पूजा विधिशिव पूजा की सही विधि क्या है?शिव पूजा में: स्नान, बेलपत्र, पंचामृत अभिषेक (दूध-दही-घी-शहद-शक्कर), गंगाजल, भस्म त्रिपुंड, धतूरा-आक पुष्प, 'ॐ नमः शिवाय' जप, आरती और आधी परिक्रमा। बेलपत्र और जल — ये दो सबसे महत्वपूर्ण अर्पण हैं।#शिव पूजा#विधि#षोडशोपचार
पुराण परिचयशिव पुराण क्या है?शिव पुराण वेदव्यास रचित 18 महापुराणों में से एक है — 24,000 श्लोक, 7 संहिताएं। इसमें शिव के सभी स्वरूप, सती-पार्वती कथा, गणेश जन्म, 12 ज्योतिर्लिंग माहात्म्य, दक्ष यज्ञ और हलाहल पान की कथाएं हैं। शिव-विष्णु एकता का संदेश इसकी विशेषता है।#शिव पुराण#7 संहिता#शिव कथा
पौराणिक कथागणेश जी की कथा क्या है?गणेश जी का जन्म माता पार्वती ने अपने शरीर के मैल से किया। शिव जी ने अनजाने में उनका सिर काट दिया, फिर हाथी का सिर लगाकर पुनर्जीवित किया और 'प्रथम पूज्य' घोषित किया। माता-पिता की परिक्रमा से प्रथम पूज्य का वरदान मिला। परशुराम से युद्ध में एक दाँत टूटने से 'एकदंत' नाम पड़ा।#गणेश कथा#जन्म कथा#हाथी का सिर
शिव स्वरूपशिव जी का अर्धनारीश्वर रूप क्या है?अर्धनारीश्वर में शिव का आधा शरीर शिव (पुरुष/चेतना) और आधा पार्वती (स्त्री/शक्ति) का है। यह पुरुष-प्रकृति का अभेद और अद्वैत का प्रतीक है — सृष्टि के लिए दोनों तत्व अनिवार्य हैं।#अर्धनारीश्वर#शिव-पार्वती#अद्वैत
शिव स्वरूपशिव जी का नटराज रूप क्या है?नटराज शिव का नृत्य स्वरूप है। डमरू (सृष्टि), अग्नि (संहार), अभय मुद्रा (रक्षा), माया को पाँव से दबाना और उठा पाँव (मोक्ष) — ये पाँच ब्रह्मांडीय क्रियाओं के प्रतीक हैं। CERN में भी नटराज की प्रतिमा है।#नटराज#तांडव#आनंद तांडव
शिव धामकैलाश पर्वत का महत्व क्या है?कैलाश पर्वत तिब्बत में स्थित शिव-पार्वती का नित्य निवास है। यहाँ से चार पवित्र नदियां निकलती हैं। इसका आकार स्वाभाविक रूप से शिवलिंग जैसा है। कैलाश परिक्रमा (52 किमी) से सभी पाप नष्ट होते हैं।#कैलाश#पर्वत#शिव धाम
शिव ज्ञानशिव जी का तीसरा नेत्र क्या दर्शाता है?शिव का तृतीय नेत्र परम ज्ञान, कामना का दहन और महाप्रलय का प्रतीक है। यह आज्ञा चक्र (योग) का प्रतीक है। दो नेत्र सूर्य-चंद्र हैं, तृतीय नेत्र ज्ञानाग्नि है। त्रिनेत्र से शिव त्रिकाल (भूत, वर्तमान, भविष्य) देखते हैं।#तृतीय नेत्र#ज्ञान नेत्र#विनाश
पुराण परिचयशिव पुराण क्या है?शिव पुराण 18 महापुराणों में से एक है, जिसमें 24,000 श्लोक हैं। इसमें 7 संहिताएं हैं — शिव पूजा विधि, 12 ज्योतिर्लिंग कथाएं, शिव-पार्वती विवाह और मोक्ष मार्ग का वर्णन है। वेदव्यास जी इसके रचयिता हैं।#शिव पुराण#महापुराण#संहिता
पूजा विधिशिव जी की आरती कैसे करें?शिव जी की आरती पंचमुखी दीप या घी के दीप से, 'ओम जय शिव ओंकारा' के गायन के साथ, दक्षिणावर्त 7 बार घुमाते हुए करें। शंख-घंटा बजाएं और अंत में दीप की लौ आँखों से लगाएं।#आरती#शिव आरती#विधि
