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रामचरितमानस(354)

रामचरितमानस पर शास्त्रीय व्याख्या, कथा, अर्थ, शिक्षाएँ और प्रश्नोत्तर — कुल 354 प्रश्न उपलब्ध हैं।

बालकाण्ड (321)अयोध्याकाण्डअरण्यकाण्डकिष्किन्धाकाण्ड (1)सुन्दरकाण्ड (1)लंकाकाण्डउत्तरकाण्ड
रामचरितमानस — बालकाण्ड

सप्तर्षियों ने पार्वतीजी से क्या कहकर उनकी परीक्षा ली?

सप्तर्षियों ने शिवजी को अवगुणों का भवन, निर्गुण, निलज, कुबेष, अकुल, दिगम्बर बताया। नारदजी के उपदेश की भी आलोचना की — कि जिसने सुना उसका घर बर्बाद हुआ। यह सब पार्वतीजी का संकल्प डिगाने के लिये था।

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रामचरितमानस — बालकाण्ड

देवताओं ने पार्वतीजी की परीक्षा के लिये किन्हें भेजा?

सप्तर्षियों (सात ऋषियों) को भेजा। ऋषियों ने पार्वतीजी को देखा — 'मूरतिमंत तपस्या जैसी' — मानो मूर्तिमान तपस्या ही हो। उन्होंने प्रश्न पूछे और शिवजी की निन्दा करके पार्वतीजी का संकल्प डिगाने का प्रयास किया।

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रामचरितमानस — बालकाण्ड

पार्वतीजी की तपस्या से तीनों लोकों में क्या प्रभाव पड़ा?

पार्वतीजी का शरीर तप से क्षीण हो गया, तब आकाश से ब्रह्मवाणी हुई — 'अब मिलिहहिं त्रिपुरारि' — अब शिवजी मिलेंगे। ब्रह्माजी ने कहा कि ऐसा कठोर तप किसी ने नहीं किया। सप्तर्षि जब मिलें तब इस वाणी को प्रमाण जानना।

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रामचरितमानस — बालकाण्ड

पार्वतीजी ने 'अपर्णा' नाम कैसे पाया?

'अपर्णा' = अ (बिना) + पर्णा (पत्ते) = पत्तों के बिना रहने वाली। जब पार्वतीजी ने तपस्या में सूखे पत्ते खाना भी छोड़ दिया, तब उनका नाम 'अपर्णा' पड़ा। चौपाई — 'पुनि परिहरे सुखानेउ परना। उमहि नामु तब भयउ अपरना॥'

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रामचरितमानस — बालकाण्ड

पार्वतीजी की तपस्या कितनी कठोर थी — क्या-क्या त्यागा?

क्रमशः — (1) 1000 वर्ष कन्दमूल-फल, (2) 100 वर्ष केवल साग, (3) कुछ दिन जल-वायु फिर उपवास, (4) 3000 वर्ष केवल सूखे बेलपत्र, (5) पत्ते भी छोड़े — तब 'अपर्णा' नाम पड़ा। शरीर क्षीण हुआ तब ब्रह्मवाणी हुई — 'अब मिलिहहिं त्रिपुरारि' — शिवजी मिलेंगे।

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रामचरितमानस — बालकाण्ड

पार्वतीजी ने अपनी तपस्या कहाँ की?

पार्वतीजी ने वन (बिपिन) में जाकर तपस्या की। 'उर धरि उमा प्रानपति चरना। जाइ बिपिन लागीं तपु करना॥' — शिवजी के चरणों को हृदय में धारण करके वन में तप करने लगीं। सुकुमार शरीर होने पर भी सब भोग त्याग दिये।

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रामचरितमानस — बालकाण्ड

'करै सो तपु जेहिं मिलहिं महेसू। आन उपायँ न मिटिहि कलेसू' — इसका अर्थ?

अर्थ — ऐसा तप करो जिससे शिवजी मिल जायें, दूसरे किसी उपाय से यह कष्ट नहीं मिटेगा। नारदजी ने स्पष्ट किया कि शिवजी प्राप्ति का एकमात्र मार्ग कठोर तपस्या है, कोई और उपाय काम नहीं करेगा।

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रामचरितमानस — बालकाण्ड

नारदजी ने पार्वतीजी को शिवजी प्राप्ति के लिये क्या उपाय बताया?

