ॐ नमः शिवाय  |  जय श्री राम  |  हरे कृष्ण
काण्ड 1

श्रीरामचरितमानसबाल काण्ड

कुल 1,913 पद/श्लोक

चौपाई 1बाल काण्ड
अति गहगहे बाजने बाजे । सबहिं मनोहर मंगल साजे ॥
जूथ जूथ मिलि सुमुखि सुनयनीं । करहिं गान कल कोकिलबयनीं ॥ १ ॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 2बाल काण्ड
सुखु बिदेह कर बरनि न जाई । जन्मदरिद्र मनहुँ निधि पाई ॥
बिगत त्रास भइ सीय सुखारी । जनु बिधु उदयँ चकोरकुमारी ॥ २ ॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 3बाल काण्ड
जनक कीन्ह कौसिकहि प्रनामा । प्रभु प्रसाद धनु भंजेउ रामा ॥
मोहि कृतकृत्य कीन्ह दुहुँ भाईं । अब जो उचित सो कहिअ गोसाईं ॥ ३ ॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 4बाल काण्ड
कह मुनि सुनु नरनाथ प्रबीना । रहा बिबाहु चाप आधीना ॥
टूटतहीं धनु भयउ बिबाहू । सुर नर नाग बिदित सब काहू ॥ ४ ॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 1बाल काण्ड
दूत अवधपुर पठवहु जाई । आनहिं नृप दसरथहिं बोलाई ॥
मुदित राउ कहि भलेहिं कृपाला । पठए दूत बोलि तेहि काला ॥ १ ॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 2बाल काण्ड
बहुरि महाजन सकल बोलाए । आइ सबन्हि सादर सिर नाए ॥
हाट बाट मंदिर सुरबासा । नगरु सँवारहु चारिहुँ पासा ॥ २ ॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 3बाल काण्ड
हरषि चले निज निज गृह आए । पुनि परिचारक बोलि पठाए ॥
रचहु बिचित्र बितान बनाई । सिर धरि बचन चले सचु पाई ॥ ३ ॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 4बाल काण्ड
पठए बोलि गुनी तिन्ह नाना । जे बितान बिधि कुसल सुजाना ॥
बिधिहि बंदि तिन्ह कीन्ह अरंभा । बिरचे कनक कदलि के खंभा ॥ ४ ॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 1बाल काण्ड
बेनु हरित मनिमय सब कीन्हे । सरल सपरब परहिं नहिं चीन्हे ॥
कनक कलित अहिबेलि बनाई । लखि नहिं परइ सपरन सुहाई ॥ १ ॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 2बाल काण्ड
तेहि के रचि पचि बंध बनाए । बिच बिच मुकुता दाम सुहाए ॥
मानिक मरकत कुलिस पिरोजा । चीरि कोरि पचि रचे सरोजा ॥ २ ॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 3बाल काण्ड
किए भृंग बहुरंग बिहंगा । गुंजहिं कूजहिं पवन प्रसंगा ॥
सुर प्रतिमा खंभन गढ़ि काढ़ीं । मंगल द्रब्य लिएँ सब ठाढ़ीं ॥ ३ ॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 1बाल काण्ड
रचे रुचिर बर बंदनिवारे । मनहुँ मनोभवँ फंद सँवारे ॥
मंगल कलश अनेक बनाए । ध्वज पताक पट चमर सुहाए ॥ १ ॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 2बाल काण्ड
दीप मनोहर मनिमय नाना । जाइ न बरनि बिचित्र बिताना ॥
जेहिं मंडप दुलहिनि बैदेही । सो बरनै असि मति कबि केही ॥ २ ॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 3बाल काण्ड
दूलहु रामु रूप गुन सागर । सो बितानु तिहुँ लोग उजागर ॥
जनक भवन कै सोभा जैसी । गृह गृह प्रति पुर देखिअ तैसी ॥ ३ ॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 4बाल काण्ड
जेहिं तेरहुति तेहि समय निहारी । तेहि लघु लगहिं भुवन दस चारी ॥
जो संपदा नीच गृह सोहा । सो बिलोकि सुरनायक मोहा ॥ ४ ॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 1बाल काण्ड
पहुँचे दूत राम पुर पावन । हरषे नगर बिलोकि सुहावन ॥
भूप द्वार तिन्ह खबरि जनाई । दसरथ नृप सुनि लिए बोलाई ॥ १ ॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 2बाल काण्ड
करि प्रनामु तिन्ह पाती दीन्ही । मुदित महीप आपु उठि लीन्ही ॥
बारि बिलोचन बाँचत पाती । पुलक गात आई भरि छाती ॥ २ ॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 3बाल काण्ड
रामु लखनु उर कर बर चीठी । रहि गए कहत न खाटी मीठी ॥
पुनि धरि धीर पत्रिका बाँची । हरषी सभा बात सुनि साँची ॥ ३ ॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 1बाल काण्ड
सुनि पाती पुलके दोउ भ्राता । अधिन सनेहु समात न गाता ॥
प्रीति पुनीत भरत कै देखी । सकल सभाँ सुखु लहेउ बिसेषी ॥ १ ॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 2बाल काण्ड
तब नृप दूत निकट बैठारे । मधुर मनोहर बचन उचारे ॥
भैया कहहु कुसल दोउ बारे । तुम्ह नीकें निज नयन निहारे ॥ २ ॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 3बाल काण्ड
स्यामल गौर धरें धनु भाथा । बय किसोर कौसिक मुनि साथा ॥
पहिचानहु तुम्ह कहहु सुभाऊ । प्रेम बिबस पुनि पुनि कह राऊ ॥ ३ ॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 4बाल काण्ड
जा दिन तें मुनि गए लवाई । तब तें आजु साँचि सुधि पाई ॥
कहहु बिदेह कवन बिधि जाने । सुनि प्रिय बचन दूत मुसुकाने ॥ ४ ॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 1बाल काण्ड
पूछन जोगु न तनय तुम्हारे । पुरुषसिंघ तिहु पुर उजिआरे ॥
जिन्ह के जस प्रताप कें आगे । ससि मलीन रबि सीतल लागे ॥ १ ॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 2बाल काण्ड
तिन्ह कहँ कहिअ नाथ किमि चीन्हे । देखिअ रबि कि दीप कर लीन्हे ॥
सीय स्वयंबर भूप अनेका । समिटे सुभट एक तें एका ॥ २ ॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 3बाल काण्ड
संभु सरासनु काहुँ न टारा । हारे सकल बीर बरिआरा ॥
तीनि लोक महँ जे भटमानी । सभ कै सकति संभु धनु भानी ॥ ३ ॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 4बाल काण्ड
सकइ उठाइ सरासुर मेरू । सोउ हियँ हारि गयउ करि फेरू ॥
जेहिं कौतुक सिवसैलु उठावा । सोउ तेहि सभाँ पराभउ पावा ॥ ४ ॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 1बाल काण्ड
सुनि सरोष भृगुनायकु आए । बहुत भाँति तिन्ह आँखि देखाए ॥
देखि राम बलु निज धनु दीन्हा । करिबहु बिनय गवनु बन कीन्हा ॥ १ ॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 2बाल काण्ड
राजन रामु अतुलबल जैसें । तेज निधान लखनु पुनि तैसें ॥
कंपहिं भूप बिलोकत जाकें । जिमि गज हरि किसोर के ताकें ॥ २ ॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 3बाल काण्ड
देव देखि तव बालक दोऊ । अब न आँखि तर आवत कोऊ ॥
दूत बचन रचना प्रिय लागी । प्रेम प्रताप बीर रस पागी ॥ ३ ॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 4बाल काण्ड
सभा समेत राउ अनुरागे । दूतन्ह देन निछावरि लागे ॥
कहि अनीति ते मूदहिं काना । धरमु बिचारि सबहिं सुखु माना ॥ ४ ॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 1बाल काण्ड
सुनि बोले गुर अति सुखु पाई । पुन्य पुरुष कहुँ महि सुख छाई ॥
जिमि सरिता सागर महुँ जाहीं । जद्यपि ताहि कामना नाहीं ॥ १ ॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 2बाल काण्ड
तिमि सुख संपति बिनहिं बोलाएँ । धरमसील पहिं जाहिं सुभाएँ ॥
तुम्ह गुर बिप्र धेनु सुर सेबी । तसि पुनीत कौसल्या देबी ॥ २ ॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 3बाल काण्ड
सुकृती तुम्ह समान जग माहीं । भयउ न है कोउ होनेउ नाहीं ॥
तुम्ह ते अधिक पुन्य बड़ काकें । राजन राम सरिस सुत जाकें ॥ ३ ॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 4बाल काण्ड
बीर बिनीत धरम ब्रत धारी । गुन सागर बर बालक चारी ॥
तुम्ह कहुँ सर्ब काल कल्याना । सजहु बरात बजाइ निसाना ॥ ४ ॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 1बाल काण्ड
राजा सबु रनिवास बोलाई । जनक पत्रिका बाचि सुनाई ॥
सुनि संदेसु सकल हरषानीं । अपर कथा सब भूप बखानीं ॥ १ ॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 2बाल काण्ड
प्रेम प्रफुल्लित राजहिं रानी । मनहुँ सिखिनि सुनि बारिद बानी ॥
मुदित असीस देहिं गुर नारीं । अति आनंद मगन महतारीं ॥ २ ॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 3बाल काण्ड
लेहिं परस्पर अति प्रिय पाती । हृदयँ लगाई जुड़ावहिं छाती ॥
राम लखन कै कीरति करनी । बारहिं बार भूपबर बरनी ॥ ३ ॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 4बाल काण्ड
मुनि प्रसादु कहि द्वार सिधाए । रानिन्ह तब महिदेव बोलाए ॥
दिए दान आनंद समेता । चले बिप्रबर आसिष देता ॥ ४ ॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 2बाल काण्ड
भुवन चारिदस भरा उछाहू । जनकसुता रघुबीर बिआहू ॥
सुनि सुभ कथा लोग अनुरागे । मग गृह गलीं सँवारन लागे ॥ २ ॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 3बाल काण्ड
जद्यपि अवध सदैव सुहावनि । रामपुरी मंगलमय पावनि ॥
तदपि प्रीति कै प्रीति सुहाई । मंगल रचना रची बनाई ॥ ३ ॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 4बाल काण्ड
