ॐ नमः शिवाय  |  जय श्री राम  |  हरे कृष्ण
काण्ड 1

श्रीरामचरितमानसबाल काण्ड

कुल 1,913 पद/श्लोक

चौपाई 1बाल काण्ड
जनि डरपहु मुनि सिद्ध सुरेसा । तुम्हहि लागि धरिहउँ नर बेषा ॥
अंसन्ह सहित मनुज अवतारा । लेहउँ दिनकर बंस उदारा ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
कस्यप अदिति महातप कीन्हा । तिन्ह कहुँ मैं पुरब बर दीन्हा ॥
ते दसरथ कौसल्या रूपा । कोसलपुरीं प्रगट नरभूपा ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
तिन्ह कें गृह अवतरिहउँ जाई । रघुकुल तिलक सो चारिउ भाई ॥
नारद बचन सत्य सब करिहउँ । परम सक्ति समेत अवतरिहउँ ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
हरिहउँ सकल भूमि गरुआई । निर्भय होहु देव समुदाई ॥
गगन ब्रह्मबानी सुनि काना । तुरत फिरे सुर हृदय जुड़ाना ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
गए देव सब निज निज धामा । भूमि सहित मन कहुँ बिश्रामा ॥
जो कछु आयसु ब्रह्माँ दीन्हा । हरषे देव बिलंब न कीन्हा ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
बनचर देह धरि छिति माहीं । अतुलित बल प्रताप तिन्ह पाहीं ॥
गिरि तरु नख आयुध सब बीरा । हरि मारग चितवहिं मतिधीरा ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
गिरि कानन जहँ तहँ भरि पूरी । रहे निज निज अनीक रचि रूरी ॥
यह सब रुचिर चरित मैं भाषा । अब सो सुनहु जो बीचहिं राखा ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
अवधपुरीं रघुकुलमनि राउ । बेद बिदित तेहि दसरथ नाउ ॥
धरम धुरंधर गुननिधि ग्यानी । हृदयँ भगति मति सारंगपानी ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
एक बार भूपति मन माहीं । भै गलानि मोरें सुत नाहीं ॥
गुर गृह गयउ तुरत महिपाला । चरन लागि करि बिनय बिसाला ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
निज दुख सुख सब गुरहि सुनायउ । कहि बसिष्ठ बहु बिधि समुझायउ ॥
धरहु धीर होइहहिं सुत चारी । त्रिभुवन बिदित भगत भय हारी ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
सृंगी ऋषिहि बसिष्ठ बोलावा । पुत्रकाम सुभ जग्य करावा ॥
भगति सहित मुनि आहुति दीन्हें । प्रगटे अगिनि चरु कर लीन्हें ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
जो बसिष्ठ कछु हृदयँ बिचारा । सकल काजु भा सिद्ध तुम्हारा ॥
यह हबि बाँटि देहु नृप जाई । जथा जोग जेहि भाग बनाई ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
तबहीं रायँ प्रिय नारि बोलाईं । कौसल्यादि तहाँ चलि आइँ ॥
अर्ध भाग कौसल्यहि दीन्हा । उभय भाग आधे करि कीन्हा ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
कैकेई कहँ नृप सो दयऊ । रह्यो सो उभय भाग पुनि भयऊ ॥
कौसल्या कैकेई हाथ धरि । दीन्ह सुमित्रहि मन प्रसन्न करि ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
एहि बिधि गर्भसहित सब नारी । भईँ हृदयँ हरषित सुख भारी ॥
जा दिन तें हरि गर्भहिं आए । सकल लोक सुख संपति छाए ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
मंदिर महँ सब राजहिं रानी । सोभा सील तेज की खानी ॥
सुख जुत कछुक काल चलि गयऊ । जेहिं प्रभु प्रगट सो अवसर भयऊ ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
नौमी तिथि मधु मास पुनीता । सुकल पच्छ अभिजित हरिप्रीता ॥
मध्य दिवस अति सीत न घामा । पावन काल लोक बिश्रामा ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
सीतल मंद सुरभि बह बाऊ । हरषित सुर संतन्ह मन चाऊ ॥
बन कुसुमित गिरिगन मनिआरा । स्रवहिं सकल सरिता अमृतधारा ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
सो अवसर बिरंचि जब जाना । चले सकल सुर साजि बिमाना ॥
गगन बिमल संकुल सुर जूथा । गावहिं गुन गंधर्ब बरूथा ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
बरषहिं सुमन सुअंजुलि साजी । गहगहि गगन दुंदुभी बाजी ॥
अस्तुति करहिं नाग मुनि देवा । बहुबिधि लावहिं निज निज सेवा ॥
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छंद 191बाल काण्ड
भए प्रगट कृपाला दीनदयाला कौसल्या हितकारी ।
हरषित महतारी मुनि मन हारी अद्भुत रूप बिचारी ॥
लोचन अभिरामा तनु घनस्यामा निज आयुध भुज चारी ।
भूषन बनमाला नयन बिसाला सोभासिंधु खरारी ॥
कह दुइ कर जोरी अस्तुति तोरी केहि बिधि करौं अनंता ।
माया गुन ग्यानातीत अमाना बेद पुरान भनंता ॥
करुना सुख सागर सब गुन आगर जेहि गावहिं श्रुति संता ।
सो मम हित लागी जन अनुरागी भयउ प्रगट श्रीकंता ॥
ब्रह्मांड निकाया निर्मित माया रोम रोम प्रति बेद कहै ।
मम उर सो बासी यह उपहासी सुनत धीर मति थिर न रहै ॥
उपजा जब ग्याना प्रभु मुसुकाना चरित बहुत बिधि कीन्ह चहै ।
कहि कथा सुहाई मातु बुझाई जेहि प्रकार सुत प्रेम लहै ॥
माता पुनि बोली सो मति डोली तजहु तात यह रूपा ।
कीजै सिसुलीला अति प्रियसीला यह सुख परम अनूपा ॥
सुनि बचन सुजाना रोदन ठाना होइ बालक सुरभूपा ।
यह चरित जे गावहिं हरिपद पावहिं ते न परहिं भवकूपा ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
सुनि सिसु रुदन परम प्रिय बानी । संभ्रम चलि आई सब रानी ॥
हरषित जहँ तहँ धाईं दासी । आनँद मगन सकल पुरबासी ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
दसरथ पुत्रजन्म सुनि काना । मानहुँ ब्रह्मानंद समाना ॥
परम प्रेम मन पुलक सरीरा । चाहत उठत करत मति धीरा ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
गुर बसिष्ठ कहँ गयउ हँकारा । आए द्विजन सहित नृपद्वारा ॥
अनुपम बालक देखेन्हि जाई । रूप रासि गुन कहि न सिराई ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
ध्वज पताक तोरन पुर छावा । कहि न जाइ जेहि भाँति बनावा ॥
सुमनबृष्टि अकास तें होई । ब्रह्मानंद मगन सब लोई ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
बृंद बृंद मिलि चलीं लोगाई । सहज सिंगार किएँ उठि धाई ॥
कनक कलस मंगल भरि थारा । गावत पैठहिं भूप दुआरा ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
करि आरति नेवछावरि करहीं । बार बार सिसु चरनन्हि परहीं ॥
मागध सूत बंदिगन गायक । पावन गुन गावहिं रघुनायक ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
सर्बस दान दीन्ह सब काहू । जेहिं पावा राखा नहिं ताहू ॥
मृगमद चंदन कुंकुम कीचा । मची सकल बीथिन्ह बिच बीचा ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
अवधपुरी सोहइ एहि भाँती । प्रभुहि मिलन आई जनु राती ॥
देखि भानू जनु मन सकुचानी । तदपि बनी संध्या अनुमानी ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
अगर धूप बहु जनु अँधिआरी । उड़इ अबीर मनहुँ अरुनारी ॥
मंदिर मनि समूह जनु तारा । नृप गृह कलस सो इंदु उदारा ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
भवन बेदधुनि अति मृदु बानी । जनु खग मुखर समयँ जनु सानी ॥
कौतुक देखि पतंग भुलाना । एक मास तेइँ जात न जाना ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
यह रहस्य काहू नहिं जाना । दिन मनि चले करत गुनगाना ॥
देखि महोत्सव सुर मुनि नागा । चले भवन बरनत निज भागा ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
औरउ एक कहउँ निज चोरी । सुनु गिरिजा अति दूढ़ मति तोरी ॥
काकभुसुंडि संग हम दोऊ । मनुजरूप जानइ नहिं कोऊ ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
परमानंद प्रेमसुख फूले । बीथिन्ह फिरहिं मगन मन भूले ॥
यह सुभ चरित जान पै सोई । कृपा राम कै जापर होई ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
तेहि अवसर जो जेहि बिधि आवा । दीन्ह भूप जो जेहि मन भावा ॥
गज रथ तुरग हेम गो हीरा । दीन्हे नृप नानाबिधि चीरा ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
कछुक दिवस बीते एहि भाँती । जात न जानिअ दिन अरु राती ॥
नामकरन कर अवसरु जानी । भूप बोलि पठए मुनि ग्यानी ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
करि पूजा भूपति अस भाषा । धरिअ नाम जो मुनि गुनि राखा ॥
इन्ह के नाम अनेक अनूपा । मैं नृप कहब स्वमति अनुरूपा ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
जो आनंद सिंधु सुखरासी । सीकर तें त्रैलोक सुपासी ॥
सो सुख धाम राम अस नामा । अखिल लोक दायक बिश्रामा ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
बिस्व भरन पोषन कर जोई । ताकर नाम भरत अस होई ॥
जाके सुमिरन तें रिपु नासा । नाम सत्रुहन बेद प्रकासा ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
धरे नाम गुर हृदयँ बिचारी । बेद तत्व नृप तव सुत चारी ॥
मुनि धन जन सरबस सिव प्राना । बाल केलि तेहिं सुख माना ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
बारहि ते निज हित पति जानी । लछिमन राम चरन रति मानी ॥
भरत सत्रुहन दूनउ भाई । प्रभु सेवक जसि प्रीति बड़ाई ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
स्याम गौर सुंदर दोउ जोरी । निरखहिं छबि जननीं तृन तोरी ॥
चारिउ सील रूप गुन धामा । तदपि अधिक सुखसागर रामा ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
हृदयँ अनुग्रह इंदु प्रकासा । सूचत किरन मनोहर हाँसा ॥
कबहुँ उछंग कबहुँ बर पलना । मातु दुलारइ कहि प्रिय ललना ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
काम कोटि छबि स्याम सरीरा । नील कंज बारिद गंभीरा ॥
अरुन चरन पंकज नख जोती । कमल दलन्हि बैठे जनु मोती ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
रेख कुलिस ध्वज अंकुस सोहे । नूपुर धुनि सुनि मुनि मन मोहे ॥