मंत्र ज्ञानशिव जी का महामृत्युंजय मंत्र क्या है?महामृत्युंजय मंत्र है — 'ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्। उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात्॥' यह ऋग्वेद (7.59.12) का मंत्र है। अर्थ — तीन नेत्रों वाले शिव हमें मृत्यु के बंधन से मुक्त करें।#महामृत्युंजय#मंत्र#ऋग्वेद
मंत्र ज्ञानशिव जी को प्रसन्न करने का सबसे शक्तिशाली मंत्र कौन सा है?शिव प्रसन्नता के लिए महामृत्युंजय मंत्र (ॐ त्र्यम्बकं यजामहे...) और पंचाक्षरी (ॐ नमः शिवाय) सर्वाधिक शक्तिशाली हैं। रोग-मृत्यु भय में महामृत्युंजय और मोक्ष के लिए पंचाक्षरी श्रेष्ठ है।#शक्तिशाली मंत्र#महामृत्युंजय#पंचाक्षरी
साधना विधिशिव मंत्र जप का सही समय क्या है?शिव मंत्र जप के लिए ब्रह्ममुहूर्त (4-6 बजे प्रातः) सर्वश्रेष्ठ है। प्रदोष काल (सूर्यास्त के बाद) और अर्धरात्रि भी शिव जी को प्रिय है। सोमवार और सावन माह में जप का विशेष महत्व है।#मंत्र जप#समय#ब्रह्ममुहूर्त
पूजा सामग्रीशिव जी को कौन सा भोग पसंद है?शिव जी को भांग, पंचामृत, ठंडाई, धतूरा और श्रीफल अत्यंत प्रिय हैं। खीर, रबड़ी और मखाना भी शिव भोग में शामिल होते हैं। शिव भोलेनाथ हैं — एक बेलपत्र और जल से भी प्रसन्न हो जाते हैं।#भोग#नैवेद्य#शिव प्रिय
पूजा सामग्रीशिव जी को कौन सा फूल चढ़ाना चाहिए?शिव जी को बेलपत्र सर्वाधिक प्रिय है। धतूरा, आक के फूल, नीला कमल, कनेर, जूही और चमेली भी शिव प्रिय हैं। केतकी (केवड़ा) और तुलसी शिव पूजा में वर्जित हैं।#फूल#शिव पूजा#बेलपत्र
शिव साहित्यशिव तांडव स्तोत्र किसने लिखा?शिव तांडव स्तोत्र की रचना लंकापति रावण ने की थी। जब रावण ने कैलाश उठाने का प्रयास किया और शिव ने उसका हाथ दबा दिया, तब पीड़ा में रावण ने इस अद्भुत 15-श्लोकीय स्तोत्र की रचना की।#शिव तांडव स्तोत्र#रावण#स्तोत्र
शिव ज्ञानशिवलिंग घर में रखना शुभ है या नहीं?हाँ, शिवलिंग घर में रखना शुभ है — यदि नियमित पूजा हो, उचित आकार हो और ईशान कोण में स्थापित हो। शयन कक्ष में न रखें, खंडित शिवलिंग न रखें और पूजा में अनियमितता से बचें।#शिवलिंग#घर में पूजा#वास्तु
साधना विधिशिव पंचाक्षरी मंत्र की सिद्धि कैसे करें?गुरु दीक्षा लेकर ब्रह्ममुहूर्त में रुद्राक्ष माला से 'ॐ नमः शिवाय' का सवा लाख जप (पुरश्चरण) करें। ब्रह्मचर्य, सात्विक आहार और दशांश हवन के साथ यह साधना पूर्ण होती है।#मंत्र सिद्धि#पंचाक्षरी#साधना
मंत्र ज्ञानशिव पंचाक्षरी मंत्र क्या है?शिव पंचाक्षरी मंत्र है — 'ॐ नमः शिवाय'। 'नमः शिवाय' के पाँच अक्षर (न, मः, शि, वा, य) पंचतत्वों (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश) के प्रतीक हैं। यजुर्वेद के श्री रुद्रम् में यह मंत्र मिलता है।#पंचाक्षरी मंत्र#ॐ नमः शिवाय#शिव मंत्र
