सब प्रसंगु गिरिपतिहि सुनावा । मदन दहन सुनि अति दुखु पावा ॥ बहुरि कहेउ रति कर बरदाना । सुनि हिमवंत बहुत सुखु माना ॥
श्रीरामचरितमानस — बाल काण्ड
कुल 1,913 पद/श्लोक
हृदयँ बिचारि संभु प्रभुताई । सादर मुनिबर लिए बोलाई ॥ सुदिनु सुनखतु सुघरी सोचाई । बेगि बेदबिधि लग्न धराई ॥
पत्री सप्तऋषिन्ह सोइ दीन्ही । गहि पद बिनय हिमाचल कीन्ही ॥ जाइ बिधिहि तिन्ह दीन्हि सो पाती । बाचत प्रीति न हृदयँ समाती ॥
लगन बाचि अज सबहि सुनाई । हरषे मुनि सब सुर समुदाई ॥ सुमन बृष्टि नभ बाजन बाजे । मंगल कलस दसहुँ दिसि साजे ॥
हियँ हरषे मुनि बचन सुनि देखि प्रीति बिस्वास । चले भवानीहि नाइ सिर गए हिमाचल पास ॥ ९० ॥
सिवहि संभु गन करहिं सिंगारा । जटा मुकुट अहि मौर सँवारा ॥ कुंडल कंकन पहिरे ब्याला । तन बिभूति पट केहरि छाला ॥
ससि ललाट सुंदर सिर गंगा । नयन तीनि उपवीत भुजंगा ॥ गरल कंठ उर नर सिर माला । असिव बेष सिवधाम कृपाला ॥
कर त्रिसूल अरु डमरु बिराजा । चले बसहँ चढ़ि बाजहिं बाजा ॥ देखि सिवहि सुरतिय मुसुकाहीं । बर लायक दुलहिन जग नाहीं ॥
बिष्णु बिरंचि आदि सुरब्राता । चढ़ि चढ़ि वाहन चले बराता ॥ सुर समाज सब भाँति अनूपा । नहिं बरात दूलह अनुरूपा ॥
लगे सँवारन सकल सुर वाहन बिबिध बिमान । होहिं सगुन मंगल सुभद करहिं अपछरा गान ॥ ९१ ॥
बर अनुहारि बरात न भाई । हँसी करैहहु पर पुर जाई ॥ बिष्णु बचन सुनि सुर मुसुकाने । निज निज सेन सहित बिलगाने ॥
मनहीं मन महेसु मुसुकाहीं । हरि के बिंग्य बचन नहिं जाहीं ॥ अति प्रिय बचन सुनत प्रिय केरे । भृंगिहि प्रेरि सकल गन टेरे ॥
सिव अनुसासन सुनि सब आए । प्रभु पद जलज सीस तिन्ह नाए ॥ नाना वाहन नाना बेषा । बिहसे सिव समाज निज देखा ॥
कोउ मुखहीन बिपुल मुख काहू । बिनु पद कर कोउ बहु पद बाहू ॥ बिपुल नयन कोउ नयन बिहीना । रिष्टपुष्ट कोउ अति तनखीना ॥
बिष्णु कहा अस बिहसि तब बोलि सकल दिसिराज । बिलग बिलग होइ चलहु सब निज निज सहित समाज ॥ ९२ ॥
तन खीन कोउ अति पीन पावन कोउ अपावन गति धरें । भूषन कराल कपाल कर सब सद्य सोनित तन भरें ॥ खर स्वान सुअर सृकाल मुख गन बेष अगनित को गनै । बहु जिनस प्रेत पिसाच जोगि जमात बरनत नहिं बनै ॥
नाचहिं गावहिं गीत परम तरंगी भूत सब । देखत अति बिपरीत बोलहिं बचन बिचित्र बिधि ॥ ९३ ॥
जस दूलहु तसि बनी बराता । कौतुक बिबिध होहिं मग जाता ॥ इहाँ हिमाचल रचेउ बिताना । अति बिचित्र नहिं जाइ बखाना ॥
सैल सकल जहाँ लगि जग माहीं । लघु बिसाल नहिं बरनि सिराहीं ॥ बन सागर सब नदीं तलावा । हिमगिरि सब कहुँ नेवत पठावा ॥
कामरूप सुंदर तन धारी । सहित समाज सहित बर नारी ॥ गए सकल तुहिनाचल गेहा । गावहिं मंगल सहित सनेहा ॥
प्रथमहिं गिरि बहु गृह सँवाए । जथाजोगु तहँ तहँ सब छाए ॥ पुर सोभा अवलोकि सुहाई । लागइ लघु बिरंचि निपुनाई ॥
लघु लाग बिधि की निपुनता अवलोकि पुर सोभा सही । बन बाग कूप तड़ाग सरिता सुभग सब सक को कही ॥ मंगल बिपुल तोरन पताका केतु गृह गृह सोहहीं । बनिता पुरुष सुंदर चतुर छबि देखि मुनि मन मोहहीं ॥
नगर निकट बरात सुनि आई । पुर खरभरु सोभा अधिकाई ॥ करि बनाव साजि वाहन नाना । चले लेन सादर अगवाना ॥
हियँ हरषे सुर सेन निहारी । हरिहि देखि अति भए सुखारी ॥ सिव समाज जब देखन लागे । बिडरि चले वाहन सब भागे ॥
धरि धीरजु तहँ रहे सयाने । बालक सब लै जीव पराने ॥ गए भवन पूछहिं पितु माता । कहहिं बचन भय कंपित गाता ॥