नारदजी ने कहा — 'करै सो तपु जेहिं मिलहिं महेसू। आन उपायँ न मिटिहि कलेसू॥' — ऐसी तपस्या करो जिससे शिवजी मिलें, दूसरा कोई उपाय काम नहीं करेगा। शिवजी दुराराध्य हैं पर आशुतोष भी हैं।

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रामचरितमानस — बालकाण्ड

नारदजी ने पार्वतीजी का हाथ देखकर क्या भविष्यवाणी की?

नारदजी ने कहा — (1) सब गुणों की खान, सुन्दर, सुशील, (2) पति को सदा प्यारी, सुहाग अचल, (3) जगत में पूज्य होगी। परन्तु एक दोष बताया — वर निर्गुण, निलज, कुबेष, अकुल, अगेह, दिगम्बर होगा — जो शिवजी के ही लक्षण हैं।

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रामचरितमानस — बालकाण्ड

नारदजी हिमवान के घर क्यों आये?

नारदजी ने पार्वतीजी के जन्म के समाचार सुनकर कौतुकवश हिमवान के घर आये। पर्वतराज ने बड़ा आदर किया। नारदजी ने पार्वतीजी का हाथ देखकर भविष्यवाणी की और शिवजी प्राप्ति के लिये तपस्या का उपाय बताया।

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रामचरितमानस — बालकाण्ड

पार्वतीजी का बचपन का क्या वर्णन है बालकाण्ड में?

नारदजी ने कहा — पार्वतीजी सब गुणों की खान हैं, स्वभाव से सुन्दर, सुशील और सयानी। सब सुलक्षणों से सम्पन्न, पति को सदा प्यारी होंगी, सुहाग अचल रहेगा। सारे जगत में पूज्य होंगी। नाम — उमा, अम्बिका, भवानी।

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रामचरितमानस — बालकाण्ड

हिमवान कौन हैं और उनकी पत्नी का क्या नाम है?

हिमवान (हिमालय) पर्वतों के राजा हैं — मानस में 'सैलराज', 'गिरिराज', 'हिमाचल' कहा गया। उनकी पत्नी का नाम मैना (मैनावती) है। इन्हीं के घर सतीजी ने पार्वती रूप में पुनर्जन्म लिया।

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रामचरितमानस — बालकाण्ड

सतीजी ने पुनर्जन्म किसके घर लिया?

सतीजी ने हिमवान (हिमालय/पर्वतराज) के घर माता मैना की कोख से पार्वती के रूप में पुनर्जन्म लिया। नारदजी ने उनका नाम बताया — उमा, अम्बिका, भवानी — और कहा कि ये सब गुणों की खान हैं।

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रामचरितमानस — बालकाण्ड

सतीजी के देहत्याग के बाद शिवजी ने क्या किया?

शिवगण दक्ष यज्ञ को नष्ट करने लगे। 'सती मरनु सुनि संभु गन लगे करन मख खीस।' मुनि भृगु ने यज्ञ की रक्षा की। मानस में यह प्रसंग संक्षिप्त है — विस्तार शिव पुराण में है। इसके बाद सीधे पार्वती जन्म की कथा आती है।

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रामचरितमानस — बालकाण्ड

'योगाग्नि' से शरीर त्यागने का क्या अर्थ है?

'योगाग्नि' = योगशक्ति से प्रकट आन्तरिक दिव्य अग्नि। यह बाहरी आग नहीं, बल्कि प्राणशक्ति और योगसाधना से शरीर के भीतर अग्नि तत्व जाग्रत करना है। यह इच्छामृत्यु का उच्चतम रूप है जो केवल सिद्ध योगी कर सकते हैं।

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रामचरितमानस — बालकाण्ड

सतीजी ने किस प्रकार अपना शरीर त्यागा?

सतीजी ने योगाग्नि (योगशक्ति से प्रकट आन्तरिक अग्नि) से शरीर त्यागा — बाहरी अग्नि में नहीं कूदीं। शिवजी को हृदय में धारण करके अपनी योगशक्ति से शरीर भस्म कर डाला।

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रामचरितमानस — बालकाण्ड

सतीजी ने दक्ष यज्ञ में अपमान सहकर क्या किया?

