विस्तृत उत्तर
श्रीमद्भागवतमाहात्म्य में भक्ति को कलियुग का सार कहा गया है। नारदजी बताते हैं कि पहले तीन युगों में ज्ञान और वैराग्य मुक्ति के साधन थे, पर कलियुग में केवल भक्ति ही मोक्ष कराने वाली है। वे भक्ति को घर-घर और प्रत्येक व्यक्ति के हृदय में स्थापित करने की प्रतिज्ञा करते हैं। कहा गया है कि जो जीव भक्ति से युक्त होंगे, वे पापी होने पर भी निर्भय होकर भगवान श्रीकृष्ण के धाम को प्राप्त होंगे। जिनके हृदय में प्रेमरूपिणी भक्ति रहती है, वे स्वप्न में भी यमराज को नहीं देखते, और जिनके हृदय में भक्ति महारानी का निवास है, उन्हें प्रेत, पिशाच, राक्षस या असुर छू भी नहीं सकते। आगे कहा गया है कि तप, वेद, ज्ञान और कर्म से भगवान वश में नहीं होते; वे भक्ति से वश में होते हैं। इसलिए स्रोत के अनुसार भक्ति जरूरी है क्योंकि वही कृष्ण-प्राप्ति, निर्भयता और मोक्ष का मार्ग है।
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