पूजा विधिशिव पूजा की सही विधि क्या है?शिव पूजा में स्नान के बाद षोडशोपचार विधि से पूजन किया जाता है — पंचामृत अभिषेक, बेलपत्र, धतूरा, चंदन अर्पण, 'ॐ नमः शिवाय' जप और आरती। तुलसी व केतकी वर्जित हैं।#शिव पूजा#पूजा विधि#षोडशोपचार
माला नियमरुद्राक्ष माला से जप करने के नियम क्या हैं?पंचमुखी सर्वसाधारण। गंगाजल+दूध शुद्धि + 108 'ॐ नमः शिवाय'। सोमवार धारण। अंगूठा+मध्यमा, गौमुखी। सुमेरु न लांघें। अशुद्ध अवस्था उतारें। सरसों तेल रखरखाव।#रुद्राक्ष#माला#जप
शिव अवतारशिव के किरात अवतार में अर्जुन से युद्ध कैसे हुआ?वनवास में अर्जुन शिव की तपस्या कर रहे थे। दैत्य मूकासुर शूकर रूप में आया। किरात वेषधारी शिव और अर्जुन ने एक साथ बाण चलाए। विवाद में युद्ध हुआ, अर्जुन हारे, तब शिव प्रकट हुए और अर्जुन को पाशुपतास्त्र दिया।#किरात अवतार#अर्जुन युद्ध#पाशुपतास्त्र
अस्त्र शस्त्रपरशुराम को फरसा शिव जी से कैसे मिला?परशुराम ने कैलाश पर भगवान शिव की घोर तपस्या की। प्रसन्न शिव ने उन्हें दिव्य परशु (विद्युदभि फरसा) सहित अनेक अस्त्र दिए। इसी परशु के कारण 'राम' का नाम 'परशुराम' हो गया।#परशुराम#शिव तपस्या#परशु प्राप्ति
शिव पूजा नियमशिव की पूजा में दिशा का क्या महत्व है — उत्तर या पूर्व?उत्तर सर्वोत्तम (कैलाश दिशा), पूर्व भी शुभ, ईशान कोण (उत्तर-पूर्व) सर्वश्रेष्ठ। जलाधारी मुख उत्तर अनिवार्य। मुख उत्तर/पूर्व, पीठ दक्षिण/पश्चिम।#दिशा#उत्तर#पूर्व
हवन/यज्ञमहामृत्युंजय हवन की विधि और सामग्री क्या है?'ॐ त्र्यम्बकं...स्वाहा'। सामग्री: घी+तिल+जौ+दूर्वा+बिल्व+धतूरा+चंदन। 1,25,000 (पूर्ण) / 108 (सरल)। कब: रोग, दुर्घटना, शनि, दीर्घायु। श्वेत, रुद्राक्ष। पुरोहित=अनुशंसित।#महामृत्युंजय#हवन#विधि
शिव भक्तिशिव को प्रसन्न करने में सबसे बड़ी बाधा क्या होती है?सबसे बड़ी बाधा = अहंकार। शिव निरहंकार — अहंकारी शिव-तत्व से सर्वाधिक दूर। अन्य: अश्रद्धा/संदेह, अनियमितता, दिखावा, क्रूरता, निंदा, काम-क्रोध-लोभ, गुरु अपमान। शिव 'आशुतोष' — सच्चा, निष्कपट भक्तिभाव चाहते हैं। अहंकार त्यागें, श्रद्धा रखें — शिव दौड़े आते हैं।#बाधा#अहंकार#भक्ति दोष
शिव पूजा विधिशिवलिंग की परिक्रमा अर्धचंद्राकार क्यों की जाती है, पूरी गोल क्यों नहीं?शिवलिंग की अर्धचंद्राकार परिक्रमा इसलिए होती है क्योंकि सोमसूत्र (जलधारी) को लांघना शास्त्रों में वर्जित है। शिवलिंग से प्रवाहित जल में शिव-शक्ति की ऊर्जा होती है। बाईं ओर से आरंभ कर जलधारी तक जाएं, फिर विपरीत दिशा में लौटें — यह चंद्राकार प्रदक्षिणा कहलाती है। शिव मूर्ति की पूरी परिक्रमा हो सकती है, शिवलिंग की नहीं।#परिक्रमा#अर्धचंद्राकार#शिवलिंग
