विस्तृत उत्तर
श्रीमद्भागवतमाहात्म्य में सत्संग से विवेक जागने की बात सीधे कही गई है। नारदजी सनकादि ऋषियों की शरण लेकर कहते हैं कि उनका दर्शन जीव के संपूर्ण पापों को तुरंत नष्ट करता है और संसार-दुख की अग्नि से तपे हुए लोगों पर शांति की वर्षा करता है। फिर वे कहते हैं कि जब अनेक जन्मों के संचित पुण्य का उदय होता है, तभी मनुष्य को सत्संग मिलता है। ऐसा सत्संग अज्ञान से उत्पन्न मोह और मदरूपी अंधकार का नाश करता है, और उसके बाद विवेक का उदय होता है। स्रोत के अनुसार विवेक केवल बौद्धिक जानकारी से नहीं, बल्कि पवित्र संगति से जागता है। सत्संग मनुष्य के भीतर के अज्ञान, भ्रम और अहंकार को हटाकर सही समझ पैदा करता है।
आगे क्या पढ़ें
प्रश्न से जुड़े हब और आज के उपयोगी पंचांग लिंक