सतीजी ने शिवजी को हृदय में धारण करके योगाग्नि से अपना शरीर भस्म कर डाला। 'अस कहि जोग अगिनि तनु जारा। भयउ सकल मख हाहाकारा॥' — सारी यज्ञशाला में हाहाकार मच गया।

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रामचरितमानस — बालकाण्ड

दक्ष प्रजापति ने शिवजी की निन्दा क्या कहकर की?

दक्ष ब्रह्मसभा से शिवजी पर नाराज़ थे और यज्ञ में उनकी निन्दा की। सतीजी ने सभा को चेतावनी दी — जिन्होंने शिवनिन्दा की या सुनी, उन सबको तुरन्त फल मिलेगा और पिता दक्ष भी पछतायेंगे।

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रामचरितमानस — बालकाण्ड

दक्ष यज्ञ में सतीजी का क्या अपमान हुआ?

दक्ष ने सतीजी का कोई आदर नहीं किया और सभा में शिवजी की खुलकर निन्दा की। यज्ञ में शिवजी का कोई भाग नहीं रखा गया। सतीजी से यह अपमान सहा नहीं गया और उन्होंने क्रोध में सभा को डाँटा।

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रामचरितमानस — बालकाण्ड

शिवजी ने सतीजी को दक्ष यज्ञ में जाने से क्यों रोका?

तीन कारण — (1) न्योता नहीं आया — बिना बुलाये जाना अशोभनीय, (2) दक्ष का पुराना वैर — ब्रह्मसभा से शिवजी पर नाराज़, (3) 'रहइ न सीलु सनेहु न कानी' — बिना बुलाये जाने पर शील, स्नेह और मर्यादा सब नष्ट होगी।

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रामचरितमानस — बालकाण्ड

सतीजी दक्ष यज्ञ में जाने की जिद क्यों कर रही थीं?

सतीजी ने आकाश में विमान जाते देखे और शिवजी से पूछा। पता चला कि पिता दक्ष के यज्ञ में सब जा रहे हैं। शिवजी द्वारा त्यागे जाने का भारी दुख था, पिता के घर जाने का बहाना मिला। उन्होंने कहा — 'पिता भवन उत्सव परम जौं प्रभु आयसु होइ।'

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रामचरितमानस — बालकाण्ड

दक्ष प्रजापति ने यज्ञ में किसको नहीं बुलाया?

दक्ष प्रजापति ने शिवजी और सतीजी को नहीं बुलाया। दक्ष ने सब पुत्रियों को बुलाया पर शिवजी से वैर के कारण सतीजी को भुला दिया। शिवजी ने सतीजी को बिना बुलाये जाने से मना किया।

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रामचरितमानस — बालकाण्ड

सतीजी ने शिवजी की समाधि के दौरान क्या किया?

सतीजी कैलास पर रहती थीं, मन में बड़ा दुख था। 'जुग सम दिवस सिराहिं' — एक-एक दिन युग समान बीतता था। वे सोचती थीं कि मैंने रघुपति का अपमान किया और पति के वचन झूठ माने — उसका फल मिल रहा है। इस रहस्य को कोई नहीं जानता था।

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रामचरितमानस — बालकाण्ड

शिवजी ने सतीजी का त्याग करने के बाद कितने वर्ष तक समाधि लगाई?

शिवजी ने कैलास पर बड़ के पेड़ के नीचे पद्मासन लगाकर 'अखण्ड अपार' समाधि लगाई। सटीक वर्ष संख्या मानस में नहीं है, पर 'अखण्ड अपार' से बहुत लम्बी अवधि ध्वनित होती है। सतीजी के लिये एक-एक दिन युग समान बीतता था।

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रामचरितमानस — बालकाण्ड

सतीजी के सीता रूप धारण करने पर लक्ष्मणजी ने क्या किया?