ध्वज पताक पट चामर चारू । छावा परम बिचित्र बजारू ॥
कनक कलस तोरन मनि जाला । हरद दूब दधि अच्छत माला ॥ ४ ॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 1बाल काण्ड
जहँ तहँ जूथ जूथ मिलि भामिनि । सजि नव सप्त सकल दुति दामिनि ॥
बिधुबदनीं मृग सावक लोचनि । निज सरूप रति मानु बिमोचनि ॥ १ ॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 2बाल काण्ड
गावहिं मंगल मंजुल बानीं । सुनि कल रव कलकंठि लजानीं ॥
भूप भवन किमि जाइ बखाना । बिस्व बिमोहन रचेउ बिताना ॥ २ ॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 3बाल काण्ड
मंगल द्रब्य मनोहर नाना । राजत बाजत बिपुल निसाना ॥
कतहुँ बिरिद बंदी उच्चरहीं । कतहुँ बेद धुनि भूसुर करहीं ॥ ३ ॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 4बाल काण्ड
गावहिं सुंदरि मंगल गीता । लै लै नामु रामु अरु सीता ॥
बहुत उछाहु भवनु अति थोरा । मानहुँ उमगि चला चहु ओरा ॥ ४ ॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 1बाल काण्ड
भूप भरत पुनि लिए बोलाई । हय गयस्यंदन साजहु जाई ॥
चलहु बेगि रघुबीर बराता । सुनत पुलक पूरे दोउ भ्राता ॥ १ ॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 2बाल काण्ड
भरत सकल साहनी बोलाए । आयसु दीन्ह मुदित उठि धाए ॥
रचि रुचि जीन तुरग तिन्ह साजे । बरन बरन बर बाजि बिराजे ॥ २ ॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 3बाल काण्ड
सुभग सकल सुठि चंचल करनी । अय इव जरत धरत पग धरनी ॥
नाना जाति न जाहिं बखाने । निदरि पवनु जनु चहत उड़ाने ॥ ३ ॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 4बाल काण्ड
तिन्ह सब छयल भए असवारा । भरत सरिस बय राजकुमारा ॥
सब सुंदर सब भूषनधारी । कर सर चाप तून कटि भारी ॥ ४ ॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 1बाल काण्ड
बाँधें बिरद बीर रन गाढ़े । निकसि भए पुर बाहेर ठाढ़े ॥
फेरहिं चतुर तुरग गति नाना । हरषहिं सुनि सुनि पनव निसाना ॥ १ ॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 2बाल काण्ड
रथ सारथिन्ह बिचित्र बनाए । ध्वज पताक मनि भूषन लाए ॥
चवँर चारु किंकिनि धुनि करहीं । भानु जान सोभा अपहरहीं ॥ २ ॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 3बाल काण्ड
सावँकरन अगनित हय होते । ते तिन्ह रथन्ह सारथिन्ह जोते ॥
सुंदर सकल अलंकृत सोहे । जिन्हहि बिलोकत मुनि मन मोहे ॥ ३ ॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 4बाल काण्ड
जे जल चलहिं थलहि की नाईं । टाप न बूड़ बेग अधिकाईं ॥
अस्त्र सस्त्र सबु साजु बनाई । रथी सारथिन्ह लिए बोलाई ॥ ४ ॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 1बाल काण्ड
कलित करिबरन्हि परीं अँबारीं । कहि न जाहिं जेहि भाँति सँवारीं ॥
चले मत्त गज घंट बिराजी । मनहुँ सुभग सावन घन राजी ॥ १ ॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 2बाल काण्ड
बाहन अपर अनेक बिधाना । सिबिका सुभग सुखासन जाना ॥
तिन्ह चढ़ि चले बिप्रबर बृंदा । जनु तनु धरें सकल श्रुति छंदा ॥ २ ॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 3बाल काण्ड
मागध सूत बंधि गुनगायक । चले जान चढ़ि जो जेहि लायक ॥
बेसर ऊँट बृषभ बहु जाती । चले बस्तु भरि अगनित भाँती ॥ ३ ॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 4बाल काण्ड
कोटिन्ह काँवरि चले कहारा । बिबिध बस्तु को बरनै पारा ॥
चले सकल सेवक समुदाई । निज निज साजु समाजु बनाई ॥ ४ ॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 1बाल काण्ड
गरजहिं गज घंटा धुनि घोरा । रथ रव बाजि हिंस चहु ओरा ॥
निदरि घनहि घुर्म्मरहिं निसाना । निज पराइ कछु सुनिअ न काना ॥ १ ॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 2बाल काण्ड
महा भीर भूपति के द्वारें । रज होइ जाइ पषान पबारें ॥
चढ़ी अटारिन्ह देखहिं नारीं । लिएँ आरती मंगल थारीं ॥ २ ॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 3बाल काण्ड
गावहिं गीत मनोहर नाना । अति आनंदु न जाइ बखाना ॥
तब सुमंत्र दुइ स्यंदन साजी । जोते रबि हय निंदक बाजी ॥ ३ ॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 4बाल काण्ड
दोउ रथ रुचिर भूप पहिं आने । नहिं सारद पहिं जाहिं बखाने ॥
राज समाजु एक रथ साजा । दूसर तेज पुंज अति भ्राजा ॥ ४ ॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 1बाल काण्ड
सहित बसिष्ठ सोह नृप कैसें । सुर गुर संग पुरंदर जैसें ॥
करि कुल रीति बेद बिधि राऊ । देखि सबहि सब भाँति बनाऊ ॥ १ ॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 2बाल काण्ड
सुमिरि रामु गुर आयसु पाई । चले महीपति संख बजाई ॥
हरषे बिबुध बिलोकि बराता । बरषहिं सुमन सुमंगल दाता ॥ २ ॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 3बाल काण्ड
भयउ कोलाहल हय गय गाजे । ब्योम बरात बाजने बाजे ॥
सुर नर नारि सुमंगल गाईं । सरस राग बाजहिं सहनाईं ॥ ३ ॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 4बाल काण्ड
घंट घंटि धुनि बरनि न जाहीं । सरव करहिं पाइक फहराहीं ॥
करहिं बिदूषक कौतुक नाना । हास कुसल कल गान सुजाना ॥ ४ ॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 1बाल काण्ड
बनइ न बरनत बनी बराता । होहिं सगुन सुंदर सुभदाता ॥
चारा चाषु बाम दिसि लेई । मनहुँ सकल मंगल कहि देई ॥ १ ॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 2बाल काण्ड
दाहिन काग सुखेत सुहावा । नकुल दरसु सब काहूँ पावा ॥
सानुकूल बह त्रिबिध बयारी । सघट सबाल आव बर नारी ॥ २ ॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 3बाल काण्ड
लोवा फिरि फिरि दरसु देखावा । सुरभी सनमुख सिसुहि पिआवा ॥
मृगमाला फिरि दाहिनि आई । मंगल गन जनु दीन्हि देखाई ॥ ३ ॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 4बाल काण्ड
छेमकरी कह छेम बिसेषी । स्यामा बाम सुतरु पर देखी ॥
सनमुख आयउ दधि अरु मीना । कर पुस्तक दुइ बिप्र प्रबीना ॥ ४ ॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 1बाल काण्ड
मंगल सगुन सुगम सब ताकें । सगुन ब्रह्म सुंदर सुत जाकें ॥
राम सरिस बरु दुलहिनि सीता । समधी दसरथु जनकु पुनीता ॥ १ ॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 2बाल काण्ड
सुनि अस ब्याहु सगुन सब नाचे । अब कीन्हे बिरंचि हम साँचे ॥
एहि बिधि कीन्ह बरात पयाना । हय गय गाजहिं हने निसाना ॥ २ ॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 3बाल काण्ड
आवत जानि भानुकुल केतू । सरितन्हि जनक बँधाए सेतू ॥
बीच-बीच बर बास बनाए । सुरपुर सरिस संपदा छाए ॥ ३ ॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 4बाल काण्ड
असन सयन बर बसन सुहाए । पावहिं सब निज निज मन भाए ॥
नित नूतन सुख लखि अनुकूले । सकल बरातिन्ह मंदिर भूले ॥ ४ ॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 1बाल काण्ड
कनक कलस भरि कोपर थारा । भाजन ललित अनेक प्रकारा ॥
भरे सुधा सम सब पकवाने । नाना भाँति न जाहिं बखाने ॥ १ ॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 2बाल काण्ड
फल अनेक बर बस्तु सुहाईं । हरषि भेंट हित भूप पठाईं ॥
भूषन बसन महामनि नाना । खग मृग हय गय बहुबिधि जाना ॥ २ ॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 3बाल काण्ड
मंगल सगुन सुगंध सुहाए । बहुत भाँति महिपाल पठाए ॥
दधि चिउरा उपहार अपारा । भरि भरि काँवरि चले कहारा ॥ ३ ॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 4बाल काण्ड
अगवानन्ह जब दीखि बराता । उर आनंदु पुलक भर गाता ॥
देखि बनाव सहित अगवाना । मुदित बरातिन्ह हने निसाना ॥ ४ ॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 1बाल काण्ड
बरषि सुमन सुर सुंदरि गावहिं । मुदित देव दुंदुभीं बजावहिं ॥
बस्तु सकल राखीं नृप आगें । बिनय कीन्हि तिन्ह अति अनुरागें ॥ १ ॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 2बाल काण्ड
प्रेम समेत रायँ सबु लीन्हा । भै बकसीस जाचकन्हि दीन्हा ॥
करि पूजा मान्यता बड़ाई । जनवासे कहुँ चले लवाई ॥ २ ॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 3बाल काण्ड
बसन बिचित्र पाँवड़े परहीं । देखि धनदु धन मदु परिहरहीं ॥
अति सुंदर दीन्हेउ जनवासा । जहँ सब कहुँ सब भाँति सुपासा ॥ ३ ॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 4बाल काण्ड
जानी सियँ बरात पुर आई । कछु निज महिमा प्रगटि जनाई ॥
हृदयँ सुमिरि सब सिद्धि बोलाईं । भूप पहुनई करन पठाईं ॥ ४ ॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 1बाल काण्ड
निज निज बास बिलोकि बराती । सुर सुख सकल सुलभ सब भाँती ॥