शिव साधनाशिव के 64 भैरव रूपों की उपासना कैसे करें?8 अष्ट भैरव × 8 उपभैरव = 64 भैरव। 64 भैरव उपासना = तांत्रिक, गुरु दीक्षा अनिवार्य। सामान्य भक्त: काल भैरव पूजा (कालाष्टमी), बटुक भैरव (भय निवारण)। भैरवाष्टमी = वर्ष का प्रमुख भैरव पूजा दिन। काशी काल भैरव सर्वप्रसिद्ध। 64 भैरव समूह साधना अत्यंत दुर्लभ — केवल सिद्ध गुरु मार्गदर्शन में।#अष्ट भैरव#64 भैरव#भैरव उपासना
अस्त्र शस्त्रक्या चंद्रहास शिव जी की तलवार थी?हाँ, चंद्रहास भगवान शिव की अर्धचंद्राकार दिव्य तलवार थी जो उन्होंने रावण को उसकी भक्ति पर दी थी। इसकी शक्ति वज्र के समान थी। जटायु पर प्रयोग के बाद यह शिव के पास वापस लौट गई।#चंद्रहास#शिव तलवार#रावण
अस्त्र शस्त्रचंद्रहास रावण को कैसे मिली थी?रावण ने कैलाश उठाने की कोशिश की, हाथ दबने पर शिव तांडव स्त्रोत गाकर शिव को प्रसन्न किया। शिव ने प्रसन्न होकर चंद्रहास तलवार दी — साथ में यह भी कहा कि दुरुपयोग करने पर यह वापस आ जाएगी।#चंद्रहास#रावण#शिव
शिव महिमाहलाहल विष को पीने के लिए शिव ने क्यों आगे बढ़े?शिव ने हलाहल इसलिए पिया क्योंकि उनकी अनंत करुणा थी और वे सृष्टि के स्वामी हैं। कोई अन्य देव या दानव उस विष को ग्रहण करने में सक्षम नहीं था। शिव जी की योगशक्ति और दिव्य देह ही उसे धारण कर सकती थी।#हलाहल#शिव विषपान#लोककल्याण
शिव लीलामोहिनी ने भस्मासुर का वध कैसे किया?मोहिनी ने भस्मासुर को नृत्य सिखाने के बहाने उसके साथ नाचने लगी। नृत्य के अंत में उसने अपना हाथ अपने सिर पर रखा — भस्मासुर ने नकल करते हुए अपना हाथ अपने सिर पर रखा और शिव के वरदान से स्वयं भस्म हो गया।#मोहिनी लीला#भस्मासुर वध#नृत्य छल
शिव पूजा विधिशिव पूजा में भस्म लगाने का सही तरीका और मंत्र क्या है?त्रिपुंड — तीन आड़ी रेखाएं ललाट पर (बाएं→दाएं)। तीन अंगुलियों से लगाएं। मंत्र: 'ॐ त्र्यायुषं जमदग्नेः...' (जाबालोपनिषद्) या 'ॐ नमः शिवाय'। यज्ञ/गोबर भस्म सर्वोत्तम। भस्म = वैराग्य, अनित्यता, अहंकार त्याग का प्रतीक।#भस्म#विभूति#त्रिपुंड
शिव साधनाशिव की पूजा में वामाचार और दक्षिणाचार में क्या भेद है?दक्षिणाचार = सात्विक (शुद्ध विधि, दिन में साधना, सौम्य शिव, सभी के लिए)। वामाचार = तांत्रिक (पंचमकार, रात्रि साधना, उग्र शिव/भैरव, केवल दीक्षित)। दोनों का लक्ष्य: शिव-प्राप्ति। कौलाचार = सर्वोच्च, दोनों विलीन, अद्वैत। सामान्य साधक: दक्षिणाचार श्रेष्ठ और सुरक्षित।#वामाचार#दक्षिणाचार#तंत्र
शिव पार्वती विवाहशिव की बारात को देखकर मेना ने क्या किया?शिव की भयानक बारात देखकर माता मेना रो पड़ीं और विलाप करने लगीं। उन्होंने नारद को दोष दिया। पार्वती जी ने माँ को समझाया और नारद जी ने शिव की महिमा बताई, तब जाकर मेना विवाह के लिए मान गईं।#मेना#शिव बारात#पार्वती माता
विष्णु अस्त्र शस्त्रशिव जी ने सुदर्शन चक्र विष्णु को क्यों दिया?दैत्यों के अत्याचार से देवता विवश हो गए। विष्णु ने कैलाश पर शिव की तपस्या की और एक कमल की कमी पर अपना नेत्र अर्पित किया। इस अटूट भक्ति से प्रसन्न शिव ने दैत्य-संहार के लिए विष्णु को सुदर्शन चक्र भेंट किया।#सुदर्शन चक्र#शिव विष्णु#कमल नेत्र