लक्ष्मणजी सतीजी का बनावटी सीता वेष देखकर चकित हो गये, हृदय में भ्रम हुआ। वे बहुत गम्भीर हो गये, कुछ कह नहीं सके — क्योंकि धीरबुद्धि लक्ष्मणजी प्रभु रघुनाथजी के प्रभाव को जानते थे।

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रामचरितमानस — बालकाण्ड

'जलु पय सरिस बिकाइ देखहु प्रीति कि रीति भलि' — इस सोरठा का क्या अर्थ है?

अर्थ — प्रेम की सुन्दर रीति देखो कि जल भी दूध के साथ मिलकर दूध के भाव बिकता है। लेकिन कपटरूपी खटाई पड़ते ही दूध फट जाता है और पानी अलग हो जाता है। तात्पर्य — सतीजी के कपट (सीता रूप) ने शिवजी के प्रेम-बन्धन को तोड़ दिया।

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रामचरितमानस — बालकाण्ड

शिवजी ने सतीजी का मानसिक त्याग क्यों किया?

दो कारण — (1) सीताजी जगन्माता हैं, उनका रूप धारण करने वाली से पति-भाव रखना भक्तिमार्ग के विरुद्ध है, (2) शिवजी ने कहा 'मिटइ भगति पथु होइ अनीती' — भक्तिमार्ग नष्ट हो जायेगा। सतीजी पवित्र थीं इसलिये प्रकट में कुछ नहीं कहा, बस मन में त्याग किया।

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रामचरितमानस — बालकाण्ड

सतीजी द्वारा सीता रूप धारण करने के बाद शिवजी ने क्या निर्णय लिया?

शिवजी ने मन-ही-मन सतीजी का पत्नी रूप में त्याग करने का संकल्प किया — 'एहिं तन सतिहि भेट मोहि नाहीं।' कारण — सतीजी ने सीता रूप धारा, अतः शिवजी की दृष्टि में वे माता समान हो गयीं। प्रकट में कुछ नहीं कहा पर हृदय में बड़ा सन्ताप था।

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रामचरितमानस — बालकाण्ड

श्रीरामजी ने सतीजी को सीता रूप में पहचान लिया तो क्या कहा?

सर्वज्ञ भगवान ने सतीजी का कपट तुरन्त जान लिया। हाथ जोड़कर प्रणाम किया, पितासहित अपना नाम बताया और पूछा — 'वृषकेतु (शिवजी) कहाँ हैं? आप वन में अकेली क्यों फिर रही हैं?' — यह सुनकर सतीजी को अत्यन्त लज्जा और संकोच हुआ।

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रामचरितमानस — बालकाण्ड

सतीजी ने श्रीराम की परीक्षा लेने के लिये किसका रूप धारण किया?

सतीजी ने माता सीताजी का रूप धारण किया। दोहा — 'पुनि पुनि हृदयँ बिचारु करि धरि सीता कर रूप।' सतीजी ने सोचा कि यदि ये सचमुच परब्रह्म हैं तो सीता रूप पहचान लेंगे।

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रामचरितमानस — बालकाण्ड

शिवजी ने सतीजी को राम की परीक्षा लेने से क्यों मना किया?

शिवजी ने कहा — ये मेरे इष्टदेव श्रीरघुवीर हैं, तर्क मत करो। 'होइहि सोइ जो राम रचि राखा' — जो राम ने रचा है वही होगा। शिवजी जानते थे कि परब्रह्म की परीक्षा लेना अनुचित है और इसका परिणाम बुरा होगा, इसलिये मना किया।

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रामचरितमानस — बालकाण्ड

सतीजी को शिवजी के प्रणाम करने पर क्या संदेह हुआ?

सतीजी को दो संदेह हुए — (1) सर्वव्यापक, मायारहित परब्रह्म मनुष्य कैसे बन सकता है? (2) सर्वज्ञ भगवान अज्ञानी की तरह पत्नी को क्यों खोजेंगे? उन्हें लगा कि शिवजी ने साधारण राजपुत्र को व्यर्थ प्रणाम किया।

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रामचरितमानस — बालकाण्ड

शिवजी ने श्रीरामजी को देखकर कैसे प्रणाम किया?

