विस्तृत उत्तर
श्रीमद्भागवतमाहात्म्य में नारदजी कलियुग के मुख्य दोषों को विस्तार से बताते हैं। वे कहते हैं कि सत्य, तप, शौच, दया और दान का अभाव हो गया है। जीव केवल पेट भरने में लगे हैं; वे असत्य बोलते हैं, आलसी हैं, मंदबुद्धि हैं और दुर्भाग्य से पीड़ित हैं। साधु-संतों के नाम पर पाखंड बढ़ने का वर्णन है। घरों में स्त्री-पुरुषों का कलह, लोभ से कन्या-विक्रय और स्वार्थपूर्ण व्यवहार बताया गया है। तीर्थ, आश्रम और देवालय भी कलियुग के प्रभाव से आहत बताए गए हैं। नारदजी आगे कहते हैं कि योगी, सिद्ध, ज्ञानी और सच्चा सत्कर्म करने वाला दुर्लभ हो गया है। फिर वे बताते हैं कि कथा, तीर्थ, तप और ध्यानयोग का सार भी लोभ, अधर्म, काम, क्रोध, तृष्णा, पाखंड और शास्त्र-अभ्यास के अभाव से घट गया है। स्रोत के अनुसार कलियुग के मुख्य दोष हैं: असत्य, आलस्य, लोभ, पाखंड, सदाचार की कमी, धर्म का बाहरी दिखावा और साधना का सार खो जाना।
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