विस्तृत उत्तर
संन्यासी आत्मदेव को पुत्र-मोह छोड़ने को इसलिए कहते हैं क्योंकि वे आत्मदेव का प्रारब्ध देख चुके थे। उनके अनुसार सात जन्म तक आत्मदेव को पुत्र नहीं होना था। वे समझाते हैं कि कर्म की गति प्रबल है, इसलिए विवेक का आश्रय लेकर संसार की वासना छोड़नी चाहिए। वे राजा सगर और राजा अंग का उदाहरण देते हैं कि संतान के कारण उन्हें भी दुख मिला था। जब आत्मदेव फिर भी पुत्र मांगते हैं, तब संन्यासी कहते हैं कि विधाता के लेख को मिटाने का हठ करने से राजा चित्रकेतु को भी कष्ट उठाना पड़ा था। उनका आशय यह है कि पुत्र को सुख का निश्चित कारण मानना मोह है; दैव के प्रतिकूल होने पर पुत्र से भी दुख मिल सकता है।
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