विस्तृत उत्तर
धुंधुली के मन में गर्भ को लेकर कई प्रकार के भय उठते हैं। वह कहती है कि फल खाने से गर्भ रहेगा, पेट बढ़ जाएगा और फिर खाया-पिया नहीं जाएगा; इससे शक्ति घटेगी और घर का काम कैसे होगा। वह सोचती है कि यदि गाँव में डाकुओं का आक्रमण हो जाए तो गर्भवती स्त्री कैसे भागेगी। उसे यह भी डर है कि यदि गर्भ पेट में ही रह गया या प्रसव के समय टेढ़ा हो गया तो प्राण संकट में पड़ जाएंगे। वह प्रसव-पीड़ा को भयंकर मानती है। साथ ही उसे सत्य, शौच आदि नियम निभाना कठिन लगता है और बच्चा जनने के बाद लालन-पालन का कष्ट दिखाई देता है। इसी भय ने उसे फल खाने से रोक दिया।
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