कहिअ काह कहि जाइ न बाता । जम कर धार किधौं बरिआता ॥ बर बौराह बसहँ असवारा । ब्याल कपाल बिभूषन छारा ॥
जगदंबा जहाँ अवतरीं सो पुर बरनि कि जाइ । रिद्धि सिद्धि संपत्ति सुख नित नूतन अधिकाइ ॥ ९४ ॥
तन छार ब्याल कपाल भूषन नगन जटिल भयंकरा । संग भूत प्रेत पिसाच जोगिनि बिकट मुख रजनीचरा ॥ जो जिअत रहिहि बरात देखत पुन्य बड़ तेहि कर सही । देखिहि सो उमा बिबाहु घर घर बात असि लरिकन्ह कही ॥
लै अगवान बरातहि आए । दिए सबहि जनवास सुहाए ॥ मैनाँ सुभ आरती सँवारी । संग सुमंगल गावहिं नारी ॥
केंचन थार सोह बर पानी । परिछन चली हरहि हरषानी ॥ बिकट बेष रुद्रहि जब देखा । अबलन्ह उर भय भयउ बिसेषा ॥
भागि भवन पैठीं अति त्रासा । गए महेसु जहाँ जनवासा ॥ मैना हृदयँ भयउ दुखु भारी । लीन्ही बोलि गिरीसकुमारी ॥
अधिक सनेहँ गोद बैठारी । स्याम सरोज नयन भरे बारी ॥ जेहिं बिधि तुम्हहि रूपु अस दीन्हा । तेहिं जड़ बर बाउर कस कीन्हा ॥
समुझि महेस समाज सब जननि जनक मुसुकाहिं । बाल बुझाए बिबिध बिधि निडर होहु डरु नाहिं ॥ ९५ ॥
कस कीन्ह बर बौराह बिधि जेहिं तुम्हहि सुंदरता दई । जो फलु चहिअ सुरतरुहिं सो बरबस बबूरहि लागई ॥ तुम्ह सहित गिरि तें गिरौं पावक जरौं जलनिधि महुँ परौं । घर जाउ अपजसु होउ जग जीवत बिबाहु न हौं करौं ॥
नारद कर मैं काह बिगारा । भवनु मोर जिन्ह बसत उजारा ॥ अस उपदेसु उमहि जिन्ह दीन्हा । बॉरे बरहि लागि तपु कीन्हा ॥
साँचें उन्ह कें मोह न माया । उदासीन धनु धामु न जाया ॥ पर घर घालक लाज न भीरा । बाँझ कि जान प्रसव कै पीरा ॥
जननिहि बिकल बिलोकि भवानी । बोलीं जुत बिबेक मृदु बानी ॥ अस बिचारि सोचहि मति माता । सो न टरउ जो रचउ बिधाता ॥
करम लिखा जौं बाउर नाहू । तौ कत दोसु लगाइअ काहू ॥ तुम्ह सन मिटहिं कि बिधि के अंका । मातु ब्यर्थ जनि लेहु कलंका ॥
भई बिकल अबला सकल दुखित देखि गिरिनारि । करि बिलापु रोदति बदति सुता सनेहु सँभारि ॥ ९६ ॥
जनि लेहु मातु कलंकु करना परिहरहु अवसर नाहीं । दुखु सुखु जो लिखा लिलार हमारे जाइ जहाँ पाउब तहीं ॥ सुनि उमा बचन बिनीत कोमल सकल अबला सोचहीं । बहु भाँति बिधिहि लगाइ दूषण नयन बारि बिमोचहीं ॥
तब नारद सबही समुझावा । पूरब कथाप्रसंगु सुनावा ॥ मयना सत्य सुनहु मम बानी । जगदंबा तव सुता भवानी ॥
अजा अनादि सक्ति अबिनासिनि । सदा संभु अरधंग निवासिनि ॥ जग संभव पालन लय कारिनि । निज इच्छा लीला बपु धारिनि ॥
जनमीं प्रथम दच्छ गृह जाई । नामु सती सुंदर तनु पाई ॥ तहँहु सती संकरहि बिबाहीं । कथा प्रसिद्ध सकल जग माहीं ॥
एक बार आवत सिव संगा । देखेउ रघुकुल कमल पतंगा ॥ भयउ मोह सिव कहा न कीन्हा । भ्रम बस बेषु सीय कर लीन्हा ॥
तेहि अवसर नारद सहित अरु ऋषि सस समेत । समाचार सुनि तुहिनगिरि गवने तुरत निकेत ॥ ९७ ॥
सिय बेषु सतीं जो कीन्ह तेहिं अपराध संकर परिहरहीं । हर बिरहँ जाइ बहोरि पितु कें जग्य जोगानल जरीं ॥ अब जनमि तुम्हरे भवन निज पति लागि दारुन तपु किया । अस जानि संसय तजहु गिरिजा सर्वदा संकरप्रिया ॥
तब मयना हिमवंतु अनंदे । पुनि पुनि पारबती पद बंदे ॥ नारि पुरुष सिसु जुबा सयाने । नगर लोग सब अति हरषाने ॥
लगे होन पुर मंगल गाना । सजे सबहिं हाटक घट नाना ॥ भाँति अनेक भई जेवनारा । सूपसास्त्र जस कछु ब्यवहारा ॥
सो जेवनार कि जाइ बखानी । बसहिं भवन जेहिं मातु भवानी ॥ सादर बोले सकल बराती । बिष्णु बिरंचि देव सब जाती ॥
