रामचरितमानस — बालकाण्डराजा जनक ने सीताजी के विवाह के लिये क्या शर्त रखी थी?जो शिवजी का धनुष (पिनाक) उठाकर तोड़ दे, उसी से सीताजी का विवाह। यह जनक की प्रतिज्ञा थी। धनुष अत्यन्त भारी — हज़ारों राजा मिलकर भी हिला नहीं सके।#बालकाण्ड#जनक प्रतिज्ञा#धनुष शर्त
रामचरितमानस — बालकाण्डसीताजी ने वरदान पाकर लक्ष्मणजी और रामजी के बारे में क्या सोचा?पार्वती वरदान और नारद भविष्यवाणी के अनुसार सीताजी ने मन ही मन रामजी को अपना वर मान लिया। सखी ने कहा — पहले राजकुमार देख लो। रामजी को साँवला, सलोना, अनुपम सुन्दर पाया। जन्म-जन्मान्तर का शाश्वत प्रेम जागा।#बालकाण्ड#सीता#वरदान
रामचरितमानस — बालकाण्डजनकपुर की स्त्रियों ने श्रीरामजी के लिये सीताजी से विवाह की कामना क्यों की?रामजी को सीताजी का सबसे योग्य वर माना — अनुपम सौन्दर्य, दोनों एक दूसरे के योग्य, विधाता का उचित फल। स्त्रियों ने कहा — 'जोगु जानकिहि यह बरु अहई' — यह विवाह हो तो सब कृतार्थ होंगे।#बालकाण्ड#विवाह कामना#स्त्रियाँ
रामचरितमानस — बालकाण्डजनकपुर में श्रीरामजी को देखकर नगरवासियों ने क्या-क्या कहा?नगरवासी मुग्ध हुए — (1) जानकी के योग्य वर, (2) विधाता मिलायें तो सब कृतार्थ, (3) शंकर धनुष कठोर — चिन्ता, (4) रूप में अपार शक्ति, (5) इनका दर्शन पूर्वजन्म के पुण्य से ही मिलता है।#बालकाण्ड#नगरवासी#राम छबि
रामचरितमानस — बालकाण्डश्रीराम-लक्ष्मण ने जनकपुर में किन-किन स्थानों का भ्रमण किया?नगर भ्रमण (गलियाँ-बाज़ार), राजा का सुन्दर बाग (पुष्पवाटिका), बाग का मणि-सीढ़ियों वाला सरोवर, लता-मण्डप। 'बागु तड़ागु बिलोकि प्रभु हरषे बंधु समेत' — बाग-सरोवर देखकर भाई सहित हर्षित हुए।#बालकाण्ड#जनकपुर भ्रमण#बाग
रामचरितमानस — बालकाण्ड'प्रेम बिबस सीता पहिं आई' — कौन प्रेमविह्वल होकर सीताजी के पास आई?एक चतुर-सयानी प्रिय सखी — जिसने सीताजी को रामजी के बारे में बताया। उसके वचन सीताजी को प्रिय लगे, नेत्र अकुलाये। उसी सखी को आगे कर सीताजी चलीं। 'प्रीति पुरातन लखइ न कोई' — जन्म-जन्मान्तर का प्रेम।#बालकाण्ड#सखी#सीता
रामचरितमानस — बालकाण्डजनकपुर में सीताजी की किस प्रसिद्धि का वर्णन है?सीताजी अनुपम सौन्दर्य, शील और सुलक्षणों से प्रसिद्ध थीं। नारदजी ने 'सारे जगत में पूज्य' कहा था। सखियाँ उनकी शोभा देखकर अपने-आपको भूल जातीं। जनकपुर की स्त्रियाँ रामजी से उनके विवाह की कामना करती थीं।#बालकाण्ड#सीता प्रसिद्धि#जनकपुर
रामचरितमानस — बालकाण्ड'कोउ कह जौं ए बर बरैं तौ सखि कहा बुझाइ' — इसका अर्थ?जनकपुर की स्त्रियों का संवाद — यदि विधाता उचित फल देते हैं तो जानकी को यही वर मिलेगा, सन्देह नहीं। यदि ऐसा संयोग बने तो सब कृतार्थ होंगे — सखी कहती हैं 'ये ससुराल यहाँ आयें' इसकी आतुरता है।#बालकाण्ड#जनकपुर स्त्रियाँ#सखी संवाद
