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श्रीमद्भागवत📜 श्रीमद्भागवतमाहात्म्य 4, श्लोक 36-40⏱ 1 मिनट पठन

आत्मदेव ने संन्यास क्यों नहीं माना?

अंतिम अपडेट: 29 मई 2026
संक्षिप्त उत्तर

आत्मदेव ने संन्यास को नीरस कहा और पुत्र-पौत्र से भरे गृहस्थ जीवन को सरस मानकर पुत्र मांगने का हठ किया।

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विस्तृत उत्तर

संन्यासी आत्मदेव को कुटुंब की आशा छोड़कर संन्यास में सुख मानने को कहते हैं, पर आत्मदेव यह बात नहीं मानते। वे कहते हैं कि विवेक से उन्हें क्या होगा; उन्हें तो किसी भी तरह पुत्र चाहिए। वे यह भी कह देते हैं कि यदि पुत्र नहीं मिला तो वे संन्यासी के सामने ही प्राण त्याग देंगे। आत्मदेव की दृष्टि में पुत्र-पौत्र से रहित संन्यास नीरस था, जबकि पुत्र-पौत्रों से भरा गृहस्थ जीवन सरस लगता था। संन्यासी उनके इस हठ को देखकर कहते हैं कि विधाता के लेख को मिटाने का आग्रह दुख देता है। फिर भी आत्मदेव के आग्रह और दीनता को देखकर अंत में उन्हें फल दिया जाता है।

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शास्त्रीय स्रोत
श्रीमद्भागवतमाहात्म्य 4, श्लोक 36-40
उत्तर को थोड़ा और स्पष्ट करें

आत्मदेव ने संन्यास क्यों नहीं माना को संदर्भ सहित समझें

आत्मदेव ने संन्यास क्यों नहीं माना का सबसे सीधा सार यह है: आत्मदेव ने संन्यास को नीरस कहा और पुत्र-पौत्र से भरे गृहस्थ जीवन को सरस मानकर पुत्र मांगने का हठ किया।

श्रीमद्भागवत जैसे विषयों में यह देखना जरूरी होता है कि बात किस परिस्थिति में लागू होती है, किन नियमों के साथ मान्य होती है और व्यवहार में इसका सही अर्थ क्या निकलता है. उपलब्ध स्रोत श्रीमद्भागवतमाहात्म्य 4, श्लोक 36-40 इस दिशा को मजबूत आधार देता है।

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उत्तर का शास्त्रीय आधार देखने के लिए श्रीमद्भागवतमाहात्म्य 4, श्लोक 36-40 के उल्लेख को ध्यान से पढ़ें।

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श्रीमद्भागवत श्रेणी के दूसरे प्रश्न इस उत्तर की सीमा और उपयोग दोनों स्पष्ट करते हैं।

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