शिव मंदिरकाशी विश्वनाथ मंदिर में शिव पूजा की परंपरा अन्य मंदिरों से कैसे अलग है?काशी = 'अविमुक्त क्षेत्र' — शिव कभी नहीं छोड़ते (स्कन्द पुराण काशीखंड)। विशेष: पंचक्रोशी यात्रा (108 मंदिर), मणिकर्णिका स्नान अनिवार्य, सीधे गंगाजल अभिषेक, ब्रह्ममुहूर्त मंगला आरती, विस्तृत भोग, निर्माल्य अपवाद। दर्शन मात्र से मोक्ष मार्ग।#काशी विश्वनाथ#वाराणसी#परंपरा
शिव पूजाशिव विवाह पूजा कैसे करें और इसका क्या लाभ है?शिव-पार्वती विवाह का अनुष्ठान। विधि: शिवलिंग+पार्वती प्रतिमा स्थापना → पंचामृत अभिषेक → बिल्वपत्र-धतूरा अर्पण → पार्वती श्रृंगार → गठजोड़ → रामचरितमानस शिव विवाह पाठ → आरती। लाभ: विवाह बाधा निवारण, दांपत्य सुख, संतान प्राप्ति, मांगलिक दोष शांति।#शिव विवाह#शिव पार्वती पूजन#वैवाहिक सुख
शिव पूजा सामग्रीशिव की पूजा में चंदन का तिलक लगाना चाहिए या भस्म का?शैव परंपरा: भस्म (विभूति) त्रिपुंड प्रधान — शिव = भस्मधारी। चंदन भी शुभ (शीतलता, शांति)। दोनों मिलाकर भी मान्य। शिवलिंग पर सिंदूर/हल्दी/कुमकुम वर्जित।#चंदन#भस्म#तिलक
शिव पूजाशिव की पूजा में भक्ति और विधि में कौन अधिक महत्वपूर्ण है?भक्ति > विधि। शिव पुराण: शिव 'भावग्राही' — भाव देखते हैं, विधि नहीं। कन्नप्पा: विधि विरुद्ध पूजा, पर सच्ची भक्ति से शिव प्रसन्न। 'मंत्रहीनं क्रियाहीनं' श्लोक: भक्ति विधि की कमी पूर्ण करती है। विधि भी महत्वपूर्ण: अनुशासन, एकाग्रता देती है। भक्ति = आत्मा, विधि = शरीर।#भक्ति#विधि#भाव प्रधान
शिव पूजा नियमशिवलिंग पर तुलसी क्यों नहीं चढ़ाई जाती, शिव पुराण में क्या प्रमाण है?शिव पुराण/पद्म पुराण: तुलसी पूर्वजन्म में वृंदा थी — जालंधर (राक्षस) की पत्नी। शिव ने जालंधर वध किया, वृंदा ने शिव को दोषी ठहराया। वृंदा के आत्मदाह से तुलसी उत्पन्न। तुलसी विष्णु-प्रिया, शिव पूजा में वर्जित। भिन्न मत: ब्रह्म पुराण और निर्णयसिंधु में तुलसी-शिव निषेध स्पष्ट नहीं — विवादित विषय।#तुलसी#शिवलिंग#वृंदा
शिव पूजाशिव की पूजा में राहु केतु दोष निवारण कैसे करें?राहु: महामृत्युंजय सवा लाख जप+हवन, शिवलिंग पर काले तिल, काल भैरव पूजा। केतु: कुश से जलाभिषेक, गणेश पूजा, सप्तधान्य अर्पण। दोनों: रुद्राभिषेक, प्रदोष व्रत, 8/9 मुखी रुद्राक्ष, काल सर्प दोष हेतु त्र्यम्बकेश्वर/महाकाल पूजा। ज्योतिषी से कुंडली परामर्श उचित।#राहु केतु#ग्रह दोष#निवारण
शक्तिपीठ52 शक्तिपीठों की उत्पत्ति कैसे हुई — पौराणिक कथा?दक्ष यज्ञ → सती आत्मदाह → शिव तांडव → विष्णु सुदर्शन → 52 अंग 52 स्थानों पर गिरे = शक्तिपीठ। प्रत्येक = शक्ति + भैरव। कामाख्या, काशी, कालीघाट, हिंगलाज, नैना देवी प्रमुख।#52 शक्तिपीठ#उत्पत्ति#सती