कटि किंकिनी उदर त्रय रेखा । नाभि गभीर जान जेहि देखा ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
भुज बिसाल भूषन जुत भूरी । हियँ हरि नख अति सोभा रूरी ॥
उर मनिहार पदिक की सोभा । बिप्र चरन देखत मन लोभा ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
कंबु कंठ अति चिबुक सुहाई । आनन अमित मदन छबि छाई ॥
दुइ दुइ दसन अधर अरुनारे । नासा तिलक को बरनै पारे ॥
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चौपाई 5बाल काण्ड
सुंदर श्रवन सुचारु कपोला । अति प्रिय मधुर तोतरे बोला ॥
चिक्कन कच कुंचित गभुआरे । बहु प्रकार रचि मातु सँवारे ॥
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चौपाई 6बाल काण्ड
पीत झगुलिआ तनु पहिराई । जानु पानि बिचरनि मोहि भाई ॥
रूप सकहिं नहिं कहि श्रुति सेषा । सो जानइ सपनेहुँ जेहि देखा ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
एहि बिधि राम जगत पितु माता । कोसलपुर बासिन्ह सुखदाता ॥
जिन्ह रघुनाथ चरन रति मानी । तिन्ह की यह गति प्रगट भवानी ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
रघुपति बिमुख जतन कर कोरी । कवन सकइ भव बंधन छोरी ॥
जीव चराचर बस कै राखे । सो माया प्रभु सों भय भाखे ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
भृकुटि बिलास नचावइ ताही । अस प्रभु छाड़ि भजिअ कहु काही ॥
मन क्रम बचन छाड़ि चतुराई । भजत कृपा करिहहिं रघुराई ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
एहि बिधि सिसुबिनोद प्रभु कीन्हा । सकल नगरबासिन्ह सुख दीन्हा ॥
लै उछंग कबहुँक हलरावै । कबहुँ पालने घालि झुलावै ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
एक बार जननीं अन्हवाएँ । करि सिंगार पलनाँ पौढ़ाएँ ॥
निज कुल इष्टदेव भगवाना । पूजा हेतु कीन्ह अस्नाना ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
करि पूजा नैबेद्य चढ़ावा । आपु गई जहाँ पाक बनावा ॥
बहुरि मातु तहवाँ चलि आई । भोजन करत देख सुत जाई ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
गै जननी सिसु पहिं भयभीता । देखा बाल तहँ पुनि सूता ॥
बहुरि आइ देखा सुत सोई । हृदयँ कंप मन धीर न होई ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
इहाँ उहां दुइ बालक देखा । मतिभ्रम मोर कि आन बिसेषा ॥
देखि राम जननी अकुलानी । प्रभु हँसि दीन्ह मधुर मुसुकानी ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
अगनित रवि ससि सिव चतुरानन । बहु गिरि सरित सिंधु महि कानन ॥
काल कर्म गुन ग्यान सुभाऊ । सोउ देखा जो सुना न काऊ ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
देखी माया सब बिधि गाढ़ी । अति सभीत जोरें कर ठाढ़ी ॥
देखा जीव नचावइ जाही । देखी भगति जो छोरइ ताही ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
तन पुलकित मुख बचन न आवा । नयन मूदि चरणनि सिर नावा ॥
बिसमयवंत देखि महतारी । भए बहुरि सिसुरूप खरारी ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
अस्तुति करि न जाइ भय माना । जगत पिता मैं सुत करि जाना ॥
हरि जननी बहुबिधि समुझाई । यह जनि कतहूँ कहसि सुनु माई ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
बालचरित हरि बहुबिधि कीन्हा । अति अनंद दासन्ह कहँ दीन्हा ॥
कछुक काल बीतें सब भाई । बड़े भए परिजन सुखदाई ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
चूड़ाकरन कीन्ह गुर जाई । बिप्रन्ह पुनि दच्छिना बहु पाई ॥
परम मनोहर चरित अपारा । करत फिरत चारिउ सुकुमारा ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
कौसल्या जब बोलन जाई । ठुमुकु ठुमुकु प्रभु चलहिं पराई ॥
निगम नेति सिव अंत न पावा । ताहि धरै जननी हठि धावा ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
बालचरित अति सरल सुहाए । सारद सेष संभु श्रुति गाए ॥
जिन्ह कर मन इन्ह सन नहिं राता । ते जन बंचित किए बिधाता ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
भए कुमार जबहिं सब भ्राता । दीन्ह जनेऊ गुर पितु माता ॥
गुरगृहँ गए पढ़न रघुराई । अलप काल बिद्या सब आई ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
जाकी सहज स्वास श्रुति चारी । सो हरि पढ़ यह कौतुक भारी ॥
बिद्या बिनय निपुन गुन सीला । खेलहिं खेल सकल नृप लीला ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
करतल बान धनुष अति सोहा । देखत रूप चराचर मोहा ॥
जिन्ह बीथिन्ह बिहरहिं सब भाई । थकित होहिं सब लोग लुगाई ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
बंधु सखा संग लेहिं बोलाई । बन मृगया नित खेलहिं जाई ॥
पावन मृग मारहिं जियँ जानी । दिन प्रति नृपहिं देखावहिं आनी ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
जे मृग राम बान के मारे । ते तनु तजि सुरलोक सिधारे ॥
अनुज सखा संग भोजन करहीं । मातु पिता अग्या अनुसरहीं ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
जेहि बिधि सुखी होहिं पुर लोगा । करहिं कृपानिधि सोइ संजोगा ॥
बेद पुरान सुनहिं मन लाई । आपु कहहिं अनुजन्ह समुझाई ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
प्रातकाल उठि कै रघुनाथा । मातु पिता गुर नावहिं माथा ॥
आयसु मागि करहिं पुर काजा । देखि चरित हरषइ मन राजा ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
यह सब चरित कहा मैं गाई । आगिलि कथा सुनहु मन लाई ॥
बिस्वामित्र महामुनि ग्यानी । बसहिं बिपिन सुभ आश्रम जानी ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
जहँ जप जग्य जोग मुनि करहीं । अति मारीच सुबाहुहि डरहीं ॥
देखत जग्य निसाचर धावहिं । करहिं उपद्रव मुनि दुख पावहिं ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
गाधितनय मन चिंता ब्यापी । हरि बिनु मरहिं न निसिचर पापी ॥
तब मुनिबर मन कीन्ह बिचारा । प्रभु अवतरेउ हरन महि भारा ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
एहूँ मिस देखौं पद जाई । करि बिनती आनौं दोउ भाई ॥
ग्यान बिराग सकल गुन अयना । सो प्रभु मैं देखब भरि नयना ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
मुनि आगमन सुना जब राजा । मिलन गयउ लै बिप्र समाजा ॥
करि दंडवत मुनिहि सनमानी । निज आसन बैठारेंन्हि आनी ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
चरन पखारि कीन्हि अति पूजा । मो सम आजु धन्य नहिं दूजा ॥
बिबिध भाँति भोजन करवावा । मुनिबर हृदयँ हरष अति पावा ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
पुनि चरणनि मेले सुत चारी । राम देखि मुनि देह बिसारी ॥
भए मगन देखत मुख सोभा । जनु चकोर पूरन ससि लोभा ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
तब मन हरषि बचन कह राऊ । मुनि अस कृपा न कीन्हिहु काऊ ॥
केहि कारन आगमन तुम्हारा । कहहु सो करत न लावौं बारा ॥
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चौपाई 5बाल काण्ड
असुर समूह सतावहिं मोही । मैं जाचन आयउँ नृप तोही ॥
अनुज समेत देहु रघुनाथा । निसिचर बध मैं होब सनाथा ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
सुनि राजा अति अप्रिय बानी । हृदयँ कंप मुख दुति कुमुलानी ॥
चौथेंपन पाएँ सुत चारी । बिप्र बचन नहिं कहेहु बिचारी ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
मागहु भूमि धेनु धन कोसा । सर्वस देउँ आजु सहरोसा ॥
देह प्रान तें प्रिय कछु नाहीं । सोउ मुनि देउँ निमिष एक माहीं ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
सब सुत प्रिय मोहि प्रान कि नाई । राम देत नहिं बनइ गोसाई ॥
कहँ निसिचर अति घोर कठोरा । कहँ सुंदर सुत परम किसोरा ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
सुनि नृप गिरा प्रेम रस सानी । हृदयँ हरष माना मुनि ग्यानी ॥
तब बसिष्ठ बहुबिधि समुझावा । नृप संदेह नास कहुँ पावा ॥
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चौपाई 5बाल काण्ड
अति आदर दोउ तनय बोलाए । हृदयँ लाइ बहु भाँति सिखाए ॥
मेरे प्रान नाथ सुत दोऊ । तुम्ह मुनि पिता आन नहिं कोऊ ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
अरुन नयन उर बाहु बिसाला । नील जलज तनु स्याम तमाला ॥
कटि पट पीत कसें बर भाथा । रुचिर चाप सायक दुइ हाथा ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
स्याम गौर सुंदर दोउ भाई । बिस्वामित्र महानिधि पाई ॥
प्रभु ब्रह्मन्यदेव मैं जाना । मोहि निति पिता तजेउ भगवाना ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
चले जात मुनि दीन्हि देखाई । सुनि ताड़का क्रोध करि धाई ॥
एकहि बान प्रान हरि लीन्हा । दीन जानि तेहि निज पद दीन्हा ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
तब ऋषि निज नाथहि जियँ चीन्ही । बिद्यानिधि कहुँ बिद्या दीन्ही ॥
जाते लाग न छुधा पिपासा । अतुलित बल तनु तेज प्रकासा ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
प्रात कहा मुनि सन रघुराई । निर्भय जग्य करहु तुम्ह जाई ॥
होम करन लागे मुनि झारी । आपु रहे मख कीं रखवारी ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
सुनि मारीच निसाचर क्रोही । लै सहाय धावा मुनिद्रोही ॥
बिनु फर बान राम तेहि मारा । सत जोजन गा सागर पारा ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
पावक सर सुबाहु पुनि मारा । अनुज निसाचर कटकु सँघारा ॥
मारि असुर द्विज निर्मयकारी । अस्तुति करहिं देव मुनि झारी ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
तहँ पुनि कछुक दिवस रघुराया । रहे कीन्हि बिप्रन्ह पर दाया ॥
भगति हेतु बहु कथा पुराना । कहे बिप्र जद्यपि प्रभु जाना ॥
