विस्तृत उत्तर
आत्मदेव को फल वही संन्यासी योगी देते हैं जिनसे वे वन में तालाब के पास मिले थे। संन्यासी पहले आत्मदेव को पुत्र-मोह छोड़ने, प्रारब्ध स्वीकार करने और संन्यास का मार्ग अपनाने को समझाते हैं। पर आत्मदेव अपना आग्रह नहीं छोड़ते और पुत्र न मिलने पर प्राण त्यागने की बात कहते हैं। जब संन्यासी देखते हैं कि आत्मदेव किसी भी तरह अपना हठ नहीं छोड़ रहा, तब वे उसे एक फल देते हैं। वे कहते हैं कि इसे अपनी पत्नी को खिला देना, इससे पुत्र होगा। साथ ही पत्नी के लिये सत्य, शौच, दया, दान और एक समय भोजन जैसे एक वर्ष के नियम भी बताते हैं।
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