शिव भक्तिशिव भक्त को विभूति कैसे लगानी चाहिए और कब?तीन अंगुलियों से ललाट पर बाएं→दाहिने तीन क्षैतिज रेखाएं = त्रिपुंड। कब: स्नान बाद/पूजा पूर्व/सोमवार/शिवरात्रि। स्रोत: यज्ञ भस्म सर्वोत्तम, मंदिर प्रसाद शुभ। लाभ: पाप नाश, रक्षा, शिव कृपा।#विभूति#भस्म#त्रिपुंड
शिव लीलाशिव ने गजासुर का वध किसके कहने पर किया?शिव ने गजासुर का वध काशी के देवताओं, ऋषियों और भक्तों की प्रार्थना पर किया। त्रिशूल से वध के बाद गजासुर ने शिव से अपनी खाल धारण करने और शव को काशी में लिंग रूप में स्थापित करने की इच्छा माँगी। शिव ने यह स्वीकार किया।#गजासुर वध#देवता प्रार्थना#कृत्तिवासा
शिव मंत्रशिव मंत्र जप में दशांश हवन का क्या नियम है?दशांश हवन = जप संख्या का 10% हवन। सवा लाख जप → 12,500 आहुतियां → 1,250 तर्पण → 125 मार्जन → 12-13 ब्राह्मण भोजन। मंत्र+'स्वाहा' बोलकर आहुति दें। शिव हवन: घी, तिल, बिल्वपत्र, समिधा (आम)। पूर्णाहुति: नारियल+घी+फल। विद्वान आचार्य मार्गदर्शन श्रेष्ठ।#दशांश हवन#पुरश्चरण#हवन विधि
शिव पार्वती विवाहशिव ने पार्वती से विवाह के लिए सुनटनर्तक रूप क्यों धारण किया?शिव ने सुनटनर्तक (ब्राह्मण) रूप इसलिए धारण किया क्योंकि वे पार्वती के प्रेम और निश्चय की परीक्षा लेना चाहते थे। पार्वती ने शिव की निंदा सुनकर भी अपना निश्चय नहीं बदला, तब शिव प्रकट हुए और विवाह स्वीकार किया।#सुनटनर्तक#शिव पार्वती परीक्षा#शिव विवाह
शिव पूजाअमरनाथ बर्फ शिवलिंग की पूजा का क्या विशेष विधान है?अमरनाथ: प्राकृतिक हिम शिवलिंग, शिव ने पार्वती को अमर कथा सुनाई। यात्रा: संकल्प, ब्रह्मचर्य, निरंतर जप। गुफा में: दर्शन + प्रार्थना + प्रसाद अर्पण। श्रावण पूर्णिमा सर्वाधिक शुभ (पूर्ण आकार)। चंद्र कलाओं से बढ़ता-घटता है। साथ पार्वती-गणेश हिम संरचनाएं भी। दर्शन से मोक्ष प्राप्ति का विधान।#अमरनाथ#बर्फ शिवलिंग#तीर्थयात्रा
यंत्रमहामृत्युंजय यंत्र स्थापित करने की विधि क्या है?सोमवार/शिवरात्रि/श्रावण। गंगाजल+पंचामृत शुद्धि। पूर्व/उत्तर दिशा। बिल्वपत्र, दूध। प्राण प्रतिष्ठा + महामृत्युंजय 108। नित्य जलाभिषेक+11/21 जप। लाभ: मृत्यु भय, रोग, ग्रह शांति, दीर्घायु।#महामृत्युंजय#यंत्र#स्थापना
शिव पूजा नियमशिवलिंग पर कौन-कौन से फूल नहीं चढ़ाने चाहिए और क्यों?शिवलिंग पर वर्जित फूल: केतकी (ब्रह्मा जी के झूठ में साक्षी — शिव का श्राप)। लाल रंग के फूल (गुड़हल आदि — शिव को श्वेत प्रिय)। कनेर। कमल (विष्णु-लक्ष्मी से संबद्ध)। शिव-प्रिय फूल: धतूरा, आंकड़े, श्वेत फूल, चमेली, बेला।#फूल#शिवलिंग#निषेध
शिव ध्यानशिव ध्यान करते समय किस चक्र पर ध्यान केंद्रित करें?आज्ञा चक्र (भ्रूमध्य) सर्वप्रचलित — शिव का तीसरा नेत्र। सहस्रार (मस्तक शीर्ष) उन्नत साधना। अनाहत (हृदय) भक्ति ध्यान। सर्वसुलभ: भ्रूमध्य + ज्योति कल्पना + 'ॐ' जप। अत्यधिक जोर से न लगाएं।#चक्र#आज्ञा#सहस्रार