रामचरितमानस — बालकाण्डसीताजी की सखियों ने पार्वती मूर्ति का हिलना देखकर क्या कहा?सखियों ने पार्वती मूर्ति को प्रसन्न होते (हिलते/मुस्कुराते) देखकर कहा कि देवी प्रसन्न हुईं — सीताजी का मनोरथ पूरा होगा, मनवांछित वर मिलेंगे। सीताजी को बड़ा हर्ष हुआ।#बालकाण्ड#सखी#पार्वती मूर्ति
रामचरितमानस — बालकाण्डसीताजी ने पार्वती पूजन में क्या-क्या अर्पित किया?मानस में विस्तृत सामग्री वर्णन संक्षिप्त है। सीताजी ने पार्वतीजी के मन्दिर में चरणों में वन्दना की, हाथ जोड़कर स्तुति की, और प्रेमपूर्वक पूजन किया। मुख्य भाव — हृदय से प्रार्थना और मनोरथ निवेदन।#बालकाण्ड#सीता पूजन#पार्वती
रामचरितमानस — बालकाण्डसीताजी और श्रीरामजी के प्रथम दर्शन में तुलसीदासजी ने कौन सा रस वर्णित किया?श्रृंगार रस (संयोग पक्ष) — रामजी के नेत्र सीता-मुख के चकोर बने, सीताजी में पवित्र प्रीति जागी पर मृगछौनी-सी भयभीत। दोनों ने प्रेम अनुभव किया पर लोकलाज-मर्यादा से प्रकट नहीं किया। मानस का सबसे मधुर प्रसंग।#बालकाण्ड#श्रृंगार रस#प्रथम दर्शन
रामचरितमानस — बालकाण्ड'श्याम गौर किमि कहौं बखानी' — यह किसका वर्णन है?श्रीरामजी (श्याम/साँवले) और लक्ष्मणजी (गौर/गोरे) की जोड़ी का वर्णन। 'सोभा सीवँ सुभग दोउ बीरा। नील पीत जलजाभ सरीरा' — दोनों शोभा की सीमा, नील-पीत कमल समान शरीर, मोरपंख सिर पर। यह मानस में राम-लक्ष्मण की प्रसिद्ध उपाधि है।#बालकाण्ड#श्याम गौर#राम लक्ष्मण
रामचरितमानस — बालकाण्डगिरिजा (पार्वती) की मूर्ति ने सीताजी को क्या वरदान दिया?पार्वती मूर्ति ने प्रसन्न होकर मुस्कुराई और वरदान दिया — मनवांछित वर (रामजी) मिलेंगे, मनोरथ पूर्ण होगा। सखियों ने मूर्ति का हिलना देखा — 'देवी प्रसन्न हुईं।' सीताजी को बड़ा हर्ष हुआ।#बालकाण्ड#पार्वती वरदान#सीता
रामचरितमानस — बालकाण्डसीताजी ने श्रीरामजी को पहली बार देखकर क्या अनुभव किया?नारदजी के वचन स्मरण कर मन में पवित्र प्रीति जागी — 'जनु सिसु मृगी सभीत' — डरी हुई मृगछौनी की तरह चकित होकर चारों ओर देखने लगीं। दर्शन के लिये नेत्र अकुला उठे। जन्म-जन्मान्तर का प्रेम जाग उठा।#बालकाण्ड#सीता#प्रथम दर्शन
रामचरितमानस — बालकाण्डपुष्पवाटिका में श्रीरामजी ने सीताजी को पहली बार कब देखा?जब सीताजी सखियों संग फूल चुन रहीं और कंगन-किंकिनी-नूपुर की ध्वनि सुनाई दी। रामजी ने उस ओर देखा — 'सिय मुख ससि भए नयन चकोरा' — सीताजी के मुखरूपी चन्द्रमा के लिये नेत्र चकोर बन गये। दोनों का प्रथम दर्शन पुष्पवाटिका में हुआ।#बालकाण्ड#प्रथम दर्शन#पुष्पवाटिका
रामचरितमानस — बालकाण्डकिस सखी ने सीताजी को श्रीराम-लक्ष्मण के बारे में बताया?एक चतुर सयानी सखी ने — 'धरि धीरजु एक आलि सयानी। सीता सन बोली गहि पानी' — हाथ पकड़कर कहा कि गिरिजा पूजन बाद में, पहले राजकुमार को देख लो। सखी के वचन सीताजी को अत्यन्त प्रिय लगे।#बालकाण्ड#सखी#सीता