बिबिध पाँति बैठी जेवनारा । लागे परुसन निपुन सुआरा ॥ नारिबृंद सुर जेवंत जानी । लगीं देन गारीं मृदु बानी ॥
सुनि नारद के बचन तब सब कर मिटा बिषाद । छन महुँ ब्यापेउ सकल पुर घर घर यह संवाद ॥ ९८ ॥
गारीं मधुर स्वर देहिं सुंदरि बिंग्य बचन सुनावहीं । भोजन करहिं सुर अति बिलंबु बिनोद सुनि सचु पावहीं ॥ जेवंत जो बढ़्यो अनंदु सो मुख कोटिहूँ न परे कहयो । अचवाँइ दीन्हे पान गवने बास जहाँ जाको रहयो ॥
बोलि सकल सुर सादर लीन्हे । सबहि जथोचित आसन दीन्हे ॥ बेदी बेद बिधान सँवारी । सुभग सुमंगल गावहिं नारी ॥
सिंघासनु अति दिब्य सुहावा । जाइ न बरनि बिरंचि बनावा ॥ बैठे सिव बिप्रन्ह सिरु नाई । हृदयँ सुमिरि निज प्रभु रघुराई ॥
बहुरि मुनीसन्ह उमा बोलाई । करि सिंगारु सखीँ लै आई ॥ देखत रूपु सकल सुर मोहे । बरनै छबि अस जग कबि को हे ॥
जगदंबिका जानि भव भामा । सुरन्ह मनहिं मन कीन्ह प्रनामा ॥ सुंदरता मरजाद भवानी । जाइ न कोटिहुँ बदन बखानी ॥
बहुरि मुनिन्ह हिमवंत कहुँ लगन सुनाइ आइ । समय बिलोकि बिबाह कर पठए देव बोलाइ ॥ ९९ ॥
कोटिहुँ बदन नहिं बने बरनत जग जननि सोभा महा । सकुचहिं कहत श्रुति सेष सारद मंदमति तुलसी कहा ॥ छबिखानि मातु भवानि गवनीं मध्य मंडप सिव जहाँ । अवलोकि सकहिं न सकुच पति पद कमल मनु मधुकर तहाँ ॥
जसि बिबाह कै बिधि श्रुति गाई । महामुनिन्ह सो सब करवाई ॥ गहि गिरीस कुस कन्या पानी । भवहि समरपीं जानि भवानी ॥
पानिग्रहन जब कीन्ह महेसा । हियँ हरषे तब सकल सुरेसा ॥ बेदमंत्र मुनिबर उच्चरहीं । जय जय जय संकर सुर करहीं ॥
बाजहिं बाजन बिबिध बिधाना । सुमनबृष्टि नभ भए बिधि नाना ॥ हर गिरिजा कर भयउ बिबाहू । सकल भुवन भरि रहा उछाहू ॥
दासीं दास तुरग रथ नागा । धेनु बसन मनि वस्त्र बिभागा ॥ अन्न कनकभाजन भरि जाना । दाइज दीन्ह न जाइ बखाना ॥
मुनि अनुसासन गनपतिहि पूजेउ संभु भवानी । कोउ सुनि संसय करे जनि सुर अनादि जियँ जानी ॥ १०० ॥
दाइज दियो बहु भाँति पुनि कर जोरि हिमभूधर कहयो । का देऊँ पूरनकाम संकर चरन पंकज गहि रहयो ॥ सिवें कृपासागर ससुर कर संतोषु सब भाँतिहिं कियो । पुनि गहे पद पाथोज मयना प्रेम परिपूरन हियो ॥
बहु बिधि संभु सासु समुझाई । गवनी भवन चरन सिरु नाई ॥ जननीं उमा बोलि तब लीन्हीं । लै उछंग सुंदर सिख दीन्हीं ॥
करेहु सदा संकर पद पूजा । नारिधर्मु पति देउ न दूजा ॥ बचन कहत भरे लोचन बारी । बहुरि लाइ उर लीन्ह कुमारी ॥
कत बिधि सृजीं नारि जग माहीं । पराधीन सपनेहुँ सुखु नाहीं ॥ भै अति प्रेम बिकल महतारी । धीरजु कीन्ह कुसमय बिचारी ॥
पुनि पुनि मिलति परति गहि चरना । परम प्रेमु कछु जाइ न बरना ॥ सब नारिन्ह मिलि भेंटि भवानी । जाइ जननि उर पुनि लपटानी ॥
नाथ उमा मम प्रान सम गृहकिंकरी करेंहु । छमहु सकल अपराध अब होइ प्रसन्न बर देहु ॥ १०१ ॥
जननिहि बहुरि मिलि चली उचित असीस सब काहूँ दई । फिरि फिरि बिलोकति मातु तन तब सखी ले सिव पहिं गई ॥ जाचक सकल संतोषि संकर उमा सहित भवन चले । सब अमर हरषे सुमन बरषि निसान नभ बाजे भले ॥
तुरत भवन आए गिरिराई । सकल सैल सर लिए बोलाई ॥ आदर दान बिनय बहुमाना । सब कर बिदा कीन्ह हिमवाना ॥
जबहीं संभु कैलासहिं आए । सुर सब निज निज लोक सिधाए ॥ जगत मातु पितु संभु भवानी । तेहि सिंगारु न कहउँ बखानी ॥
करहिं बिबिध बिधि भोग बिलासा । गनन्ह समेत बसहिं कैलासा ॥ हर गिरिजा बिहार नित नयऊ । एहि बिधि बिपुल काल चलि गयऊ ॥
