विस्तृत उत्तर
आत्मदेव के संतान-अभाव का कारण प्रारब्ध से समझाया गया है। जब आत्मदेव दुख से रोते हुए संन्यासी के पास जाते हैं, तो योगी संन्यासी उनके ललाट की रेखाएँ देखकर उनका वृत्तांत जान लेते हैं। वे आत्मदेव से कहते हैं कि पुत्र-प्राप्ति का मोह छोड़ो, कर्म की गति प्रबल है, विवेक का आश्रय लो और संसार की वासना छोड़ दो। फिर वे स्पष्ट कहते हैं कि उन्होंने आत्मदेव का प्रारब्ध देखा है और सात जन्म तक उन्हें पुत्र किसी प्रकार नहीं होगा। इसीलिये वे आत्मदेव को कुटुंब की आशा छोड़कर संन्यास-सुख की ओर जाने का उपदेश देते हैं।
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