रामचरितमानस — बालकाण्डसीताजी ने माता पार्वती से कैसा वर माँगा?सीताजी ने सीधे शब्दों में नहीं कहा — 'मोर मनोरथु जानहु नीकें' — मेरा मनोरथ आप जानती हैं। नारदजी के वचन स्मरण कर मन में पवित्र प्रीति जागी — रामजी उनके वर बनें, यही हृदय भाव से प्रार्थना।#बालकाण्ड#सीता#पार्वती
रामचरितमानस — बालकाण्डसीताजी ने गिरिजा (पार्वती) मन्दिर में क्या प्रार्थना की?सीताजी ने पार्वतीजी की स्तुति की — 'जय जय गिरिबरराज किसोरी' — और कहा कि मेरा मनोरथ आप जानती हैं, आप सबके हृदय में बसती हैं, इसलिये प्रकट नहीं किया। चरण पकड़कर मनोवांछित वर (रामजी) की प्रार्थना की।#बालकाण्ड#सीता प्रार्थना#पार्वती मन्दिर
रामचरितमानस — बालकाण्डसीताजी पुष्पवाटिका में किसकी पूजा करने गयी थीं?गिरिजा (पार्वती/भवानी) की पूजा करने — माता ने भेजा था। 'तेहि अवसर सीता तहँ आई। गिरिजा पूजन जननि पठाई॥' सखियों के साथ आयीं, फूल चुने, फिर पार्वती मन्दिर में पूजा की।#बालकाण्ड#सीता#पुष्पवाटिका
रामचरितमानस — बालकाण्डजनकपुर की स्त्रियों ने श्रीराम-लक्ष्मण को देखकर क्या-क्या कहा?स्त्रियों ने कहा — (1) यह वर जानकी के योग्य है, (2) राजा देख ले तो प्रतिज्ञा छोड़कर विवाह करा दे, (3) विधाता उचित फल देते हैं तो जानकी को यही मिलेगा, (4) पर शंकर धनुष कठोर है और ये कोमल किशोर — चिन्ता भी जताई।#बालकाण्ड#जनकपुर स्त्रियाँ#राम दर्शन
रामचरितमानस — बालकाण्डश्रीराम-लक्ष्मण ने जनकपुर में प्रवेश करते समय नगर का क्या वर्णन किया?राजा का सुन्दर बाग देखा — वसन्त ऋतु छायी, मनोहर वृक्ष, रंग-बिरंगी लताओं के मण्डप, कोयल-तोते-मोर, मणियों की सीढ़ियों वाला सरोवर, निर्मल जल, कमल और भँवरे।#बालकाण्ड#जनकपुर#नगर वर्णन
रामचरितमानस — बालकाण्डश्रीराम-लक्ष्मण जनकपुर में किसके अतिथि बने?विश्वामित्रजी के साथ राजा जनक के अतिथि बने। जनक ने आदर-सत्कार किया, भोजन करवाया, आवास दिया। नगरवासी और स्त्रियाँ राम-लक्ष्मण की शोभा देखकर मुग्ध हुए।#बालकाण्ड#राम लक्ष्मण#जनकपुर
रामचरितमानस — बालकाण्डजनकपुर में राजा जनक ने विश्वामित्रजी का कैसे स्वागत किया?जनक ने ब्राह्मणों के साथ आकर दण्डवत किया, आसन दिया, चरण पखारे, भोजन करवाया। रामजी को देखकर मुग्ध हो गये — 'जनु चकोर पूरन ससि लोभा' — जैसे चकोर पूर्ण चन्द्रमा देखकर लुभा जाये।#बालकाण्ड#जनक#विश्वामित्र स्वागत
रामचरितमानस — बालकाण्डजनकपुर किसकी राजधानी थी?जनकपुर राजा जनक (विदेह/मिथिलेश) की राजधानी थी। जनक विदेह वंश के प्रतापी, विरक्त राजा थे। सीताजी उन्हीं की पुत्री थीं — इसीलिये 'जानकी' और 'वैदेही' कहलाती हैं।#बालकाण्ड#जनकपुर#राजा जनक