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चौपाई 5बाल काण्ड
तब मुनि सादर कहा बुझाई । चरित एक प्रभु देखिअ जाई ॥
धनुषजग्य मुनि रघुकुल नाथा । हरषि चले मुनिबर के साथा ॥
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चौपाई 6बाल काण्ड
आश्रम एक दीख मग माहीं । खग मृग जीव जंतु तहँ नाहीं ॥
पूछा मुनिहि सिला प्रभु देखी । सकल कथा मुनि कहा बिसेषी ॥
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छंद 210बाल काण्ड
परसत पद पावन सोक नसावन प्रगट भई तपपुंज सही ।
देखत रघुनायक जन सुख दायक सनमुख होइ कर जोरि रही ॥
अति प्रेम अधीरा पुलक सरीरा मुख नहिं आवइ बचन कही ।
अतिसय बड़भागी चरनन्हि लागी जुगल नयन जलधार बही ॥
धीरजु मन कीन्हा प्रभु कहुँ चीन्हा रघुपति कृपाँ भगति पाई ।
अति निर्मल बानीं अस्तुति ठानी ग्यानगम्य जय रघुराई ॥
मै नारि अपावन प्रभु जग पावन रावन रिपु जन सुखदाई ।
राजीव बिलोचन भव भय मोचन पाहि पाहि सरनहिं आई ॥
मुनि श्राप जो दीन्हा अति भल कीन्हा परम अनुग्रह मैं माना ।
देखेउँ भरि लोचन हरि भवमोचन इहइ लाभ संकर जाना ॥
बिनती प्रभु मोरी मैं मति भोरी नाथ न मागउँ बर आना ।
पद कमल परागा रस अनुरागा मम मन मधुप करै पाना ॥
जेहिं पद सुरसरिता परम पुनीता प्रगट भई सिव सीस धरी ।
सोइ पद पंकज जेहि पूजत अज मम सिर धरेउ कृपाल हरी ॥
एहि भाँति सिधारी गौतम नारी बार बार हरि चरन परी ।
जो अति मन भावा सो बरु पावा गै पतिलोक अनंद भरी ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
चले राम लछिमन मुनि संगा । गए जहाँ जग पावनि गंगा ॥
गाधिसूनु सब कथा सुनाई । जेहि प्रकार सुरसरि महि आई ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
तब प्रभु रिषिन्ह समेत नहाए । बिबिध दान महिदेवन्हि पाए ॥
हरषि चले मुनि बृंद सहाया । बेगि बिदेह नगर निअराया ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
पुर रम्यता राम जब देखी । हरषे अनुज समेत बिसेषी ॥
बापीं कूप सरित सर नाना । सलिल सुधासम मनि सोपाना ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
गुंजत मंजु मत्त रस भृंगा । कूजत कल बहुबरन बिहंगा ॥
बरन बरन बिकसे बन जाता । त्रिबिध समीर सदा सुखदाता ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
बनइ न बरनत नगर निकाई । जहाँ जाइ मन तहँइँ लोभाई ॥
चारु बजारु बिचित्र अँबारी । मनिमय बिधि जनु स्वकर सँवारी ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
धनिक बनिक बर धनद समाना । बैठ सकल बस्तु लै नाना ॥
चौहट सुंदर गलीं सुहाई । संतत रहहिं सुगंध सिंचाई ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
मंगलमय मंदिर सब केरें । चित्रित जनु रतिनाथ चितेरें ॥
पुर नर नारि सुभग सुचि संता । धरमसील ग्यानी गुनवंता ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
अति अनूप जहँ जनक निवासू । बिथकहिं बिबुध बिलोकि बिलासू ॥
होत चकित चित कोट बिलोकी । सकल भुवन सोभा जनु रोकी ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
सुभग द्वार सब कुलिस कपाटा । भूप भीर नट मागध भाटा ॥
बनी बिसाल बाजि गज साला । हय गय रथ संकुल सब काला ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
सूर सचिव सेनप बहुतेरे । नृपगृह सरिस सदन सब केरे ॥
पुर बाहेर सर सारित समीपा । उतरे जहँ तहँ बिपुल महीपा ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
देखि अनूप एक अँवराई । सब सुपास सब भाँति सुहाई ॥
कौसिक कहेउ मोर मनु माना । इहाँ रहिअ रघुबीर सुजाना ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
भलेहिं नाथ कहि कृपानिकेता । उतरे तहँ मुनिबृंद समेता ॥
बिस्वामित्र महामुनि आए । समाचार मिथिलापति पाए ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
कीन्ह प्रनामु चरन धरि माथा । दीन्हि असीस मुदित मुनिनाथा ॥
बिप्रबृंद सब सादर बंदे । जानि भाग्य बड़ राउ अनंदे ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
कुसल प्रस्न कहि बारहिं बारा । बिस्वामित्र नृपहि बैठारा ॥
तेहि अवसर आए दोउ भाई । गए रहे देखन फुलवाई ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
स्याम गौर मृदु बयस किसोरा । लोचन सुखद बिस्व चित चोरा ॥
उठे सकल जब रघुपति आए । बिस्वामित्र निकट बैठाए ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
भए सब सुखी देखि दोउ भ्राता । बारि बिलोचन पुलकित गाता ॥
मूरति मधुर मनोहर देखी । भयउ बिदेहु बिदेहु बिसेषी ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
कहहु नाथ सुंदर दोउ बालक । मुनिकुल तिलक कि नृपकुल पालक ॥
ब्रह्म जो निगम नेति कहि गावा । उभय बेष धरि की सोइ आवा ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
सहज बिरागरुप मनु मोरा । थकित होत जिमि चंद चकोरा ॥
ताते प्रभु पूछउँ सतिभाऊ । कहहु नाथ जनि करहु दुराऊ ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
इन्हहि बिलोकत अति अनुरागा । बरबस ब्रह्मसुखहि मन त्यागा ॥
कह मुनि बिहसि कहेहु नृप नीका । बचन तुम्हार न होइ अलीका ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
ए प्रिय सबहि जहाँ लगि प्रानी । मन मुसुकाहिं रामु सुनि बानी ॥
रघुकुल मनि दसरथ के जाए । मम हित लागि नरेस पठाए ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
मुनि तव चरन देखि कह राऊ । कहि न सकउँ निज पुन्य प्राभाऊ ॥
सुंदर स्याम गौर दोउ भ्राता । आनँदहू के आनँद दाता ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
इन्ह कै प्रीति परसपर पावनि । कहि न जाइ मन भाव सुहावनि ॥
सुनहु नाथ कह मुदित बिदेहू । ब्रह्म जीव इव सहज सनेहू ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
पुनि पुनि प्रभुहि चितव नरनाहू । पुलक गात उर अधिक उछाहू ॥
मुनिहि प्रसंसि नाइ पद सीसू । चलेउ लवाइ नगर अवनीसू ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
सुंदर सदनु सुखद सब काला । तहाँ बासु लै दीन्ह भुआला ॥
करि पूजा सब बिधि सेवकाई । गयउ राउ गृह बिदा कराई ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
लखन हृदयँ लालसा बिसेषी । जाइ जनकपुर आइअ देखी ॥
प्रभु भय बहुरि मुनिहि सकुचाहीं । प्रगट न कहहिं मनहिं मुसुकाहीं ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
राम अनुज मन की गति जानी । भगत बछलता हिंयँ हुलसानी ॥
परम बिनीत सकुचि मुसुकाई । बोले गुर अनुसासन पाई ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
नाथ लखनु पुरु देखन चहहीं । प्रभु सकोच डर प्रगट न कहहीं ॥
जौं राउर आयसु मैं पावौं । नगर देखाइ तुरत लै आवौं ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
सुनि मुनीसु कह बचन सप्रीती । कस न राम तुम्ह राखहु नीती ॥
धरम सेतु पालक तुम्ह ताता । प्रेम बिबस सेवक सुखदाता ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
मुनि पद कमल बंदि दोउ भ्राता । चले लोक लोचन सुख दाता ॥
बालक बृंदि देखि अति सोभा । लगे संग लोचन मनु लोभा ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
केहरि कंधर बाहु बिसाला । उर अति रुचिर नागमनि माला ॥
सुभग सोन सरसीरुह लोचन । बदन मयंक तापत्रय मोचन ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
कानन्हि कनक फूल छबि देहीं । चितवत चितहि चोरि जनु लेहीं ॥
चितवनि चारु भृकुटि बर बाँकी । तिलक रेखा सोभा जनु चाँकी ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
निरखि सहज सुंदर दोउ भाई । होहिं सुखी लोचन फल पाई ॥
जुवतीं भवन झरोखन्हि लागीं । निरखहिं राम रूप अनुरागीं ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
कहहिं परस्पर बचन सप्रीती । सखि इन्ह कोटि काम छबि जीती ॥
सुर नर असुर नाग मुनि माहीं । सोभा असि कहुँ सुनिअति नाहीं ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
बिष्णु चारि भुज बिधि मुख चारी । बिकट बेष मुख पंच पुरारी ॥
अपर देउ अस कोउ न आही । यह छवि सखी पटतरिअ जाही ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
कहहिं सखी अस को तनुधारी । जो न मोह यह रूप निहारी ॥
कोउ सप्रेम बोली मृदु बानी । जो मैं सुना सो सुनहु सयानी ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
ए दोऊ दसरथ के ढोटा । बाल मरालन्हि के कल जोटा ॥
मुनि कौसिक मख के रखवारे । जिन्ह रन अजिर निसाचर मारे ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
स्याम गात कल कंज बिलोचन । जो मारीच सुभुज मदु मोचन ॥
कौसल्या सुत सो सुख खानी । नामु रामु धनु सायक पानी ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
गौर किसोर बेषु बर काछें । कर सर चाप राम के पाछें ॥
लछिमनु नामु राम लघु भ्राता । सुनु सखि तासु सुमित्रा माता ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
देखि राम छबि कोउ एक कहई । जोगु जानकिहि यह बरु अहई ॥
जौ सखि इन्हहि देख नरनाहू । पन परिहरि हठि करइ बिबाहू ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
कोउ कह ए भूपति पहिचाने । मुनि समेत सादर सनमाने ॥
सखि परंतु पनु राउ न तजई । बिधि बस हठि अबिबेकहि भजई ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
कोउ कह जौं भल अहइ बिधाता । सब कहँ सुनिअ उचित फलदाता ॥
तौ जानकिहि मिलिहि बरु एहू । नाहिन आलि इहाँ संदेहू ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
जौं बिधि बस अस बनै सँजोगू । तौ कृतकृत्य होइ सब लोगू ॥
सखि हमरें आरति अति तातें । कबहुँक ए आवहिं एहि नातें ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
