जनि डरपहु मुनि सिद्ध सुरेसा । तुम्हहि लागि धरिहउँ नर बेषा ॥ अंसन्ह सहित मनुज अवतारा । लेहउँ दिनकर बंस उदारा ॥
श्रीरामचरितमानस — बाल काण्ड
कुल 1,913 पद/श्लोक
कस्यप अदिति महातप कीन्हा । तिन्ह कहुँ मैं पुरब बर दीन्हा ॥ ते दसरथ कौसल्या रूपा । कोसलपुरीं प्रगट नरभूपा ॥
तिन्ह कें गृह अवतरिहउँ जाई । रघुकुल तिलक सो चारिउ भाई ॥ नारद बचन सत्य सब करिहउँ । परम सक्ति समेत अवतरिहउँ ॥
हरिहउँ सकल भूमि गरुआई । निर्भय होहु देव समुदाई ॥ गगन ब्रह्मबानी सुनि काना । तुरत फिरे सुर हृदय जुड़ाना ॥
जानि सभय सुर भूमि सुनि बचन समेत सनेह । गगनगिरा गंभीर भई हरनि सोक संदेह ॥ १८६ ॥
गए देव सब निज निज धामा । भूमि सहित मन कहुँ बिश्रामा ॥ जो कछु आयसु ब्रह्माँ दीन्हा । हरषे देव बिलंब न कीन्हा ॥
बनचर देह धरि छिति माहीं । अतुलित बल प्रताप तिन्ह पाहीं ॥ गिरि तरु नख आयुध सब बीरा । हरि मारग चितवहिं मतिधीरा ॥
गिरि कानन जहँ तहँ भरि पूरी । रहे निज निज अनीक रचि रूरी ॥ यह सब रुचिर चरित मैं भाषा । अब सो सुनहु जो बीचहिं राखा ॥
अवधपुरीं रघुकुलमनि राउ । बेद बिदित तेहि दसरथ नाउ ॥ धरम धुरंधर गुननिधि ग्यानी । हृदयँ भगति मति सारंगपानी ॥
निज लोकहि बिरंचि गे देवन्ह इहइ सिखाइ । बानर तनु धरि धरि महि हरि पद सेवहु जाइ ॥ १८७ ॥
एक बार भूपति मन माहीं । भै गलानि मोरें सुत नाहीं ॥ गुर गृह गयउ तुरत महिपाला । चरन लागि करि बिनय बिसाला ॥
निज दुख सुख सब गुरहि सुनायउ । कहि बसिष्ठ बहु बिधि समुझायउ ॥ धरहु धीर होइहहिं सुत चारी । त्रिभुवन बिदित भगत भय हारी ॥
सृंगी ऋषिहि बसिष्ठ बोलावा । पुत्रकाम सुभ जग्य करावा ॥ भगति सहित मुनि आहुति दीन्हें । प्रगटे अगिनि चरु कर लीन्हें ॥
जो बसिष्ठ कछु हृदयँ बिचारा । सकल काजु भा सिद्ध तुम्हारा ॥ यह हबि बाँटि देहु नृप जाई । जथा जोग जेहि भाग बनाई ॥
कौसल्यादि नारि प्रिय सब आचरन पुनीत । पति अनुकूल प्रेम दृढ़ हरि पद कमल बिनीत ॥ १८८ ॥
तबहीं रायँ प्रिय नारि बोलाईं । कौसल्यादि तहाँ चलि आइँ ॥ अर्ध भाग कौसल्यहि दीन्हा । उभय भाग आधे करि कीन्हा ॥
कैकेई कहँ नृप सो दयऊ । रह्यो सो उभय भाग पुनि भयऊ ॥ कौसल्या कैकेई हाथ धरि । दीन्ह सुमित्रहि मन प्रसन्न करि ॥
एहि बिधि गर्भसहित सब नारी । भईँ हृदयँ हरषित सुख भारी ॥ जा दिन तें हरि गर्भहिं आए । सकल लोक सुख संपति छाए ॥
मंदिर महँ सब राजहिं रानी । सोभा सील तेज की खानी ॥ सुख जुत कछुक काल चलि गयऊ । जेहिं प्रभु प्रगट सो अवसर भयऊ ॥
तब अदृश्य भए पावक सकल सभहि समुझाइ । परमानंद मगन नृप हरष न हृदयँ समाइ ॥ १८९ ॥
नौमी तिथि मधु मास पुनीता । सुकल पच्छ अभिजित हरिप्रीता ॥ मध्य दिवस अति सीत न घामा । पावन काल लोक बिश्रामा ॥
सीतल मंद सुरभि बह बाऊ । हरषित सुर संतन्ह मन चाऊ ॥ बन कुसुमित गिरिगन मनिआरा । स्रवहिं सकल सरिता अमृतधारा ॥
सो अवसर बिरंचि जब जाना । चले सकल सुर साजि बिमाना ॥ गगन बिमल संकुल सुर जूथा । गावहिं गुन गंधर्ब बरूथा ॥
बरषहिं सुमन सुअंजुलि साजी । गहगहि गगन दुंदुभी बाजी ॥ अस्तुति करहिं नाग मुनि देवा । बहुबिधि लावहिं निज निज सेवा ॥
जोग लगन ग्रह बार तिथि सकल भए अनुकूल । चर अचर हरषजुत राम जनम सुखमूल ॥ १९० ॥
सुर समूह बिनती करि पहुँचे निज निज धाम । जगनिवास प्रभु प्रगटे अखिल लोक बिश्राम ॥ १९१ ॥
भए प्रगट कृपाला दीनदयाला कौसल्या हितकारी । हरषित महतारी मुनि मन हारी अद्भुत रूप बिचारी ॥ लोचन अभिरामा तनु घनस्यामा निज आयुध भुज चारी । भूषन बनमाला नयन बिसाला सोभासिंधु खरारी ॥ कह दुइ कर जोरी अस्तुति तोरी केहि बिधि करौं अनंता । माया गुन ग्यानातीत अमाना बेद पुरान भनंता ॥ करुना सुख सागर सब गुन आगर जेहि गावहिं श्रुति संता । सो मम हित लागी जन अनुरागी भयउ प्रगट श्रीकंता ॥ ब्रह्मांड निकाया निर्मित माया रोम रोम प्रति बेद कहै । मम उर सो बासी यह उपहासी सुनत धीर मति थिर न रहै ॥ उपजा जब ग्याना प्रभु मुसुकाना चरित बहुत बिधि कीन्ह चहै । कहि कथा सुहाई मातु बुझाई जेहि प्रकार सुत प्रेम लहै ॥ माता पुनि बोली सो मति डोली तजहु तात यह रूपा । कीजै सिसुलीला अति प्रियसीला यह सुख परम अनूपा ॥ सुनि बचन सुजाना रोदन ठाना होइ बालक सुरभूपा । यह चरित जे गावहिं हरिपद पावहिं ते न परहिं भवकूपा ॥
सुनि सिसु रुदन परम प्रिय बानी । संभ्रम चलि आई सब रानी ॥ हरषित जहँ तहँ धाईं दासी । आनँद मगन सकल पुरबासी ॥
दसरथ पुत्रजन्म सुनि काना । मानहुँ ब्रह्मानंद समाना ॥ परम प्रेम मन पुलक सरीरा । चाहत उठत करत मति धीरा ॥
जाकर नाम सुनत सुभ होई । मोरें गृह आवा प्रभु सोई ॥ परमानंद पूरि मन राजा । कहा बोलाइ बजावहु बाजा ॥
गुर बसिष्ठ कहँ गयउ हँकारा । आए द्विजन सहित नृपद्वारा ॥ अनुपम बालक देखेन्हि जाई । रूप रासि गुन कहि न सिराई ॥
बिप्र धेनु सुर संत हित लीन्ह मनुज अवतार । निज इच्छा निर्मित तनु माया गुन गो पार ॥ १९२ ॥
ध्वज पताक तोरन पुर छावा । कहि न जाइ जेहि भाँति बनावा ॥ सुमनबृष्टि अकास तें होई । ब्रह्मानंद मगन सब लोई ॥
बृंद बृंद मिलि चलीं लोगाई । सहज सिंगार किएँ उठि धाई ॥ कनक कलस मंगल भरि थारा । गावत पैठहिं भूप दुआरा ॥
करि आरति नेवछावरि करहीं । बार बार सिसु चरनन्हि परहीं ॥ मागध सूत बंदिगन गायक । पावन गुन गावहिं रघुनायक ॥
सर्बस दान दीन्ह सब काहू । जेहिं पावा राखा नहिं ताहू ॥ मृगमद चंदन कुंकुम कीचा । मची सकल बीथिन्ह बिच बीचा ॥
नंदीमुख सराध करि जातकरम सब कीन्ह । हाटक धेनु बसन मनि नृप बिप्रन्ह कहँ दीन्ह ॥ १९३ ॥
कैकयसुता सुमित्रा दोऊ । सुंदर सुत जनमत भैं ओऊ ॥ वह सुख संपति समय समाजा । कहि न सकइ सारद अहिराजा ॥
अवधपुरी सोहइ एहि भाँती । प्रभुहि मिलन आई जनु राती ॥ देखि भानू जनु मन सकुचानी । तदपि बनी संध्या अनुमानी ॥
अगर धूप बहु जनु अँधिआरी । उड़इ अबीर मनहुँ अरुनारी ॥ मंदिर मनि समूह जनु तारा । नृप गृह कलस सो इंदु उदारा ॥
भवन बेदधुनि अति मृदु बानी । जनु खग मुखर समयँ जनु सानी ॥ कौतुक देखि पतंग भुलाना । एक मास तेइँ जात न जाना ॥
गृह गृह बाज बधाव सुभ प्रगटे सुषमा कंद । हरषवंत सब जहँ तहँ नगर नारि नर बृंद ॥ १९४ ॥
यह रहस्य काहू नहिं जाना । दिन मनि चले करत गुनगाना ॥ देखि महोत्सव सुर मुनि नागा । चले भवन बरनत निज भागा ॥
औरउ एक कहउँ निज चोरी । सुनु गिरिजा अति दूढ़ मति तोरी ॥ काकभुसुंडि संग हम दोऊ । मनुजरूप जानइ नहिं कोऊ ॥
परमानंद प्रेमसुख फूले । बीथिन्ह फिरहिं मगन मन भूले ॥ यह सुभ चरित जान पै सोई । कृपा राम कै जापर होई ॥
तेहि अवसर जो जेहि बिधि आवा । दीन्ह भूप जो जेहि मन भावा ॥ गज रथ तुरग हेम गो हीरा । दीन्हे नृप नानाबिधि चीरा ॥
मास दिवस कर दिवस भा मरम न जानइ कोइ । रथ समेत रबि थाकेउ निसा कवन बिधि होइ ॥ १९५ ॥
कछुक दिवस बीते एहि भाँती । जात न जानिअ दिन अरु राती ॥ नामकरन कर अवसरु जानी । भूप बोलि पठए मुनि ग्यानी ॥
करि पूजा भूपति अस भाषा । धरिअ नाम जो मुनि गुनि राखा ॥ इन्ह के नाम अनेक अनूपा । मैं नृप कहब स्वमति अनुरूपा ॥
जो आनंद सिंधु सुखरासी । सीकर तें त्रैलोक सुपासी ॥ सो सुख धाम राम अस नामा । अखिल लोक दायक बिश्रामा ॥
बिस्व भरन पोषन कर जोई । ताकर नाम भरत अस होई ॥ जाके सुमिरन तें रिपु नासा । नाम सत्रुहन बेद प्रकासा ॥
मन संतोषे सबन्हि के जहँ तहँ देहिं असीस । सकल तनय चिर जीवहुँ तुलसिदास के ईस ॥ १९६ ॥
धरे नाम गुर हृदयँ बिचारी । बेद तत्व नृप तव सुत चारी ॥ मुनि धन जन सरबस सिव प्राना । बाल केलि तेहिं सुख माना ॥
बारहि ते निज हित पति जानी । लछिमन राम चरन रति मानी ॥ भरत सत्रुहन दूनउ भाई । प्रभु सेवक जसि प्रीति बड़ाई ॥
स्याम गौर सुंदर दोउ जोरी । निरखहिं छबि जननीं तृन तोरी ॥ चारिउ सील रूप गुन धामा । तदपि अधिक सुखसागर रामा ॥
हृदयँ अनुग्रह इंदु प्रकासा । सूचत किरन मनोहर हाँसा ॥ कबहुँ उछंग कबहुँ बर पलना । मातु दुलारइ कहि प्रिय ललना ॥
लच्छन धाम राम प्रिय सकल जगत आधार । गुरु बसिष्ठ तेहि राखा लछिमन नाम उदार ॥ १९७ ॥
काम कोटि छबि स्याम सरीरा । नील कंज बारिद गंभीरा ॥ अरुन चरन पंकज नख जोती । कमल दलन्हि बैठे जनु मोती ॥