रामचरितमानस — बालकाण्डविश्वामित्रजी श्रीराम-लक्ष्मण को लेकर कहाँ गये?जनकपुर (मिथिला/विदेहनगर) — जहाँ राजा जनक का धनुष-यज्ञ होने वाला था। मार्ग में गंगा-स्नान किया, विश्वामित्रजी ने गंगावतरण की कथा सुनाई, फिर जनकपुर पहुँचे।#बालकाण्ड#जनकपुर#विश्वामित्र
रामचरितमानस — बालकाण्ड'अहिल्या' उद्धार का प्रसंग बालकाण्ड में किस प्रकरण के बाद आता है?ताड़का वध और यज्ञ रक्षा के बाद, जनकपुर जाते मार्ग में। एक आश्रम में शिला देखकर रामजी ने पूछा, मुनि ने कथा सुनाई, चरण-स्पर्श से उद्धार हुआ। इसके बाद गंगा तट से जनकपुर गये।#बालकाण्ड#अहल्या उद्धार#कथा क्रम
रामचरितमानस — बालकाण्डयज्ञ रक्षा के बाद विश्वामित्रजी ने क्या प्रसन्नता व्यक्त की?विश्वामित्रजी को 'महानिधि' प्राप्त हुई। उन्होंने रामजी को 'ब्रह्मण्यदेव' (ब्राह्मणों का भगवान) जाना — 'मोहि निति पिता तजेउ भगवाना' — मेरे लिये भगवान ने पिता भी छोड़ दिया। फिर जनकपुर की ओर चले।#बालकाण्ड#यज्ञ रक्षा#विश्वामित्र प्रसन्न
रामचरितमानस — बालकाण्डविश्वामित्रजी ने श्रीरामजी को कौन-कौन से दिव्यास्त्र दिये?विश्वामित्रजी ने 'विद्यानिधि' (विद्याओं के भण्डार) रामजी को अनेक विद्याएँ दीं — जिनसे भूख-प्यास न लगे, अतुलित बल-तेज प्रकट हो। मानस में विशिष्ट नाम नहीं। वाल्मीकि रामायण में बला-अतिबला आदि का विस्तार है।#बालकाण्ड#दिव्यास्त्र#विश्वामित्र
रामचरितमानस — बालकाण्डविश्वामित्रजी के यज्ञ में कौन से राक्षस बाधा डाल रहे थे?विश्वामित्रजी ने कहा — 'असुर समूह सतावहिं मोही।' मार्ग में ताड़का का वध हुआ। वाल्मीकि रामायण के अनुसार मारीच और सुबाहु मुख्य राक्षस थे। मानस में संक्षिप्त वर्णन है।#बालकाण्ड#राक्षस#यज्ञ बाधा
रामचरितमानस — बालकाण्डश्रीरामजी के चरण-स्पर्श से अहल्या का क्या हुआ?शिला से तपोमूर्ति अहल्या प्रकट हुईं — शरीर पुलकित, प्रेम से अधीर, नेत्रों से आँसुओं की धारा। चरणों में लिपटीं, स्तुति की — 'मेरा मन-भौंरा आपके चरण-रज का प्रेम-रस सदा पान करे।' आनन्दपूर्वक पतिलोक गयीं।#बालकाण्ड#अहल्या प्रकट#चरण स्पर्श
रामचरितमानस — बालकाण्डअहल्या का उद्धार कैसे हुआ?श्रीरामजी के चरण-स्पर्श से — 'परसत पद पावन सोक नसावन प्रगट भई तपपुंज सही' — पवित्र चरणों का स्पर्श पाते ही शिला से तपोमूर्ति अहल्या प्रकट हुईं। स्तुति करके आनन्दपूर्वक पतिलोक गयीं।#बालकाण्ड#अहल्या उद्धार#चरण स्पर्श
रामचरितमानस — बालकाण्डगौतम ऋषि ने अहल्या को क्या शाप दिया?शिला (पत्थर) बनने का शाप दिया — 'गौतम नारि श्राप बस उपल देह धरि धीर।' इन्द्र के छल के कारण शाप मिला। शाप-मुक्ति — भगवान राम के चरण-स्पर्श से। मानस में कारण विस्तार से नहीं बताया।#बालकाण्ड#गौतम शाप#अहल्या