तब जनमेउ षट्बदन कुमारा । तारकु असुर समर जेहिं मारा ॥ आगम निगम प्रसिद्ध पुराना । षन्मुख जन्मु सकल जग जाना ॥
चले संग हिमवंतु तब पहुँचावन अति हेतु । बिबिध भाँति परितोष करि बिदा कीन्ह बृषकेतु ॥ १०२ ॥
जगु जान षन्मुख जन्मु कर्मु प्रतापु पुरुषारथु महा । तेहि हेतु मैं बृषकेतु सुत कर चरित संछेपहिं कहा ॥ यह उमा संभु बिबाहु जे नर नारि कहहिं जे गावहीं । कल्यान काज बिबाह मंगल सर्वदा सुखु पावहीं ॥
संभु चरित सुनि सरस सुहावा । भरद्वाज मुनि अति सुखु पावा ॥ बहु लालसा कथा पर बाढ़ी । नयनन्हि नीर रोमावलि ठाढ़ी ॥
प्रेम बिबस मुख आव न बानी । दसा देखि हरषे मुनि ग्यानी ॥ अहो धन्य तव जन्मु मुनीसा । तुम्हहि प्रान सम प्रिय गौरीसा ॥
सिव पद कमल जिन्हहि रति नाहीं । रामहि ते सपनेहुँ न सोहाहीं ॥ बिनु छल बिस्वनाथ पद नेहू । राम भगत कर लच्छन एहू ॥
सिव सम को रघुपति ब्रतधारी । बिनु अघ तजी सती असि नारी ॥ पनु करि रघुपति भगति देखाई । को सिव सम रामहि प्रिय भाई ॥
चरित सिंधु गिरिजा रमन बेद न पावहिं पारु । बरनै तुलसीदासु किमि अति मतिमंद गवाँरु ॥ १०३ ॥
मैं जाना तुम्हार गुन सीला । कहउँ सुनहु अब रघुपति लीला ॥ सुनु मुनि आजु समागम तोरें । कहि न जाइ जस सुखु मन मोरें ॥
राम चरित अति अमित मुनीसा । कहि न सकहिं सत कोटि अहीसा ॥ तदपि यथाश्रुत कहउँ बखानी । सुमिरि गिरापति प्रभु धनुपानी ॥
सारद दारुनारि सम स्वामी । रामु सूत्रधर अंतरजामी ॥ जेहि पर कृपा करहिं जनु जानी । कबि उर अजिर नचावहिं बानी ॥
प्रनवउँ सोइ कृपाल रघुनाथा । बरनउँ बिसद तासु गुन गाथा ॥ परम रम्य गिरिबरु कैलासू । सदा जहाँ सिव उमा निवासू ॥
प्रथमहिं मैं कहि सिव चरित बूझा मरमु तुम्हार । सुचि सेवक तुम्ह राम के रहित समस्त बिकार ॥ १०४ ॥
हरि हर बिमुख धर्म रति नाहीं । ते नर तहाँ सपनेहुँ नहिं जाहीं ॥ तेहि गिरि पर बट बिटप बिसाला । नित नूतन सुंदर सब काला ॥
त्रिबिध समीर सुसीतल छाया । सिव बिश्राम बिटप श्रुति गाया ॥ एक बार तेहि तर प्रभु गयऊ । तरु बिलोकि उर अति सुखु भयऊ ॥
निज कर डासि नागरिपु छाला । बैठे सहजहिं संभु कृपाला ॥ कुंद इंदु दर गौर सरीरा । भुज प्रलंब परिधन मुनिचीरा ॥
तरुन अरुन अंबुज सम चरना । नख दुति भगत हृदय तम हरना ॥ भुजग भूति भूषन त्रिपुरारी । आननु सरद चंद छबि हारी ॥
सिद्ध तपोधन जोगिजन सुर किंनर मुनिबृंद । बसहिं तहाँ सुकृती सकल सेवहिं सिव सुखकंद ॥ १०५ ॥
बैठे सोह कामरिपु कैसेँ । धरें सरीर सांतरसु जैसेँ ॥ पारबती भल अवसर जानी । गई संभु पहिं मातु भवानी ॥
जानि प्रिया आदरु अति कीन्हा । बाम भाग आसनु हर दीन्हा ॥ बैठीं सिव समीप हरषाई । पूरब जन्म कथा चित आई ॥
पति हियँ हेतु अधिक अनुमानी । बिहसि उमा बोलीं प्रिय बानी ॥ कथा जो सकल लोक हितकारी । सोइ पूछन चह सैलकुमारी ॥
बिस्वनाथ मम नाथ पुरारी । त्रिभुवन महिमा बिदित तुम्हारी ॥ चर अरु अचर नाग नर देवा । सकल करहिं पद पंकज सेवा ॥
जटा मुकुट सुरसरित सिर लोचन नलिन बिसाल । नीलकंठ लावन्यनिधि सोह बालबिधु भाल ॥ १०६ ॥
जौं मो पर प्रसन्न सुखरासी । जानिअ सत्य मोहि निज दासी ॥ तौ प्रभु हरहु मोर अग्याना । कहि रघुनाथ कथा बिधि नाना ॥
जासु भवनु सुरतरु तर होई । सहि कि दरिद्र जनित दुखु सोई ॥ ससिभूषन अस हृदयँ बिचारी । हरहु नाथ मम मति भ्रम भारी ॥
प्रभु जे मुनि परमारथबादी । कहहिं राम कहुँ ब्रह्म अनादी ॥ सेस सारदा बेद पुराना । सकल करहिं रघुपति गुन गाना ॥