बिभव भेद कछु कोउ न जाना । सकल जनक कर करहिं बखाना ॥ १ ॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 2बाल काण्ड
सिय महिमा रघुनायक जानी । हरषे हृदयँ हेतु पहिचानी ॥
पितु आगमनु सुनत दोउ भाई । हृदयँ न अति आनंदु अमाई ॥ २ ॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 3बाल काण्ड
सकुचन्ह कहि न सकत गुरु पाहीं । पितु दरसन लालचु मन माहीं ॥
बिस्वामित्र बिनय बड़ि देखी । उपजा उर संतोषु बिसेषी ॥ ३ ॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 4बाल काण्ड
हरषि बंधु दोउ हृदयँ लगाए । पुलक अंग अंबक जल छाए ॥
चले जहाँ दसरथु जनवासे । मनहुँ सरोबर तकेउ पिआसे ॥ ४ ॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 1बाल काण्ड
मुनिहि दंडवत कीन्ह महीसा । बार बार पद रज धरि सीसा ॥
कौसिक राउ लिए उर लाई । कहि असीस पूछी कुसलाई ॥ १ ॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 2बाल काण्ड
पुनि दंडवत करत दोउ भाई । देखि नृपति उर सुखु न समाई ॥
सुत हियँ लाइ दुसह दुख मेटे । मृतक सरीर प्रान जनु भेंटे ॥ २ ॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 3बाल काण्ड
पुनि बसिष्ठ पद सिर तिन्ह नाए । प्रेम मुदित मुनिबर उर लाए ॥
बिप्र बृंद बंदे दुहुँ भाईं । मनभावती असीसें पाईं ॥ ३ ॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 4बाल काण्ड
भरत सहानुज कीन्ह प्रनामा । लिए उठाइ लाइ उर रामा ॥
हरषे लखन देखि दोउ भ्राता । मिले प्रेम परिपूरित गाता ॥ ४ ॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 1बाल काण्ड
रामहि देखि बरात जुड़ानी । प्रीति कि रीति न जाति बखानी ॥
नृप समीप सोहहिं सुत चारी । जनु धन धरमादिक तनुधारी ॥ १ ॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 2बाल काण्ड
सुतन्ह समेत दसरथहि देखी । मुदित नगर नर नारि बिसेषी ॥
सुमन बरिसि सुर हनहिं निसाना । नाकनटीं नाचहिं करि गाना ॥ २ ॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 3बाल काण्ड
सतानंद अरु बिप्र सचिव गन । मागध सूत बिदुष बंदीजन ॥
सहित बरात राउ सनमाना । आयसु मागि फिरे अगवाना ॥ ३ ॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 4बाल काण्ड
प्रथम बरात लगन तें आई । तातें पुर प्रमोदु अधिकाई ॥
ब्रह्मानंदु लोग सब लहहीं । बढ़हुँ दिवस निसि बिधि सन कहहीं ॥ ४ ॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 1बाल काण्ड
जनक सुकृत मूरति बैदेही । दसरथ सुकृत रामु धरें देही ॥
इन्ह सम काहुँ न सिव अवराधे । काहुँ न इन्ह समान फल लाधे ॥ १ ॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 2बाल काण्ड
इन्ह सम कोउ न भयउ जग माहीं । है नहिं कतहूँ होनेउ नाहीं ॥
हम सब सकल सुकृत कै रासी । भए जग जनमि जनकपुर बासी ॥ २ ॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 3बाल काण्ड
जिन्ह जानकी राम छबि देखी । को सुकृती हम सरिस बिसेषी ॥
पुनि देखब रघुबीर बिआहू । लेब भली बिधि लोचन लाहू ॥ ३ ॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 4बाल काण्ड
कहहिं परसपर कोकिलबयनीं । एहि बिआहँ बड़ लाभु सुनयनीं ॥
बड़ें भाग बिधि बात बनाई । नयन अतिथि होइहहिं दोउ भाई ॥ ४ ॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 1बाल काण्ड
बिबिध भाँति होइहि पहुनाई । प्रिय न काहि अस सासुर माई ॥
तब तब राम लखनहि निहारी । होइहहिं सब पुर लोग सुखारी ॥ १ ॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 2बाल काण्ड
सखि जस राम लखन कर जोटा । तैसेइ भूप संग हुइ ढोटा ॥
स्याम गौर सब अंग सुहाए । ते सब कहहिं देखि जे आए ॥ २ ॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 3बाल काण्ड
कहा एक मैं आजु निहारे । जनु बिरंचि निज हाथ सँवारे ॥
भरतु राम ही की अनुहारी । सहसा लखि न सकहिं नर नारी ॥ ३ ॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 4बाल काण्ड
लखनु सत्रुसूदनु एकरूपा । नख सिख ते सब अंग अनूपा ॥
मन भावहिं मुख बरनि न जाहीं । उपमा कहुँ त्रिभुवन कोउ नाहीं ॥ ४ ॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 1बाल काण्ड
एहि बिधि सकल मनोरथ करहीं । आनँद उमगि उमगि उर भरहीं ॥
जे नृप सीय स्वयंबर आए । देखि बंधु सब तिन्ह सुख पाए ॥ १ ॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 2बाल काण्ड
कहत राम जसु बिसद बिसाला । निज निज भवन गए महिपाला ॥
गए बीति कछु दिन एहि भाँती । प्रमुदित पुरजन सकल बराती ॥ २ ॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 3बाल काण्ड
मंगल मूल लगन दिनु आवा । हिम रितु अगहनु मासु सुहावा ॥
ग्रह तिथि नखतु जोगु बर बारू । लगन सोधि बिधि कीन्ह बिचारू ॥ ३ ॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 4बाल काण्ड
पठै दीन्हि नारद सन सोई । गनी जनक के गनकन्ह जोई ॥
सुनी सकल लोगन्ह यह बाता । कहहिं जोतिषी आहिं बिधाता ॥ ४ ॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
छंद 311बाल काण्ड
उपमा न कोउ कह दास तुलसी कतहुँ कबि कोबिद कहैं ।
बल बिनय बिद्या सील सोभा सिंधु इन्ह से एइ अहैं ॥
पुर नारि सकल पसारि अंचल बिधिहि बचन सुनावहीं ।
ब्याहिअहुँ चारिउ भाइ एहिं पुर हम सुमंगल गावहीं ॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 1बाल काण्ड
उपरोहितहि कहेउ नरनाहा । अब बिलंब कर कारनु काहा ॥
सतानंद तब सचिव बोलाए । मंगल सकल साजि सब ल्याए ॥ १ ॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 2बाल काण्ड
संख निसान पनव बहु बाजे । मंगल कलस सगुन सुभ साजे ॥
सुभग सुआसिनि गावहिं गीता । करहिं बेद धुनि बिप्र पुनीता ॥ २ ॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 3बाल काण्ड
लेन चले सादर एहि भाँती । गए जहाँ जनवास बराती ॥
कोसलपति कर देखि समाजू । अति लघु लाग तिन्हहि सुरराजू ॥ ३ ॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 4बाल काण्ड
भयउ समउ अब धारिअ पाऊ । यह सुनि परा निसानहिं घाऊ ॥
गुरहि पूछि करि कुल बिधि राजा । चले संग मुनि साधु समाजा ॥ ४ ॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 1बाल काण्ड
सुरन्ह सुमंगल अवसरु जाना । बरषहिं सुमन बजाइ निसाना ॥
सिव ब्रह्मादिक बिबुध बरूथा । चढ़े बिमानन्हि नाना जूथा ॥ १ ॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 2बाल काण्ड
प्रेम पुलक तन हृदयँ उछाहू । चले बिलोकन राम बिआहू ॥
देखि जनकपुरु सुर अनुरागे । निज निज लोक सबहिं लघु लागे ॥ २ ॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 3बाल काण्ड
चितवहिं चकित बिचित्र बिताना । रचना सकल अलौकिक नाना ।
नगर नारि नर रूप निधाना । सुघर सुधरम सुसील सुजाना ॥ ३ ॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 4बाल काण्ड
तिन्हहि देखि सब सुर सुरनारीं । भए नखत जनु बिधु उजिआरीं ॥
बिधिहि भयउ आचरजु बिसेषी । निज करनी कछु कतहुँ न देखी ॥ ४ ॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 1बाल काण्ड
जिन्ह कर नामु लेत जग माहीं । सकल अमंगल मूल नसाहीं ॥
करतल होहिं पदारथ चारी । तेइ सिय रामु कहेउ कामारी ॥ १ ॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 2बाल काण्ड
एहि बिधि संभु सुरन्ह समुझावा । पुनि आगें बर बसह चलावा ॥
देवन्ह देखे दसरथु जाता । महामोद मन पुलकित गाता ॥ २ ॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 3बाल काण्ड
साधु समाज संग महिदेवा । जनु तनु धरें करहिं सुख सेवा ॥
सोहत साथ सुभग सुत चारी । जनु अपबरग सकल तनुधारी ॥ ३ ॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 4बाल काण्ड
मरकत कनक बरन बर जोरी । देखि सुरन्ह भै प्रीति न थोरी ॥
पुनि रामहि बिलोकि हियँ हरषे । नृपहि सराहि सुमन तिन्ह बरषे ॥ ४ ॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 1बाल काण्ड
केकि कंठ दुति स्यामल अंगा । तड़ित बिनिंदक बसन सुरंगा ॥
ब्याह बिभूषन बिबिध बनाए । मंगल सब सब भाँति सुहाए ॥ १ ॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 2बाल काण्ड
सरद बिमल बिधु बदनु सुहावन । नयन नवल राजीव लजावन ॥
सकल अलौकिक सुंदरताई । कहि न जाई मनहीं मन भाई ॥ २ ॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 3बाल काण्ड
बंधु मनोहर सोहहिं संगा । जात नचावत चपल तुरंगा ।
राजकुअँर बर बाजि देखावहिं । बंस प्रसंसक बिरिद सुनावहिं ॥ ३ ॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 4बाल काण्ड
जेहि तुरंग पर रामु बिराजे । गति बिलोकि खगनायकु लाजे ॥
कहि न जाइ सब भाँति सुहावा । बाजि बेषु जनु काम बनावा ॥ ४ ॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 1बाल काण्ड