रेख कुलिस ध्वज अंकुस सोहे । नूपुर धुनि सुनि मुनि मन मोहे ॥ कटि किंकिनी उदर त्रय रेखा । नाभि गभीर जान जेहि देखा ॥
भुज बिसाल भूषन जुत भूरी । हियँ हरि नख अति सोभा रूरी ॥ उर मनिहार पदिक की सोभा । बिप्र चरन देखत मन लोभा ॥
कंबु कंठ अति चिबुक सुहाई । आनन अमित मदन छबि छाई ॥ दुइ दुइ दसन अधर अरुनारे । नासा तिलक को बरनै पारे ॥
सुंदर श्रवन सुचारु कपोला । अति प्रिय मधुर तोतरे बोला ॥ चिक्कन कच कुंचित गभुआरे । बहु प्रकार रचि मातु सँवारे ॥
पीत झगुलिआ तनु पहिराई । जानु पानि बिचरनि मोहि भाई ॥ रूप सकहिं नहिं कहि श्रुति सेषा । सो जानइ सपनेहुँ जेहि देखा ॥
व्यापक ब्रह्म निरंजन निर्गुन बिगत बिनोद । सो अज प्रेम भगति बस कौसल्या के गोद ॥ १९८ ॥
एहि बिधि राम जगत पितु माता । कोसलपुर बासिन्ह सुखदाता ॥ जिन्ह रघुनाथ चरन रति मानी । तिन्ह की यह गति प्रगट भवानी ॥
रघुपति बिमुख जतन कर कोरी । कवन सकइ भव बंधन छोरी ॥ जीव चराचर बस कै राखे । सो माया प्रभु सों भय भाखे ॥
भृकुटि बिलास नचावइ ताही । अस प्रभु छाड़ि भजिअ कहु काही ॥ मन क्रम बचन छाड़ि चतुराई । भजत कृपा करिहहिं रघुराई ॥
एहि बिधि सिसुबिनोद प्रभु कीन्हा । सकल नगरबासिन्ह सुख दीन्हा ॥ लै उछंग कबहुँक हलरावै । कबहुँ पालने घालि झुलावै ॥
सुख संदोह मोहपर ग्यान गिरा गोतीत । दंपति परम प्रेम बस कर सिसुचरित पुनीत ॥ १९९ ॥
एक बार जननीं अन्हवाएँ । करि सिंगार पलनाँ पौढ़ाएँ ॥ निज कुल इष्टदेव भगवाना । पूजा हेतु कीन्ह अस्नाना ॥
करि पूजा नैबेद्य चढ़ावा । आपु गई जहाँ पाक बनावा ॥ बहुरि मातु तहवाँ चलि आई । भोजन करत देख सुत जाई ॥
गै जननी सिसु पहिं भयभीता । देखा बाल तहँ पुनि सूता ॥ बहुरि आइ देखा सुत सोई । हृदयँ कंप मन धीर न होई ॥
इहाँ उहां दुइ बालक देखा । मतिभ्रम मोर कि आन बिसेषा ॥ देखि राम जननी अकुलानी । प्रभु हँसि दीन्ह मधुर मुसुकानी ॥
प्रेम मगन कौसल्या निसि दिन जात न जान । सुत सनेह बस माता बालचरित कर गान ॥ २०० ॥
अगनित रवि ससि सिव चतुरानन । बहु गिरि सरित सिंधु महि कानन ॥ काल कर्म गुन ग्यान सुभाऊ । सोउ देखा जो सुना न काऊ ॥
देखी माया सब बिधि गाढ़ी । अति सभीत जोरें कर ठाढ़ी ॥ देखा जीव नचावइ जाही । देखी भगति जो छोरइ ताही ॥
तन पुलकित मुख बचन न आवा । नयन मूदि चरणनि सिर नावा ॥ बिसमयवंत देखि महतारी । भए बहुरि सिसुरूप खरारी ॥
अस्तुति करि न जाइ भय माना । जगत पिता मैं सुत करि जाना ॥ हरि जननी बहुबिधि समुझाई । यह जनि कतहूँ कहसि सुनु माई ॥
देखरावा मातहि निज अद्भुत रूप अखंड । रोम रोम प्रति लागे कोटि कोटि ब्रह्मंड ॥ २०१ ॥
बालचरित हरि बहुबिधि कीन्हा । अति अनंद दासन्ह कहँ दीन्हा ॥ कछुक काल बीतें सब भाई । बड़े भए परिजन सुखदाई ॥
चूड़ाकरन कीन्ह गुर जाई । बिप्रन्ह पुनि दच्छिना बहु पाई ॥ परम मनोहर चरित अपारा । करत फिरत चारिउ सुकुमारा ॥
मन क्रम बचन अगोचर जोई । दसरथ अजिर बिचर प्रभु सोई ॥ भोजन करत बोल जब राजा । नहिं आवत तजि बाल समाजा ॥
कौसल्या जब बोलन जाई । ठुमुकु ठुमुकु प्रभु चलहिं पराई ॥ निगम नेति सिव अंत न पावा । ताहि धरै जननी हठि धावा ॥
धूसर धूरि भरें तनु आए । भूपति बिहसि गोद बैठाए ॥
बार बार कौसल्या बिनय करइ कर जोरि । अब जनि कबहूँ ब्यापै प्रभु मोहि माया तोरि ॥ २०२ ॥
बालचरित अति सरल सुहाए । सारद सेष संभु श्रुति गाए ॥ जिन्ह कर मन इन्ह सन नहिं राता । ते जन बंचित किए बिधाता ॥
भए कुमार जबहिं सब भ्राता । दीन्ह जनेऊ गुर पितु माता ॥ गुरगृहँ गए पढ़न रघुराई । अलप काल बिद्या सब आई ॥
जाकी सहज स्वास श्रुति चारी । सो हरि पढ़ यह कौतुक भारी ॥ बिद्या बिनय निपुन गुन सीला । खेलहिं खेल सकल नृप लीला ॥
करतल बान धनुष अति सोहा । देखत रूप चराचर मोहा ॥ जिन्ह बीथिन्ह बिहरहिं सब भाई । थकित होहिं सब लोग लुगाई ॥
भोजन करत चपल चित इत उत अवसर पाइ । भाजि चले किलकत मुख दधि ओदन लपटाइ ॥ २०३ ॥
बंधु सखा संग लेहिं बोलाई । बन मृगया नित खेलहिं जाई ॥ पावन मृग मारहिं जियँ जानी । दिन प्रति नृपहिं देखावहिं आनी ॥
जे मृग राम बान के मारे । ते तनु तजि सुरलोक सिधारे ॥ अनुज सखा संग भोजन करहीं । मातु पिता अग्या अनुसरहीं ॥
जेहि बिधि सुखी होहिं पुर लोगा । करहिं कृपानिधि सोइ संजोगा ॥ बेद पुरान सुनहिं मन लाई । आपु कहहिं अनुजन्ह समुझाई ॥
प्रातकाल उठि कै रघुनाथा । मातु पिता गुर नावहिं माथा ॥ आयसु मागि करहिं पुर काजा । देखि चरित हरषइ मन राजा ॥
कोसलपुर बासी नर नारि बृद्ध अरु बाल । प्रानहु तें प्रिय लागत सब कहुँ राम कृपाल ॥ २०४ ॥
यह सब चरित कहा मैं गाई । आगिलि कथा सुनहु मन लाई ॥ बिस्वामित्र महामुनि ग्यानी । बसहिं बिपिन सुभ आश्रम जानी ॥
जहँ जप जग्य जोग मुनि करहीं । अति मारीच सुबाहुहि डरहीं ॥ देखत जग्य निसाचर धावहिं । करहिं उपद्रव मुनि दुख पावहिं ॥
गाधितनय मन चिंता ब्यापी । हरि बिनु मरहिं न निसिचर पापी ॥ तब मुनिबर मन कीन्ह बिचारा । प्रभु अवतरेउ हरन महि भारा ॥
एहूँ मिस देखौं पद जाई । करि बिनती आनौं दोउ भाई ॥ ग्यान बिराग सकल गुन अयना । सो प्रभु मैं देखब भरि नयना ॥
ब्यापक अकल अनीह अज निर्गुन नाम न रूप । भगत हेतु नाना बिधि करत चरित्र अनूप ॥ २०५ ॥
मुनि आगमन सुना जब राजा । मिलन गयउ लै बिप्र समाजा ॥ करि दंडवत मुनिहि सनमानी । निज आसन बैठारेंन्हि आनी ॥
चरन पखारि कीन्हि अति पूजा । मो सम आजु धन्य नहिं दूजा ॥ बिबिध भाँति भोजन करवावा । मुनिबर हृदयँ हरष अति पावा ॥
पुनि चरणनि मेले सुत चारी । राम देखि मुनि देह बिसारी ॥ भए मगन देखत मुख सोभा । जनु चकोर पूरन ससि लोभा ॥
तब मन हरषि बचन कह राऊ । मुनि अस कृपा न कीन्हिहु काऊ ॥ केहि कारन आगमन तुम्हारा । कहहु सो करत न लावौं बारा ॥
असुर समूह सतावहिं मोही । मैं जाचन आयउँ नृप तोही ॥ अनुज समेत देहु रघुनाथा । निसिचर बध मैं होब सनाथा ॥
बहुबिधि करत मनोरथ जात लागि नहिं बार । करि मज्जन सरजू जल गए भूप दरबार ॥ २०६ ॥
सुनि राजा अति अप्रिय बानी । हृदयँ कंप मुख दुति कुमुलानी ॥ चौथेंपन पाएँ सुत चारी । बिप्र बचन नहिं कहेहु बिचारी ॥
मागहु भूमि धेनु धन कोसा । सर्वस देउँ आजु सहरोसा ॥ देह प्रान तें प्रिय कछु नाहीं । सोउ मुनि देउँ निमिष एक माहीं ॥
सब सुत प्रिय मोहि प्रान कि नाई । राम देत नहिं बनइ गोसाई ॥ कहँ निसिचर अति घोर कठोरा । कहँ सुंदर सुत परम किसोरा ॥
सुनि नृप गिरा प्रेम रस सानी । हृदयँ हरष माना मुनि ग्यानी ॥ तब बसिष्ठ बहुबिधि समुझावा । नृप संदेह नास कहुँ पावा ॥
अति आदर दोउ तनय बोलाए । हृदयँ लाइ बहु भाँति सिखाए ॥ मेरे प्रान नाथ सुत दोऊ । तुम्ह मुनि पिता आन नहिं कोऊ ॥
देहु भूप मन हरषित तजहु मोह अग्यान । धरम सुजस प्रभु तुम्ह कौ इन्ह कहुँ अति कल्यान ॥ २०७ ॥
पुरुषसिंह दोउ बीर हरषि चले मुनि भय हरन । कृपासिंधु मतिधीर अखिल बिस्व कारन करन ॥ २०८ (ख) ॥
अरुन नयन उर बाहु बिसाला । नील जलज तनु स्याम तमाला ॥ कटि पट पीत कसें बर भाथा । रुचिर चाप सायक दुइ हाथा ॥
स्याम गौर सुंदर दोउ भाई । बिस्वामित्र महानिधि पाई ॥ प्रभु ब्रह्मन्यदेव मैं जाना । मोहि निति पिता तजेउ भगवाना ॥
चले जात मुनि दीन्हि देखाई । सुनि ताड़का क्रोध करि धाई ॥ एकहि बान प्रान हरि लीन्हा । दीन जानि तेहि निज पद दीन्हा ॥
तब ऋषि निज नाथहि जियँ चीन्ही । बिद्यानिधि कहुँ बिद्या दीन्ही ॥ जाते लाग न छुधा पिपासा । अतुलित बल तनु तेज प्रकासा ॥
सौंपे भूप ऋषिहि सुत बहुबिधि देइ असीस । जननी भवन गए प्रभु चले नाइ पद सीस ॥ २०८ (क) ॥
प्रात कहा मुनि सन रघुराई । निर्भय जग्य करहु तुम्ह जाई ॥ होम करन लागे मुनि झारी । आपु रहे मख कीं रखवारी ॥
सुनि मारीच निसाचर क्रोही । लै सहाय धावा मुनिद्रोही ॥ बिनु फर बान राम तेहि मारा । सत जोजन गा सागर पारा ॥
पावक सर सुबाहु पुनि मारा । अनुज निसाचर कटकु सँघारा ॥ मारि असुर द्विज निर्मयकारी । अस्तुति करहिं देव मुनि झारी ॥
तहँ पुनि कछुक दिवस रघुराया । रहे कीन्हि बिप्रन्ह पर दाया ॥ भगति हेतु बहु कथा पुराना । कहे बिप्र जद्यपि प्रभु जाना ॥
तब मुनि सादर कहा बुझाई । चरित एक प्रभु देखिअ जाई ॥ धनुषजग्य मुनि रघुकुल नाथा । हरषि चले मुनिबर के साथा ॥