तुम्ह पुनि राम राम दिन राती । सादर जपहु अनंग आराती ॥ रामु सो अवध नृपति सुत सोई । की अज अगुन अलखगति कोई ॥
प्रभु समरथ सर्वज्ञ सिव सकल कला गुन धाम । जोग ग्यान बैराग्य निधि प्रनत कल्पतरु नाम ॥ १०७ ॥
जौं अनीह ब्यापक बिभु कोऊ । कहहु बुझाइ नाथ मोहि सोऊ ॥ अग्य जानि रिस उर जनि धरहू । जेहि बिधि मोह मिटे सोइ करहू ॥
मैं बन दीख राम प्रभुताई । अति भय बिकल न तुम्हहि सुनाई ॥ तदपि मलिन मन बोधु न आवा । सो फलु भली भाँति हम पावा ॥
अजहूँ कछु संसउ मन मोरें । करहु कृपा बिनवउँ कर जोरें ॥ प्रभु तब मोहि बहु भाँति प्रबोधा । नाथ सो समुझि करहु जनि क्रोधा ॥
तब कर अस बिमोह अब नाहीं । रामकथा पर रुचि मन माहीं ॥ कहहु पुनीत राम गुन गाथा । भुजगराज भूषन सुरनाथा ॥
जौं नृप तनय त ब्रह्म किमि नारि बिरहँ मति भोरि । देखि चरित महिमा सुनत भ्रमति बुद्धि अति मोरि ॥ १०८ ॥
जदपि जोषिता नहिं अधिकारी । दासी मन क्रम बचन तुम्हारी ॥ गूढउ तत्त्व न साधु दुरावहिं । आरत अधिकारी जहाँ पावहिं ॥
अति आरति पूछउँ सुरराया । रघुपति कथा कहहु करि दाया ॥ प्रथम सो कारण कहहु बिचारी । निर्गुन ब्रह्म सगुन बपु धारी ॥
पुनि प्रभु कहहु राम अवतारा । बालचरित पुनि कहहु उदारा ॥ कहहु जथा जानकी बिबाहीं । राज तजा सो दूषन काहीं ॥
बन बसि कीन्हे चरित अपारा । कहहु नाथ जिमि रावन मारा ॥ राज बैठि कीन्हीं बहु लीला । सकल कहहु संकर सुखसीला ॥
बंदउँ पद धरि धरनि सिरु बिनय करउँ कर जोरि । बरनहु रघुबर बिसद जसु श्रुति सिद्धांत निचोरि ॥ १०९ ॥
पुनि प्रभु कहहु सो तत्त्व बखानी । जेहिं बिग्यान मगन मुनि ग्यानी ॥ भगति ग्यान बिग्यान बिरागा । पुनि सब बरनहु सहित बिभागा ॥
औरउ राम रहस्य अनेका । कहहु नाथ अति बिमल बिबेका ॥ जो प्रभु मैं पूछा नहिं होई । सोउ दयाल राखहु जनि गोई ॥
तुम्ह त्रिभुवन गुर बेद बखाना । आन जीव पाँवर का जाना ॥ प्रस्न उमा कै सहज सुहाई । छल बिहीन सुनि सिव मन भाई ॥
हर हियँ रामचरित सब आए । प्रेम पुलक लोचन जल छाए ॥ श्रीरघुनाथ रूप उर आवा । परमानंद अमित सुख पावा ॥
बहुरि कहहु करुनायतन कीन्ह जो अचरज राम । प्रजा सहित रघुबंसमनि किमि गवने निज धाम ॥ ११० ॥
झूठेउ सत्य जाहि बिनु जानें । जिमि भुजंग बिनु रजु पहिचानें ॥ जेहि जानें जग जाइ हेराई । जागें जथा सपन भ्रम जाई ॥
बंदउँ बालरूप सोइ रामू । सब सिधि सुलभ जपत जिसु नामू ॥ मंगल भवन अमंगल हारी । द्रवउ सो दसरथ अजिर बिहारी ॥
करि प्रनाम रामहि त्रिपुरारी । हरषि सुधा सम गिरा उचारी ॥ धन्य धन्य गिरिराजकुमारी । तुम्ह समान नहिं कोउ उपकारी ॥
पूँछेहु रघुपति कथा प्रसंगा । सकल लोक जग पावनि गंगा ॥ तुम्ह रघुबीर चरन अनुरागी । कीन्हिहु प्रस्न जगत हित लागी ॥
मगन ध्यान रस दंड जुग पुनि मन बाहर कीन्ह । रघुपति चरित महेस तब हरषित बरनै लीन्ह ॥ १११ ॥
तदपि असंका कीन्हिहु सोई । कहत सुनत सब कर हित होई ॥ जिन्ह हरिकथा सुनी नहिं काना । श्रवन रंध्र अहिभवन समाना ॥
नयनन्हि संत दरस नहिं देखा । लोचन मोरपंख कर लेखा ॥ ते सिर कटु तुंबरी समतूला । जे न नमत हरि गुरु पद मूला ॥
जिन्ह हरिभगति हृदयँ नहिं आनी । जीवत सव समान तेई प्रानी ॥ जो नहिं करउ राम गुन गाना । जीह सो दादुर जीह समाना ॥
कुलिस कठोर निठुर सोई छाती । सुनि हरिचरित न जो हरषाती ॥ गिरिजा सुनहु राम कै लीला । सुर हित दनुज बिमोहनसीला ॥