शिवजी ने 'सच्चिदानन्द परमधाम' कहकर हृदय से प्रणाम किया। सतीजी से कहा — 'सोइ मम इष्टदेव रघुबीरा' — ये वही मेरे इष्टदेव श्रीरघुवीर हैं जिनकी कथा अगस्त्य ऋषि ने गाई और जिनकी सेवा ज्ञानी मुनि सदा करते हैं।

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रामचरितमानस — बालकाण्ड

शिवजी ने सती से राम को देखकर क्या कहा?

शिवजी ने श्रीरामजी को देखकर 'सच्चिदानन्द परमधाम' कहकर प्रणाम किया और उनकी शोभा में इतने मग्न हो गये कि हृदय में प्रीति रोकने से भी नहीं रुकती। इसी पर सतीजी को संदेह हुआ।

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रामचरितमानस — बालकाण्ड

रामचरितमानस में सती और शिवजी कहाँ जा रहे थे जब उन्होंने श्रीराम को देखा?

शिवजी अगस्त्य मुनि के आश्रम से रामकथा सुनकर सतीजी के साथ कैलास लौट रहे थे। मार्ग में उन्हें भगवान श्रीराम दण्डकवन में वनवासी वेष में सीताजी की खोज करते दिखे।

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रामचरितमानस — बालकाण्ड

याज्ञवल्क्यजी ने भरद्वाजजी को वही कथा सुनाई जो किसने किसको सुनाई थी?

वही कथा जो भगवान शिवजी ने माता पार्वतीजी को सुनाई थी। कथा-परम्परा: शिवजी → पार्वतीजी → अगस्त्यजी → याज्ञवल्क्यजी → भरद्वाजजी। इसीलिये मानस की मूल कथाधारा शिव-पार्वती संवाद है।

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रामचरितमानस — बालकाण्ड

भरद्वाजजी ने रामकथा सुनने की इच्छा क्यों प्रकट की?

भरद्वाजजी के मन में संदेह था — राम दशरथ के पुत्र हैं या परब्रह्म जिन्हें शिवजी जपते हैं? उन्होंने कहा कि गुरु से छिपाव करने से ज्ञान नहीं होता, इसलिये अपना अज्ञान प्रकट करके कृपानिधान से सत्य जानना चाहते हैं।

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रामचरितमानस — बालकाण्ड

भरद्वाजजी का आश्रम कहाँ था?

प्रयाग (प्रयागराज) में — गंगा-यमुना-सरस्वती के त्रिवेणी संगम के निकट। माघ मेले में ऋषि-मुनि उनके आश्रम में एकत्र होते थे।

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रामचरितमानस — बालकाण्ड

प्रयाग तीर्थराज में माघ मेले का क्या महत्व बताया गया रामचरितमानस में?

तुलसीदासजी ने संत-समाज को चलता-फिरता तीर्थराज प्रयाग कहा। रामभक्ति = गंगा, ब्रह्मविचार = सरस्वती, कर्मकथा = यमुना। यह तीर्थराज अलौकिक है और तत्काल फल देने वाला है।

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रामचरितमानस — बालकाण्ड

याज्ञवल्क्यजी और भरद्वाजजी का मिलन किस अवसर पर हुआ?

माघ मेले (मकर स्नान) के अवसर पर प्रयाग में। हर वर्ष माघ महीने में मुनिगण प्रयाग आकर स्नान करते और लौट जाते। एक बार भरद्वाजजी ने याज्ञवल्क्यजी के चरण पकड़कर उन्हें रोक लिया।

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रामचरितमानस — बालकाण्ड

मुनि भरद्वाज ने याज्ञवल्क्यजी से क्या प्रश्न किया?

भरद्वाजजी ने पूछा — 'राम कौन हैं? वे अवधेश दशरथ के कुमार जिन्होंने सीता विरह में दुख उठाया और रावण को मारा — वही राम हैं या कोई और परब्रह्म जिनको शिवजी जपते हैं? कृपया विचारकर बताइये।'

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रामचरितमानस — बालकाण्ड

रामचरितमानस में याज्ञवल्क्य-भरद्वाज संवाद कहाँ हुआ?

