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श्रीमद्भागवत📜 श्रीमद्भागवतमाहात्म्य 4, श्लोक 34-36, 39-40⏱ 1 मिनट पठन

संन्यासी ने पुत्र मोह छोड़ने को क्यों कहा?

अंतिम अपडेट: 29 मई 2026
संक्षिप्त उत्तर

संन्यासी ने कहा कि कर्म की गति प्रबल है और पुत्र से सुख निश्चित नहीं; संतान के कारण सगर और अंग को भी दुख मिला।

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विस्तृत उत्तर

संन्यासी आत्मदेव को पुत्र-मोह छोड़ने को इसलिए कहते हैं क्योंकि वे आत्मदेव का प्रारब्ध देख चुके थे। उनके अनुसार सात जन्म तक आत्मदेव को पुत्र नहीं होना था। वे समझाते हैं कि कर्म की गति प्रबल है, इसलिए विवेक का आश्रय लेकर संसार की वासना छोड़नी चाहिए। वे राजा सगर और राजा अंग का उदाहरण देते हैं कि संतान के कारण उन्हें भी दुख मिला था। जब आत्मदेव फिर भी पुत्र मांगते हैं, तब संन्यासी कहते हैं कि विधाता के लेख को मिटाने का हठ करने से राजा चित्रकेतु को भी कष्ट उठाना पड़ा था। उनका आशय यह है कि पुत्र को सुख का निश्चित कारण मानना मोह है; दैव के प्रतिकूल होने पर पुत्र से भी दुख मिल सकता है।

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शास्त्रीय स्रोत
श्रीमद्भागवतमाहात्म्य 4, श्लोक 34-36, 39-40
उत्तर को थोड़ा और स्पष्ट करें

संन्यासी ने पुत्र मोह छोड़ने को क्यों कहा को संदर्भ सहित समझें

संन्यासी ने पुत्र मोह छोड़ने को क्यों कहा का सबसे सीधा सार यह है: संन्यासी ने कहा कि कर्म की गति प्रबल है और पुत्र से सुख निश्चित नहीं; संतान के कारण सगर और अंग को भी दुख मिला।

श्रीमद्भागवत जैसे विषयों में यह देखना जरूरी होता है कि बात किस परिस्थिति में लागू होती है, किन नियमों के साथ मान्य होती है और व्यवहार में इसका सही अर्थ क्या निकलता है. उपलब्ध स्रोत श्रीमद्भागवतमाहात्म्य 4, श्लोक 34-36, 39-40 इस दिशा को मजबूत आधार देता है।

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उत्तर का शास्त्रीय आधार देखने के लिए श्रीमद्भागवतमाहात्म्य 4, श्लोक 34-36, 39-40 के उल्लेख को ध्यान से पढ़ें।

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