विस्तृत उत्तर
संन्यासी आत्मदेव को कुटुंब की आशा छोड़कर संन्यास में सुख मानने को कहते हैं, पर आत्मदेव यह बात नहीं मानते। वे कहते हैं कि विवेक से उन्हें क्या होगा; उन्हें तो किसी भी तरह पुत्र चाहिए। वे यह भी कह देते हैं कि यदि पुत्र नहीं मिला तो वे संन्यासी के सामने ही प्राण त्याग देंगे। आत्मदेव की दृष्टि में पुत्र-पौत्र से रहित संन्यास नीरस था, जबकि पुत्र-पौत्रों से भरा गृहस्थ जीवन सरस लगता था। संन्यासी उनके इस हठ को देखकर कहते हैं कि विधाता के लेख को मिटाने का आग्रह दुख देता है। फिर भी आत्मदेव के आग्रह और दीनता को देखकर अंत में उन्हें फल दिया जाता है।
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