रामचरितमानस — बालकाण्डअहल्या कौन थीं — किसकी पत्नी?अहल्या गौतम ऋषि की पत्नी थीं। गौतम ऋषि के शाप से शिला (पत्थर) बनी थीं। 'गौतम नारि श्राप बस उपल देह धरि धीर। चरन कमल रज चाहति कृपा करहु रघुबीर॥' — रामजी के चरण-स्पर्श की प्रतीक्षा में।#बालकाण्ड#अहल्या#गौतम ऋषि
रामचरितमानस — बालकाण्डश्रीरामजी ने ताड़का का वध कैसे किया?एक ही बाण से — 'एकहिं बान प्रान हरि लीन्हा। दीन जानि तेहि निज पद दीन्हा॥' — एक बाण से प्राण हरे और दीन जानकर निजपद (मुक्ति) दिया। भगवान शत्रु को मारकर भी कल्याण करते हैं।#बालकाण्ड#ताड़का वध#एक बाण
रामचरितमानस — बालकाण्डताड़का कौन थी?ताड़का एक भयानक राक्षसी थी — सुकेतु यक्ष की कन्या (वाल्मीकि रामायण अनुसार)। विश्वामित्रजी के यज्ञ क्षेत्र के मार्ग में रहती थी। रामजी ने एक ही बाण से उसके प्राण हरे और दीन जानकर निजपद (मुक्ति) दिया।#बालकाण्ड#ताड़का#यक्ष कन्या
रामचरितमानस — बालकाण्डविश्वामित्रजी के साथ कौन-कौन गये?श्रीरामजी और लक्ष्मणजी — दोनों भाई विश्वामित्रजी के साथ गये। 'पुरुषसिंह दोउ बीर हरषि चले मुनि भय हरन' — पुरुषों में सिंह दोनों वीर भाई मुनि का भय हरने प्रसन्न होकर चले।#बालकाण्ड#राम लक्ष्मण#विश्वामित्र
रामचरितमानस — बालकाण्डवसिष्ठजी ने राजा दशरथ को कैसे समझाया?वसिष्ठजी ने बहुत प्रकार से समझाया — राजा का सन्देह नष्ट हुआ। दशरथ ने दोनों पुत्रों को हृदय से लगाकर शिक्षा दी और विश्वामित्रजी को सौंपा — 'सौंपे भूप रिषिहि सुत बहुबिधि देइ असीस।'#बालकाण्ड#वसिष्ठ#दशरथ समझाना
रामचरितमानस — बालकाण्ड'सब सुत प्रिय मोहि प्रान कि नाई। राम देत नहिं बनइ गोसाई' — इसका अर्थ?अर्थ — सब पुत्र मुझे प्राणों समान प्यारे हैं, राम को देना सम्भव नहीं। दशरथ ने कहा — पृथ्वी, गौ, धन, प्राण सब दे दूँगा पर राम नहीं दे सकता। कहाँ भयानक राक्षस, कहाँ मेरा सुकुमार पुत्र।#बालकाण्ड#दशरथ वचन#चौपाई अर्थ
रामचरितमानस — बालकाण्डराजा दशरथ ने श्रीरामजी को देने में क्या आपत्ति जताई?दशरथ का हृदय काँपा — 'सब सुत प्रिय मोहि प्रान कि नाई। राम देत नहिं बनइ गोसाई' — सब पुत्र प्राण समान हैं, राम को देना सम्भव नहीं। कहाँ भयानक राक्षस और कहाँ मेरा सुकुमार किशोर पुत्र!#बालकाण्ड#दशरथ#पुत्र मोह
रामचरितमानस — बालकाण्डविश्वामित्रजी ने राजा दशरथ से क्या माँगा?अनुज (लक्ष्मण) समेत श्रीरघुनाथजी (रामजी) को यज्ञ रक्षा के लिये माँगा — 'अनुज समेत देहु रघुनाथा। निसिचर बध मैं होब सनाथा॥' — राक्षसों के वध से सनाथ हो जाऊँगा।#बालकाण्ड#विश्वामित्र#राम लक्ष्मण माँगा
रामचरितमानस — बालकाण्डविश्वामित्रजी राजा दशरथ के पास क्यों आये?राक्षसों के समूह विश्वामित्रजी के यज्ञ में बाधा डाल रहे थे। उन्होंने दशरथ से कहा — 'असुर समूह सतावहिं मोही' — राम-लक्ष्मण को दो, राक्षसों के वध से मैं सनाथ हो जाऊँगा।#बालकाण्ड#विश्वामित्र#दशरथ