बोली अपर कहहु सखि नीका । ए बिआहाति हित सबही का ॥
कोउ कह संकर चाप कठोरा । ए स्यामल मृदु गात किसोरा ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
सब असमंजस अहहिं सयानी । यह मुनि ऊपर कहइ मृदु बानी ॥
सखि इन्ह कहँ कोटि कोटि अस कहहीं । बड़ प्रभाव देखत लघु अहहीं ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
परसि जासु पद पंकज धूरी । तरी अहल्या कृत अघ भूरी ॥
सो कि रहिहि बिनु सिव धनु तोरें । यह प्रतीति परिहरिअ न भोरें ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
जेहिं बिरंचि रचि सीयँ सँवारी । तेहिं स्यामल कर रचेउ बिचारी ॥
तासु बचन सुनि सब हरषानीं । ऐसे होउ कहहिं मुदु बानीं ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
पुर एत दिसि चले दोउ भाई । जहाँ धनुषमख हित भूमि बनाई ॥
अति बिस्तार चारु गचँवारी । बिमल बेदिका रुचिर सँवारी ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
चहुँ दिसि कंचन मंच बिसाला । रचे जहाँ बैठहिं महिपाला ॥
तेहि पाछें समीप चहुँ पासा । अपर मंच मंडली बिलासा ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
कछुक ऊँच सब भाँति सुहाई । बैठहिं नगर लोग जहाँ जाई ॥
तिन्ह के निकट बिसाल सुहाए । धवल धाम बहुबर्न बनाए ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
जहँ बैठें देखहिं सब नारी । जथाजोगु निज कुल अनुहारी ॥
पुर बालक कहि कहि मृदु बचना । सादर प्रभुहि देखावहिं रचना ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
सिसु सब राम प्रेमबस जाने । प्रीति समेत निकेत बोलाने ॥
निज निज रुचि सब लेहिं बोलाई । सहित सनेह जाहिं दोउ भाई ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
राम देखावहिं अनुजहिं रचना । कहि मृदु मधुर मनोहर बचना ॥
लव निमेष महुँ भुवन निकाया । रचइ जासु अनुसासन माया ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
भगति हेतु सोइ दीनदयाला । चितवत चकित धनुष मखसाला ॥
कौतुक देखि चले गुरु पाहीं । जानि बिलंबु त्रास मन माहीं ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
जासु त्रास डर कहँ डर होई । भजन प्रभाव देखावत सोई ॥
कहि बातें मृदु मधुर सुहाईं । किए बिदा बालक बरिआई ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
नित्य निवेदि मुनि आयसु लीन्हा । सबहीं संध्याबंदनु कीन्हा ॥
कहत कथा इतिहास पुरानी । रुचिर रजनि जुग जाम सिरानी ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
मुनिबर सयन कीन्ह तब जाई । लगे चरन चापन दोउ भाई ॥
जिन्ह के चरन सरोरुह लागी । करत बिबिध जप जोग बिरागी ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
तेइ दोउ बंधु प्रेम जनु जीते । गुर पद कमल पलोटत प्रीते ॥
बार बार मुनि अग्या दीन्ही । रघुबर जाइ सयन तब कीन्ही ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
चापत चरन लखनु उर लाएँ । सभय प्रेम बस परम सच पाएँ ॥
पुनि पुनि प्रभु कह सोवहु ताता । पौढ़े धरि उर पद जलजाता ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
सकल सोच कर जाइ नहाए । नित्य निवाहि मुनिहि सिर नाए ॥
समय जानि गुर आयसु पाई । लेन प्रसून चले दोउ भाई ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
भूप बागु बर देखेउ जाई । जहाँ बसंत रितु रही लोभाई ॥
लागे बिटप मनोहर नाना । बरन बरन बर बेलि बिताना ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
मध्य बाग सर सोह सुहावा । मनि सोपान बिचित्र बनावा ॥
बिमल सलिलु सरसिज बहुरंगा । जलखग कूजत गुंजत भृंगा ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
चहुँ दिसि चितइ पूँछहिं मालिगन । लगे लेन दल फूल मुदित मन ॥
तेहि अवसर सीता तहँ आई । गिरिजा पूजन जननि पठाई ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
संग सखी सब सुभग सयानी । गावहिं गीत मनोहर बानी ॥
सर समीप गिरिजा गृह सोहा । बरनि न जाइ देखि मनु मोहा ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
मज्जन करि सर सखिन्ह समेताँ । गई मुदित मन गौरि निकेता ॥
पूजा कीन्हि अधिक अनुरागा । निज अनुरूप सुभग बरु माँगा ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
देखन बागु कुअँर दुई आए । बयस किसोर सब भाँति सुहाए ॥
स्याम गौर किमि कहौं बखानी । गिरा अनयन नयन बिनु बानी ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
मुनि हरषीं सुनि सखी सयानी । सिय हियँ अति उत्कंठा जानी ॥
एक कहइ नृपसुत तेइ आळी । सुने जे मुनि संग आए काली ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
जिन्ह निज रूप मोहनी डारी । कीन्हे स्वबस नगर नर नारी ॥
बरनत छबि जहाँ तहँ सब लोगू । अवसि देखिअहिं देखन जोगू ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
तासु बचन अति सियहि सोहाने । दरस लागि लोचन अकुलाने ॥
चली अग्र करि प्रिय सखि सोई । प्रीति पुरातन लखइ न कोई ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
कंकन किंकिनि नूपुर धुनि सुनि । कहत लखन सन रामु हृदयँ गुनि ॥
मानहुँ मदन दुंदुभी दीन्हीं । मनसा बिस्व विजय कहुँ कीन्हीं ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
अस कहि फिरि चितए तेहि ओरा । सिय मुख ससि भए नयन चकोरा ॥
भए बिलोचन चारु अचंचल । मनहुँ सकुचि निमि तजे दिगंचल ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
देखि सिय सोभा सुखु पावा । हृदयँ सराहत बचनु न आवा ॥
जनु बिरंचि सब निज निपुनाई । बिरचि बिस्व कहुँ प्रगट देखाई ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
सुंदरता कहुँ सुंदर करई । छबिगृहँ दीपसिखा जनु बरई ॥
सब उपमा कवि रहे जुठारी । केहि पटतरौं बिदेहकुमारी ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
जासु बिलोकि अलौकिक सोभा । सहज पुनीत मोर मनु छोभा ॥
सो सब कारन जान बिधाता । फरकहिं सुभद अंग सुनु भ्राता ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
रघुबंसिन्ह कर सहज सुभाऊ । मनु कुपंथ पगु धरइ न काऊ ॥
मोहि अतिसय प्रतीति मन केरी । जेहिं सपनेहुँ परनारि न हेरी ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
जिन्ह कै लहहिं न रिपु रन पीठी । नहिं पावहिं परतिय मनु डीठी ॥
मंगन लहहिं न जिन्ह कै नाहीं । ते नरबर थोरे जग माहीं ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
चितवति चकित चहुँ दिसि सीता । कहँ गए नृपकिसोर मनु चिंता ॥
जहँ बिलोक मृग सावक नैनी । जनु तहँ बरिस कमल सित श्रेनी ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
लता ओट तब सखिन्ह लखाए । स्यामल गौर किसोर सुहाए ॥
देखि रूप लोचन ललचाने । हरषे जनु निज निधि पहिचाने ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
थके नयन रघुपति छबि देखें । पलकन्हिहूँ परिहरीं निमेषें ॥
अधिक सनेहँ देह भै भोरी । सरद ससिहि जनु चितव चकोरी ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
लोचन मग रामहि उर आनी । दीन्हे पलक कपाट सयानी ॥
जब सिय सखिन्ह प्रेमबस जानी । कहि न सकहिं कछु मन सकुचानी ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
सोभा सींव सुभग दोउ बीरा । नील पीत जलजाभ सरीरा ॥
मोरपंख सिर सोहत नीके । गुच्छ बीच बिच कुसुम कली के ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
भाल तिलक श्रमबिंदु सुहाए । श्रवन सुभग भूषन छबि छाए ॥
बिकट भृकुटि कच घुँघरवारे । नव सरोज लोचन रतनारे ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
चारु चिबुक नासिका कपोला । हास बिलास लेत मनु मोला ॥
मुखछबि कहि न जाइ मोहि पाहीं । जो बिलोकि बहु काम लजाहीं ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
उर मनि माल कंबु कल गीवा । काम कलभ कर भुज बलसींवा ॥
सुमन समेत बाम कर दोना । साँवर कुँअर सखी सुठि लोना ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
धरि धीरजु एक आलि सयानी । सीता सन बोली गहि पानी ॥
बहुरि गौरि कर ध्यान करहु । भूपकिसोर देखि किन लेहु ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
सकुचि सीयँ तब नयन उघारे । सनमुख दोउ रघुसिंघ निहारे ॥
नख सिख देखि राम के सोभा । सुमिरि पिता पनु मन अति छोभा ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
परबस सखिन्ह लखी जब सीता । भयउ गहेउ सब कहहिं सभीता ॥
पुनि आउब एहि बेरिआँ काली । अस कहि मन बिहसी एक आली ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
गूढ़ गिरा सुनि सिय सकुचानी । भयउ बिलंब मातु भय मानी ॥
धरि बड़ी धीर राम उर आने । फिरि अपनपउ पितुबस जाने ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
जानि कठिन सिवचाप बिसूरति । चली राखि उर स्यामल मूरति ॥
प्रभु जब जात जानकी जानी । सुख सनेह सोभा गुन खानी ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
परम प्रेममय मृदु मसि कीन्ही । चारु चित्त भीतीं लिखि लीन्ही ॥
गई भवानी भवन बहोरी । बंदि चरन बोली कर जोरी ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
जय जय गिरिबरराज किसोरी । जय महेस मुख चंद चकोरी ॥
जय गजबदन षडानन माता । जगत जननि दामिनि दुति गाता ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
नहिं तव आदि मध्य अवसाना । अमित प्रभाउ बेदु नहिं जाना ॥
भव भव बिभव पराभव कारिनि । बिस्व बिमोहनि स्वबस बिहारिनि ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
सेवत तोहि सुलभ फल चारी । बरदायनी पुरारि पिआरी ॥
