विस्तृत उत्तर
श्रीमद्भागवतमाहात्म्य में नारदजी पहले कहते हैं कि कलियुग रूपी दावानल से साधन भस्म हो गए हैं। आगे वे तपस्या के सार घटने का विशेष कारण बताते हैं। उनके अनुसार जिनका चित्त लगातार काम, क्रोध, महान लोभ और तृष्णा से व्याकुल रहता है, वे भी तपस्या का आचरण करने लगते हैं। ऐसे आचरण से तप का वास्तविक सार चला जाता है। यह बात कलियुग के व्यापक दोषों के साथ रखी गई है: सत्य, तप, शौच, दया और दान घटते हैं; लोग लोभ और पाखंड में पड़ते हैं; और साधना बाहरी रूप में रह जाती है। इसलिए स्रोत के अनुसार तपस्या का सार इसलिए घटता है क्योंकि तप के भीतर शुद्ध भाव, संयम और भगवान की ओर झुकाव के स्थान पर काम, क्रोध, लोभ, तृष्णा और दिखावा आ जाता है।
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