राम कृपा तें पारबति सपनेहुँ तव मन माहिं । सोक मोह संदेह भ्रम मम बिचार कछु नाहिं ॥ ११२ ॥
रामकथा सुंदर कर तारी । संसय बिहग उडावनिहारी ॥ रामकथा कलि बिटप कुठारी । सादर सुनु गिरिराजकुमारी ॥
राम नाम गुन चरित सुहाए । जनम करम अगनित श्रुति गाए ॥ जथा अनंत राम भगवाना । तथा कथा कीरति गुन नाना ॥
तदपि जथा श्रुत जसि मति मोरी । कहिहउँ देखि प्रीति अति तोरी ॥ उमा प्रस्न तव सहज सुहाई । सुखद संतसंमत मोहि भाई ॥
एक बात नहिं मोहि सोहानी । जदपि मोह बस कहेहु भवानी ॥ तुम्ह जो कहा राम कोउ आना । जेहि श्रुति गाव धरहिं मुनि ध्याना ॥
रामकथा सुरधेनु सम सेवत सब सुख दानि । सतसमाज सुरलोक सब को न सुनै अस जानि ॥ ११३ ॥
अग्य अकोबिद अंध अभागी । काई विषय मुकुर मन लागी ॥ लंपट कपटी कुटिल बिसेषी । सपनेहुँ संतसभा नहिं देखी ॥
कहहिं ते बेद असंमत बानी । जिन्ह कें सूझ लाभु नहिं हानी ॥ मुकुर मलिन अरु नयन बिहीना । राम रूप देखहिं किमि दीना ॥
जिन्ह कें अगुन न सगुन बिबेका । जल्पहिं कल्पित बचन अनेका ॥ हरिमाया बस जगत भ्रमाहीं । तिन्हहि कहत कछु अघटित नाहीं ॥
बातुल भूत बिबस मतवारे । ते नहिं बोलहिं बचन बिचारे ॥ जिन्ह कृत महामोह मद पाना । तिन्ह कर कहा करिअ नहिं काना ॥
कहहिं सुनहिं अस अधम नर ग्रसे जे मोह पिसाच । पाषंडी हरि पद बिमुख जानहिं झूठ न साच ॥ ११४ ॥
अस निज हृदयँ बिचारि तजु संसय भजु राम पद । सुनु गिरिराज कुमारि भ्रम तम रबि कर बचन मम ॥ ११५ ॥
सगुनहि अगुनहि नहिं कछु भेदा । गावहिं मुनि पुरान बुध बेदा ॥ अगुन अरूप अलख अज जोई । भगत प्रेम बस सगुन सो होई ॥
जो गुन रहित सगुन सोई कैसेँ । जलु हिम उपल बिलग नहिं जैसेँ ॥ जासु नाम भ्रम तिमिर पतंगा । तेहि किमि कहिअ बिमोह प्रसंगा ॥
राम सच्चिदानंद दिनेसा । नहिं तहाँ मोह निसा लवलेसा ॥ सहज प्रकासरूप भगवाना । नहिं तहाँ पुनि बिग्यान बिहाना ॥
हरष बिषाद ग्यान अग्याना । जीव धर्म अहमिति अभिमाना ॥ राम ब्रह्म ब्यापक जग जाना । परमानंद परेस पुराना ॥
निज भ्रम नहिं समुझहिं अग्यानी । प्रभु पर मोह धरहिं जड़ प्रानी ॥ जथा गगन घन पटल निहारी । झाँपेउ भानु कहहिं कुबिचारी ॥
चितव जो लोचन अँगुलि लाएँ । प्रगट जुगल ससि तेहि के भाएँ ॥ उमा राम बिषयक अस मोहा । नभ तम धूम धूरि जिमि सोहा ॥
बिषय करन सुर जीव समेता । सकल एक तें एक सचेता ॥ सब कर परम प्रकासक जोई । राम अनादि अवधपति सोई ॥
जगत प्रकास्य प्रकासक रामू । मायाधीस ग्यान गुन धामू ॥ जासु सत्यता तें जड़ माया । भास सत्य इव मोह सहाया ॥
पुरुष प्रसिद्ध प्रकास निधि प्रगट परावर नाथ । रघुकुलमनि मम स्वामि सोइ कहि सिवँ नायउ माथ ॥ ११६ ॥
एहि बिधि जग हरि आश्रित रहई । जदपि असत्य देत दुख अहई ॥ जौं सपनें सिर काटे कोइ । बिनु जागें न दूरि दुख होइ ॥
जासु कृपाँ अस भ्रम मिटि जाई । गिरिजा सोइ कृपाल रघुराई ॥ आदि अंत कोउ जासु न पावा । मति अनुमानि निगम अस गावा ॥
बिनु पद चलइ सुनइ बिनु काना । कर बिनु करम करइ बिधि नाना ॥ आनन रहित सकल रस भोगी । बिनु बानी बकता बड़ जोगी ॥
तन बिनु परस नयन बिनु देखा । ग्रहइ घ्रान बिनु बास असेषा ॥ असि सब भाँति अलौकिक करनी । महिमा जासु जाइ नहिं बरनी ॥
रजत सीप महुँ भास जिमि जथा भानु कर बारि । जदपि मृषा तिहुँ काल सोउ भ्रम न सकइ कोउ टारि ॥ ११७ ॥
कासीं मरत जंतु अवलोकी । जासु नाम बल करउँ बिसोकी ॥ सोइ प्रभु मोर चराचर स्वामी । रघुबर सब उर अंतरजामी ॥