देबि पूजि पद कमल तुम्हारे । सुर नर मुनि सब होहिं सुखारे ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
मोर मनोरथु जानहु नीकेँ । बसहु सदा उर पुर सबही कें ॥
कीन्हेउँ प्रगट न कारन तेहीं । अस कहि चरन गहे बैदेही ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
बिनय प्रेम बस भई भवानी । खसी माल मूरति मुसुकानी ॥
सादर सियँ प्रसाद सिर धरेऊ । बोली गौरि हरषु हियँ भरेऊ ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
सुनु सिय सत्य असीस हमारी । पूजहिं मन कामना तुम्हारी ॥
नारद बचन सदा सुचि साचा । सो बरु मिलिहि जाहिं मनु राचा ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
हृदयँ सराहत सिय लोनाई । गुरु समीप गवने दोउ भाई ॥
राम कहा सबु कौसिक पाहीं । सरल सुभाउ छुअत छल नाहीं ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
सुमन पाइ मुनि पूजा कीन्ही । पुनि असीस दुइ भाइन्ह दीन्ही ॥
सुफल मनोरथ होहुँ तुम्हारे । रामु लखनु सुनि भए सुखारे ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
करि भोजनु मुनिबर बिग्यानी । लगे कहन कछु कथा पुरानी ॥
बिगत दिवसु गुरु आयसु पाई । संध्या करन चले दोउ भाई ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
प्राची दिसि ससि उयउ सुहावा । सिय मुख सरिस देखि सुखु पावा ॥
बहुरि बिचार कीन्ह मन माहीं । सिय बदन सम हिमकर नाहीं ॥
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छंद 236बाल काण्ड
मनु जाहिं राचेउ मिलिहि सो बरु सहज सुंदर साँवरो ।
करुना निधान सुजान सीलु सनेहु जानत रावरो ॥
एहि भाँति गौरी असीस सुनि सिय सहित हियँ हरषीं अली ।
तुलसी भवानीहि पूजि पुनि पुनि मुदित मन मंदिर चली ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
घटइ बढ़इ बिरहिनि दुखदाई । ग्रसइ राहु निज संधिहिं पाई ॥
कोक सोकप्रद पंकज द्रोही । अवगुन बहुत चंद्रमा तोही ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
बैदेही मुख पटतर दीन्हें । होइ दोष बड़ अनुचित कीन्हें ॥
सिय मुखछबि बिधु ब्याज बखानी । गुरु पहिं चले निसा बड़ि जानी ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
करि मुनि चरन सरोज प्रनामा । आयसु पाइ कीन्ह बिश्रामा ॥
बिगत निसा रघुनायक जागे । बंधु बिलोकि कहन अस लागे ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
उदय अरुन अवलोकहु ताता । पंकज कोक लोक सुखदाता ॥
बोले लखनु जोरि जुग पानी । प्रभु प्रभाउ सूचक मृदु बानी ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
नृप सब नखत करहिं उजिआरी । टारि न सकहिं चाप तम भारी ॥
कमल कोक मधुकर खग नाना । हरषे सकल निसा अवसाना ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
एसेहिं प्रभु सब भगत तुम्हारे । होइहहिं टूटें धनुष सुखारे ॥
उदय भानु बिनु श्रम तम नासा । दुरे नखत जग तेज प्रकासा ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
रवि निज उदय ब्याज रघुराया । प्रभु प्रतापु सब नृपन्हि दिखाया ॥
तव भुज बल महिमा उदघाटी । प्रगटी धनु बिघटन परिपाटी ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
बंधु बचन सुनि प्रभु मुसुकाने । होइ सुचि सहज पुनीत नहाने ॥
नित्यक्रिया करि गुरु पहिं आए । चरन सरोज सुभग सिर नाए ॥
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चौपाई 5बाल काण्ड
सतानंदु तब जनक बोलाए । कौसिक मुनि पहिं तुरत पठाए ॥
जनक बिनय तिन्ह आइ सुनाई । हरषे बोले लिए दोउ भाई ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
हरषे मुनि सब सुनि बर बानी । दीन्हि असीस सबहिं सुखु मानी ॥
पुनि मुनिबृंद समेत कृपाला । देखन चले धनुषमख साला ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
रंगभूमि आए दोउ भाई । असि सुधि सब पुरबासिन्ह पाई ॥
चले सकल गृह काज बिसारी । बाल जुबान जरठ नर नारी ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
देखी जनक भीर भै भारी । सुचि सेवक सब लिए हँकारी ॥
तुरत सकल लोगन्ह पहिं जाहू । आसन उचित देहु सब काहू ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
राज समाज बिराजत रूरे । उडगन महुँ जनु जुग बिधु पूरे ॥
जिन्ह कें रही भावना जैसी । प्रभु मूरति तिन्ह देखी तैसी ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
देखहिं रूप महा रनधीरा । मनहुँ बीर रसु धरें सरीरा ॥
डरे कुटिल नृप प्रभुहि निहारी । मनहुँ भयानक मूरति भारी ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
रहे असुर छल छोनिप बेषा । तिन्ह प्रभु प्रगट कालसम देखा ।
पुरबासिन्ह देखे दोउ भाई । नरभूषन लोचन सुखदाई ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
बिदुषन्ह प्रभु बिराटमय दीसा । बहु मुख कर पग लोचन सीसा ॥
जनक जाति अवलोकहिं कैसें । सजन सगे प्रिय लागहिं जैसें ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
सहित बिदेह बिलोकहिं रानी । सिसु सम प्रीति न जाति बखानी ॥
जोगिन्ह परम तत्वमय भासा । सांत सुद्ध सम सहज प्रकासा ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
हरिभगतन्ह देखे दोउ भ्राता । इष्टदेव इव सब सुख दाता ॥
रामहि चितव भायँ जेहि सीया । सो सनेहु सुखु नहिं कथनीया ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
उर अनुभवति न कहि सक सोऊ । कवन प्रकार कहै कबि कोऊ ॥
एहि बिधि रहा जाहि जस भाऊ । तेहिं तस देखेउ कोसलराऊ ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
चितवनि चारु मार मनु हरनी । भावति हृदय जाति नहिं बरनी ॥
कल कपोल श्रुति कुंडल लोला । चिबुक अधर सुंदर मृदु बोला ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
कुमुदबंधु कर निंदक हाँसा । भृकुटी बिकट मनोहर नासा ॥
भाल बिसाल तिलक झलकाहीं । कच बिलोकि अलि अवलि लजाहीं ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
पीत चौतनीं सिरन्हि सुहाईं । कुसुम कलीं बिच बीच बनाईं ॥
रेखें रुचिर कंबु कल गीवाँ । जनु त्रिभुवन सुषमा की सीवाँ ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
कटि तूनीर पीत पट बाँधें । कर सर धनुष बाम बर काँधें ॥
पीत जग्य उपबीत सुहाए । नख सिख मंजु महाछबि छाए ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
करि बिनती निज कथा सुनाई । रंग अवनि सब मुनिहि देखाई ॥
जहँ जहँ जाहिं कुअँर बर दोऊ । तहँ तहँ चकित चितव सबु कोऊ ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
निज निज रुख रामहि सबु देखा । कोउ न जान कछु मरमु बिसेषा ॥
भलि रचना मुनि नृप सन कहेऊ । राजाँ मुदित महासुख लहेऊ ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
प्रभुहि देखि सब नृप हियँ हारे । जनु राकेस उदय भएँ तारे ॥
असि प्रतीति सब के मन माहीं । राम चाप तोरब सक नाहीं ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
बिनु भंजेहुँ भव धनुषु बिसाला । मेलिहि सीय राम उर माला ॥
अस बिचारि गवनहु घर भाई । जसु प्रतापु बलु तेजु गवाँई ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
बिहसे अपर भूप सुनि बानी । जे अबिबेक अंध अभिमानी ॥
तोरेहुँ धनुषु ब्याहु अवगाहा । बिनु तोरें को कुअँरि बिआहा ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
ब्यर्थ मरहु जनि गाल बजाई । मन मोदकन्हि कि भूख बुताई ॥
सिख हमारि सुनि परम पुनीता । जगदंबा जानहु जियँ सीता ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
जगत पिता रघुपतिहि बिचारी । भरि लोचन छबि लेहु निहारी ॥
सुंदर सुखद सकल गुन रासी । ए दोउ बंधु संभु उर बासी ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
सुधा समुद्र समीप बिहाई । मृगजलु निरखि मरहु कत धाई ॥
करहु जाइ जा कहुँ जोइ भावा । हम तौ आजु जनम फलु पावा ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
अस कहि भले भूप अनुरागे । रूप अनुप बिलोकन लागे ॥
देखहिं सुर नभ चढ़े बिमाना । बरषहिं सुमन करहिं कल गाना ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
सिय सोभा नहिं जाइ बखानी । जगदंबिका रूप गुन खानी ॥
उपमा सकल मोहि लघु लागीं । प्राकृत नारि अंग अनुरागीं ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
सिय बरनिअ तेइ उपमा देई । कुकबि कहाइ अजसु को लेई ॥
जौं पटतरिअ तीय सम सीया । जग असि जुबति कहाँ कमनीया ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
गिरा मुखर तन अरध भवानी । रति अति दुखित अतनु पति जानी ॥
बिष बारुनी बंधु प्रिय जेही । कहिअ रमासम किमि बैदेही ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
जौं छबि सुधा पयोनिधि होई । परम रूपमय कच्छपु सोई ॥
सोभा रजु मंदरु सिंगारू । मथै पानि पंकज निज मारू ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
चलीं संग लै सखीं सयानी । गावत गीत मनोहर बानी ॥
सोह नवल तनु सुंदर सारी । जगत जननि अतुलित छबि भारी ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
भूषन सकल सुदेस सुहाए । अंग अंग रचि सखिन्ह बनाए ॥
रंगभूमि जब सिय पगु धारी । देखि रूप मोहे नर नारी ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
हरषि सुरन्ह दुंदुभीं बजाईं । बरषि प्रसून अपछरा गाईं ॥
पानि सरोज सोह जयमाला । अवचट चितए सकल भुआला ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
राम रूपु अरु सिय छबि देखें । नर नारिन्ह परिहरीं निमेषें ॥
सोचहिं सकल कहत सकुचाहीं । बिधि सन बिनय करहिं मन माहीं ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
हरू बिधि बेगि जनक जड़ताई । मति हमारि असि देहि सुहाई ॥
