विस्तृत उत्तर
नारदजी पहले सिद्धांत बताते हैं कि भगवान के नाम और यश से युक्त वाणी लोगों के पापों का नाश करती है। फिर वे अपने अनुभव से यह बात समझाते हैं। पूर्वजीवन में वे वेदवादी ब्राह्मणों की दासी के पुत्र थे और चातुर्मास्य में ठहरे योगियों की सेवा करते थे। वे चंचलता छोड़कर विनम्रता से सेवा करते रहे। संतों की अनुमति से पात्रों में लगा प्रसाद एक बार खाने पर उनके पाप धुल गए और सेवा करते-करते चित्त शुद्ध हो गया। उन्हीं संतों के अनुग्रह से वे प्रतिदिन श्रीकृष्ण की मनोहर कथाएँ सुनते रहे। श्रद्धापूर्वक सुनते-सुनते भगवान में रुचि उत्पन्न हुई और रजोगुण-तमोगुण को नष्ट करने वाली भक्ति उनके हृदय में प्रकट हुई।
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