बिबसहुँ जासु नाम नर कहहीं । जनम अनेक रचित अघ दहहीं ॥ सादर सुमिरन जे नर करहीं । भव बारिधि गोपद इव तरहीं ॥
राम सो परमतमा भवानी । तहाँ भ्रम अति अबिहित तव बानी ॥ अस संसय आनत उर माहीं । ग्यान बिराग सकल गुन जाहीं ॥
सुनि सिव के भ्रम भंजन बचना । मिटि गै सब कुतरक कै रचना ॥ भई रघुपति पद प्रीति प्रतीती । दारुन असंभावना बीती ॥
जेहि इमि गावहिं बेद बुध जाहि धरहिं मुनि ध्यान । सोइ दसरथ सुत भगत हित कोसलपति भगवान ॥ ११८ ॥
ससि कर सम सुनि गिरा तुम्हारी । मिटा मोह सरदातप भारी ॥ तुम्ह कृपाल सबु संसउ हरेऊ । राम स्वरूप जानि मोहि परेऊ ॥
नाथ कृपाँ अब गयउ बिषादा । सुखी भयउँ प्रभु चरन प्रसादा ॥ अब मोहि आपनि किंकरि जानी । जदपि सहज जड़ नारि अयानी ॥
प्रथम जो मैं पूँछा सोइ कहहू । जौं मो पर प्रसन्न प्रभु अहहू ॥ राम ब्रह्म चिनमय अबिनासी । सर्व रहित सब उर पुर बासी ॥
नाथ धरेउ नरतनु केहि हेतु । मोहि समुझाइ कहहु बृषकेतू ॥ उमा बचन सुनि परम बिनीता । रामकथा पर प्रीति पुनीता ॥
पुनि पुनि प्रभु पद कमल गहि जोरि पंकरुह पानि । बोलीं गिरिजा बचन बर मनहुँ प्रेम रस सानि ॥ ११९ ॥
सुनु सुभ कथा भवानी रामचरितमानस बिमल । कहा भुसुंडि बखानि सुना बिहगनायक गरुड ॥ १२० (ख) ॥
सुनु गिरिजा हरिचरित सुहाए । बिपुल बिसद निगमागम गाए ॥ हरि अवतार हेतु जेहि होई । इदमित्थं कहि जाइ न सोई ॥
राम अतर्क्य बुद्धि मन बानी । मत हमार अस सुनहि सयानी ॥ तदपि संत मुनि बेद पुराना । जस कछु कहहिं स्वमति अनुमाना ॥
तस मैं सुमुखि सुनावउँ तोही । समुझि परइ जस कारन मोही ॥ जब जब होइ धरम कै हानी । बाढ़हिं असुर अधम अभिमानी ॥
करहिं अनीति जाइ नहिं बरनी । सीदहिं बिप्र धेनु सुर धरनी ॥ तब तब प्रभु धरि बिबिध सरीरा । हरहिं कृपानिधि सज्जन पीरा ॥
हियँ हरषे कामारि तब संकर सहज सुजान । बहु बिधि उमहि प्रसंसि पुनि बोले कृपानिधान ॥ १२० (क) ॥
सो संबाद उदार जेहि बिधि भा आगें कहब । सुनहु राम अवतार चरित परम सुंदर अनघ ॥ १२० (ग) ॥
हरि गुन नाम अपार कथा रूप अगनित अमित । मैं निज मति अनुसार कहउँ उमा सादर सुनहु ॥ १२० (घ) ॥
सोइ जस गाइ भगत भव तरहिं । कृपासिंधु जन हित तनु धरहीं ॥ राम जनम के हेतु अनेका । परम बिचित्र एक तें एका ॥
जनम एक दुइ कहउँ बखानी । सावधान सुनु सुमति भवानी ॥ द्वारपाल हरि के प्रिय दोऊ । जय अरु विजय जान सब कोऊ ॥
बिप्र श्राप तें दूनउ भाई । तामस असुर देह तिन्ह पाई ॥ कनककसिपु अरु हाटकलोचन । जगत बिदित सुरपति मद मोचन ॥
बिजइ समर बीर बिख्याता । धरि बराह बपु एक निपाता ॥ होइ नरहरि दूसर पुनि मारा । जन प्रह्लाद सुजस बिस्तारा ॥
असुर मारि थापहिं सुरन्ह राखहिं निज श्रुति सेतु । जग बिस्तारहिं बिसद जस राम जन्म कर हेतु ॥ १२१ ॥
मुकुत न भए हते भगवाना । तीनि जनम द्विज बचन प्रवाना ॥ एक बार तिन्ह के हित लागी । धरेउ सरीर भगत अनुरागी ॥
कस्यप अदिति तहाँ पितु माता । दसरथ कौसल्या बिख्याता ॥ एक कलप एहि बिधि अवतारा । चरित पवित्र किए संसारा ॥
एक कलप सुर देखि दुखारे । समर जलंधर सन सब हारे ॥ संभु कीन्ह संग्राम अपारा । दनुज महाबल मरइ न मारा ॥
परम सती असुराधिप नारी । तेहिं बल ताहि न जितहिं पुरारी ॥
भए निसाचर जाइ तेइ महाबीर बलवान । कुंभकरन रावन सुभट सुर बिजई जग जान ॥ १२२ ॥
तासु श्राप हरि दीन्ह प्रमाना । कौतुकनिधि कृपाल भगवाना ॥ तहाँ जलंधर रावन भयउ । रन हति राम परम पद दयउ ॥