बिनु बिचार पनु तजि नरनाहू । सीय राम कर करै बिबाहू ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
जगु भल कहिहि भाव सब काहू । हठ कीन्हें अंतहुँ उर दाहू ॥
एहिं लालसाँ मगन सब लोगू । बरु साँवरो जानकी जोगू ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
नृप भुजबल बिधु सिवधनु राहू । गरुअ कठोर बिदित सब काहू ॥
रावनु बानु महाभट भारे । देखि सरासन गवँहिं सिधारे ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
सोइ पुरारि कोदंडु कठोरा । राज समाज आजु जोइ तोरा ॥
त्रिभुवन जय समेत बैदेही । बिनहिं बिचार बरइ हठि तेही ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
सुनि पन सकल भूप अभिलाषे । भटमानी अतिसय मन माखे ॥
परिकर बाँधि उठे अकुलाई । चले इष्ट देवन्ह सिर नाई ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
तमकि ताकि तकि सिवधनु धरहीं । उठइ न कोटि भाँति बलु करहीं ॥
जिन्ह के कछु बिचारु मन माहीं । चाप समीप महीप न जाहीं ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
सब नृप भए जोगु उपहासी । जैसें बिनु बिराग संन्यासी ॥
कीरति बिजय बीरता भारी । चले चाप कर बरबस हारी ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
श्रीहत भए हारि हियँ राजा । बैठे निज निज जाइ समाजा ॥
नृपन्ह बिलोकि जनकु अकुलाने । बोले बचन रोष जनु साने ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
कहहु काहि यहु लाभु न भावा । काहुँ न संकर चाप चढ़ावा ॥
रहउ चढ़ाउब तोरब भाई । तिलु भरि भूमि न सके छड़ाई ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
अब जनि कोउ भाखे भट मानी । बीर बिहीन मही मैं जानी ॥
तजहु आस निज निज गृह जाहू । लिखा न बिधि बैदेहि बिबाहू ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
सुकृतु जाइ जौं पनु परिहरऊँ । कुअँरि कुआँरि रहउ का करऊँ ॥
जौं जनतेउँ बिनु भट भुबि भाई । तौ पनु करि होतेउँ न हँसाई ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
जनक बचन सुनि सब नर नारी । देखि जानकिहि भए दुखारी ॥
माखे लखनु कुटिल भइँ भौंहें । रदपट फरकत नयन रिसौंहें ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
रघुबंसिन्ह महुँ जहँ कोउ होई । तेहिं समाज अस कहइ न कोई ॥
कही जनक जसि अनुचित बानी । बिद्यमान रघुकुल मनि जानी ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
सुनहु भानुकुल पंकज भानू । कहउँ सुभाउ न कछु अभिमानू ॥
जौं तुम्हारि अनुसासन पावौं । कंदुक इव ब्रह्मांड उठावौं ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
काचे घट जिमि डारौं फोरी । सकउँ मेरु मूलक जिमि तोरी ॥
तव प्रताप महिमा भगवाना । को बापुरो पिनाक पुराना ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
नाथ जानि अस आयसु होऊ । कौतुकु करौं बिलोकिअ सोऊ ॥
कमल नाल जिमि चाप चढ़ावौं । जोजन सत प्रमान लै धावौं ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
लखन सकोप बचन जे बोले । डगमगानि महि दिग्गज डोले ॥
सकल लोग सब भूप डेराने । सिय हियँ हरषु जनकु सकुचाने ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
गुर रघुपति सब मुनि मन माहीं । मुदित भए पुनि पुनि पुलकाहीं ॥
सयनहिं रघुपति लखनु नेवारे । प्रेम समेत निकट बैठारे ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
बिस्वामित्र समय सुभ जानी । बोले अति सनेहमय बानी ॥
उठहु राम भंजहु भवचापा । मेटहु तात जनक परितापा ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
सुनि गुरु बचन चरन सिरु नावा । हरषु बिषादु न कछु उर आवा ॥
ठाढ़े भए उठि सहज सुभाएँ । ठवनि जुबा मृगराजु लजाएँ ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
नृपन्ह केरि आसा निसि नासी । बचन नखत अवली न प्रकासी ॥
मानी महिप कुमुद सकुचाने । कपटी भूप उलूक लुकाने ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
भए बिसोक कोक मुनि देवा । बरिसहिं सुमन जनावहिं सेवा ॥
गुर पद बंदि सहित अनुरागा । राम मुनिन्हसन आयसु मागा ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
सहजहिं चले सकल जग स्वामी । मत्त मंजु बर कुंजर गामी ॥
चलत राम सब पुर नर नारी । पुलक पूरि तन भए सुखारी ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
बंदि पितर सुर सुकृत सँभारे । जौं कछु पुन्य प्रभाउ हमारे ॥
तौ सिवधनु मृनाल की नाईं । तोरहुँ रामु गनेस गोसाईं ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
सखि सब कौतुक देख निहारे । जेउ कहावत हितू हमारे ॥
कोउ न बुझाइ कहइ गुर पाहीं । ए बालक असि हठ भलि नाहीं ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
रावन बान छुआ नहिं चापा । हारे सकल भूप करि दापा ॥
सो धनु राजकुअँर कर देहीं । बाल मराल कि मंदर लेहीं ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
भूप सयानप सकल सिरानी । सखि बिधि गति कछु जाति न जानी ॥
बोली चतुर सखी मृदु बानी । तेजवंत लघु गनिअ न रानी ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
कहँ कुंभज कहँ सिंधु अपारा । सोषेउ सुजसु सकल संसारा ॥
रबि मंडल देखत लघु लागा । उदयँ तासु तिभुवन तम भागा ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
काम कुसुम धनु सायक लीन्हे । सकल भुवन अपनें बस कीन्हे ॥
देबि तजिअ संसउ अस जानी । भंजब धनुषु राम सुनु रानी ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
सखी बचन सुनि भै परतीती । मिटा बिषादु बढ़ी अति प्रीती ॥
तब रामहि बिलोकि बैदेही । सभय हृदयँ बिनवति जेहि तेही ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
मनहीं मन मनाव अकुलानी । होहु प्रसन्न महेस भवानी ॥
करहु सफल आपनि सेवकाई । करि हितु हरहु चाप गरुआई ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
गननायक बरदायक देवा । आजु लगें कीन्हिउँ तुअ सेवा ॥
बार बार बिनती सुनि मोरी । करहु चाप गुरुता अति थोरी ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
नीकें निरखि नयन भरि सोभा । पितु पनु सुमिरि बहुरि मनु छोभा ॥
अहह तात दारुनि हठ ठानी । समुझत नहिं कछु लाभु न हानी ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
सचिव सभय सिख देइ न कोई । बुध समाज बड़ अनुचित होई ॥
कहँ धनु कुलिसहु चाहि कठोरा । कहँ स्यामल मृदुगात किसोरा ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
बिधि केहि भाँति धरौं उर धीरा । सिरस सुमन कन बेधिअ हीरा ॥
सकल सभा कै मति भै भोरी । अब मोहि संभुचाप गति तोरी ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
निज जड़ता लोगन्ह पर डारी । होहि हरुअ रघुपतिहि निहारी ॥
अति परिताप सीय मन माहीं । लव निमेष जुग सय सम जाहीं ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
गिरा अलिनि मुख पंकज रोकी । प्रगट न लाज निसा अवलोकी ॥
लोचन जलु रह लोचन कोना । जैसें परम कृपन कर सोना ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
सकुची ब्याकुलता बड़ि जानी । धरि धींरजु प्रतीति उर आनी ॥
तन मन बचन मोर पनु साचा । रघुपति पद सरोज चितु राचा ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
तौ भगवानु सकल उर बासी । करिहि मोहि रघुबर कै दासी ॥
जेहि कें जेहि पर सत्य सनेहू । सो तेहि मिलइ न कछु संदेहू ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
प्रभु तन चितइ प्रेम तन ठाना । कृपानिधान राम सबु जाना ॥
सियहि बिलोकि तकेउ धनु कैसें । चितव गरुरु लघु ब्यालहि जैसें ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
दिसिकुंजरहु कमठ अहि कोला । धरहु धरनि धरि धीर न डोला ॥
रामु चहहिं संकर धनु तोरा । होहु सजग सुनि आयसु मोरा ॥ १ ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
चाप समीप रामु जब आए । नर नारिन्ह सुर सुकृत मनाए ॥
सब कर संसउ अरु अग्यानू । मंद महीपन्ह कर अभिमानू ॥ २ ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
भृगुपति केरि गरब गरुआई । सुर मुनिबरन्ह केरि कदराई ॥
सिय कर सोचु जनक पछितावा । रानिन्ह कर दारुन दुख दावा ॥ ३ ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
संभुचाप बड़ बोहितु पाई । चढ़े जाइ सब संगु बनाई ॥
राम बाहुबल सिंधु अपारू । चहत पारु नहिं कोउ कड़हारू ॥ ४ ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
देखी बिपुल बिकल बैदेही । निमिष बिहात कलप सम तेही ॥
तृषित बारि बिनु जो तनु त्यागा । मुएँ करइ का सुधा तड़ागा ॥ १ ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
का बरषा सब कृषी सुखानें । समय चुकें पुनि का पछितानें ॥
अस जियँ जानि जानकी देखी । प्रभु पुलके लखि प्रीति बिसेषी ॥ २ ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
गुरहि प्रनामु मनहिं मन कीन्हा । अति लाघवँ उठाइ धनु लीन्हा ॥
दमकेउ दामिनि जिमि जब लयऊ । पुनि नभ धनु मंडल सम भयऊ ॥ ३ ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
लेत चढ़ावत खैंचत गाढ़ें । काहुँ न लखा देख सबु ठाढ़ें ॥
तेहि छन राम मध्य धनु तोरा । भरे भुवन धुनि घोर कठोरा ॥ ४ ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
प्रभु दोउ चापखंड महि डारे । देखि लोग सब भए सुखारे ॥
कौसिकरूप पयोनिधि पावन । प्रेम बारि अवगाहु सुहावन ॥ १ ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
रामरूप राकेसु निहारी । बढ़त बीचि पुलकावलि भारी ॥
बाजे नभ गहगहे निसाना । देवबधू नाचहिं करि गाना ॥ २ ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