जेहिं बर बाजि रामु असवारा । तेहि सारदउ न बरनै पारा ॥
संकरु राम रूप अनुरागे । नयन पंचदस अति प्रिय लागे ॥ १ ॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 2बाल काण्ड
हरि हित सहित रामु जब जोहे । रमा समेत रमापति मोहे ॥
निरखि राम छबि बिधि हरषाने । आठइ नयन जानि पछिताने ॥ २ ॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 3बाल काण्ड
सुर सेनप उर बहुत उछाहू । बिधि ते डेवढ़ लोचन लाहू ॥
रामहि चितव सुरेस सुजाना । गौतम श्रापु परम हित माना ॥ ३ ॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 4बाल काण्ड
देव सकल सुरपतिहि सिहाहीं । आजु पुरंदर सम कोउ नाहीं ॥
मुदित देवगन रामहि देखी । नृपसमाज दुहुँ हरषु बिसेषी ॥ ४ ॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
छंद 316बाल काण्ड
जनु बाजि बेषु बनाइ मनसिजु राम हित अति सोहई ।
आपनें बय बल रूप गुन गति सकल भुवन बिमोहई ॥
जगमगत जीनु जराव जोति सुमोति मनि मानिक लगे ।
किंकिनि ललाम लगामु ललित बिलोकिसुर नर मुनि ठगे ॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 1बाल काण्ड
बिधुबदनीं सब सब मृगलोचनि । सब निज तन छबि रति मदु मोचनि ॥
पहिरें बरन बरन बर चीरा । सकल बिभूषन सजें सरीरा ॥ १ ॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 2बाल काण्ड
सकल सुमंगल अंग बनाएँ । करहिं गान कलकंठि लजाएँ ॥
कंकन किंकिनि नूपुर बाजहिं । चालि बिलोकि काम गज लाजहिं ॥ २ ॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 3बाल काण्ड
बाजहिं बाजने बिबिध प्रकारा । नभ अरु नगर सुमंगलचारा ॥
सची सारदा रमा भवानी । जे सुरतिय सुचि सजह सयानी ॥ ३ ॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 4बाल काण्ड
कपट नारि बर बेष बनाई । मिली सकल रनिवासहिं जाई ॥
करहिं गान कल मंगल बानीं । हरष बिबस सब काहुँ न जानीं ॥ ४ ॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
छंद 317बाल काण्ड
अति हरषु राजसमाज दुहु दिसि दुंदुभीं बाजहिं घनी ।
बरषहिं सुमन सुर हरषि कहि जय जयति जय रघुकुलमनी ॥
एहि भाँति जानि बरात आवत बाजने बहु बाजहीं ।
रानी सुआसिनि बोलि परिछनि हेतु मंगल साजहीं ॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 1बाल काण्ड
नयन नीरु हटि मंगल जानी । परिछनि करहिं मुदित मन रानी ॥
बेद बिहित अरु कुल आचारू । कीन्ह भली बिधि सब ब्यवहारू ॥ १ ॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 2बाल काण्ड
पंच सबद धुनि मंगल गाना । पट पाँवड़े परहिं बिधि नाना ॥
करि आरती अरघु तिन्ह दीन्हा । राम गमनु मंडप तब कीन्हा ॥ २ ॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 3बाल काण्ड
दसरथु सहित समाज बिराजे । बिभव बिलोकि लोकपति लाजे ॥
समयँ समयँ सुर बरषहिं फूला । सांति पढ़हिं महिसुर अनुकूला ॥ ३ ॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 4बाल काण्ड
नभ अरु नगर कोलाहल होई । आपनि पर कछु सुनइ न कोई ॥
एहि बिधि रामु मंडपहिं आए । अरघु देइ आसन बैठाए ॥ ४ ॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
छंद 318बाल काण्ड
को जान केहि आनंद बस सब ब्रह्मु बर परिछन चली ।
कल गान मधुर निसान बरषहिं सुमन सुर सोभा भली ॥
आनंदकंदु बिलोकि दूलहु सकलहियँ हरषित भई ।
अंभोज अंबक अंबु उमगि सुअंग पुलकावलि छई ॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 1बाल काण्ड
मिले जनकु दसरथु अति प्रीतीं । करि बैदिक लौकिक सब रीतीं ॥
मिलत महा दोउ राज बिराजे । उपमा खोजि खोजि कबि लाजे ॥ १ ॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 2बाल काण्ड
लही न कतहुँ हारि हियँ मानी । इन्ह सम एइ उपमा उर आनी ॥
सामध देखि देव अनुरागे । सुमन बरषि जसु गावन लागे ॥ २ ॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 3बाल काण्ड
जगु बिरंचि उपजावा जब तें । देखे सुने ब्याह बहु तब तें ॥
सकल भाँति सम साजु समाजू । सम समधी देखे हम आजू ॥ ३ ॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 4बाल काण्ड
देव गिरा सुनि सुंदर साँची । प्रीति अलौकिक दुहु दिसि माची ॥
देत पाँवड़े अरघु सुहाए । सादर जनकु मंडपहिं ल्याए ॥ ४ ॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
छंद 319बाल काण्ड
बैठारि आसन आरती करि निरखि बरु सुखु पावहीं ।
मनि बसन भूषन भूरि वारहिं नारि मंगल गावहीं ॥
ब्रह्मादि सुरबर बिप्र बेष बनाइ कौतुक देखहीं ।
अवलोकि रघुकुल कमल रबि छबि सुफल जीवन लेखहीं ॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 1बाल काण्ड
बहुरि कीन्हि कोसलपति पूजा । जानि ईस सम भाउ न दूजा ॥
कीन्हि जोरि कर बिनय बड़ाई । कहि निज भाग्य बिभव बहुताई ॥ १ ॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 3बाल काण्ड
सकल बरात जनक सनमानी । दान मान बिनती बर बानी ॥
बिधि हरि हरु दिसिपति दिनराऊ । जे जानहिं रघुबीर प्रभाऊ ॥ ३ ॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 4बाल काण्ड
कपट बिप्र बर बेष बनाएँ । कौतुक देखहिं अति सचु पाएँ ॥
पूजे जनक देव सम जानें । दिए सुआसन बिनु पहिचानें ॥ ४ ॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
छंद 320बाल काण्ड
मंडपु बिलोकि बिचित्र रचनाँ रुचिरताँ मुनि मन हरे ।
निज पानि जनक सुजान सब कहुँ आनि सिंघासन धरे ॥
कुल इष्ट सरिस बसिष्ट पूजे बिनय करि आसिष लही ।
कौसिकहि पूजन परम प्रीति कि रीति तौ न परै कही ॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 1बाल काण्ड
समउ बिलोकि बसिष्ठ बोलाए । सादर सतानंदु सुनि आए ॥
बेगि कुअँरि अब आनहु जाई । चले मुदित मुनि आयसु पाई ॥ १ ॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 2बाल काण्ड
रानी सुनि उपरोहित बानी । प्रमुदित सखिन्ह समेत सयानी ॥
बिप्र बधू कुल बृद्ध बोलाईं । करि कुल रीति सुमंगल गाईं ॥ २ ॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 3बाल काण्ड
नारि बेष जे सुर बर बामा । सकल सुभायँ सुंदरी स्यामा ॥
तिन्हहि देखि सुखु पावहिं नारी । बिनु पहिचानि प्रानहु ते प्यारीं ॥ ३ ॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 4बाल काण्ड
बार बार सनमानहिं रानी । उमा रमा सारद सम जानी ॥
सीय सँवारि समाजु बनाई । मुदित मंडपहिं चलीं लवाई ॥ ४ ॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
छंद 321बाल काण्ड
पहिचान को केहि जान सबहि अपान सुधि भोरी भई ।
आनंद कंदु बिलोकि दूलहु उभय दिसि आनँदमई ॥
सुर लखे राम सुजान पूजे मानसिक आसन दए ।
अवलोकि सीलु सुभाउ प्रभु को बिबुध मन प्रमुदित भए ॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 1बाल काण्ड
सिय सुंदरता बरनि न जाई । लघु मति बहुत मनोहरताई ॥
आवत दीखि बरातिन्ह सीता । रूप रासि सब भाँति पुनीता ॥ १ ॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 2बाल काण्ड
सबहिं मनहिं मन किए प्रनामा । देखि राम भए पूरनकामा ॥
हरषे दसरथ सुतन्ह समेता । कहि न जाइ उर आनँदु जेता ॥ २ ॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 3बाल काण्ड
सुर प्रनामु करि बरिसहिं फूला । मुनि असीस धुनि मंगल मूला ॥
गान निसान कोलाहलु भारी । प्रेम प्रमोद मगन नर नारी ॥ ३ ॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 4बाल काण्ड
एहि बिधि सीय मंडपहिं आई । प्रमुदित सांति पढ़हिं मुनिराई ॥
तेहि अवसर कर बिधि ब्यवहारू । दुहुँ कुलगुर सब कीन्ह अचारू ॥ ४ ॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
छंद 322बाल काण्ड
चलि ल्याइ सीतहि सखीं सादर सजि सुमंगल भामिनीं ।
नवसप्त साजें सुंदरी सब मत्त कुंजर गामिनीं ॥
कल गान सुनि मुनि ध्यान त्यागहिं काम कोकिल लाजहीं ।
मंजीर नूपुर कलित कंकन ताल गति बर बाजहीं ॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 1बाल काण्ड
जनक पाटमहिषी जग जानी । सीय मातु किमि जाइ बखानी ॥ ॥
सुजसु सुकृत सुख सुंदरताई । सब समेटि बिधि रची बनाई ॥ १ ॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 2बाल काण्ड
समउ जानि मुनिबरन्ह बोलाईं । सुनत सुआसिनि सादर ल्याईं ॥
जनक बाम दिसि सोह सुनयना । हिमगिरि संग बनी जनु मयना ॥ २ ॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 3बाल काण्ड
कनक कलस मनि कोपर रूरे । सुचि सुगंध मंगल जल पूरे ॥
निज कर मुदित रायँ अरु रानी । धरे राम के आगें आनी ॥ ३ ॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 4बाल काण्ड
पढ़हिं बेद मुनि मंगल बानी । गगन सुमन झरि अवसरु जानी ॥
बरु बिलोकि दंपति अनुरागे । पाय पुनीत पखारन लागे ॥ ४ ॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