रामचरितमानस — बालकाण्ड'राम' नाम का अर्थ वसिष्ठजी ने क्या बताया?'राम' = जो सबके हृदय में रमण करते हैं, आनन्दस्वरूप। 'र' 'आ' 'म' — अग्नि, सूर्य, चन्द्रमा का बीज। ब्रह्मा, विष्णु, शिव स्वरूप। वेदों का प्राण, निर्गुण, अनुपम, गुणनिधान।#बालकाण्ड#राम नाम अर्थ#वसिष्ठ
रामचरितमानस — बालकाण्ड'ठुमकि चलत रामचन्द्र बाजत पैंजनियाँ' — यह किस लीला का वर्णन है?श्रीरामजी की बाललीला — जब वे ठुमक-ठुमककर चलते और माता कौशल्या बुलाने जातीं तो भागते। 'निगम नेति सिव अंत न पावा। ताहि धरैं जननी हठि धावा' — जिनका अन्त वेद और शिव भी नहीं पाते, उन्हें माता हठ से पकड़ने दौड़तीं।#बालकाण्ड#ठुमकि चलत#पैंजनियाँ
रामचरितमानस — बालकाण्डश्रीरामजी की बाललीला में कौन-कौन सी लीलाएँ प्रमुख हैं?प्रमुख बाललीलाएँ — (1) कौशल्या की गोद में खेलना, (2) ठुमककर चलना-पैंजनी बजना, (3) दही-भात मुँह लपटाकर भागना, (4) धूल में लोटना, (5) ईष्टदेव का नैवेद्य खाना। सबको परम आनन्द दिया।#बालकाण्ड#बाललीला#राम
रामचरितमानस — बालकाण्डगुरु वसिष्ठजी ने चारों पुत्रों का नाम कैसे रखा — क्या अर्थ बताया?राम — सबके हृदय में रमण करने वाले, आनन्दस्वरूप। भरत — विश्व का भरण करने वाले। लक्ष्मण — लक्ष्मी के मनरूप, शेषजी के अवतार। शत्रुघ्न — शत्रुओं का नाश करने वाले। गुरु वसिष्ठजी ने गुण-अर्थ अनुसार नाम रखे।#बालकाण्ड#वसिष्ठ#नामकरण अर्थ
रामचरितमानस — बालकाण्डश्रीरामजी का नामकरण किसने किया?गुरु वसिष्ठजी ने चारों भाइयों का नामकरण किया। चूड़ाकर्म संस्कार भी गुरुजी ने करवाया। चारों नाम गुण और अर्थ के अनुसार रखे गये।#बालकाण्ड#नामकरण#वसिष्ठ
रामचरितमानस — बालकाण्डलक्ष्मण और शत्रुघ्न किसके पुत्र थे?लक्ष्मणजी और शत्रुघ्नजी राजा दशरथ और रानी सुमित्रा के पुत्र थे। लक्ष्मणजी — शीतल, सुभग, भक्त-सुखदाता, राम-कीर्ति की पताका। शत्रुघ्नजी — वीर, सुशील, भरत-अनुगामी।#बालकाण्ड#लक्ष्मण#शत्रुघ्न
रामचरितमानस — बालकाण्डभरत किसके पुत्र थे?भरतजी राजा दशरथ और रानी कैकेयी के पुत्र थे। श्रीरामजी के अनन्य भक्त — जिनका मन राम-चरणों में भौंरे की तरह सदा लगा रहता, कभी पास नहीं छोड़ता।#बालकाण्ड#भरत#कैकेयी
रामचरितमानस — बालकाण्डश्रीरामजी के तीन भाइयों के नाम क्या हैं?भरत (कैकेयी से), लक्ष्मण और शत्रुघ्न (सुमित्रा से)। चारों शील, रूप, गुण के धाम पर सुख-सागर राम सबसे अधिक। श्याम-गौर दो जोड़ियाँ — राम-लक्ष्मण (श्याम-गौर) और भरत-शत्रुघ्न।#बालकाण्ड#भरत#लक्ष्मण
रामचरितमानस — बालकाण्डश्रीरामजी के जन्म पर अयोध्या में कैसा उत्सव मना?अपार आनन्द — रानियाँ दौड़ीं, दासियाँ हर्षित, पुरवासी मगन। दशरथ को मानो ब्रह्मानन्द मिला। नगर में बधावा, मंगलगान, ब्राह्मणों को दान।#बालकाण्ड#राम जन्म उत्सव#अयोध्या