ब्रह्मादिक सुर सिद्ध मुनीसा । प्रभुहि प्रसंसहिं देहिं असीसा ॥
बरिसहिं सुमन रंग बहु माला । गावहिं किंनर गीत रसाला ॥ ३ ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
रही भुवन भरि जय जय बानी । धनुषभंग धुनिजात न जानी ॥
मुदित कहहिं जहँ तहँ नर नारी । भंजेउ राम संभुधनु भारी ॥ ४ ॥
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छंद 261बाल काण्ड
भरे भुवन घोर कठोर रव रवि बाजि तजि मारगु चले ।
चिक्करहिं दिग्गज डोल महि अहि कोल कूरम कलमले ॥
सुर असुर मुनि कर कान दीन्हें सकल बिकल बिचारहीं ।
कोदंड खंडेउ राम तुलसी जयति बचन उचारहीं ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
झाँझि मृदंग संख सहनाई । भेरि ढोल दुंदुभी सुहाई ॥
बाजहिं बहु बाजने सुहाए । जहँ तहँ जुबतिन्ह मंगल गाए ॥ १ ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
सखिन्ह सहित हरषी अति रानी । सूखत धान परा जनु पानी ॥
जनक लहेउ सुखु सोचु बिहाई । तैरत थकें थाह जनु पाई ॥ २ ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
श्रीहत भए भूप धनु टूटे । जैसें दिवस दीप छबि छूटे ॥
सीय सुखहि बरनिअ केहि भाँती । जनु चातकी पाइ जलु स्वाती ॥ ३ ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
रामहि लखनु बिलोकत कैसें । ससिहि चकोर किसोरकु जैसें ॥
सतानंद तब आयसु दीन्हा । सीताँ गमनु राम पहिं कीन्हा ॥ ४ ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
सखिन्ह मध्य सिय सोहति कैसें । छबिगन मध्य महाछबि जैसें ॥
कर सरोज जयमाल सुहाई । बिस्व बिजय सोभा जेहिं छाई ॥ १ ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
तन सकोचु मन परम उछाहू । गूढ़ प्रेमु लखि परइ न काहू ॥
जाइ समीप राम छबि देखी । रहि जनु कुअँरि चित्र अवरेखी ॥ २ ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
चतुर सखीं लखि कहा बुझाई । पहिरावहु जयमाल सुहाई ॥
सुनत जुगल कर माल उठाई । प्रेम बिबस पहिराइ न जाई ॥ ३ ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
सोहत जनु जुग जलज सनाला । ससिहि सभीत देत जयमाला ॥
गावहिं छबि अवलोकि सहेली । सियँ जयमाल राम उर मेली ॥ ४ ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
पुर अरु ब्योम बाजने बाजे । खल भए मलिन साधु सब राजे ॥
सुर किंनर नर नाग मुनीसा । जय जय जय कहि देहिं असीसा ॥ १ ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
नाचहिं गावहिं बिबुध बधूटीं । बार बार कुसुमांजलि छूटीं ॥
जहँ तहँ बिप्र बेदधुनि करहीं । बंदी बिरिदावलि उच्चरहीं ॥ २ ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
महिं पाताल नाक जसु ब्यापा । राम बरी सिय भंजेउ चापा ॥
करहिं आरती पुर नर नारी । देहिं निछावरि बित्त बिसारी ॥ ३ ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
सोहति सीय राम कै जोरी । छबि सिंगारु मनहुँ एक ठोरी ॥
सखीं कहहिं प्रभु पद गहु सीता । करति न चरन परस अति भीता ॥ ४ ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
तब सिय देखि भूप अभिलाषे । कूर कपूत मूढ़ मन माखे ॥
उठि उठि पहिरि सनाह अभागे । जहँ तहँ गाल बजावन लागे ॥ १ ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
लेहु छड़ाइ सीय कह कोऊ । धरि बाँधहु नृप बालक दोऊ ॥
तोरें धनुषु चाड़ नहिं सरई । जीवत हमहि कुअँरि को बरई ॥ २ ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
जौं बिदेहु कछु करै सहाई । जीतहु समर सहित दोउ भाई ॥
साधु भूप बोले सुनि बानी । राजसमाजहि लाज लजानी ॥ ३ ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
बलु प्रतापु बीरता बड़ाई । नाक पिनाकहि संग सिधाई ॥
सोइ सूरता कि अब कहुँ पाई । असि बुधि तौ बिधि मुँह मसि लाई ॥ ४ ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
बैनतेय बलि जिमि चह कागू । जिमि ससु चहै नाग अरि भागू ॥
जिमि चह कुसल अकारन कोही । सब संपदा चहै सिवद्रोही ॥ १ ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
लोभी लोलुप कल कीरति चहई । अकलंकता कि कामी लहई ॥
हरि पद बिमुख परम गति चाहा । तस तुम्हार लालचु नरनाहा ॥ २ ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
कोलाहलु सुनि सीय सकानी । सखीं लवाइ गईं जहँ रानी ॥
रामु सुभायँ चले गुरु पाहीं । सिय सनेहु बरनत मन माहीं ॥ ३ ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
रानिन्ह सहित सोच बस सीया । अब धौं बिधिहि काह करनीया ॥
भूप बचन सुनि इत उत तकहीं । लखनु राम डर बोलि न सकहीं ॥ ४ ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
खरभरु देखि बिकल पुर नारीं । सब मिलि देहिं महीपन्ह गारीं ॥
तेहिं अवसर सुनि सिवधनु भंगा । आयउ भृगुकुल कमल पतंगा ॥ १ ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
देखि महीप सकल सकुचाने । बाज झपट जनु लवा लुकाने ॥
गौरि सरीर भूति भल भ्राजा । भाल बिसाल त्रिपुंड बिराजा ॥ २ ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
सीस जटा ससिबदनु सुहावा । रिस बस कछुक अरुन होइ आवा ॥
भृकुटी कुटिल नयन रिस राते । सहजहुँ चितवत मनहुँ रिसाते ॥ ३ ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
बृषभ कंध उर बाहु बिसाला । चारु जनेउ माल मृगछाला ॥
कटि मुनिबसन तून दुइ बाँधें । धनु सर कर कुठारु कल काँधें ॥ ४ ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
देखत भृगुपति बेषु कराला । उठे सकल भय बिकल भुआला ॥
पितु समेत कहि कहि निज नामा । लगे करन सब दंड प्रनामा ॥ १ ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
जेहि सुभायँ चितवहिं हितु जानी । सो जानइ जनु आइ खुटानी ॥
जनक बहोरि आइ सिरु नावा । सीय बोलाइ प्रनामु करावा ॥ २ ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
आसिष दीन्हि सखीं हरषानीं । निज समाज लै गईं सयानीं ॥
बिस्वामित्रु मिले पुनि आई । पद सरोज मेले दोउ भाई ॥ ३ ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
रामु लखनु दसरथ के ढोटा । दीन्हि असीस देखि भल जोटा ॥
रामहि चितइ रहे थकि लोचन । रूप अपार मार मद मोचन ॥ ४ ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
समाचार कहि जनक सुनाए । जेहि कारन महीप सब आए ॥
सुनत बचन फिरि अनत निहारे । देखे चापखंड महि डारे ॥ १ ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
अति रिस बोले बचन कठोरा । कहु जड़ जनक धनुष कै तोरा ॥
बेगि देखाउ मूढ़ न त आजू । उलटउँ महि जहँ लहि तव राजू ॥ २ ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
अति डरु उतरु देत नृपु नाहीं । कुटिल भूप हरषे मन माहीं ॥
सुर मुनि नाग नगर नर नारी । सोचहिं सकल त्रास उर भारी ॥ ३ ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
मन पछिताति सीय महतारी । बिधि अब सँवरी बात बिगारी ॥
भृगुपति कर सुभाउ सुनि सीता । अरध निमेष कलप सम बीता ॥ ४ ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
नाथ संभुधनु भंजनिहारा । होइहि केउ एक दास तुम्हारा ॥
आयसु काह कहिअ किन मोही । सुनि रिसाइ बोले मुनि कोही ॥ १ ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
सेवकु सो जो करै सेवकाई । अरि करनी करि करिअ लराई ॥
सुनहु राम जेहिं सिवधनु तोरा । सहसबाहु सम सो रिपु मोरा ॥ २ ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
सो बिलगाउ बिहाइ समाजा । न त मारे जैहहिं सब राजा ॥
सुनि मुनि बचन लखन मुसुकाने । बोले परसुधरहि अपमाने ॥ ३ ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
बहु धनुहीं तोरीं लरिकाईं । कबहुँ न असि रिस कीन्हि गोसाईं ॥
एहि धनु पर ममता केहि हेतू । सुनि रिसाइ कह भृगुकुलकेतू ॥ ४ ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
लखन कहा हँसि हमरें जाना । सुनहु देव सब धनुष समाना ॥
का छति लाभु जून धनु तोरें । देखा राम नयन के भोरें ॥ १ ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
छुअत टूट रघुपतिहु न दोसू । मुनि बिनु काज करिअ कत रोसू ॥
बोले चितइ परसु की ओरा । रे सठ सुनेहि सुभाउ न मोरा ॥ २ ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
बालकु बोलि बधउँ नहिं तोही । केवल मुनि जड़ जानहि मोही ॥
बाल ब्रह्मचारी अति कोही । बिस्व बिदित छत्रियकुल द्रोही ॥ ३ ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
भुजबल भूमि भूप बिनु कीन्ही । बिपुल बार महिदेवन्ह दीन्ही ॥
सहसबाहु भुज छेदनिहारा । परसु बिलोकु महीपकुमारा ॥ ४ ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
बिहसि लखनु बोले मृदु बानी । अहो मुनीसु महा भटमानी ॥
पुनि पुनि मोहि देखाव कुठारू । चहत उड़ावन फूँकि पहारू ॥ १ ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
इहाँ कुम्हड़बतिया कोउ नाहीं । जे तरजनी देखि मरि जाहीं ॥
देखि कुठारु सरासन बाना । मैं कछु कहा सहित अभिमाना ॥ २ ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
भृगुसुत समुझि जनेउ बिलोकी । जो कछु कहहु सहउँ रिस रोकी ॥
सुर महिसुर हरिजन अरु गाई । हमरें कुल इन्ह पर न सुराई ॥ ३ ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
बधें पापु अपकीरति हारें । मारतहूँ पा परिअ तुम्हारें ॥
कोटि कुलिस सम बचनु तुम्हारा । ब्यर्थ धरहु धनु बान कुठारा ॥ ४ ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
कौसिक सुनहु मंद यहु बालकु । कुटिल कालबस निज कुल घालकु ॥
भानु बंस राकेस कलंकू । निपट निरंकुस अबुध असंकू ॥ १ ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