छंद 323बाल काण्ड
आचारु करि गुर गौरि गनपति मुदित बिप्र पुजावहीं ।
सुर प्रगटि पूजा लेहिं देहिं असीस अति सुखु पावहीं ॥
मधुपर्क मंगल द्रब्य जो जेहि समय मुनि मन महुँ चहें ।
भरे कनक कोपर कलस सो तब लिएहिं परिचारक रहैं ॥ १ ॥
कुल रीति प्रीति समेत रबि कहि देत सबु सादर कियो ।
एहि भाँति देव पुजाइ सीतहि सुभग सिंघासनु दियो ॥
सिय राम अवलोकनि परसपर प्रेमु काहुँ न लखि परै ।
मन बुद्धि बर बानी अगोचर प्रगट कबि कैसें करै ॥ २ ॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 1बाल काण्ड
कुअँरु कुअँरि कल भावँरि देहीं । नयन लाभु सब सादर लेहीं ॥
जाइ न बरनि मनोहर जोरी । जो उपमा कछु कहौं सो थोरी ॥ १ ॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 2बाल काण्ड
राम सीय सुंदर प्रतिछाहीं । जगमगात मनि खंभन माहीं
मनहुँ मदन रति धरि बहु रूपा । देखत राम बिआहु अनूपा ॥ २ ॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 3बाल काण्ड
दरस लालसा सकुच न थोरी । प्रगटत दुरत बहोरि बहोरी ॥
भए मगन सब देखनिहारे । जनक समान अपान बिसारे ॥ ३ ॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 4बाल काण्ड
प्रमुदित मुनिन्ह भावँरीं फेरीं । नेगसहित सब रीति निवेरीं ॥
राम सीय सिर सेंदुर देहीं । सोभा कहि न जाति बिधि केहीं ॥ ४ ॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 5बाल काण्ड
अरुन पराग जलजु भरि नीकें । ससिहि भूष अहि लोभ अमी कें ॥
बहुरि बसिष्ठ दीन्हि अनुसासन । बरु दुलहिनि बैठे एक आसन ॥ ५ ॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
छंद 324बाल काण्ड
लागे पखारन पाय पंकज प्रेम तन पुलकावली ।
नभ नगर गान निसान जय धुनि उमगि जनु चहुँ दिसि चली ॥
जे पद सरोज मनोज अरि उर सर सदैव बिराजहीं ।
जे सुकृत सुमिरत बिमलता मन सकल कलि मल भाजहीं ॥ १ ॥
जे परसि मुनिबनिता लही गति रही जो पातकमई ।
मकरंदु जिन्ह को संभु सिर सुचिता अवधि सुर बरनई ॥
करि मधुप मन मुनि जोगिजन जे सेइ अभिमत गति लहैं ।
ते पद पखारत भाग्यभाजनु जनकु जय जय सब कहैं ॥ २ ॥
बर कुअँरि करतल जोरि साखोचारु दोउ कुलगुर करैं ।
भयो पानिगहनु बिलोकि बिधि सुर मनुज मुनि आनँद भरैं ॥
सुखमूल दूलहु देखि दंपति पुलक तन हुलस्यो हियो ।
करि लोक बेद बिधानु कन्यादानु नृपभूषन कियो ॥ ३ ॥
हिमवंत जिमि गिरिजा महेसहि हरिहि श्री सागर दई ।
तिमि जनक रामहि सिय समरपी बिस्व कल कीरति नई ॥
क्यों करै बिनय बिदेहु कियो बिदेहु मूरति सावँरीं ।
करि होमु बिधिवत गाँठि जोरी होन लागीं भावँरीं ॥ ४ ॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 1बाल काण्ड
जसि रघुबीर ब्याह बिधि बरनी । सकल कुअँर ब्याहे तेहिं करनी ॥
कहि न जा कछु दाइज भूरी । रहा कनक मनि मंडपु पूरी ॥ १ ॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 2बाल काण्ड
कंबल बसन बिचित्र पटोरे । भाँति भाँति बहु मोल न थोरे ॥
गज रथ तुरगदास अरु दासी । धेनु अलंकृत कामदुहा सी ॥ २ ॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 3बाल काण्ड
बस्तु अनेक करिअ किमि लेखा । कहि न जाइ जानहिं जिन्ह देखा ॥
लोकपाल अवलोकि सिहाने । लीन्ह अवधपति सबु सुखु माने ॥ ३ ॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 4बाल काण्ड
दीन्ह जाचकन्हि जो जेहि भावा । उबरा सो जनवासेहिं आवा ॥
तब कर जोरि जनकु मृदु बानी । बोले सब बरात सनमानी ॥ ४ ॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
छंद 325बाल काण्ड
बैठे बरासन रामु जानकि मुदित मन दसरथु भए ।
तनु पुलक पुनि पुनि देखि अपनें सुकृत सुरतरु पल नए ॥
भरि भुवन रहा उछाहु राम बिबाहु भा सबहीं कहा ।
केहि भाँति बरनि सिरात रसना एक यहु मंगलु महा ॥ १ ॥
तब जनक पाइ बसिष्ठ आयसु ब्याह साज सँवारि कै ।
मांडवी श्रुतकीरति उरमिला कुअँरि लईं हँकारि कै ॥
कुसकेतु कन्या प्रथम जो गुन सील सुख सोभामई ।
सब रीति प्रीति समेत करि सो ब्याहि नृप भरतहि दई ॥ २ ॥
जानकी लघु भगिनी सकल सुंदरि सिरोमनि जानि कै ।
सो तनय दीन्ही ब्याहि लखनहि सकल बिधि सनमानि कै ॥
जेहि नामु श्रुतकीरति सुलोचनि सुमुखि सब गुन आगरी ।
सो दई रिपुसूदनहि भूपति रूप सील उजागरी ॥ ३ ॥
अनुरूप बर दुलहिनि परस्पर लखि सकुच हियँ हरषहीं ।
सब मुदित सुंदरता सराहहिं सुमन सुर गन बरषहीं ॥
सुंदरीं सुंदर बरन्ह सह सब एक मंडप राजहीं ।
जनु जीव उर चारिउ अवस्था बिभुन सहित बिराजहीं ॥ ४ ॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 1बाल काण्ड
स्याम सरीरु सुभायँ सुहावन । सोभा कोटि मनोज लजावन ॥
जावक जुत पद कमल सुहाए । मुनि मन मधुप रहत जिन्ह छाए ॥ १ ॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 2बाल काण्ड
पीत पुनीत मनोहर धोती । हरति बाल रबि दामिनि जोती ॥
कल किंकिनि कटि सूत्र मनोहर । बाहु बिसाल बिभूषन सुंदर ॥ २ ॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 3बाल काण्ड
पीत जनेउ महाछबि देई । कर मुद्रिका चोरि चितु लेई ॥
सोहत ब्याह साज सब साजे । उर आयत उरभूषन राजे ॥ ३ ॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 4बाल काण्ड
पिअर उपरना काखासोती । दुहुँ आँचरन्हि लगे मनि मोती ॥
नयन कमल कल कुंडल काना । बदनु सकल सौंदर्य निदाना ॥ ४ ॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 5बाल काण्ड
सुंदर भृकुटि मनोहर नासा । भाल तिलकु रुचिरता निवासा ॥
सोहत मौरु मनोहर माथे । मंगलमय मुकुता मनि गाथे ॥ ५ ॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
छंद 326बाल काण्ड
सनमानि सकल बरात आदर दान बिनय बड़ाइ कै ।
प्रमुदित महामुनि बृंद बंदे पूजि प्रेम लड़ाइ कै ॥
सिरु नाइ देव मनाइ सब सन कहत कर संपुट किएँ ।
सुर साधु चाहत भाउ सिंधु कि तोष जल अंजलि दिएँ ॥ १ ॥
कर जोरि जनकु बहोरि बंधु समेत कोसलराय सों ।
बोले मनोहर बयन सानि सनेह सील सुभाय सों ॥
संबंध राजन रावरें हम बड़े अब सब बिधि भए ।
एहि राज साज समेत सेवक जानिबे बिनु गथ लए ॥ २ ॥
ए दारिका परिचारिका करि पालिबीं करुना नई ।
अपराधु छमिबो बोलि पठए बहुत हौं ढीट्यो कई ॥
पुनि भानुकुलभूषन सकल सनमान निधि समधी किए ।
कहि जाति नहिं बिनती परस्पर प्रेम परिपूरन हिए ॥ ३ ॥
बृंदारका गन सुमन बरिसहिं राउ जनवासेहि चले ।
दुंदुभी जय धुनि बेद धुनि नभ नगर कौतूहल भले ॥
तब सखीं मंगल गान करत मुनीस आयसु पाइ कै ।
दूलह दुलहिनिन्ह सहित सुंदरि चलीं कोहबर ल्याइ कै ॥ ४ ॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 1बाल काण्ड
पुनि जेवनार भई बहु भाँती । पठए जनक बोलाइ बराती ॥
परत पाँवड़े बसन अनूपा । सुतन्ह समेत गवन कियो भूपा ॥ १ ॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 2बाल काण्ड
सादर सब के पाय पखारे । जथाजोगु पीढ़न्ह बैठारे ॥
धोए जनक अवधपति चरना । सीलु सनेहु जाइ नहिं बरना ॥ २ ॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 4बाल काण्ड
आसन उचित सबहि नृप दीन्हे । बोलि सूपकारी सब लीन्हे ॥
सादर लगे परन पनवारे । कनक कील मनि पान सँवारे ॥ ४ ॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
छंद 327बाल काण्ड
गाथे महामनि मौर मंजुल अंग सब चित चोरहीं ।
पुर नारि सुर सुंदरीं बरहि बिलोकि सब तिन तोरहीं ॥
मनि बसन भूषन वारि आरति करहिं मंगल गावहीं ।
सुर सुमन बरिसहिं सूत मागध बंदि सुजसु सुनावहीं ॥ १ ॥
कोहबरहिं आने कुअँर कुअँरि सुआसिनिन्ह सुख पाइ कै ।
अति प्रीति लौकिक रीति लागीं करन मंगल गाइ कै ॥
लहकौरि गौरि सिखाव रामहि सीय सन सारद कहैं ।
रनिवासु हास बिलास रस बस जन्म को फलु सब लहैं ॥ २ ॥
निज पानि मनि महुँ देखिअति मूरति सुरूपनिधान की ।
चालति न भुजबल्ली बिलोकनि बिरह भय बस जानकी ॥
कौतुक बिनोद प्रमोदु प्रेमु न जाइ कहि जानहिं अलीं ।
बर कुअँरि सुंदर सकल सखीं लवाइ जनवासेहि चलीं ॥ ३ ॥
तेहि समय सुनिअ असीस जहँ तहँ नगर नभ आनँदु महा ।
चिरु जिअहुँ जोरीं चारु चार्यो मुदित मन सबहीं कहा ॥
जोगींद्र सिद्ध मुनीस देव बिलोकि प्रभु दुंदुभि हनी ।
चले हरषि बरषि प्रसून निज निज लोक जय जय जय भनी ॥ ४ ॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 1बाल काण्ड
पंच कवल करि जेवन लागे । गारि गान सुनि अति अनुरागे ।
भाँति अनेक परे पकवाने । सुधा सरिस नहिं जाहिं बखाने ॥ १ ॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 2बाल काण्ड
परुसन लगे सुआर सुजाना । बिंजन बिबिध नाम को जाना ॥
चारि भाँति भोजन बिधि गाई । एक एक बिधि बरनि न जाई ॥ २ ॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 3बाल काण्ड
छरस रुचिर बिंजन बहु जाती । एक एक रस अगनित भाँती ॥
जेवँत देहिं मधुर धुनि गारी । लै लै नाम पुरुष अरु नारी ॥ ३ ॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 4बाल काण्ड