आश्रम एक दीख मग माहीं । खग मृग जीव जंतु तहँ नाहीं ॥ पूछा मुनिहि सिला प्रभु देखी । सकल कथा मुनि कहा बिसेषी ॥
आयुध सर्व समर्पि कै प्रभु निज आश्रम आनि । कंद मूल फल भोजन दीन्ह भगति हित जानि ॥ २०९ ॥
गौतम नारि श्राप बस उपल देह धरि धीर । चरन कमल रज चाहति कृपा करहु रघुबीर ॥ २१० ॥
परसत पद पावन सोक नसावन प्रगट भई तपपुंज सही । देखत रघुनायक जन सुख दायक सनमुख होइ कर जोरि रही ॥ अति प्रेम अधीरा पुलक सरीरा मुख नहिं आवइ बचन कही । अतिसय बड़भागी चरनन्हि लागी जुगल नयन जलधार बही ॥ धीरजु मन कीन्हा प्रभु कहुँ चीन्हा रघुपति कृपाँ भगति पाई । अति निर्मल बानीं अस्तुति ठानी ग्यानगम्य जय रघुराई ॥ मै नारि अपावन प्रभु जग पावन रावन रिपु जन सुखदाई । राजीव बिलोचन भव भय मोचन पाहि पाहि सरनहिं आई ॥ मुनि श्राप जो दीन्हा अति भल कीन्हा परम अनुग्रह मैं माना । देखेउँ भरि लोचन हरि भवमोचन इहइ लाभ संकर जाना ॥ बिनती प्रभु मोरी मैं मति भोरी नाथ न मागउँ बर आना । पद कमल परागा रस अनुरागा मम मन मधुप करै पाना ॥ जेहिं पद सुरसरिता परम पुनीता प्रगट भई सिव सीस धरी । सोइ पद पंकज जेहि पूजत अज मम सिर धरेउ कृपाल हरी ॥ एहि भाँति सिधारी गौतम नारी बार बार हरि चरन परी । जो अति मन भावा सो बरु पावा गै पतिलोक अनंद भरी ॥
चले राम लछिमन मुनि संगा । गए जहाँ जग पावनि गंगा ॥ गाधिसूनु सब कथा सुनाई । जेहि प्रकार सुरसरि महि आई ॥
तब प्रभु रिषिन्ह समेत नहाए । बिबिध दान महिदेवन्हि पाए ॥ हरषि चले मुनि बृंद सहाया । बेगि बिदेह नगर निअराया ॥
पुर रम्यता राम जब देखी । हरषे अनुज समेत बिसेषी ॥ बापीं कूप सरित सर नाना । सलिल सुधासम मनि सोपाना ॥
गुंजत मंजु मत्त रस भृंगा । कूजत कल बहुबरन बिहंगा ॥ बरन बरन बिकसे बन जाता । त्रिबिध समीर सदा सुखदाता ॥
अस प्रभु दीनबंधु हरि कारन रहित दयाल । तुलसिदास सठ तेहि भजु छाड़ि कपट जंजाल ॥ २११ ॥
बनइ न बरनत नगर निकाई । जहाँ जाइ मन तहँइँ लोभाई ॥ चारु बजारु बिचित्र अँबारी । मनिमय बिधि जनु स्वकर सँवारी ॥
धनिक बनिक बर धनद समाना । बैठ सकल बस्तु लै नाना ॥ चौहट सुंदर गलीं सुहाई । संतत रहहिं सुगंध सिंचाई ॥
मंगलमय मंदिर सब केरें । चित्रित जनु रतिनाथ चितेरें ॥ पुर नर नारि सुभग सुचि संता । धरमसील ग्यानी गुनवंता ॥
अति अनूप जहँ जनक निवासू । बिथकहिं बिबुध बिलोकि बिलासू ॥ होत चकित चित कोट बिलोकी । सकल भुवन सोभा जनु रोकी ॥
सुमन बाटिका बाग बन बिपुल बिहंग निवास । फूलत फलत सुपल्लवत सोहत पुर चहुँ पास ॥ २१२ ॥
सुभग द्वार सब कुलिस कपाटा । भूप भीर नट मागध भाटा ॥ बनी बिसाल बाजि गज साला । हय गय रथ संकुल सब काला ॥
सूर सचिव सेनप बहुतेरे । नृपगृह सरिस सदन सब केरे ॥ पुर बाहेर सर सारित समीपा । उतरे जहँ तहँ बिपुल महीपा ॥
देखि अनूप एक अँवराई । सब सुपास सब भाँति सुहाई ॥ कौसिक कहेउ मोर मनु माना । इहाँ रहिअ रघुबीर सुजाना ॥
भलेहिं नाथ कहि कृपानिकेता । उतरे तहँ मुनिबृंद समेता ॥ बिस्वामित्र महामुनि आए । समाचार मिथिलापति पाए ॥
धवल धाम मनि पुरट पट सुघटित नाना भाँति । सिय निवास सुंदर सदन सोभा किमि कहि जाति ॥ २१३ ॥
कीन्ह प्रनामु चरन धरि माथा । दीन्हि असीस मुदित मुनिनाथा ॥ बिप्रबृंद सब सादर बंदे । जानि भाग्य बड़ राउ अनंदे ॥
कुसल प्रस्न कहि बारहिं बारा । बिस्वामित्र नृपहि बैठारा ॥ तेहि अवसर आए दोउ भाई । गए रहे देखन फुलवाई ॥
स्याम गौर मृदु बयस किसोरा । लोचन सुखद बिस्व चित चोरा ॥ उठे सकल जब रघुपति आए । बिस्वामित्र निकट बैठाए ॥
भए सब सुखी देखि दोउ भ्राता । बारि बिलोचन पुलकित गाता ॥ मूरति मधुर मनोहर देखी । भयउ बिदेहु बिदेहु बिसेषी ॥
संग सचिव सुचि भूरि भट भूसुर बर गुर ग्याति । चले मिलन मुनिनायकहि मुदित राउ एहि भाँति ॥ २१४ ॥
कहहु नाथ सुंदर दोउ बालक । मुनिकुल तिलक कि नृपकुल पालक ॥ ब्रह्म जो निगम नेति कहि गावा । उभय बेष धरि की सोइ आवा ॥
सहज बिरागरुप मनु मोरा । थकित होत जिमि चंद चकोरा ॥ ताते प्रभु पूछउँ सतिभाऊ । कहहु नाथ जनि करहु दुराऊ ॥
इन्हहि बिलोकत अति अनुरागा । बरबस ब्रह्मसुखहि मन त्यागा ॥ कह मुनि बिहसि कहेहु नृप नीका । बचन तुम्हार न होइ अलीका ॥
ए प्रिय सबहि जहाँ लगि प्रानी । मन मुसुकाहिं रामु सुनि बानी ॥ रघुकुल मनि दसरथ के जाए । मम हित लागि नरेस पठाए ॥
प्रेम मगन मनु जानि नृपु करि बिबेकु धरि धीर । बोलेउ मुनि पद नाइ सिरु गदगद गिरा गभीर ॥ २१५ ॥
मुनि तव चरन देखि कह राऊ । कहि न सकउँ निज पुन्य प्राभाऊ ॥ सुंदर स्याम गौर दोउ भ्राता । आनँदहू के आनँद दाता ॥
इन्ह कै प्रीति परसपर पावनि । कहि न जाइ मन भाव सुहावनि ॥ सुनहु नाथ कह मुदित बिदेहू । ब्रह्म जीव इव सहज सनेहू ॥
पुनि पुनि प्रभुहि चितव नरनाहू । पुलक गात उर अधिक उछाहू ॥ मुनिहि प्रसंसि नाइ पद सीसू । चलेउ लवाइ नगर अवनीसू ॥
सुंदर सदनु सुखद सब काला । तहाँ बासु लै दीन्ह भुआला ॥ करि पूजा सब बिधि सेवकाई । गयउ राउ गृह बिदा कराई ॥
रामु लखनु दोउ बंधुबर रूप सील बल धाम । मख राखेउ सबु साखि जगु जिते असुर संग्राम ॥ २१६ ॥
लखन हृदयँ लालसा बिसेषी । जाइ जनकपुर आइअ देखी ॥ प्रभु भय बहुरि मुनिहि सकुचाहीं । प्रगट न कहहिं मनहिं मुसुकाहीं ॥
राम अनुज मन की गति जानी । भगत बछलता हिंयँ हुलसानी ॥ परम बिनीत सकुचि मुसुकाई । बोले गुर अनुसासन पाई ॥
नाथ लखनु पुरु देखन चहहीं । प्रभु सकोच डर प्रगट न कहहीं ॥ जौं राउर आयसु मैं पावौं । नगर देखाइ तुरत लै आवौं ॥
सुनि मुनीसु कह बचन सप्रीती । कस न राम तुम्ह राखहु नीती ॥ धरम सेतु पालक तुम्ह ताता । प्रेम बिबस सेवक सुखदाता ॥
रिषय संग रघुबंस मनि करि भोजनु बिश्रामु । बैठे प्रभु भ्राता सहित दिवसु रहा भरि जामु ॥ २१७ ॥
मुनि पद कमल बंदि दोउ भ्राता । चले लोक लोचन सुख दाता ॥ बालक बृंदि देखि अति सोभा । लगे संग लोचन मनु लोभा ॥
पीत बसन परिकर कटि भाथा । चारु चाप सर सोहत हाथा ॥ तन अनुहरत सुचंदन खोरी । स्यामल गौर मनोहर जोरी ॥
केहरि कंधर बाहु बिसाला । उर अति रुचिर नागमनि माला ॥ सुभग सोन सरसीरुह लोचन । बदन मयंक तापत्रय मोचन ॥
कानन्हि कनक फूल छबि देहीं । चितवत चितहि चोरि जनु लेहीं ॥ चितवनि चारु भृकुटि बर बाँकी । तिलक रेखा सोभा जनु चाँकी ॥
जाइ देखी आवहु नगरु सुख निधान दोउ भाइ । करहु सुफल सब के नयन सुंदर बदन देखाइ ॥ २१८ ॥
देखन नगरु भूपसुत आए । समाचार पुरबासिन्ह पाए ॥ धाए धाम काम सब त्यागी । मनहुँ रंक निधि लूटन लागी ॥
निरखि सहज सुंदर दोउ भाई । होहिं सुखी लोचन फल पाई ॥ जुवतीं भवन झरोखन्हि लागीं । निरखहिं राम रूप अनुरागीं ॥
कहहिं परस्पर बचन सप्रीती । सखि इन्ह कोटि काम छबि जीती ॥ सुर नर असुर नाग मुनि माहीं । सोभा असि कहुँ सुनिअति नाहीं ॥
बिष्णु चारि भुज बिधि मुख चारी । बिकट बेष मुख पंच पुरारी ॥ अपर देउ अस कोउ न आही । यह छवि सखी पटतरिअ जाही ॥
रुचिर चौतनीं सुभग सिर मेचक कुंचित केस । नख सिख सुंदर बंधु दोउ सोभा सकल सुदेस ॥ २१९ ॥
कहहिं सखी अस को तनुधारी । जो न मोह यह रूप निहारी ॥ कोउ सप्रेम बोली मृदु बानी । जो मैं सुना सो सुनहु सयानी ॥
ए दोऊ दसरथ के ढोटा । बाल मरालन्हि के कल जोटा ॥ मुनि कौसिक मख के रखवारे । जिन्ह रन अजिर निसाचर मारे ॥
स्याम गात कल कंज बिलोचन । जो मारीच सुभुज मदु मोचन ॥ कौसल्या सुत सो सुख खानी । नामु रामु धनु सायक पानी ॥
गौर किसोर बेषु बर काछें । कर सर चाप राम के पाछें ॥ लछिमनु नामु राम लघु भ्राता । सुनु सखि तासु सुमित्रा माता ॥
बयस किसोर सुषमा सदन स्याम गौर सुख धाम । अंग अंग पर वारिअहिं कोटि कोटि सत काम ॥ २२० ॥
देखि राम छबि कोउ एक कहई । जोगु जानकिहि यह बरु अहई ॥ जौ सखि इन्हहि देख नरनाहू । पन परिहरि हठि करइ बिबाहू ॥
कोउ कह ए भूपति पहिचाने । मुनि समेत सादर सनमाने ॥ सखि परंतु पनु राउ न तजई । बिधि बस हठि अबिबेकहि भजई ॥
कोउ कह जौं भल अहइ बिधाता । सब कहँ सुनिअ उचित फलदाता ॥ तौ जानकिहि मिलिहि बरु एहू । नाहिन आलि इहाँ संदेहू ॥
जौं बिधि बस अस बनै सँजोगू । तौ कृतकृत्य होइ सब लोगू ॥ सखि हमरें आरति अति तातें । कबहुँक ए आवहिं एहि नातें ॥
बिप्रकाजु करि बंधु दोउ मग मुनिबधू उधारि । आए देखन चापमख सुनि हरषीं सब नारि ॥ २२१ ॥
