

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विस्तृत उत्तर

श्रीमद्भागवतमाहात्म्य में पाप और पाखंड बढ़ने के कारण सीधे कलियुग के आचरण से जुड़े बताए गए हैं। नारदजी कहते हैं कि सत्य, तप, शौच, दया और दान का अभाव हो गया है। लोग उदर-भरण में लगे हैं, असत्य भाषी हैं, आलसी और मंदबुद्धि हो गए हैं। साधु कहलाने वालों में भी पाखंड और संग्रह की प्रवृत्ति आ गई है। आगे वे कहते हैं कि कुकर्मों से वस्तुओं का सार नष्ट हो गया है। भागवत कथा भी अन्न-धन के लोभ से घर-घर कराई जाने लगी है, जिससे कथा का सार चला गया। तीर्थों में भी घोर कर्म करने वाले और नास्तिक लोग रहने लगे हैं। तप में काम, क्रोध, लोभ और तृष्णा का प्रवेश बताया गया है। ध्यानयोग का फल मन को वश में न करने, लोभ, दंभ, पाखंड और शास्त्र-अभ्यास की कमी से नष्ट होता है। इसलिए स्रोत के अनुसार पाप और पाखंड तब बढ़ते हैं जब धर्म का भीतरी सत्य छोड़कर लोभ, दिखावा, असंयम और अधर्म का व्यवहार बढ़ जाता है।

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शास्त्रीय स्रोत
श्रीमद्भागवतमाहात्म्य 1, श्लोक 31-36, 72-76
उत्तर को थोड़ा और स्पष्ट करें

कलियुग में पाप और पाखंड क्यों बढ़ता है को संदर्भ सहित समझें

कलियुग में पाप और पाखंड क्यों बढ़ता है का सबसे सीधा सार यह है: स्रोत के अनुसार लोभ, असत्य, सदाचार का अभाव, शास्त्र-अभ्यास की कमी और दिखावे से पाप-पाखंड बढ़ता है।

श्रीमद्भागवत जैसे विषयों में यह देखना जरूरी होता है कि बात किस परिस्थिति में लागू होती है, किन नियमों के साथ मान्य होती है और व्यवहार में इसका सही अर्थ क्या निकलता है. उपलब्ध स्रोत श्रीमद्भागवतमाहात्म्य 1, श्लोक 31-36, 72-76 इस दिशा को मजबूत आधार देता है।

इसी विषय पर 5 संबंधित प्रश्न और 6 विस्तृत लेख भी उपलब्ध हैं। इसलिए इस उत्तर को शुरुआती निष्कर्ष मानें और नीचे दिए गए अगले पन्नों से पूरा संदर्भ जोड़ें।

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उत्तर का शास्त्रीय आधार देखने के लिए श्रीमद्भागवतमाहात्म्य 1, श्लोक 31-36, 72-76 के उल्लेख को ध्यान से पढ़ें।

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श्रीमद्भागवत श्रेणी के दूसरे प्रश्न इस उत्तर की सीमा और उपयोग दोनों स्पष्ट करते हैं।

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यदि विस्तृत विधि या पृष्ठभूमि चाहिए, तो नीचे दिए गए लेख पहले खोलें।

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