तीर्थराज प्रयाग (प्रयागराज) में, भरद्वाजजी के आश्रम में। माघ मेले के अवसर पर मुनि एकत्र होते थे — एक बार स्नान के बाद भरद्वाजजी ने याज्ञवल्क्यजी को रोककर रामकथा सुनने की प्रार्थना की।

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रामचरितमानस — बालकाण्ड

'कलपभेद हरिचरित सुहाए। भाँति अनेक मुनीसन्ह गाए' — इसका क्या मतलब है?

अर्थ — हर कल्प (ब्रह्मा के दिन) में भगवान की लीला भिन्न होती है, इसलिये मुनियों ने अनेक प्रकार से हरिचरित गाये हैं। इसमें संदेह न करें, प्रेमसे सुनें। वाल्मीकि, तुलसी आदि की रामकथाओं में अन्तर इसी कल्पभेद के कारण है।

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रामचरितमानस — बालकाण्ड

रामकथा को 'सौ करोड़ अपारा' क्यों कहा गया?

'नाना भाँति राम अवतारा। रामायन सत कोटि अपारा॥' — भगवान राम अनन्त अवतार लेते हैं, हर कल्प में भिन्न-भिन्न लीला होती है, इसलिये रामायणें सौ करोड़ और उससे भी अपार (अनगिनत) हैं। राम अनन्त, गुण अनन्त, कथा विस्तार असीम।

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रामचरितमानस — बालकाण्ड

मानस सरोवर की उपमा में सात काण्डों को किन सात सीढ़ियों से तुलना की गई?

सात काण्ड = सात सोपान (सीढ़ियाँ)। चौपाई — 'सप्त प्रबंध सुभग सोपाना। ग्यान नयन निरखत मन माना॥' अर्थ — सात काण्ड इस मानस-सरोवर की सुन्दर सात सीढ़ियाँ हैं जिन्हें ज्ञानरूपी नेत्रों से देखते ही मन प्रसन्न हो जाता है।

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रामचरितमानस — बालकाण्ड

तुलसीदासजी ने मानस की तुलना किस सरोवर से की है?

रामचरितमानस की तुलना पवित्र मानसरोवर से की — चार संवाद = चार घाट, सात काण्ड = सात सीढ़ियाँ (सोपान), राम-सीता यश = अमृत जल, चौपाइयाँ = पुरइन (कमलिनी), छन्द-दोहा = कमल।

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रामचरितमानस — बालकाण्ड

रामचरितमानस का नामकरण 'मानस' क्यों किया गया?

शिवजी ने इस कथा को अपने मन (मानस) में रचकर रखा था, इसीलिये प्रसन्न होकर इसका नाम 'रामचरितमानस' रखा। 'मानस' के दो अर्थ — (1) मन (शिवजी का मन), (2) पवित्र सरोवर (रामचरित का मानसरोवर)।

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रामचरितमानस — बालकाण्ड

तुलसीदासजी ने संस्कृत में क्यों नहीं लिखा — क्या कारण था?

कथा है कि संस्कृत में लिखा तो रात को सब लुप्त हो जाता। शिवजी ने स्वप्न में जनभाषा में लिखने का आदेश दिया। तुलसीदासजी ने कहा — 'संभु प्रसाद सुमति हियँ हुलसी' — शिवजी की कृपा से ही वे इस ग्रन्थ के कवि बने।

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रामचरितमानस — बालकाण्ड

रामचरितमानस किस भाषा में लिखी गई?

अवधी भाषा में। तुलसीदासजी ने श्लोक 7 में कहा — 'भाषानिबन्धमतिमञ्जुलमातनोति' अर्थात् रघुनाथजी की कथा को मनोहर भाषारचना में विस्तृत करता है। कथा है कि शिवजी ने स्वप्न में जनभाषा में लिखने का आदेश दिया।

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रामचरितमानस — बालकाण्ड

रामचरितमानस की रचना किस तिथि को पूरी हुई?

संवत् 1633 (1576 ई.) मार्गशीर्ष शुक्लपक्ष में राम विवाह के दिन पूरी हुई। आरम्भ रामनवमी (जन्म) के दिन और समाप्ति राम विवाह के दिन — कुल 2 वर्ष 7 माह 26 दिन।

#बालकाण्ड#रचना समाप्ति#संवत 1633
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