बोली अपर कहहु सखि नीका । ए बिआहाति हित सबही का ॥ कोउ कह संकर चाप कठोरा । ए स्यामल मृदु गात किसोरा ॥
सब असमंजस अहहिं सयानी । यह मुनि ऊपर कहइ मृदु बानी ॥ सखि इन्ह कहँ कोटि कोटि अस कहहीं । बड़ प्रभाव देखत लघु अहहीं ॥
परसि जासु पद पंकज धूरी । तरी अहल्या कृत अघ भूरी ॥ सो कि रहिहि बिनु सिव धनु तोरें । यह प्रतीति परिहरिअ न भोरें ॥
जेहिं बिरंचि रचि सीयँ सँवारी । तेहिं स्यामल कर रचेउ बिचारी ॥ तासु बचन सुनि सब हरषानीं । ऐसे होउ कहहिं मुदु बानीं ॥
नाहिं त हम कहुँ सुनहु सखि इन्ह कर दरसनु दूरि । यह संघटु तब होइ जब पुन्य पुराकृत भूरि ॥ २२२ ॥
पुर एत दिसि चले दोउ भाई । जहाँ धनुषमख हित भूमि बनाई ॥ अति बिस्तार चारु गचँवारी । बिमल बेदिका रुचिर सँवारी ॥
चहुँ दिसि कंचन मंच बिसाला । रचे जहाँ बैठहिं महिपाला ॥ तेहि पाछें समीप चहुँ पासा । अपर मंच मंडली बिलासा ॥
कछुक ऊँच सब भाँति सुहाई । बैठहिं नगर लोग जहाँ जाई ॥ तिन्ह के निकट बिसाल सुहाए । धवल धाम बहुबर्न बनाए ॥
जहँ बैठें देखहिं सब नारी । जथाजोगु निज कुल अनुहारी ॥ पुर बालक कहि कहि मृदु बचना । सादर प्रभुहि देखावहिं रचना ॥
हृदयँ हरषहिं बरषहिं सुमन सुमुखि सुलोचनि बृंद । जाहिं जहाँ जहाँ बंधु दोउ तहँ तहँ परमानंद ॥ २२३ ॥
सिसु सब राम प्रेमबस जाने । प्रीति समेत निकेत बोलाने ॥ निज निज रुचि सब लेहिं बोलाई । सहित सनेह जाहिं दोउ भाई ॥
राम देखावहिं अनुजहिं रचना । कहि मृदु मधुर मनोहर बचना ॥ लव निमेष महुँ भुवन निकाया । रचइ जासु अनुसासन माया ॥
भगति हेतु सोइ दीनदयाला । चितवत चकित धनुष मखसाला ॥ कौतुक देखि चले गुरु पाहीं । जानि बिलंबु त्रास मन माहीं ॥
जासु त्रास डर कहँ डर होई । भजन प्रभाव देखावत सोई ॥ कहि बातें मृदु मधुर सुहाईं । किए बिदा बालक बरिआई ॥
सब सिसु एहि मिस प्रेमबस परम मनोहर गात । तन पुलकहिं अति हरषु हियँ देखि देखि दोउ भ्रात ॥ २२४ ॥
नित्य निवेदि मुनि आयसु लीन्हा । सबहीं संध्याबंदनु कीन्हा ॥ कहत कथा इतिहास पुरानी । रुचिर रजनि जुग जाम सिरानी ॥
मुनिबर सयन कीन्ह तब जाई । लगे चरन चापन दोउ भाई ॥ जिन्ह के चरन सरोरुह लागी । करत बिबिध जप जोग बिरागी ॥
तेइ दोउ बंधु प्रेम जनु जीते । गुर पद कमल पलोटत प्रीते ॥ बार बार मुनि अग्या दीन्ही । रघुबर जाइ सयन तब कीन्ही ॥
चापत चरन लखनु उर लाएँ । सभय प्रेम बस परम सच पाएँ ॥ पुनि पुनि प्रभु कह सोवहु ताता । पौढ़े धरि उर पद जलजाता ॥
सभय सप्रेम बिनीत अति सकुच सहित दोउ भाई । गुर पद पंकज नाइ सिर बैठे आयसु पाई ॥ २२५ ॥
सकल सोच कर जाइ नहाए । नित्य निवाहि मुनिहि सिर नाए ॥ समय जानि गुर आयसु पाई । लेन प्रसून चले दोउ भाई ॥
भूप बागु बर देखेउ जाई । जहाँ बसंत रितु रही लोभाई ॥ लागे बिटप मनोहर नाना । बरन बरन बर बेलि बिताना ॥
नव पल्लव फल सुमन सुहाए । निज संपति सुर रूख लजाए ॥ चातक कोकिल कीर चकोरा । कूजत बिहग नटत कल मोरा ॥
मध्य बाग सर सोह सुहावा । मनि सोपान बिचित्र बनावा ॥ बिमल सलिलु सरसिज बहुरंगा । जलखग कूजत गुंजत भृंगा ॥
उठे लखनु निसि बिगत सुनि अरुनसिखा धुनि कान । गुर ते पहिलेहिं जगतपति जागे राम सुजान ॥ २२६ ॥
चहुँ दिसि चितइ पूँछहिं मालिगन । लगे लेन दल फूल मुदित मन ॥ तेहि अवसर सीता तहँ आई । गिरिजा पूजन जननि पठाई ॥
संग सखी सब सुभग सयानी । गावहिं गीत मनोहर बानी ॥ सर समीप गिरिजा गृह सोहा । बरनि न जाइ देखि मनु मोहा ॥
मज्जन करि सर सखिन्ह समेताँ । गई मुदित मन गौरि निकेता ॥ पूजा कीन्हि अधिक अनुरागा । निज अनुरूप सुभग बरु माँगा ॥
एक सखी सिय संग बिहाई । गई रही देखन फुलवाई ॥ तेहि दोउ बंधु बिलोकि गई । प्रेम बिबस सीय पहिं आई ॥
बागु तड़ागु बिलोकि प्रभु हरषे बंधु समेत । परम रम्य आरामु यहु जो रामहि सुख देत ॥ २२७ ॥
देखन बागु कुअँर दुई आए । बयस किसोर सब भाँति सुहाए ॥ स्याम गौर किमि कहौं बखानी । गिरा अनयन नयन बिनु बानी ॥
मुनि हरषीं सुनि सखी सयानी । सिय हियँ अति उत्कंठा जानी ॥ एक कहइ नृपसुत तेइ आळी । सुने जे मुनि संग आए काली ॥
जिन्ह निज रूप मोहनी डारी । कीन्हे स्वबस नगर नर नारी ॥ बरनत छबि जहाँ तहँ सब लोगू । अवसि देखिअहिं देखन जोगू ॥
तासु बचन अति सियहि सोहाने । दरस लागि लोचन अकुलाने ॥ चली अग्र करि प्रिय सखि सोई । प्रीति पुरातन लखइ न कोई ॥
तासु दसा देखि सखिन्ह पुलक गात जलु नैन । कहहु कारनु निज हरष कर पूँछहिं सब मृदु बैन ॥ २२८ ॥
कंकन किंकिनि नूपुर धुनि सुनि । कहत लखन सन रामु हृदयँ गुनि ॥ मानहुँ मदन दुंदुभी दीन्हीं । मनसा बिस्व विजय कहुँ कीन्हीं ॥
अस कहि फिरि चितए तेहि ओरा । सिय मुख ससि भए नयन चकोरा ॥ भए बिलोचन चारु अचंचल । मनहुँ सकुचि निमि तजे दिगंचल ॥
देखि सिय सोभा सुखु पावा । हृदयँ सराहत बचनु न आवा ॥ जनु बिरंचि सब निज निपुनाई । बिरचि बिस्व कहुँ प्रगट देखाई ॥
सुंदरता कहुँ सुंदर करई । छबिगृहँ दीपसिखा जनु बरई ॥ सब उपमा कवि रहे जुठारी । केहि पटतरौं बिदेहकुमारी ॥
सुमिरि सीय नारद बचन उपजी प्रीति पुनीत । चकित बिलोकति सकल दिसि जनु सिसु मृगी सभीत ॥ २२९ ॥
तात जनकतनया यह सोई । धनुषजग्य जेहि कारन होई ॥ पूजन गौरि सखीँ लै आई । करत प्रकासु फिरइ फुलवाई ॥
जासु बिलोकि अलौकिक सोभा । सहज पुनीत मोर मनु छोभा ॥ सो सब कारन जान बिधाता । फरकहिं सुभद अंग सुनु भ्राता ॥
रघुबंसिन्ह कर सहज सुभाऊ । मनु कुपंथ पगु धरइ न काऊ ॥ मोहि अतिसय प्रतीति मन केरी । जेहिं सपनेहुँ परनारि न हेरी ॥
जिन्ह कै लहहिं न रिपु रन पीठी । नहिं पावहिं परतिय मनु डीठी ॥ मंगन लहहिं न जिन्ह कै नाहीं । ते नरबर थोरे जग माहीं ॥
सिय सोभा हियँ बरनि प्रभु आपनि दसा बिचारि । बोले सुचि मन अनुज सन बचन समय अनुहारि ॥ २३० ॥
चितवति चकित चहुँ दिसि सीता । कहँ गए नृपकिसोर मनु चिंता ॥ जहँ बिलोक मृग सावक नैनी । जनु तहँ बरिस कमल सित श्रेनी ॥
लता ओट तब सखिन्ह लखाए । स्यामल गौर किसोर सुहाए ॥ देखि रूप लोचन ललचाने । हरषे जनु निज निधि पहिचाने ॥
थके नयन रघुपति छबि देखें । पलकन्हिहूँ परिहरीं निमेषें ॥ अधिक सनेहँ देह भै भोरी । सरद ससिहि जनु चितव चकोरी ॥
लोचन मग रामहि उर आनी । दीन्हे पलक कपाट सयानी ॥ जब सिय सखिन्ह प्रेमबस जानी । कहि न सकहिं कछु मन सकुचानी ॥
करत बतकही अनुज सन मन सिय रूप लोभान । मुख सरोज मकरंद छबि करइ मधुप इव पान ॥ २३१ ॥
सोभा सींव सुभग दोउ बीरा । नील पीत जलजाभ सरीरा ॥ मोरपंख सिर सोहत नीके । गुच्छ बीच बिच कुसुम कली के ॥
भाल तिलक श्रमबिंदु सुहाए । श्रवन सुभग भूषन छबि छाए ॥ बिकट भृकुटि कच घुँघरवारे । नव सरोज लोचन रतनारे ॥
चारु चिबुक नासिका कपोला । हास बिलास लेत मनु मोला ॥ मुखछबि कहि न जाइ मोहि पाहीं । जो बिलोकि बहु काम लजाहीं ॥
उर मनि माल कंबु कल गीवा । काम कलभ कर भुज बलसींवा ॥ सुमन समेत बाम कर दोना । साँवर कुँअर सखी सुठि लोना ॥
लताभवन तें प्रगट भए तेहि अवसर दोउ भाइ । निकसे जनु जुग बिमल बिधु जलद पटल बिलगाइ ॥ २३२ ॥
धरि धीरजु एक आलि सयानी । सीता सन बोली गहि पानी ॥ बहुरि गौरि कर ध्यान करहु । भूपकिसोर देखि किन लेहु ॥
सकुचि सीयँ तब नयन उघारे । सनमुख दोउ रघुसिंघ निहारे ॥ नख सिख देखि राम के सोभा । सुमिरि पिता पनु मन अति छोभा ॥
परबस सखिन्ह लखी जब सीता । भयउ गहेउ सब कहहिं सभीता ॥ पुनि आउब एहि बेरिआँ काली । अस कहि मन बिहसी एक आली ॥
गूढ़ गिरा सुनि सिय सकुचानी । भयउ बिलंब मातु भय मानी ॥ धरि बड़ी धीर राम उर आने । फिरि अपनपउ पितुबस जाने ॥
केहरि कटि पट पीत धर सुषमा सील निधान । देखि भानुकुलभूषनहि बिसरा सखिन्ह अपान ॥ २३३ ॥
जानि कठिन सिवचाप बिसूरति । चली राखि उर स्यामल मूरति ॥ प्रभु जब जात जानकी जानी । सुख सनेह सोभा गुन खानी ॥
परम प्रेममय मृदु मसि कीन्ही । चारु चित्त भीतीं लिखि लीन्ही ॥ गई भवानी भवन बहोरी । बंदि चरन बोली कर जोरी ॥
जय जय गिरिबरराज किसोरी । जय महेस मुख चंद चकोरी ॥ जय गजबदन षडानन माता । जगत जननि दामिनि दुति गाता ॥
नहिं तव आदि मध्य अवसाना । अमित प्रभाउ बेदु नहिं जाना ॥ भव भव बिभव पराभव कारिनि । बिस्व बिमोहनि स्वबस बिहारिनि ॥
देखन मिस मृग बिहग तरु फिरइ बहोरि बहोरि । निरखि निरखि रघुबीर छबि बाढ़इ प्रीति न थोरि ॥ २३४ ॥