समय सुहावनि गारि बिराजा । हँसत राउ सुनि सहित समाजा ॥
एहि बिधि सबहीं भोजनु कीन्हा । आदर सहित आचमनु दीन्हा ॥ ४ ॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 1बाल काण्ड
नित नूतन मंगल पुर माहीं । निमिष सरिस दिन जामिनि जाहीं ॥
बड़े भोर भूपतिमनि जागे । जाचक गुन गन गावन लागे ॥ १ ॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 2बाल काण्ड
देखि कुअँर बर बधुन्ह समेता । किमि कहि जात मोदु मन जेता ॥
प्रातक्रिया करि गे गुरु पाहीं । महाप्रमोदु प्रेमु मन माहीं ॥ २ ॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 3बाल काण्ड
करि प्रनामु पूजा कर जोरी । बोले गिरा अमिअँ जनु बोरी ॥
तुम्हरी कृपाँ सुनहु मुनिराजा । भयउँ आजु मैं पूरन काजा ॥ ३ ॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 4बाल काण्ड
अब सब बिप्र बोलाइ गोसाईं । देहु धेनु सब भाँति बनाईं ॥
सुनि गुर करि महिपाल बड़ाई । पुनि पठए मुनिबृंद बोलाई ॥ ४ ॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 1बाल काण्ड
दंड प्रनाम सबहि नृप कीन्हे । पूजि सप्रेम बरासन दीन्हे ॥
चारि लच्छ बर धेनु मगाईं । काम सुरभि सम सील सुहाईं ॥ १ ॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 2बाल काण्ड
सब बिधि सकल अलंकृत कीन्हीं । मुदित महिप महिदेवन्ह दीन्हीं ॥
करत बिनय बहु बिधि नरनाहू । लहेउँ आजु जग जीवन लाहू ॥ २ ॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 3बाल काण्ड
पाइ असीस महीसु अनंदा । लिए बोलि पुनि जाचक बृंदा ॥
कनक बसन मनि हय गय स्यंदन । दिए बूझि रुचि रबिकुलनंदन ॥ ३ ॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 4बाल काण्ड
चले पढ़त गावत गुन गाथा । जय जय जय दिनकर कुल नाथा ॥
एहि बिधि राम बिआह उछाहू । सकइ न बरनि सहस मुख जाहू ॥ ४ ॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 1बाल काण्ड
जनक सनेहु सीलु करतूती । नृपु सब भाँति सराह बिभूती ॥
दिन उठि बिदा अवधपति मागा । राखहिं जनकु सहित अनुरागा ॥ १ ॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 2बाल काण्ड
नित नूतन आदरु अधिकाई । दिन प्रति सहस भाँति पहुनाई ॥
नित नव नगर अनंद उछाहू । दसरथ गवनु सोहाइ न काहू ॥ २ ॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 3बाल काण्ड
बहुत दिवस बीते एहि भाँती । जनु सनेह रजु बँधे बराती ॥
कौसिक सतानंद तब जाई । कहा बिदेह नृपहि समुझाई ॥ ३ ॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 4बाल काण्ड
अब दसरथ कहँ आयसु देहू । जद्यपि छाड़ि न सकहु सनेहू ॥
भलेहिं नाथ कहि सचिव बोलाए । कहि जय जीव सीस तिन्ह नाए ॥ ४ ॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 1बाल काण्ड
पुरबासी सुनि चलिहि बराता । बूझत बिकल परस्पर बाता ॥
सत्य गवनु सुनि सब बिलखाने । मनहुँ साँझ सरसिज सकुचाने ॥ १ ॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 2बाल काण्ड
जहँ जहँ आवत बसे बराती । तहँ तहँ सिद्ध चला बहु भाँती ॥
बिबिध भाँति मेवा पकवाना । भोजन साजु न जाइ बखाना ॥ २ ॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 3बाल काण्ड
भरि भरि बसहँ अपार कहारा । पठईं जनक अनेक सुसारा ॥
तुरग लाख रथ सहस पचीसा । सकल सँवारे नख अरु सीसा ॥ ३ ॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 4बाल काण्ड
मत्त सहस दस सिंधुर साजे । जिन्हहि देखि दिसिकुंजर लाजे ॥
कनक बसन मनि भरि भरि जाना । महिषीं धेनु बस्तु बिधि नाना ॥ ४ ॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 1बाल काण्ड
सबु समाजु एहि भाँति बनाई । जनक अवधपुर दीन्ह पठाई ॥
चलिहि बरात सुनत सब रानीं । बिकल मीनगन जनु लघु पानीं ॥ १ ॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 2बाल काण्ड
पुनि पुनि सीय गोद करि लेहीं । देह असीस सिखावनु देहीं ॥
होएहु संतत पियहि पिआरी । चिरु अहिबात असीस हमारी ॥ २ ॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 3बाल काण्ड
सासु ससुर गुर सेवा करेहू । पति रुख लखि आयसु अनुसरेहू ॥
अति सनेह बस सखीं सयानी । नारि धरम सिखवहिं मृदु बानी ॥ ३ ॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 4बाल काण्ड
सादर सकल कुअँरि समुझाईं । रानिन्ह बार बार उर लाईं ॥
बहुरि बहुरि भेटहिं महतारीं । कहहिं बिरंचि रचीं कत नारीं ॥ ४ ॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 1बाल काण्ड
चारिउ भाइ सुभायँ सुहाए । नगर नारि नर देखन धाए ॥
कोउ कह चलन चहत हहिं आजू । कीन्ह बिदेह बिदा कर साजू ॥ १ ॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 2बाल काण्ड
लेहु नयन भरि रूप निहारी । प्रिय पाहुने भूप सुत चारी ॥
को जानै केहिं सुकृत सयानी । नयन अतिथि कीन्हे बिधि आनी ॥ २ ॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 3बाल काण्ड
मरणसीलु जिमि पाव पिऊषा । सुरतरु लहै जनम कर भूखा ॥
पाव नार की हरिपदु जैसें । इन्ह कर दरसनु हम कहँ तैसें ॥ ३ ॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 4बाल काण्ड
निरखि राम सोभा उर धरहू । निज मन फनि मूरति मनि करहू ॥
एहि बिधि सबहि नयन फलु देता । गए कुअँर सब राज निकेता ॥ ४ ॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 1बाल काण्ड
देखि राम छबि अति अनुरागीं । प्रेमबिबस पुनि पुनि पद लागीं ॥
रही न लाज प्रीति उर छाई । सहज सनेहु बरनि किमि जाई ॥ १ ॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 2बाल काण्ड
भाइन्ह सहित उबटि अन्हवाए । छरस असन अति हेतु जेवाँए ॥
बोले रामु सुअवसरु जानी । सील सनेह सकुचमय बानी ॥ २ ॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 3बाल काण्ड
राउ अवधपुर चहत सिधाए । बिदा होन हम इहाँ पठाए ॥
मातु मुदित मन आयसु देहू । बालक जानि करब नित नेहू ॥ ३ ॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 4बाल काण्ड
सुनत बचन बिलखेउ रनिवासू । बोलि न सकहिं प्रेमबस सासू ॥
हृदयँ लगाई कुअँरि सब लीन्ही । पतिन्ह सौंपि बिनती अति कीन्ही ॥ ४ ॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 1बाल काण्ड
अस कहि रही चरन गहि रानी। प्रेम पंक जनु गिरा समानी॥
सुनि सनेहसानी बर बानी। बहुबिधि राम सासु सनमानी॥1॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 2बाल काण्ड
राम बिदा मागत कर जोरी। कीन्ह प्रनामु बहोरि बहोरी॥
पाइ असीस बहुरि सिरु नाई। भाइन्ह सहित चले रघुराई॥2॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 3बाल काण्ड
मंजु मधुर मूरति उर आनी। भईं सनेह सिथिल सब रानी॥
पुनि धीरजु धरि कुअँरि हँकारीं। बार बार भेटहि महतारीं॥3॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 4बाल काण्ड
पहुँचावहिं फिरि मिलहिं बहोरी। बढ़ी परस्पर प्रीति न थोरी॥
पुनि पुनि मिलत सखिन्ह बिलगाई। बाल बच्छ जिमि धेनु लवाई॥4॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
छंद 336बाल काण्ड
करि बिनय सिय रामहि समरपी जोरि कर पुनि पुनि कहै ।
बलि जाउँ तात सुजान तुम्ह कहुँ बिदित गति सब की अहै॥
परिवार पुरजन मोहि राजहि प्रानप्रिय सिय जानिबी ।
तुलसीस सीलु सनेहु लखि निज किंकरी करि मानिबी॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 1बाल काण्ड
सुक सारिका जानकी ज्याए। कनक पिंजरन्हि राखि पढ़ाए॥
ब्याकुल कहहिं कहाँ बैदेही। सुनि धीरजु परिहरइ न केही॥1॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 2बाल काण्ड
भए बिकल खग मृग एहि भाँती। मनुज दसा कैसें कहि जाती॥
बंधु समेत जनकु तब आए। प्रेम उमगि लोचन जल छाए॥2॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 3बाल काण्ड
सीय बिलोकि धीरता भागी। रहे कहावत परम बिरागी॥
लीन्हि रायँ उर लाइ जानकी। मिटी महामरजाद ग्यान की॥3॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 4बाल काण्ड
समुझावत सब सचिव सयाने। कीन्ह बिचारु न अवसर जाने॥
बारहिं बार सुता उर लाईं। सजि सुंदर पालकीं मगाईं॥4॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 1बाल काण्ड
बहुबिधि भूप सुता समुझाईं। नारिधरमु कुलरीति सिखाईं॥
दासीं दास दिए बहुतेरे। सुचि सेवक जे प्रिय सिय केरे॥1॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 2बाल काण्ड
सीय चलत ब्याकुल पुरबासी। होहिं सगुन सुभ मंगल रासी॥
भूसुर सचिव समेत समाजा। संग चले पहुँचावन राजा॥2॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 3बाल काण्ड
समय बिलोकि बाजने बाजे। रथ गज बाजि बरातिन्ह साजे॥
