विस्तृत उत्तर
कलियुग में भागवत सप्ताह की जरूरत मनुष्य की स्थिति के कारण बताई गई है। सनकादि कहते हैं कि सत्य और ब्रह्मचर्य के साथ सदा श्रवण श्रेष्ठ है, लेकिन कलियुग में यह कठिन है। लंबे समय तक मन की वृत्तियों को वश में रखना, नियमों का पालन करना और पुण्यकर्म में स्थिर रहना आसान नहीं। मन के असंयम, रोगों की अधिकता, आयु की कमी और कलियुग के दोषों की संभावना के कारण सप्ताह श्रवण का विधान किया गया। आगे सूतजी कहते हैं कि कलियुग में दूसरे साधनों को पीछे रखकर यही प्रधान धर्म है, क्योंकि इससे दुख, दारिद्र्य, दुर्भाग्य और पाप मिटते हैं तथा काम-क्रोध पर विजय मिलती है।
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