सेवत तोहि सुलभ फल चारी । बरदायनी पुरारि पिआरी ॥ देबि पूजि पद कमल तुम्हारे । सुर नर मुनि सब होहिं सुखारे ॥
मोर मनोरथु जानहु नीकेँ । बसहु सदा उर पुर सबही कें ॥ कीन्हेउँ प्रगट न कारन तेहीं । अस कहि चरन गहे बैदेही ॥
बिनय प्रेम बस भई भवानी । खसी माल मूरति मुसुकानी ॥ सादर सियँ प्रसाद सिर धरेऊ । बोली गौरि हरषु हियँ भरेऊ ॥
सुनु सिय सत्य असीस हमारी । पूजहिं मन कामना तुम्हारी ॥ नारद बचन सदा सुचि साचा । सो बरु मिलिहि जाहिं मनु राचा ॥
पतिदेवता सुतीय महुँ मातु प्रथम तव रेख । महिमा अमित न सकहिं कहि सहस सारदा सेष ॥ २३५ ॥
जानि गौरि अनुकूल सिय हिय हरषु न जाइ कहि । मंजुल मंगल मूल बाम अंग फरकन लगे ॥ २३६ ॥
हृदयँ सराहत सिय लोनाई । गुरु समीप गवने दोउ भाई ॥ राम कहा सबु कौसिक पाहीं । सरल सुभाउ छुअत छल नाहीं ॥
सुमन पाइ मुनि पूजा कीन्ही । पुनि असीस दुइ भाइन्ह दीन्ही ॥ सुफल मनोरथ होहुँ तुम्हारे । रामु लखनु सुनि भए सुखारे ॥
करि भोजनु मुनिबर बिग्यानी । लगे कहन कछु कथा पुरानी ॥ बिगत दिवसु गुरु आयसु पाई । संध्या करन चले दोउ भाई ॥
प्राची दिसि ससि उयउ सुहावा । सिय मुख सरिस देखि सुखु पावा ॥ बहुरि बिचार कीन्ह मन माहीं । सिय बदन सम हिमकर नाहीं ॥
मनु जाहिं राचेउ मिलिहि सो बरु सहज सुंदर साँवरो । करुना निधान सुजान सीलु सनेहु जानत रावरो ॥ एहि भाँति गौरी असीस सुनि सिय सहित हियँ हरषीं अली । तुलसी भवानीहि पूजि पुनि पुनि मुदित मन मंदिर चली ॥
घटइ बढ़इ बिरहिनि दुखदाई । ग्रसइ राहु निज संधिहिं पाई ॥ कोक सोकप्रद पंकज द्रोही । अवगुन बहुत चंद्रमा तोही ॥
बैदेही मुख पटतर दीन्हें । होइ दोष बड़ अनुचित कीन्हें ॥ सिय मुखछबि बिधु ब्याज बखानी । गुरु पहिं चले निसा बड़ि जानी ॥
करि मुनि चरन सरोज प्रनामा । आयसु पाइ कीन्ह बिश्रामा ॥ बिगत निसा रघुनायक जागे । बंधु बिलोकि कहन अस लागे ॥
उदय अरुन अवलोकहु ताता । पंकज कोक लोक सुखदाता ॥ बोले लखनु जोरि जुग पानी । प्रभु प्रभाउ सूचक मृदु बानी ॥
जनमु सिंधु पुनि बंधु बिषु दिन मलीन सकलंक । सिय मुख समता पाव किमि चंदु बापुरो रंक ॥ २३७ ॥
नृप सब नखत करहिं उजिआरी । टारि न सकहिं चाप तम भारी ॥ कमल कोक मधुकर खग नाना । हरषे सकल निसा अवसाना ॥
एसेहिं प्रभु सब भगत तुम्हारे । होइहहिं टूटें धनुष सुखारे ॥ उदय भानु बिनु श्रम तम नासा । दुरे नखत जग तेज प्रकासा ॥
रवि निज उदय ब्याज रघुराया । प्रभु प्रतापु सब नृपन्हि दिखाया ॥ तव भुज बल महिमा उदघाटी । प्रगटी धनु बिघटन परिपाटी ॥
बंधु बचन सुनि प्रभु मुसुकाने । होइ सुचि सहज पुनीत नहाने ॥ नित्यक्रिया करि गुरु पहिं आए । चरन सरोज सुभग सिर नाए ॥
सतानंदु तब जनक बोलाए । कौसिक मुनि पहिं तुरत पठाए ॥ जनक बिनय तिन्ह आइ सुनाई । हरषे बोले लिए दोउ भाई ॥
अरुनोदयँ सकुचे कुमुद उदगन जोति मलीन । जिमि तुम्हार आगमन सुनि भए नृपति बलहीन ॥ २३८ ॥
सीय स्वयंबरू देखिअ जाई । ईसु काहि धौं देइ बड़ाई ॥ लखन कहा जस भाजनु सोई । नाथ कृपा तव जापर होई ॥
हरषे मुनि सब सुनि बर बानी । दीन्हि असीस सबहिं सुखु मानी ॥ पुनि मुनिबृंद समेत कृपाला । देखन चले धनुषमख साला ॥
रंगभूमि आए दोउ भाई । असि सुधि सब पुरबासिन्ह पाई ॥ चले सकल गृह काज बिसारी । बाल जुबान जरठ नर नारी ॥
देखी जनक भीर भै भारी । सुचि सेवक सब लिए हँकारी ॥ तुरत सकल लोगन्ह पहिं जाहू । आसन उचित देहु सब काहू ॥
सतानंद पद बंदि प्रभु बैठे गुरु पहिं जाइ । चलहु तात मुनि कहेउ तब पठवा जनक बोलाइ ॥ २३९ ॥
राजकुअँर तेहि अवसर आए । मनहुँ मनोहरता तन छाए ॥ गुन सागर नागर बर बीरा । सुंदर स्यामल गौर सरीरा ॥
राज समाज बिराजत रूरे । उडगन महुँ जनु जुग बिधु पूरे ॥ जिन्ह कें रही भावना जैसी । प्रभु मूरति तिन्ह देखी तैसी ॥
देखहिं रूप महा रनधीरा । मनहुँ बीर रसु धरें सरीरा ॥ डरे कुटिल नृप प्रभुहि निहारी । मनहुँ भयानक मूरति भारी ॥
रहे असुर छल छोनिप बेषा । तिन्ह प्रभु प्रगट कालसम देखा । पुरबासिन्ह देखे दोउ भाई । नरभूषन लोचन सुखदाई ॥
कहि मृदु बचन बिनीत तिन्ह बैठारे नर नारि । उत्तम मध्यम नीच लघु निज निज थल अनुहारि ॥ २४० ॥
बिदुषन्ह प्रभु बिराटमय दीसा । बहु मुख कर पग लोचन सीसा ॥ जनक जाति अवलोकहिं कैसें । सजन सगे प्रिय लागहिं जैसें ॥
सहित बिदेह बिलोकहिं रानी । सिसु सम प्रीति न जाति बखानी ॥ जोगिन्ह परम तत्वमय भासा । सांत सुद्ध सम सहज प्रकासा ॥
हरिभगतन्ह देखे दोउ भ्राता । इष्टदेव इव सब सुख दाता ॥ रामहि चितव भायँ जेहि सीया । सो सनेहु सुखु नहिं कथनीया ॥
उर अनुभवति न कहि सक सोऊ । कवन प्रकार कहै कबि कोऊ ॥ एहि बिधि रहा जाहि जस भाऊ । तेहिं तस देखेउ कोसलराऊ ॥
नारि बिलोकहिं हरषि हियँ निज निज रुचि अनुरूप । जनु सोहत सिंगार धरि मूरति परम अनूप ॥ २४१ ॥
सहज मनोहर मूरति दोऊ । कोटि काम उपमा लघु सोऊ ॥ सरद चंद निंदक मुख नीके । नीरज नयन भावते जी के ॥
चितवनि चारु मार मनु हरनी । भावति हृदय जाति नहिं बरनी ॥ कल कपोल श्रुति कुंडल लोला । चिबुक अधर सुंदर मृदु बोला ॥
कुमुदबंधु कर निंदक हाँसा । भृकुटी बिकट मनोहर नासा ॥ भाल बिसाल तिलक झलकाहीं । कच बिलोकि अलि अवलि लजाहीं ॥
पीत चौतनीं सिरन्हि सुहाईं । कुसुम कलीं बिच बीच बनाईं ॥ रेखें रुचिर कंबु कल गीवाँ । जनु त्रिभुवन सुषमा की सीवाँ ॥
राजत राज समाज महुँ कोसलराज किसोर । सुंदर स्यामल गौर तन बिस्व बिलोचन चोर ॥ २४२ ॥
कटि तूनीर पीत पट बाँधें । कर सर धनुष बाम बर काँधें ॥ पीत जग्य उपबीत सुहाए । नख सिख मंजु महाछबि छाए ॥
देखि लोग सब भए सुखारे । एकटक लोचन चलत न तारे ॥ हरषे जनकु देखि दोउ भाई । मुनि पद कमल गहे तब जाई ॥
करि बिनती निज कथा सुनाई । रंग अवनि सब मुनिहि देखाई ॥ जहँ जहँ जाहिं कुअँर बर दोऊ । तहँ तहँ चकित चितव सबु कोऊ ॥
निज निज रुख रामहि सबु देखा । कोउ न जान कछु मरमु बिसेषा ॥ भलि रचना मुनि नृप सन कहेऊ । राजाँ मुदित महासुख लहेऊ ॥
कुंजर मनि कंठा कलित उरन्हि तुलसिका माल । बृषभ कंध केहरि ठवनि बल निधि बाहु बिसाल ॥ २४३ ॥
प्रभुहि देखि सब नृप हियँ हारे । जनु राकेस उदय भएँ तारे ॥ असि प्रतीति सब के मन माहीं । राम चाप तोरब सक नाहीं ॥
बिनु भंजेहुँ भव धनुषु बिसाला । मेलिहि सीय राम उर माला ॥ अस बिचारि गवनहु घर भाई । जसु प्रतापु बलु तेजु गवाँई ॥
बिहसे अपर भूप सुनि बानी । जे अबिबेक अंध अभिमानी ॥ तोरेहुँ धनुषु ब्याहु अवगाहा । बिनु तोरें को कुअँरि बिआहा ॥
एक बार कालउ किन होऊ । सिय हित समर जितब हम सोऊ ॥ यह सुनि अवर महिप मुसुकाने । धरमसील हरिभगत सयाने ॥
सब मंचन्ह तें मंचु एक सुंदर बिसद बिसाल । मुनि समेत दोउ बंधु तहँ बैठारे महिपाल ॥ २४४ ॥
सीय बिआहबि राम गरब दूरि करि नृपन्ह के । जीति को सक संग्राम दसरथ के रन बाँकुरे ॥ २४५ ॥
ब्यर्थ मरहु जनि गाल बजाई । मन मोदकन्हि कि भूख बुताई ॥ सिख हमारि सुनि परम पुनीता । जगदंबा जानहु जियँ सीता ॥
जगत पिता रघुपतिहि बिचारी । भरि लोचन छबि लेहु निहारी ॥ सुंदर सुखद सकल गुन रासी । ए दोउ बंधु संभु उर बासी ॥
सुधा समुद्र समीप बिहाई । मृगजलु निरखि मरहु कत धाई ॥ करहु जाइ जा कहुँ जोइ भावा । हम तौ आजु जनम फलु पावा ॥
अस कहि भले भूप अनुरागे । रूप अनुप बिलोकन लागे ॥ देखहिं सुर नभ चढ़े बिमाना । बरषहिं सुमन करहिं कल गाना ॥
सिय सोभा नहिं जाइ बखानी । जगदंबिका रूप गुन खानी ॥ उपमा सकल मोहि लघु लागीं । प्राकृत नारि अंग अनुरागीं ॥
सिय बरनिअ तेइ उपमा देई । कुकबि कहाइ अजसु को लेई ॥ जौं पटतरिअ तीय सम सीया । जग असि जुबति कहाँ कमनीया ॥
गिरा मुखर तन अरध भवानी । रति अति दुखित अतनु पति जानी ॥ बिष बारुनी बंधु प्रिय जेही । कहिअ रमासम किमि बैदेही ॥
जौं छबि सुधा पयोनिधि होई । परम रूपमय कच्छपु सोई ॥ सोभा रजु मंदरु सिंगारू । मथै पानि पंकज निज मारू ॥
जानि सुअवसरु सीय तब पठई जनक बोलाइ । चतुर सखीं सुंदर सकल सादर चलीं लिवाइ ॥ २४६ ॥
चलीं संग लै सखीं सयानी । गावत गीत मनोहर बानी ॥ सोह नवल तनु सुंदर सारी । जगत जननि अतुलित छबि भारी ॥
भूषन सकल सुदेस सुहाए । अंग अंग रचि सखिन्ह बनाए ॥ रंगभूमि जब सिय पगु धारी । देखि रूप मोहे नर नारी ॥