दसरथ बिप्र बोलि सब लीन्हे। दान मान परिपूरन कीन्हे॥3॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 4बाल काण्ड
चरन सरोज धूरि धरि सीसा। मुदित महीपति पाइ असीसा॥
सुमिरि गजाननु कीन्ह पयाना। मंगल मूल सगुन भए नाना॥4॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 1बाल काण्ड
नृप करि बिनय महाजन फेरे। सादर सकल मागने टेरे॥
भूषन बसन बाजि गज दीन्हे। प्रेम पोषि ठाढ़े सब कीन्हे॥1॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 2बाल काण्ड
बार बार बिरिदावलि भाषी। फिरे सकल रामहि उर राखी॥
बहुरि बहुरि कोसलपति कहहीं। जनकु प्रेमबस फिरै न चहहीं॥2॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 3बाल काण्ड
पुनि कह भूपत बचन सुहाए। फिरिअ महीस दूरि बड़ि आए॥
राउ बहोरि उतरि भए ठाढ़े। प्रेम प्रबाह बिलोचन बाढ़े॥3॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 4बाल काण्ड
तब बिदेह बोले कर जोरी। बचन सनेह सुधाँ जनु बोरी॥
करौं कवन बिधि बिनय बनाई। महाराज मोहि दीन्हि बड़ाई॥4॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 1बाल काण्ड
मुनि मंडलिहि जनक सिरु नावा। आसिरबादु सबहि सन पावा॥
सादर पुनि भेंटे जामाता। रूप सील गुन निधि सब भ्राता॥1॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 2बाल काण्ड
जोरि पंकरुह पानि सुहाए। बोले बचन प्रेम जनु जाए॥
राम करौं केहि भाँति प्रसंसा। मुनि महेस मन मानस हंसा॥2॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 3बाल काण्ड
करहिं जोग जोगी जेहि लागी। कोहु मोहु ममता मदु त्यागी॥
ब्यापकु ब्रह्मु अलखु अबिनासी। चिदानंदु निरगुन गुनरासी॥3॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 4बाल काण्ड
मन समेत जेहि जान न बानी। तरकि न सकहिं सकल अनुमानी॥
महिमा निगमु नेति कहि कहई। जो तिहुँ काल एकरस रहई॥4॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 1बाल काण्ड
सबहि भाँति मोहि दीन्हि बड़ाई। निज जन जानि लीन्ह अपनाई॥
होहिं सहस दस सारद सेषा। करहिं कलप कोटिक भरि लेखा॥1॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 2बाल काण्ड
मोर भाग्य राउर गुन गाथा। कहि न सिराहिं सुनहु रघुनाथा॥
मैं कछु कहउँ एक बल मोरें। तुम्ह रीझहु सनेह सुठि थोरें॥2॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 3बाल काण्ड
बार बार मागउँ कर जोरें। मनु परिहरै चरन जनि भोरें॥
सुनि बर बचन प्रेम जनु पोषे। पूरनकाम रामु परितोषे॥3॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 4बाल काण्ड
करि बर बिनय ससुर सनमाने। पितु कौसिक बसिष्ठ सम जाने॥
बिनती बहुरि भरत सन कीन्ही। मिलि सप्रेमु पुनि आसिष दीन्ही॥4॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 2बाल काण्ड
सुनु मुनीस बर दरसन तोरें। अगमु न कछु प्रतीति मन मोरें॥
जो सुखु सुजसु लोकपति चहहीं। करत मनोरथ सकुचत अहहीं॥2॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 3बाल काण्ड
सो सुखु सुजसु सुलभ मोहि स्वामी। सब सिधि तव दरसन अनुगामी॥
कीन्हि बिनय पुनि पुनि सिरु नाई। फिरे महीसु आसिषा पाई॥3॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 4बाल काण्ड
चली बरात निसान बजाई। मुदित छोट बड़ सब समुदाई॥
रामहि निरखि ग्राम नर नारी। पाइ नयन फलु होहिं सुखारी॥4॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 1बाल काण्ड
हने निसान पनव बर बाजे। भेरि संख धुनि हय गय गाजे॥
झाँझि बिरव डिंडिमीं सुहाई। सरस राग बाजहिं सहनाई॥1॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 2बाल काण्ड
पुर जन आवत अकनि बराता। मुदित सकल पुलकावलि गाता॥
निज निज सुंदर सदन सँवारे। हाट बाट चौहटपुर द्वारे॥2॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 3बाल काण्ड
गलीं सकल अरगजाँ सिंचाईं। जहँ तहँ चौकें चारु पुराईं॥
बना बजारु न जाइ बखाना। तोरन केतु पताक बिताना॥3॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 1बाल काण्ड
भूप भवनु तेहि अवसर सोहा। रचना देखि मदन मनु मोहा॥
मंगल सगुन मनोहरताई। रिधि सिधि सुख संपदा सुहाई॥1॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 2बाल काण्ड
जनु उछाह सब सहज सुहाए। तनु धरि धरि दसरथ गृहँ छाए॥
देखन हेतु राम बैदेही। कहहु लालसा होहि न केही॥2॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 3बाल काण्ड
जूथ जूथ मिलि चलीं सुआसिनि। निज छबि निदरहिं मदन बिलासिनि॥
सकल सुमंगल सजें आरती। गावहिं जनु बहु बेष भारती॥3॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 4बाल काण्ड
भूपति भवन कोलाहलु होई। जाइ न बरनि समउ सुखु सोई॥
कौसल्यादि राम महतारीं। प्रेमबिबस तन दसा बिसारीं॥4॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 1बाल काण्ड
मोद प्रमोद बिबस सब माता। चलहिं न चरन सिथिल भए गाता॥
राम दरस हित अति अनुरागीं। परिछनि साजु सजन सब लागीं॥1॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 2बाल काण्ड
बिबिध बिधान बाजने बाजे। मंगल मुदित सुमित्राँ साजे॥
हरद दूब दधि पल्लव फूला। पान पूगफल मंगल मूला॥2॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 3बाल काण्ड
अच्छत अंकुर लोचन लाजा। मंजुल मंजरि तुलसि बिराजा॥
छुहे पुरट घट सहज सुहाए। मदन सकुन जनु नीड़ बनाए॥3॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 4बाल काण्ड
सगुन सुगंध न जाहिं बखानी। मंगल सकल सजहिं सब रानी॥
रचीं आरतीं बहतु बिधाना। मुदित करहिं कल मंगल गाना॥4॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 1बाल काण्ड
धूप धूम नभु मेचक भयऊ। सावन घन घमंडु जनु ठयऊ॥
सुरतरु सुमन माल सुर बरषहिं। मनहुँ बलाक अवलि मनु करषहिं॥1॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 2बाल काण्ड
मंजुल मनिमय बंदनिवारे। मनहुँ पाकरिपु चाप सँवारे॥
प्रगटहिं दुरहिं अटन्ह पर भामिनि। चारु चपल जनु दमकहिं दामिनि॥2॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 3बाल काण्ड
दुंदुभि धुनि घन गरजनि घोरा। जाचक चातक दादुर मोरा॥
सुर सुगंध सुचि बरषहिं बारी। सुखी सकल ससि पुर नर नारी॥3॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 4बाल काण्ड
समउ जानि गुर आयसु दीन्हा। पुर प्रबेसु रघुकुलमनि कीन्हा॥
सुमिरि संभु गिरिजा गनराजा। मुदित महीपति सहित समाजा॥4॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 1बाल काण्ड
मागध सूत बंदि नट नागर। गावहिं जसु तिहु लोक उजागर॥
जय धुनि बिमल बेद बर बानी। दस दिसि सुनिअ सुमंगल सानी॥1॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 2बाल काण्ड
बिपुल बाज ने बाजन लागे। नभ सुर नगर लोग अनुरागे॥
बने बराती बरनि न जाहीं। महा मुदित मन सुख न समाहीं॥2॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 3बाल काण्ड
पुरबासिन्ह तब राय जोहारे। देखत रामहि भए सुखारे॥
करहिं निछावरि मनिगन चीरा। बारि बिलोचन पुलक सरीरा॥3॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 4बाल काण्ड
आरति करहिं मुदित पुर नारी। हरषहिं निरखि कुअँर बर चारी॥
सिबिका सुभग ओहार उघारी। देखि दुलहिनिन्ह होहिं सुखारी॥4॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 1बाल काण्ड
करहिं आरती बारहिं बारा। प्रेमु प्रमोदु कहै को पारा॥
भूषन मनि पट नाना जाती। करहिं निछावरि अगनित भाँती॥1॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 2बाल काण्ड
बधुन्ह समेत देखि सुत चारी। परमानंद मगन महतारी॥
पुनि पुनि सीय राम छबि देखी। मुदित सफल जग जीवन लेखी॥2॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 3बाल काण्ड
सखीं सीय मुख पुनि पुनि चाही। गान करहिं निज सुकृत सराही॥
बरषहिं सुमन छनहिं छन देवा। नाचहिं गावहिं लावहिं सेवा॥3॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 4बाल काण्ड
देखि मनोहर चारिउ जोरीं। सारद उपमा सकल ढँढोरीं॥
देत न बनहिं निपट लघु लागीं। एकटक रहीं रूप अनुरागीं॥4॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 1बाल काण्ड
चारि सिंघासन सहज सुहाए। जनु मनोज निज हाथ बनाए॥
तिन्ह पर कुअँरि कुअँर बैठारे। सादर पाय पुनीत पखारे॥1॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 2बाल काण्ड
धूप दीप नैबेद बेद बिधि। पूजे बर दुलहिनि मंगल निधि॥
बारहिं बार आरती करहीं। ब्यजन चारु चामर सिर ढरहीं॥2॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 3बाल काण्ड
बस्तु अनेक निछावरि होहीं। भरीं प्रमोद मातु सब सोहीं॥
पावा परम तत्व जनु जोगीं। अमृतु लहेउ जनु संतत रोगीं॥3॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 1बाल काण्ड