काल कवलु होइहि छन माहीं । कहउँ पुकारि खोरि मोहि नाहीं ॥
तुम्ह हटकहु जौं चहहु उबारा । कहि प्रतापु बलु रोषु हमारा ॥ २ ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
लखन कहेउ मुनि सुजसु तुम्हारा । तुम्हहि अछत को बरनै पारा ॥
अपने मुँह तुम्ह आपनि करनी । बार अनेक भाँति बहु बरनी ॥ ३ ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
नहिं संतोषु त पुनि कछु कहहू । जनि रिस रोकि दुसह दुख सहहू ॥
बीरब्रती तुम्ह धीर अछोभा । गारी देत न पावहु सोभा ॥ ४ ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
तुम्ह तौ कालु हाँक जनु लावा । बार बार मोहि लागि बोलावा ॥
सुनत लखन के बचन कठोरा । परसु सुधारि धरेउ कर घोरा ॥ १ ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
अब जनि देइ दोसु मोहि लोगू । कटुबादी बालकु बधजोगू ॥
बाल बिलोकि बहुत मैं बाँचा । अब यहु मरनिहार भा साँचा ॥ २ ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
कौसिक कहा छमिअ अपराधू । बाल दोष गुन गनहिं न साधू ॥
खर कुठार मैं अकरुन कोही । आगें अपराधी गुरुद्रोही ॥ ३ ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
उतर देत छोड़उँ बिनु मारें । केवल कौसिक सील तुम्हारें ॥
न त एहि काटि कुठार कठोरें । गुरहि उरिन होतेउँ श्रम थोरें ॥ ४ ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
कहेउ लखन मुनि सीलु तुम्हारा । को नहिं जान बिदित संसारा ॥
माता पितहि उरिन भए नीकें । गुर रिनु रहा सोचु बड़ जीकें ॥ १ ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
सो जनु हमरेहि माथे काढ़ा । दिन चलि गए ब्याज बड़ बाढ़ा ॥
अब आनिअ ब्यवहरिआ बोली । तुरत देउँ मैं थैली खोली ॥ २ ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
सुनि कटु बचन कुठार सुधारा । हाय हाय सब सभा पुकारा ॥
भृगुबर परसु देखावहु मोही । बिप्र बिचारि बचउँ नृपदोही ॥ ३ ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
मिले न कबहुँ सुभट रन गाढ़े । द्विज देवता घरहि के बाढ़े ॥
अनुचित कहि सब लोग पुकारे । रघुपति सयनहिं लखनु नेवारे ॥ ४ ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
नाथ करहु बालक पर छोहु । सूध दूधमुख करिअ न कोहू ॥
जौं पै प्रभु प्रभाउ कछु जाना । तौ कि बराबरि करत अयाना ॥ १ ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
जौं लरिका कछु अचगरि करहीं । गुर पितु मातु मोद मन भरहीं ॥
करिअ कृपा सिसु सेवक जानी । तुम्ह सम सील धीर मुनि ग्यानी ॥ २ ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
राम बचन सुनि कछुक जुड़ाने । कहि कछु लखनु बहुरि मुसुकाने ॥
हँसत देखि नख सिख रिस ब्यापी । राम तोर भ्राता बड़ पापी ॥ ३ ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
गौर सरीर स्याम मन माहीं । कालकूट मुख पयमुख नाहीं ॥
सहज टेढ़ अनुहरइ न तोही । नीचु मीचु सम देख न मोही ॥ ४ ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
मैं तुम्हार अनुचर मुनिराया । परिहरि कोपु करिअ अब दाया ॥
टूट चाप नहिं जुरिहि रिसाने । बैठिअ होइहिं पाय पिराने ॥ १ ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
जौं अति प्रिय तौ करिअ उपाई । जोरिअ कोउ बड़ गुनी बोलाई ॥
बोलत लखनहिं जनकु डेराहीं । मष्ट करहु अनुचित भल नाहीं ॥ २ ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
थर थर काँपहिं पुर नर नारी । छोट कुमार खोट बड़ भारी ॥
भृगुपति सुनि सुनि निरभय बानी । रिस तन जरइ होई बल हानी ॥ ३ ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
बोले रामहि देइ निहोरा । बचउँ बिचारि बंधु लघु तोरा ॥
मनु मलीन तनु सुंदर कैसें । बिष रस भरा कनक घटु जैसें ॥ ४ ॥
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दोहा 277बाल काण्ड
लखन कहेउ हँसि सुनहु मुनि क्रोधु पाप कर मूल ।
जेहि बस जन अनुचित करहिं चरहिं बिस्व प्रतिकूल ॥ २७७ ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
अति बिनीत मृदु सीतल बानी । बोले रामु जोरि जुग पानी ॥
सुनहु नाथ तुम्ह सहज सुजाना । बालक बचनु करिअ नहिं काना ॥ १ ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
बररै बालकु एकु सुभाऊ । इन्हहि न संत बिदूषहिं काऊ ॥
तेहिं नाहीं कछु काज बिगारा । अपराधी मैं नाथ तुम्हारा ॥ २ ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
कृपा कोपु बधु बँधब गोसाईं । मो पर करिअ दास की नाईं ॥
कहिअ बेगि जेहि बिधि रिस जाई । मुनिनायक सोइ करौं उपाई ॥ ३ ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
कह मुनि राम जाइ रिस कैसें । अजहुँ अनुज तव चितव अनैसें ॥
एहि कें कंठ कुठारु न दीन्हा । तौ मैं कहा कोपु करि कीन्हा ॥ ४ ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
बहइ न हाथु दहइ रिस छाती । भा कुठारु कुंठित नृपघाती ॥
भयउ बाम बिधि फिरेउ सुभाऊ । मोरे हृदयँ कृपा कसि काऊ ॥ १ ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
आजु दया दुखु दुसह सहावा । सुनि सौमित्रि बिहसि सिरु नावा ॥
बाउ कृपा मूरति अनुकूला । बोलत बचन झरत जनु फूला ॥ २ ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
जौं पै कृपाँ जरिहिं मुनि गाता । क्रोध भएँ तनु राख बिधाता ॥
देखु जनक हठि बालकु एहू । कीन्ह चहत जड़ जमपुर गेहू ॥ ३ ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
बेगि करहु किन आँखिन्ह ओटा । देखत छोट खोट नृपु ढोटा ॥
बिहसे लखनु कहा मन माहीं । मूदें आँखि कतहुँ कोउ नाहीं ॥ ४ ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
बंधु कहइ कटु संमत तोरें । तू छल बिनय करसि कर जोरें ॥
करु परितोषु मोर संग्रामा । नाहिं त छाड़ कहाउब रामा ॥ १ ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
छलु तजि करहि समरु सिवद्रोही । बंधु सहित न त मारउँ तोही ॥
भृगुपति बकहिं कुठार उठाएँ । मन मुसुकाहिं रामु सिर नाएँ ॥ २ ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
गुनह लखन कर हम पर रोषू । कतहुँ सुधाइहु ते बड़ दोषू ॥
टेढ़ जानि सब बंदइ काहू । बक्र चंद्रमहि ग्रसइ न राहू ॥ ३ ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
राम कहेउ रिस तजिअ मुनीसा । कर कुठारु आगें यह सीसा ॥
जेहिं रिस जाइ करिअ सोइ स्वामी । मोहि जानिअ आपन अनुगामी ॥ ४ ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
देखि कुठार बान धनु धारी । भै लरिकहि रिस बीरु बिचारी ॥
नामु जान पै तुम्हहि न चीन्हा । बंस सुभायँ उतरु तेहिं दीन्हा ॥ १ ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
जौं तुम्ह औतेहु मुनि की नाईं । पद रज सिर सिसु धरत गोसाईं ॥
छमहु चूक अनजानत केरी । चहिअ बिप्र उर कृपा घनेरी ॥ २ ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
हमहि तुम्हहि सरिबरि कसि नाथा । कहहु न कहाँ चरन कहँ माथा ॥
राम मात्र लघुनाम हमारा । परसु सहित बड़ नाम तोहारा ॥ ३ ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
देव एकु गुनु धनुष हमारें । नव गुन परम पुनीत तुम्हारें ॥
सब प्रकार हम तुम्ह सन हारे । छमहु बिप्र अपराध हमारे ॥ ४ ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
निपटहिं द्विज करि जानहि मोही । मैं जस बिप्र सुनावउँ तोही ॥
चाप सुवा सर आहुति जानू । कोपु मोर अति घोर कृसानू ॥ १ ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
समिधि सेन चतुरंग सुहाई । महा महीप भए पसु आई ॥
मैं एहिं परसु काटि बलि दीन्हे । समर जग्य जप कोटिन्ह कीन्हे ॥ २ ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
मोर प्रभाउ बिदित नहिं तोरें । बोलसि निदरि बिप्र के भोरें ॥
भंजेउ चापु दापु बड़ बाढ़ा । अहमिति मनहुँ जीति जगु ठाढ़ा ॥ ३ ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
राम कहा मुनि कहहु बिचारी । रिस अति बड़ि लघु चूक हमारी ॥
छुअतहिं टूट पिनाक पुराना । मैं केहि हेतु करौं अभिमाना ॥ ४ ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
देव दनुज भूपति भट नाना । समबल अधिक होउ बलवाना ॥
जौं रन हमहि पचारै कोऊ । लरहिं सुखेन कालु किन होऊ ॥ १ ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
छत्रिय तनु धरि समर सकाना । कुल कलंकु तेहिं पावँर आना ॥
कहउँ सुभाउ न कुलहि प्रसंसी । कालहु डरहिं न रन रघुबंसी ॥ २ ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
बिप्रबंस कै असि प्रभुताई । अभय होइ जो तुम्हहि डेराई ॥
सुनि मृदु गूढ़ बचन रघुपत के । उघरे पटल परसुधर मति के ॥ ३ ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
राम रमापति कर धनु लेहू । खैंचहु मिटै मोर संदेहू ॥
देत चापु आपुहिं चलि गयऊ । परसुराम मन बिसमय भयऊ ॥ ४ ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
जय रघुबंस बनज बन भानू । गहन दनुज कुल दहन कृसानू ॥
जय सुर बिप्र धेनु हितकारी । जय मद मोह कोह भ्रम हारी ॥ १ ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
बिनय सील करुना गुन सागर । जयति बचन रचना अति नागर ॥
सेवक सुखद सुभग सब अंगा । जय सरीर छबि कोटि अनंगा ॥ २ ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
करौं काह मुख एक प्रसंसा । जय महेस मन मानस हंसा ॥
अनुचित बहुत कहेउँ अग्याता । छमहु छमा मंदिर दोउ भ्राता ॥ ३ ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
कहि जय जय जय रघुकुलकेतू । भृगुपति गए बनहि तप हेतू ॥
अपभयँ कुटिल महीप डेराने । जहँ तहँ कायर गवँहिं पराने ॥ ४ ॥
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