हरषि सुरन्ह दुंदुभीं बजाईं । बरषि प्रसून अपछरा गाईं ॥ पानि सरोज सोह जयमाला । अवचट चितए सकल भुआला ॥
सीय चकित चित रामहि चाहा । भए मोहबस सब नरनाहा ॥ मुनि समीप देखे दोउ भाई । लगे ललकि लोचन निधि पाई ॥
एहि बिधि उपजै लच्छि जब सुंदरता सुख मूल । तदपि सकोच समेत कबि कहहिं सीय समतूल ॥ २४७ ॥
राम रूपु अरु सिय छबि देखें । नर नारिन्ह परिहरीं निमेषें ॥ सोचहिं सकल कहत सकुचाहीं । बिधि सन बिनय करहिं मन माहीं ॥
हरू बिधि बेगि जनक जड़ताई । मति हमारि असि देहि सुहाई ॥ बिनु बिचार पनु तजि नरनाहू । सीय राम कर करै बिबाहू ॥
जगु भल कहिहि भाव सब काहू । हठ कीन्हें अंतहुँ उर दाहू ॥ एहिं लालसाँ मगन सब लोगू । बरु साँवरो जानकी जोगू ॥
तब बंदीजन जनक बोलाए । बिरिदावली कहत चलि आए ॥ कह नृपु जाइ कहहु पन मोरा । चले भाट हियँ हरषु न थोरा ॥
गुरजन लाज समाजु बड़ देखि सीय सकुचानि । लागि बिलोकन सखिन्ह तन रघुबीरहि उर आनि ॥ २४८ ॥
नृप भुजबल बिधु सिवधनु राहू । गरुअ कठोर बिदित सब काहू ॥ रावनु बानु महाभट भारे । देखि सरासन गवँहिं सिधारे ॥
सोइ पुरारि कोदंडु कठोरा । राज समाज आजु जोइ तोरा ॥ त्रिभुवन जय समेत बैदेही । बिनहिं बिचार बरइ हठि तेही ॥
सुनि पन सकल भूप अभिलाषे । भटमानी अतिसय मन माखे ॥ परिकर बाँधि उठे अकुलाई । चले इष्ट देवन्ह सिर नाई ॥
तमकि ताकि तकि सिवधनु धरहीं । उठइ न कोटि भाँति बलु करहीं ॥ जिन्ह के कछु बिचारु मन माहीं । चाप समीप महीप न जाहीं ॥
बोले बंदी बचन बर सुनहु सकल महिपाल । पन बिदेह कर कहहिं हम भुजा उठाइ बिसाल ॥ २४९ ॥
भूप सहस दस एकहि बारा । लगे उठावन टरइ न टारा ॥ डगइ न संभु सरासनु कैसें । कामी बचन सती मनु जैसें ॥
सब नृप भए जोगु उपहासी । जैसें बिनु बिराग संन्यासी ॥ कीरति बिजय बीरता भारी । चले चाप कर बरबस हारी ॥
श्रीहत भए हारि हियँ राजा । बैठे निज निज जाइ समाजा ॥ नृपन्ह बिलोकि जनकु अकुलाने । बोले बचन रोष जनु साने ॥
दीप दीप के भूपति नाना । आए सुनिहम जो पनु ठाना ॥ देव दनुज धरि मनुज सरीरा । बिपुल बीर आए रनधीरा ॥
तमकि धरहिं धनु मूढ़ नृप उठइ न चलहिं लजाइ । मनहुँ पाइ भट बाहुबलु अधिकु अधिकु गरुआइ ॥ २५० ॥
कहहु काहि यहु लाभु न भावा । काहुँ न संकर चाप चढ़ावा ॥ रहउ चढ़ाउब तोरब भाई । तिलु भरि भूमि न सके छड़ाई ॥
अब जनि कोउ भाखे भट मानी । बीर बिहीन मही मैं जानी ॥ तजहु आस निज निज गृह जाहू । लिखा न बिधि बैदेहि बिबाहू ॥
सुकृतु जाइ जौं पनु परिहरऊँ । कुअँरि कुआँरि रहउ का करऊँ ॥ जौं जनतेउँ बिनु भट भुबि भाई । तौ पनु करि होतेउँ न हँसाई ॥
जनक बचन सुनि सब नर नारी । देखि जानकिहि भए दुखारी ॥ माखे लखनु कुटिल भइँ भौंहें । रदपट फरकत नयन रिसौंहें ॥
कुअँरि मनोहर बिजय बड़ि कीरतिअति कमनीय । पावनिहार बिरंचि जनु रचेउ न धनु दमनीय ॥ २५१ ॥
रघुबंसिन्ह महुँ जहँ कोउ होई । तेहिं समाज अस कहइ न कोई ॥ कही जनक जसि अनुचित बानी । बिद्यमान रघुकुल मनि जानी ॥
सुनहु भानुकुल पंकज भानू । कहउँ सुभाउ न कछु अभिमानू ॥ जौं तुम्हारि अनुसासन पावौं । कंदुक इव ब्रह्मांड उठावौं ॥
काचे घट जिमि डारौं फोरी । सकउँ मेरु मूलक जिमि तोरी ॥ तव प्रताप महिमा भगवाना । को बापुरो पिनाक पुराना ॥
नाथ जानि अस आयसु होऊ । कौतुकु करौं बिलोकिअ सोऊ ॥ कमल नाल जिमि चाप चढ़ावौं । जोजन सत प्रमान लै धावौं ॥
कहि न सकत रघुबीर डर लगे बचन जनु बान । नाइ राम पद कमल सिरु बोले गिरा प्रमान ॥ २५२ ॥
लखन सकोप बचन जे बोले । डगमगानि महि दिग्गज डोले ॥ सकल लोग सब भूप डेराने । सिय हियँ हरषु जनकु सकुचाने ॥
गुर रघुपति सब मुनि मन माहीं । मुदित भए पुनि पुनि पुलकाहीं ॥ सयनहिं रघुपति लखनु नेवारे । प्रेम समेत निकट बैठारे ॥
बिस्वामित्र समय सुभ जानी । बोले अति सनेहमय बानी ॥ उठहु राम भंजहु भवचापा । मेटहु तात जनक परितापा ॥
सुनि गुरु बचन चरन सिरु नावा । हरषु बिषादु न कछु उर आवा ॥ ठाढ़े भए उठि सहज सुभाएँ । ठवनि जुबा मृगराजु लजाएँ ॥
तोरौं छत्रक दंड जिमि तव प्रताप बल नाथ । जौं न करौं प्रभु पद सपथ कर न धरौं धनु भाथ ॥ २५३ ॥
नृपन्ह केरि आसा निसि नासी । बचन नखत अवली न प्रकासी ॥ मानी महिप कुमुद सकुचाने । कपटी भूप उलूक लुकाने ॥
भए बिसोक कोक मुनि देवा । बरिसहिं सुमन जनावहिं सेवा ॥ गुर पद बंदि सहित अनुरागा । राम मुनिन्हसन आयसु मागा ॥
सहजहिं चले सकल जग स्वामी । मत्त मंजु बर कुंजर गामी ॥ चलत राम सब पुर नर नारी । पुलक पूरि तन भए सुखारी ॥
बंदि पितर सुर सुकृत सँभारे । जौं कछु पुन्य प्रभाउ हमारे ॥ तौ सिवधनु मृनाल की नाईं । तोरहुँ रामु गनेस गोसाईं ॥
उदित उदयगिरि मंच पर रघुबर बालपतंग । बिकसे संत सरोज सब हरषे लोचन भृंग ॥ २५४ ॥
सखि सब कौतुक देख निहारे । जेउ कहावत हितू हमारे ॥ कोउ न बुझाइ कहइ गुर पाहीं । ए बालक असि हठ भलि नाहीं ॥
रावन बान छुआ नहिं चापा । हारे सकल भूप करि दापा ॥ सो धनु राजकुअँर कर देहीं । बाल मराल कि मंदर लेहीं ॥
भूप सयानप सकल सिरानी । सखि बिधि गति कछु जाति न जानी ॥ बोली चतुर सखी मृदु बानी । तेजवंत लघु गनिअ न रानी ॥
कहँ कुंभज कहँ सिंधु अपारा । सोषेउ सुजसु सकल संसारा ॥ रबि मंडल देखत लघु लागा । उदयँ तासु तिभुवन तम भागा ॥
रामहि प्रेम समेत लखि सखिन्ह समीप बोलाइ । सीता मातु सनेह बस बचन कहइ बिलखाइ ॥ २५५ ॥
काम कुसुम धनु सायक लीन्हे । सकल भुवन अपनें बस कीन्हे ॥ देबि तजिअ संसउ अस जानी । भंजब धनुषु राम सुनु रानी ॥
सखी बचन सुनि भै परतीती । मिटा बिषादु बढ़ी अति प्रीती ॥ तब रामहि बिलोकि बैदेही । सभय हृदयँ बिनवति जेहि तेही ॥
मनहीं मन मनाव अकुलानी । होहु प्रसन्न महेस भवानी ॥ करहु सफल आपनि सेवकाई । करि हितु हरहु चाप गरुआई ॥
गननायक बरदायक देवा । आजु लगें कीन्हिउँ तुअ सेवा ॥ बार बार बिनती सुनि मोरी । करहु चाप गुरुता अति थोरी ॥
मंत्र परम लघु जासु बस बिधि हरि हर सुर सर्ब । महामत्त गजराज कहुँ बस कर अंकुस खर्ब ॥ २५६ ॥
नीकें निरखि नयन भरि सोभा । पितु पनु सुमिरि बहुरि मनु छोभा ॥ अहह तात दारुनि हठ ठानी । समुझत नहिं कछु लाभु न हानी ॥
सचिव सभय सिख देइ न कोई । बुध समाज बड़ अनुचित होई ॥ कहँ धनु कुलिसहु चाहि कठोरा । कहँ स्यामल मृदुगात किसोरा ॥
बिधि केहि भाँति धरौं उर धीरा । सिरस सुमन कन बेधिअ हीरा ॥ सकल सभा कै मति भै भोरी । अब मोहि संभुचाप गति तोरी ॥
निज जड़ता लोगन्ह पर डारी । होहि हरुअ रघुपतिहि निहारी ॥ अति परिताप सीय मन माहीं । लव निमेष जुग सय सम जाहीं ॥
देखि देखि रघुबीर तन सुर मनाव धरि धीर । भरे बिलोचन प्रेम जल पुलकावली सरीर ॥ २५७ ॥
गिरा अलिनि मुख पंकज रोकी । प्रगट न लाज निसा अवलोकी ॥ लोचन जलु रह लोचन कोना । जैसें परम कृपन कर सोना ॥
सकुची ब्याकुलता बड़ि जानी । धरि धींरजु प्रतीति उर आनी ॥ तन मन बचन मोर पनु साचा । रघुपति पद सरोज चितु राचा ॥
तौ भगवानु सकल उर बासी । करिहि मोहि रघुबर कै दासी ॥ जेहि कें जेहि पर सत्य सनेहू । सो तेहि मिलइ न कछु संदेहू ॥
प्रभु तन चितइ प्रेम तन ठाना । कृपानिधान राम सबु जाना ॥ सियहि बिलोकि तकेउ धनु कैसें । चितव गरुरु लघु ब्यालहि जैसें ॥
प्रभुहि चितइ पुनि चितव महि राजत लोचन लोल । खेलत मनसिज मीन जुग जनु बिधु मंडल डोल ॥ २५८ ॥
दिसिकुंजरहु कमठ अहि कोला । धरहु धरनि धरि धीर न डोला ॥ रामु चहहिं संकर धनु तोरा । होहु सजग सुनि आयसु मोरा ॥ १ ॥
चाप समीप रामु जब आए । नर नारिन्ह सुर सुकृत मनाए ॥ सब कर संसउ अरु अग्यानू । मंद महीपन्ह कर अभिमानू ॥ २ ॥
भृगुपति केरि गरब गरुआई । सुर मुनिबरन्ह केरि कदराई ॥ सिय कर सोचु जनक पछितावा । रानिन्ह कर दारुन दुख दावा ॥ ३ ॥
संभुचाप बड़ बोहितु पाई । चढ़े जाइ सब संगु बनाई ॥ राम बाहुबल सिंधु अपारू । चहत पारु नहिं कोउ कड़हारू ॥ ४ ॥
लखन लखेउ रघुबंसमनि ताकेउ हर कोदंडु । पुलकि गात बोले बचन चरन चापि ब्रह्मांडु ॥ २५९ ॥
देखी बिपुल बिकल बैदेही । निमिष बिहात कलप सम तेही ॥ तृषित बारि बिनु जो तनु त्यागा । मुएँ करइ का सुधा तड़ागा ॥ १ ॥
का बरषा सब कृषी सुखानें । समय चुकें पुनि का पछितानें ॥ अस जियँ जानि जानकी देखी । प्रभु पुलके लखि प्रीति बिसेषी ॥ २ ॥