देव पितर पूजे बिधि नीकी। पूजीं सकल बासना जी की॥
सबहि बंदि माँगहिं बरदाना। भाइन्ह सहित राम कल्याना॥1॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 2बाल काण्ड
अंतरहित सुर आसिष देहीं। मुदित मातु अंचल भरि लेहीं॥
भूपति बोलि बराती लीन्हे। जान बसन मनि भूषन दीन्हे॥2॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 1बाल काण्ड
जो बसिष्ट अनुसासन दीन्ही। लोक बेद बिधि सादर कीन्ही॥
भूसुर भीर देखि सब रानी। सादर उठीं भाग्य बड़ जानी॥1॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 3बाल काण्ड
बहु बिधि कीन्हि गाधिसुत पूजा। नाथ मोहि सम धन्य न दूजा॥
कीन्हि प्रसंसा भूपति भूरी। रानिन्ह सहित लीन्हि पग धूरी॥3॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 4बाल काण्ड
भीतर भवन दीन्ह बर बासू। मन जोगवत रह नृपु रनिवासू॥
पूजे गुर पद कमल बहोरी। कीन्हि बिनय उर प्रीति न थोरी॥4॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 1बाल काण्ड
बिनय कीन्हि उर अति अनुरागें। सुत संपदा राखि सब आगें॥
नेगु मागि मुनिनायक लीन्हा। आसिरबादु बहुत बिधि दीन्हा॥1॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 2बाल काण्ड
उर धरि रामहि सीय समेता। हरषि कीन्ह गुर गवनु निकेता॥
बिप्रबधू सब भूप बोलाईं। चैल चारु भूषन पहिराईं॥2॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 3बाल काण्ड
बहुरि बोलाइ सुआसिनि लीन्हीं। रुचि बिचारि पहिरावनि दीन्हीं॥
नेगी नेग जोग जब लेहीं। रुचि अनुरूप भूपमनि देहीं॥3॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 4बाल काण्ड
प्रिय पाहुने पूज्य जे जाने। भूपति भली भाँति सनमाने॥
देव देखि रघुबीर बिबाहू। बरषि प्रसून प्रसंसि उछाहू॥4॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 1बाल काण्ड
सब बिधि सबहि समदि नरनाहू। रहा हृदयँ भरि पूरि उछाहू॥
जहँ रनिवासु तहाँ पगु धारे। सहित बहूटिन्ह कुअँर निहारे॥1॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 2बाल काण्ड
लिए गोद करि मोद समेता। को कहि सकइ भयउ सुखु जेता॥
बधू सप्रेम गोद बैठारीं। बार बार हियँ हरषि दुलारीं॥2॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 3बाल काण्ड
देखि समाजु मुदित रनिवासू। सब कें उर अनंद कियो बासू॥
कहेउ भूप जिमि भयउ बिबाहू। सुनि सुनि हरषु होत सब काहू॥3॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 4बाल काण्ड
जनक राज गुन सीलु बड़ाई। प्रीति रीति संपदा सुहाई॥
बहुबिधि भूप भाट जिमि बरनी। रानीं सब प्रमुदित सुनि करनी॥4॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 1बाल काण्ड
मंगलगान करहिं बर भामिनि। भै सुखमूल मनोहर जामिनि॥
अँचइ पान सब काहूँ पाए। स्रग सुगंध भूषित छबि छाए॥1॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 2बाल काण्ड
रामहि देखि रजायसु पाई। निज निज भवन चले सिर नाई॥
प्रेम प्रमोदु बिनोदु बड़ाई। समउ समाजु मनोहरताई॥2॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 3बाल काण्ड
कहि न सकहिं सतसारद सेसू। बेद बिरंचि महेस गनेसू॥
सो मैं कहौं कवन बिधि बरनी। भूमिनागु सिर धरइ कि धरनी॥3॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 4बाल काण्ड
नृप सब भाँति सबहि सनमानी। कहि मृदु बचन बोलाईं रानी॥
बधू लरिकनीं पर घर आईं। राखेहु नयन पलक की नाई॥4॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 1बाल काण्ड
भूप बचन सुनि सहज सुहाए। जरित कनक मनि पलँग डसाए॥
सुभग सुरभि पय फेन समाना। कोमल कलित सुपेतीं नाना॥1॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 2बाल काण्ड
उपबरहन बर बरनि न जाहीं। स्रग सुगंध मनिमंदिर माहीं॥
रतनदीप सुठि चारु चँदोवा। कहत न बनइ जान जेहिं जोवा॥2॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 3बाल काण्ड
सेज रुचिर रचि रामु उठाए। प्रेम समेत पलँग पौढ़ाए॥
अग्या पुनि पुनि भाइन्ह दीन्ही। निज निज सेज सयन तिन्ह कीन्ही॥3॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 4बाल काण्ड
देखि स्याम मृदु मंजुल गाता। कहहिं सप्रेम बचन सब माता॥
मारग जात भयावनि भारी। केहि बिधि तात ताड़का मारी॥4॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 1बाल काण्ड
मुनि प्रसाद बलि तात तुम्हारी। ईस अनेक करवरें टारी॥
मख रखवारी करि दुहुँ भाईं। गुरु प्रसाद सब बिद्या पाईं॥1॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 2बाल काण्ड
मुनितिय तरी लगत पग धूरी। कीरति रही भुवन भरि पूरी॥
कमठ पीठि पबि कूट कठोरा। नृप समाज महुँ सिव धनु तोरा॥2॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 3बाल काण्ड
बिस्व बिजय जसु जानकि पाई। आए भवन ब्याहि सब भाई॥
सकल अमानुष करम तुम्हारे। केवल कौसिक कृपाँ सुधारे॥3॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 4बाल काण्ड
आजु सुफल जग जनमु हमारा। देखि तात बिधुबदन तुम्हारा॥
जे दिन गए तुम्हहि बिनु देखें। ते बिरंचि जनि पारहिं लेखें॥4॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 1बाल काण्ड
नीदउँ बदन सोह सुठि लोना। मनहुँ साँझ सरसीरुह सोना॥
घर घर करहिं जागरन नारीं। देहिं परसपर मंगल गारीं॥1॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 2बाल काण्ड
पुरी बिराजति राजति रजनी। रानीं कहहिं बिलोकहु सजनी॥
सुंदर बधुन्ह सासु लै सोईं। फनिकन्ह जनु सिरमनि उर गोईं॥2॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 3बाल काण्ड
प्रात पुनीत काल प्रभु जागे। अरुनचूड़ बर बोलन लागे॥
बंदि मागधन्हि गुनगन गाए। पुरजन द्वार जोहारन आए॥3॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 4बाल काण्ड
बंदि बिप्र सुर गुर पितु माता। पाइ असीस मुदित सब भ्राता॥
जननिन्ह सादर बदन निहारे। भूपति संग द्वार पगु धारे॥4॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 2बाल काण्ड
पुनि बसिष्टु मुनि कौसिकु आए। सुभग आसनन्हि मुनि बैठाए॥
सुतन्ह समेत पूजि पद लागे। निरखि रामु दोउ गुर अनुरागे॥2॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 3बाल काण्ड
कहहिं बसिष्टु धरम इतिहासा। सुनहिं महीसु सहित रनिवासा॥
मुनि मन अगम गाधिसुत करनी। मुदित बसिष्ठ बिपुल बिधि बरनी॥3॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 4बाल काण्ड
बोले बामदेउ सब साँची। कीरति कलित लोक तिहुँ माची॥
सुनि आनंदु भयउ सब काहू। राम लखन उर अधिक उछाहू॥4॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 1बाल काण्ड
सुदिन सोधि कल कंकन छोरे। मंगल मोद बिनोद न थोरे॥
नित नव सुखु सुर देखि सिहाहीं। अवध जन्म जाचहिं बिधि पाहीं॥1॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 2बाल काण्ड
बिस्वामित्रु चलन नित चहहीं। राम सप्रेम बिनय बस रहहीं॥
दिन दिन सयगुन भूपति भाऊ। देखि सराह महामुनिराऊ॥2॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 3बाल काण्ड
मागत बिदा राउ अनुरागे। सुतन्ह समेत ठाढ़ भे आगे॥
नाथ सकल संपदा तुम्हारी। मैं सेवकु समेत सुत नारी॥3॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 4बाल काण्ड
करब सदा लरिकन्ह पर छोहू। दरसनु देत रहब मुनि मोहू॥
अस कहि राउ सहित सुत रानी। परेउ चरन मुख आव न बानी॥4॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 5बाल काण्ड
दीन्हि असीस बिप्र बहु भाँति। चले न प्रीति रीति कहि जाती॥
रामु सप्रेम संग सब भाई। आयसु पाइ फिरे पहुँचाई॥5॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 1बाल काण्ड
बामदेव रघुकुल गुर ग्यानी। बहुरि गाधिसुत कथा बखानी॥
सुनि मुनि सुजसु मनहिं मन राऊ। बरनत आपन पुन्य प्रभाऊ॥1॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 2बाल काण्ड
बहुरे लोग रजायसु भयऊ। सुतन्ह समेत नृपति गृहँ गयऊ॥
जहँ तहँ राम ब्याहु सबु गावा। सुजसु पुनीत लोक तिहुँ छावा॥2॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 3बाल काण्ड
आए ब्याहि रामु घर जब तें। बसइ अनंद अवध सब तब तें॥
प्रभु बिबाहँ जस भयउ उछाहू। सकहिं न बरनि गिरा अहिनाहू॥3॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
चौपाई 4बाल काण्ड
कबिकुल जीवनु पावन जानी। राम सीय जसु मंगल खानी॥
तेहि ते मैं कछु कहा बखानी। करन पुनीत हेतु निज बानी॥4॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें
छंद 361बाल काण्ड
निज गिरा पावनि करन कारन राम जसु तुलसीं कह्यो।
रघुबीर चरित अपार बारिधि पारु कबि कौनें लह्यो॥
उपबीत ब्याह उछाह मंगल सुनि जे सादर गावहीं।
बैदेहि राम प्रसाद ते जन सर्बदा सुखु पावहीं॥
पूरा अर्थ और व्याख्या पढ़ें