गुरहि प्रनामु मनहिं मन कीन्हा । अति लाघवँ उठाइ धनु लीन्हा ॥ दमकेउ दामिनि जिमि जब लयऊ । पुनि नभ धनु मंडल सम भयऊ ॥ ३ ॥
लेत चढ़ावत खैंचत गाढ़ें । काहुँ न लखा देख सबु ठाढ़ें ॥ तेहि छन राम मध्य धनु तोरा । भरे भुवन धुनि घोर कठोरा ॥ ४ ॥
राम बिलोके लोग सब चित्र लिखे से देखि । चितई सिय कृपायतन जानी बिकल बिसेषि ॥ २६० ॥
संकर चापु जहाजु सागरु रघुबर बाहुबलु । बूड़ सो सकल समाजु चढ़ा जो प्रथमहिं मोह बस ॥ २६१ ॥
प्रभु दोउ चापखंड महि डारे । देखि लोग सब भए सुखारे ॥ कौसिकरूप पयोनिधि पावन । प्रेम बारि अवगाहु सुहावन ॥ १ ॥
रामरूप राकेसु निहारी । बढ़त बीचि पुलकावलि भारी ॥ बाजे नभ गहगहे निसाना । देवबधू नाचहिं करि गाना ॥ २ ॥
ब्रह्मादिक सुर सिद्ध मुनीसा । प्रभुहि प्रसंसहिं देहिं असीसा ॥ बरिसहिं सुमन रंग बहु माला । गावहिं किंनर गीत रसाला ॥ ३ ॥
रही भुवन भरि जय जय बानी । धनुषभंग धुनिजात न जानी ॥ मुदित कहहिं जहँ तहँ नर नारी । भंजेउ राम संभुधनु भारी ॥ ४ ॥
भरे भुवन घोर कठोर रव रवि बाजि तजि मारगु चले । चिक्करहिं दिग्गज डोल महि अहि कोल कूरम कलमले ॥ सुर असुर मुनि कर कान दीन्हें सकल बिकल बिचारहीं । कोदंड खंडेउ राम तुलसी जयति बचन उचारहीं ॥
झाँझि मृदंग संख सहनाई । भेरि ढोल दुंदुभी सुहाई ॥ बाजहिं बहु बाजने सुहाए । जहँ तहँ जुबतिन्ह मंगल गाए ॥ १ ॥
सखिन्ह सहित हरषी अति रानी । सूखत धान परा जनु पानी ॥ जनक लहेउ सुखु सोचु बिहाई । तैरत थकें थाह जनु पाई ॥ २ ॥
श्रीहत भए भूप धनु टूटे । जैसें दिवस दीप छबि छूटे ॥ सीय सुखहि बरनिअ केहि भाँती । जनु चातकी पाइ जलु स्वाती ॥ ३ ॥
रामहि लखनु बिलोकत कैसें । ससिहि चकोर किसोरकु जैसें ॥ सतानंद तब आयसु दीन्हा । सीताँ गमनु राम पहिं कीन्हा ॥ ४ ॥
बंदी मागध सूतगन बिरुद बदहिं मतिधीर । करहिं निछावरि लोग सब हय गय धन मनि चीर ॥ २६२ ॥
सखिन्ह मध्य सिय सोहति कैसें । छबिगन मध्य महाछबि जैसें ॥ कर सरोज जयमाल सुहाई । बिस्व बिजय सोभा जेहिं छाई ॥ १ ॥
तन सकोचु मन परम उछाहू । गूढ़ प्रेमु लखि परइ न काहू ॥ जाइ समीप राम छबि देखी । रहि जनु कुअँरि चित्र अवरेखी ॥ २ ॥
चतुर सखीं लखि कहा बुझाई । पहिरावहु जयमाल सुहाई ॥ सुनत जुगल कर माल उठाई । प्रेम बिबस पहिराइ न जाई ॥ ३ ॥
सोहत जनु जुग जलज सनाला । ससिहि सभीत देत जयमाला ॥ गावहिं छबि अवलोकि सहेली । सियँ जयमाल राम उर मेली ॥ ४ ॥
संग सखीं सुंदर चतुर गावहिं मंगलचार । गवनी बाल मराल गति सुषमा अंग अपार ॥ २६३ ॥
रघुबर उर जयमाल देखि देव बरिसहिं सुमन । सकुचे सकल भुआल जनु बिलोकि रबि कुमुदगन ॥ २६४ ॥
पुर अरु ब्योम बाजने बाजे । खल भए मलिन साधु सब राजे ॥ सुर किंनर नर नाग मुनीसा । जय जय जय कहि देहिं असीसा ॥ १ ॥
नाचहिं गावहिं बिबुध बधूटीं । बार बार कुसुमांजलि छूटीं ॥ जहँ तहँ बिप्र बेदधुनि करहीं । बंदी बिरिदावलि उच्चरहीं ॥ २ ॥
महिं पाताल नाक जसु ब्यापा । राम बरी सिय भंजेउ चापा ॥ करहिं आरती पुर नर नारी । देहिं निछावरि बित्त बिसारी ॥ ३ ॥
सोहति सीय राम कै जोरी । छबि सिंगारु मनहुँ एक ठोरी ॥ सखीं कहहिं प्रभु पद गहु सीता । करति न चरन परस अति भीता ॥ ४ ॥
तब सिय देखि भूप अभिलाषे । कूर कपूत मूढ़ मन माखे ॥ उठि उठि पहिरि सनाह अभागे । जहँ तहँ गाल बजावन लागे ॥ १ ॥
लेहु छड़ाइ सीय कह कोऊ । धरि बाँधहु नृप बालक दोऊ ॥ तोरें धनुषु चाड़ नहिं सरई । जीवत हमहि कुअँरि को बरई ॥ २ ॥
जौं बिदेहु कछु करै सहाई । जीतहु समर सहित दोउ भाई ॥ साधु भूप बोले सुनि बानी । राजसमाजहि लाज लजानी ॥ ३ ॥
बलु प्रतापु बीरता बड़ाई । नाक पिनाकहि संग सिधाई ॥ सोइ सूरता कि अब कहुँ पाई । असि बुधि तौ बिधि मुँह मसि लाई ॥ ४ ॥
गौतम तिय गति सुरति करि नहिं परसति पग पानि । मन बिहसे रघुबंसमनि प्रीति अलौकिक जानि ॥ २६५ ॥
बैनतेय बलि जिमि चह कागू । जिमि ससु चहै नाग अरि भागू ॥ जिमि चह कुसल अकारन कोही । सब संपदा चहै सिवद्रोही ॥ १ ॥
लोभी लोलुप कल कीरति चहई । अकलंकता कि कामी लहई ॥ हरि पद बिमुख परम गति चाहा । तस तुम्हार लालचु नरनाहा ॥ २ ॥
कोलाहलु सुनि सीय सकानी । सखीं लवाइ गईं जहँ रानी ॥ रामु सुभायँ चले गुरु पाहीं । सिय सनेहु बरनत मन माहीं ॥ ३ ॥
रानिन्ह सहित सोच बस सीया । अब धौं बिधिहि काह करनीया ॥ भूप बचन सुनि इत उत तकहीं । लखनु राम डर बोलि न सकहीं ॥ ४ ॥
देखहु रामहि नयन भरि तजि इरिषा मदु कोहु । लखन रोषु पावकु प्रबल जानि सलभ जनि होहु ॥ २६६ ॥
खरभरु देखि बिकल पुर नारीं । सब मिलि देहिं महीपन्ह गारीं ॥ तेहिं अवसर सुनि सिवधनु भंगा । आयउ भृगुकुल कमल पतंगा ॥ १ ॥
देखि महीप सकल सकुचाने । बाज झपट जनु लवा लुकाने ॥ गौरि सरीर भूति भल भ्राजा । भाल बिसाल त्रिपुंड बिराजा ॥ २ ॥
सीस जटा ससिबदनु सुहावा । रिस बस कछुक अरुन होइ आवा ॥ भृकुटी कुटिल नयन रिस राते । सहजहुँ चितवत मनहुँ रिसाते ॥ ३ ॥
बृषभ कंध उर बाहु बिसाला । चारु जनेउ माल मृगछाला ॥ कटि मुनिबसन तून दुइ बाँधें । धनु सर कर कुठारु कल काँधें ॥ ४ ॥
अरुन नयन भृकुटी कुटिल चितवत नृपन्ह सकोप । मनहुँ मत्त गजगन निरखि सिंघकिसोरहि चोप ॥ २६७ ॥
देखत भृगुपति बेषु कराला । उठे सकल भय बिकल भुआला ॥ पितु समेत कहि कहि निज नामा । लगे करन सब दंड प्रनामा ॥ १ ॥
जेहि सुभायँ चितवहिं हितु जानी । सो जानइ जनु आइ खुटानी ॥ जनक बहोरि आइ सिरु नावा । सीय बोलाइ प्रनामु करावा ॥ २ ॥
आसिष दीन्हि सखीं हरषानीं । निज समाज लै गईं सयानीं ॥ बिस्वामित्रु मिले पुनि आई । पद सरोज मेले दोउ भाई ॥ ३ ॥
रामु लखनु दसरथ के ढोटा । दीन्हि असीस देखि भल जोटा ॥ रामहि चितइ रहे थकि लोचन । रूप अपार मार मद मोचन ॥ ४ ॥
सांत बेषु करनी कठिन बरनि न जाइ सरूप । धरि मुनितनु जनु बीर रसु आयउ जहँ सब भूप ॥ २६८ ॥
समाचार कहि जनक सुनाए । जेहि कारन महीप सब आए ॥ सुनत बचन फिरि अनत निहारे । देखे चापखंड महि डारे ॥ १ ॥
अति रिस बोले बचन कठोरा । कहु जड़ जनक धनुष कै तोरा ॥ बेगि देखाउ मूढ़ न त आजू । उलटउँ महि जहँ लहि तव राजू ॥ २ ॥
अति डरु उतरु देत नृपु नाहीं । कुटिल भूप हरषे मन माहीं ॥ सुर मुनि नाग नगर नर नारी । सोचहिं सकल त्रास उर भारी ॥ ३ ॥
मन पछिताति सीय महतारी । बिधि अब सँवरी बात बिगारी ॥ भृगुपति कर सुभाउ सुनि सीता । अरध निमेष कलप सम बीता ॥ ४ ॥
बहुरि बिलोकि बिदेह सन कहहु काह अति भीर । पूँछत जानि अजान जिमि ब्यापेउ कोपु सरीर ॥ २६९ ॥
नाथ संभुधनु भंजनिहारा । होइहि केउ एक दास तुम्हारा ॥ आयसु काह कहिअ किन मोही । सुनि रिसाइ बोले मुनि कोही ॥ १ ॥
सेवकु सो जो करै सेवकाई । अरि करनी करि करिअ लराई ॥ सुनहु राम जेहिं सिवधनु तोरा । सहसबाहु सम सो रिपु मोरा ॥ २ ॥
सो बिलगाउ बिहाइ समाजा । न त मारे जैहहिं सब राजा ॥ सुनि मुनि बचन लखन मुसुकाने । बोले परसुधरहि अपमाने ॥ ३ ॥
बहु धनुहीं तोरीं लरिकाईं । कबहुँ न असि रिस कीन्हि गोसाईं ॥ एहि धनु पर ममता केहि हेतू । सुनि रिसाइ कह भृगुकुलकेतू ॥ ४ ॥
सभय बिलोके लोग सब जानि जानकी भीरु । हृदयँ न हरषु बिषादु कछु बोले श्रीरघुबीरु ॥ २७० ॥
लखन कहा हँसि हमरें जाना । सुनहु देव सब धनुष समाना ॥ का छति लाभु जून धनु तोरें । देखा राम नयन के भोरें ॥ १ ॥
छुअत टूट रघुपतिहु न दोसू । मुनि बिनु काज करिअ कत रोसू ॥ बोले चितइ परसु की ओरा । रे सठ सुनेहि सुभाउ न मोरा ॥ २ ॥
बालकु बोलि बधउँ नहिं तोही । केवल मुनि जड़ जानहि मोही ॥ बाल ब्रह्मचारी अति कोही । बिस्व बिदित छत्रियकुल द्रोही ॥ ३ ॥
भुजबल भूमि भूप बिनु कीन्ही । बिपुल बार महिदेवन्ह दीन्ही ॥ सहसबाहु भुज छेदनिहारा । परसु बिलोकु महीपकुमारा ॥ ४ ॥
रे नृप बालक काल बस बोलत तोहि न सँभार । धनुही सम तिपुरारि धनु बिदित सकल संसार ॥ २७१ ॥
बिहसि लखनु बोले मृदु बानी । अहो मुनीसु महा भटमानी ॥ पुनि पुनि मोहि देखाव कुठारू । चहत उड़ावन फूँकि पहारू ॥ १ ॥
इहाँ कुम्हड़बतिया कोउ नाहीं । जे तरजनी देखि मरि जाहीं ॥ देखि कुठारु सरासन बाना । मैं कछु कहा सहित अभिमाना ॥ २ ॥
भृगुसुत समुझि जनेउ बिलोकी । जो कछु कहहु सहउँ रिस रोकी ॥ सुर महिसुर हरिजन अरु गाई । हमरें कुल इन्ह पर न सुराई ॥ ३ ॥
बधें पापु अपकीरति हारें । मारतहूँ पा परिअ तुम्हारें ॥ कोटि कुलिस सम बचनु तुम्हारा । ब्यर्थ धरहु धनु बान कुठारा ॥ ४ ॥
मातु पितहि जनि सोचबस करसि महीसकिसोर । गर्भन्ह के अर्भक दलन परसु मोर अति घोर ॥ २७२ ॥
कौसिक सुनहु मंद यहु बालकु । कुटिल कालबस निज कुल घालकु ॥ भानु बंस राकेस कलंकू । निपट निरंकुस अबुध असंकू ॥ १ ॥
काल कवलु होइहि छन माहीं । कहउँ पुकारि खोरि मोहि नाहीं ॥ तुम्ह हटकहु जौं चहहु उबारा । कहि प्रतापु बलु रोषु हमारा ॥ २ ॥
लखन कहेउ मुनि सुजसु तुम्हारा । तुम्हहि अछत को बरनै पारा ॥ अपने मुँह तुम्ह आपनि करनी । बार अनेक भाँति बहु बरनी ॥ ३ ॥
नहिं संतोषु त पुनि कछु कहहू । जनि रिस रोकि दुसह दुख सहहू ॥ बीरब्रती तुम्ह धीर अछोभा । गारी देत न पावहु सोभा ॥ ४ ॥
जो बिलोकि अनुचित कहेउँ छमहु महामुनि धीर । सुनि सरोष भृगुबंसमनि बोले गिरा गभीर ॥ २७३ ॥
तुम्ह तौ कालु हाँक जनु लावा । बार बार मोहि लागि बोलावा ॥ सुनत लखन के बचन कठोरा । परसु सुधारि धरेउ कर घोरा ॥ १ ॥
अब जनि देइ दोसु मोहि लोगू । कटुबादी बालकु बधजोगू ॥ बाल बिलोकि बहुत मैं बाँचा । अब यहु मरनिहार भा साँचा ॥ २ ॥
कौसिक कहा छमिअ अपराधू । बाल दोष गुन गनहिं न साधू ॥ खर कुठार मैं अकरुन कोही । आगें अपराधी गुरुद्रोही ॥ ३ ॥
उतर देत छोड़उँ बिनु मारें । केवल कौसिक सील तुम्हारें ॥ न त एहि काटि कुठार कठोरें । गुरहि उरिन होतेउँ श्रम थोरें ॥ ४ ॥
सूर समर करनी करहिं कहि न जनावहिं आपु । बिद्यमान रन पाइ रिपु कायर कथहिं प्रतापु ॥ २७४ ॥
कहेउ लखन मुनि सीलु तुम्हारा । को नहिं जान बिदित संसारा ॥ माता पितहि उरिन भए नीकें । गुर रिनु रहा सोचु बड़ जीकें ॥ १ ॥
सो जनु हमरेहि माथे काढ़ा । दिन चलि गए ब्याज बड़ बाढ़ा ॥ अब आनिअ ब्यवहरिआ बोली । तुरत देउँ मैं थैली खोली ॥ २ ॥
सुनि कटु बचन कुठार सुधारा । हाय हाय सब सभा पुकारा ॥ भृगुबर परसु देखावहु मोही । बिप्र बिचारि बचउँ नृपदोही ॥ ३ ॥
मिले न कबहुँ सुभट रन गाढ़े । द्विज देवता घरहि के बाढ़े ॥ अनुचित कहि सब लोग पुकारे । रघुपति सयनहिं लखनु नेवारे ॥ ४ ॥
गाधिसूनु कह हृदयँ हँसि मुनिहि हरिअरइ सूझ । अयमय खाँड़ न ऊखमय अजहुँ न बूझ अबूझ ॥ २७५ ॥
नाथ करहु बालक पर छोहु । सूध दूधमुख करिअ न कोहू ॥ जौं पै प्रभु प्रभाउ कछु जाना । तौ कि बराबरि करत अयाना ॥ १ ॥
जौं लरिका कछु अचगरि करहीं । गुर पितु मातु मोद मन भरहीं ॥ करिअ कृपा सिसु सेवक जानी । तुम्ह सम सील धीर मुनि ग्यानी ॥ २ ॥
राम बचन सुनि कछुक जुड़ाने । कहि कछु लखनु बहुरि मुसुकाने ॥ हँसत देखि नख सिख रिस ब्यापी । राम तोर भ्राता बड़ पापी ॥ ३ ॥
गौर सरीर स्याम मन माहीं । कालकूट मुख पयमुख नाहीं ॥ सहज टेढ़ अनुहरइ न तोही । नीचु मीचु सम देख न मोही ॥ ४ ॥
लखन उतर आहुति सरिस भृगुबर कोपु कृसानु । बढ़त देखि जल सम बचन बोले रघुकुलभानु ॥ २७६ ॥
मैं तुम्हार अनुचर मुनिराया । परिहरि कोपु करिअ अब दाया ॥ टूट चाप नहिं जुरिहि रिसाने । बैठिअ होइहिं पाय पिराने ॥ १ ॥
जौं अति प्रिय तौ करिअ उपाई । जोरिअ कोउ बड़ गुनी बोलाई ॥ बोलत लखनहिं जनकु डेराहीं । मष्ट करहु अनुचित भल नाहीं ॥ २ ॥
थर थर काँपहिं पुर नर नारी । छोट कुमार खोट बड़ भारी ॥ भृगुपति सुनि सुनि निरभय बानी । रिस तन जरइ होई बल हानी ॥ ३ ॥
बोले रामहि देइ निहोरा । बचउँ बिचारि बंधु लघु तोरा ॥ मनु मलीन तनु सुंदर कैसें । बिष रस भरा कनक घटु जैसें ॥ ४ ॥
लखन कहेउ हँसि सुनहु मुनि क्रोधु पाप कर मूल । जेहि बस जन अनुचित करहिं चरहिं बिस्व प्रतिकूल ॥ २७७ ॥
अति बिनीत मृदु सीतल बानी । बोले रामु जोरि जुग पानी ॥ सुनहु नाथ तुम्ह सहज सुजाना । बालक बचनु करिअ नहिं काना ॥ १ ॥
बररै बालकु एकु सुभाऊ । इन्हहि न संत बिदूषहिं काऊ ॥ तेहिं नाहीं कछु काज बिगारा । अपराधी मैं नाथ तुम्हारा ॥ २ ॥
कृपा कोपु बधु बँधब गोसाईं । मो पर करिअ दास की नाईं ॥ कहिअ बेगि जेहि बिधि रिस जाई । मुनिनायक सोइ करौं उपाई ॥ ३ ॥
कह मुनि राम जाइ रिस कैसें । अजहुँ अनुज तव चितव अनैसें ॥ एहि कें कंठ कुठारु न दीन्हा । तौ मैं कहा कोपु करि कीन्हा ॥ ४ ॥
सुनि लछिमन बिहसे बहुरि नयन तरेरे राम । गुर समीप गवने सकुचि परिहरि बानी बाम ॥ २७८ ॥
बहइ न हाथु दहइ रिस छाती । भा कुठारु कुंठित नृपघाती ॥ भयउ बाम बिधि फिरेउ सुभाऊ । मोरे हृदयँ कृपा कसि काऊ ॥ १ ॥
आजु दया दुखु दुसह सहावा । सुनि सौमित्रि बिहसि सिरु नावा ॥ बाउ कृपा मूरति अनुकूला । बोलत बचन झरत जनु फूला ॥ २ ॥
जौं पै कृपाँ जरिहिं मुनि गाता । क्रोध भएँ तनु राख बिधाता ॥ देखु जनक हठि बालकु एहू । कीन्ह चहत जड़ जमपुर गेहू ॥ ३ ॥
बेगि करहु किन आँखिन्ह ओटा । देखत छोट खोट नृपु ढोटा ॥ बिहसे लखनु कहा मन माहीं । मूदें आँखि कतहुँ कोउ नाहीं ॥ ४ ॥
गर्भ स्रवहिं अवनिप रवनि सुनि कुठार गति घोर । परसु अछत देखउँ जिअत बैरी भूपकिसोर ॥ २७९ ॥
बंधु कहइ कटु संमत तोरें । तू छल बिनय करसि कर जोरें ॥ करु परितोषु मोर संग्रामा । नाहिं त छाड़ कहाउब रामा ॥ १ ॥
छलु तजि करहि समरु सिवद्रोही । बंधु सहित न त मारउँ तोही ॥ भृगुपति बकहिं कुठार उठाएँ । मन मुसुकाहिं रामु सिर नाएँ ॥ २ ॥
गुनह लखन कर हम पर रोषू । कतहुँ सुधाइहु ते बड़ दोषू ॥ टेढ़ जानि सब बंदइ काहू । बक्र चंद्रमहि ग्रसइ न राहू ॥ ३ ॥
राम कहेउ रिस तजिअ मुनीसा । कर कुठारु आगें यह सीसा ॥ जेहिं रिस जाइ करिअ सोइ स्वामी । मोहि जानिअ आपन अनुगामी ॥ ४ ॥
परसुरामु तब राम प्रति बोले उर अति क्रोधु । संभु सरासनु तोरि सठ करसि हमार प्रबोधु ॥ २८० ॥
देखि कुठार बान धनु धारी । भै लरिकहि रिस बीरु बिचारी ॥ नामु जान पै तुम्हहि न चीन्हा । बंस सुभायँ उतरु तेहिं दीन्हा ॥ १ ॥
जौं तुम्ह औतेहु मुनि की नाईं । पद रज सिर सिसु धरत गोसाईं ॥ छमहु चूक अनजानत केरी । चहिअ बिप्र उर कृपा घनेरी ॥ २ ॥
हमहि तुम्हहि सरिबरि कसि नाथा । कहहु न कहाँ चरन कहँ माथा ॥ राम मात्र लघुनाम हमारा । परसु सहित बड़ नाम तोहारा ॥ ३ ॥
देव एकु गुनु धनुष हमारें । नव गुन परम पुनीत तुम्हारें ॥ सब प्रकार हम तुम्ह सन हारे । छमहु बिप्र अपराध हमारे ॥ ४ ॥
प्रभुहि सेवकहि समरु कस तजहु बिप्रबर रोसु । बेषु बिलोकें कहेसि कछु बालकहू नहिं दोसु ॥ २८१ ॥
निपटहिं द्विज करि जानहि मोही । मैं जस बिप्र सुनावउँ तोही ॥ चाप सुवा सर आहुति जानू । कोपु मोर अति घोर कृसानू ॥ १ ॥
समिधि सेन चतुरंग सुहाई । महा महीप भए पसु आई ॥ मैं एहिं परसु काटि बलि दीन्हे । समर जग्य जप कोटिन्ह कीन्हे ॥ २ ॥
मोर प्रभाउ बिदित नहिं तोरें । बोलसि निदरि बिप्र के भोरें ॥ भंजेउ चापु दापु बड़ बाढ़ा । अहमिति मनहुँ जीति जगु ठाढ़ा ॥ ३ ॥
राम कहा मुनि कहहु बिचारी । रिस अति बड़ि लघु चूक हमारी ॥ छुअतहिं टूट पिनाक पुराना । मैं केहि हेतु करौं अभिमाना ॥ ४ ॥
बार बार मुनि बिप्रबर कहा राम सन राम । बोले भृगुपति सरुष हसि तहूँ बंधू सम बाम ॥ २८२ ॥
देव दनुज भूपति भट नाना । समबल अधिक होउ बलवाना ॥ जौं रन हमहि पचारै कोऊ । लरहिं सुखेन कालु किन होऊ ॥ १ ॥
छत्रिय तनु धरि समर सकाना । कुल कलंकु तेहिं पावँर आना ॥ कहउँ सुभाउ न कुलहि प्रसंसी । कालहु डरहिं न रन रघुबंसी ॥ २ ॥
बिप्रबंस कै असि प्रभुताई । अभय होइ जो तुम्हहि डेराई ॥ सुनि मृदु गूढ़ बचन रघुपत के । उघरे पटल परसुधर मति के ॥ ३ ॥
राम रमापति कर धनु लेहू । खैंचहु मिटै मोर संदेहू ॥ देत चापु आपुहिं चलि गयऊ । परसुराम मन बिसमय भयऊ ॥ ४ ॥
जौं हम निदरहिं बिप्र बदि सत्य सुनहु भृगुनाथ । तौ अस को जग सुभटु जेहि भय बस नावहिं माथ ॥ २८३ ॥
जय रघुबंस बनज बन भानू । गहन दनुज कुल दहन कृसानू ॥ जय सुर बिप्र धेनु हितकारी । जय मद मोह कोह भ्रम हारी ॥ १ ॥
बिनय सील करुना गुन सागर । जयति बचन रचना अति नागर ॥ सेवक सुखद सुभग सब अंगा । जय सरीर छबि कोटि अनंगा ॥ २ ॥
करौं काह मुख एक प्रसंसा । जय महेस मन मानस हंसा ॥ अनुचित बहुत कहेउँ अग्याता । छमहु छमा मंदिर दोउ भ्राता ॥ ३ ॥
कहि जय जय जय रघुकुलकेतू । भृगुपति गए बनहि तप हेतू ॥ अपभयँ कुटिल महीप डेराने । जहँ तहँ कायर गवँहिं पराने ॥ ४ ॥
जाना राम प्रभाउ तब पुलक प्रफुल्लित गात । जोरि पानि बोले बचन हृदयँ न प्रेमु अमात ॥ २८४ ॥