एक जनम कर कारन एहा । जेहि लगि राम धरी नरदेहा ॥ प्रति अवतार कथा प्रभु केरी । सुनु मुनि बरनी कबिन्ह घनेरी ॥
नारद श्राप दीन्ह एक बारा । कलप एक तेहि लगि अवतारा ॥ गिरिजा चकित भई सुनि बानी । नारद बिष्णुभगत पुनि ग्यानी ॥
कारन कवन श्राप मुनि दीन्हा । का अपराध रमापति कीन्हा ॥ यह प्रसंग मोहि कहहु पुरारी । मुनि मन मोह आचरज भारी ॥
छल करि टारेउ तासु ब्रत प्रभु सुर कारज कीन्ह । जब तेहिं जानेउ मरम तब श्राप कोप करि दीन्ह ॥ १२३ ॥
कहउँ राम गुन गाथ भरद्वाज सादर सुनहु । भव भंजन रघुनाथ भजु तुलसी तजि मान मद ॥ १२४ (ख) ॥
हिमगिरि गुहा एक अति पावनि । बह समीप सुरसरि सुहावनि ॥ आश्रम परम पुनीत सुहावा । देखि देवरिषि मन अति भावा ॥
निरखि सैल सरि बिपिन बिभागा । भयउ रमापति पद अनुरागा ॥ सुमिरत हरिहि श्राप गति बाधी । सहज बिमल मन लागि समाधी ॥
मुनि गति देखि सुरेस डेराना । कामहि बोलि कीन्ह सनमाना ॥ सहित सहाय जाहु मम हेतु । चलेउ हरषि हियँ जलचरकेतू ॥
सुनासीर मन महुँ असि त्रासा । चहत देवरिषि मम पुर बासा ॥ जे कामी लोलुप जग माहीं । कुटिल काक इव सबहि डेराहीं ॥
बोले बिहसि महेस तब ग्यानी मूढ़ न कोइ । जेहि जस रघुपति करहिं जब सो तस तेहि छन होइ ॥ १२४ (क) ॥
तेहि आश्रमहिं मदन जब गयऊ । निज मायाँ बसंत निरमयऊ ॥ कुसुमित बिबिध बिटप बहुरंगा । कूजहि कोकिल गुंजहिं भृंगा ॥
चली सुहावनि त्रिबिध बयारी । काम कृसानु बढ़ावनिहारी ॥ रंभादिक सुरनारि नबीना । सकल असमसर कला प्रबीना ॥
करहिं गान बहु तान तरंगा । बहुबिधि क्रीडहिं पानि पतंगा ॥ देखि सहाय मदन हरषाना । कीन्हेसि पुनि प्रपंच बिधि नाना ॥
काम कला कछु मुनिहि न ब्यापी । निज भयँ डेरउ मनोभव पापी ॥ सीम कि चाँपि सकइ कोउ तासू । बड़ रखवार रमापति जासू ॥
सूख हाड लै भाग सठ स्वान निरखि मृगराज । छीनि लेइ जनि जान जड़ तिमि सुरपतिहि न लाज ॥ १२५ ॥
भयउ न नारद मन कछु रोषा । कहि प्रिय बचन काम परितोषा ॥ नाइ चरन सिरु आयसु पाई । गयउ मदन तब सहित सहाई ॥
मुनि सुसीलता आपनि करनी । सुरपति सभाँ जाइ सब बरनी ॥ सुनि सब कें मन अचरजु आवा । मुनिहि प्रसंसि हरिहि सिर नावा ॥
तब नारद गवने सिव पाहीं । जिताकाम अहमिति मन माहीं ॥ मार चरित संकरहि सुनाए । अतिप्रिय जानि महेस सिखाए ॥
बार बार बिनवउँ मुनि तोही । जिमि यह कथा सुनायहु मोही ॥ तिमि जनि हरिहि सुनावहु कबहूँ । चलें प्रसंग दुराएहु तबहूँ ॥
सहित सहाय सभीत अति मानि हारि मन मैन । गहेसि जाइ मुनि चरन तब कहि सुठि आरत बैन ॥ १२६ ॥
राम कीन्ह चाहहिं सोइ होई । करै अन्यथा अस नहिं कोई ॥ संभु बचन मुनि मन नहिं भाए । तब बिरंचि के लोक सिधाए ॥
एक बार करतल बर बीना । गावत हरि गुन गान प्रबीना ॥ छीरसिंधु गवने मुनिनाथा । जहँ बस श्रीनिवास श्रुतिमाथा ॥
हरषि मिले उठि रमानिकेता । बैठे आसन रिषिहि समेता ॥ बोले बिहसि चराचर राया । बहुते दिनन कीन्हि मुनि दाया ॥
काम चरित नारद सब भाषे । जद्यपि प्रथम बरजि सिवँ राखे ॥ अति प्रचंड रघुपति कै माया । जेहि न मोह अस को जग जाया ॥
संभु दीन्ह उपदेस हित नहिं नारदहि सोहाना । भरद्वाज कौतुक सुनहु हरि इच्छा बलवाना ॥ १२७ ॥
सुनु मुनि मोह होइ मन ताकें । ग्यान बिराग हृदय नहिं जाकें ॥ ब्रह्मचरज ब्रत रत मतिधीरा । तुम्हहि कि करइ मनोभव पीरा ॥
नारद कहेउ सहित अभिमाना । कृपा तुम्हारि सकल भगवाना ॥ करुनानिधि मन दीख बिचारी । उर अंकुरेउ गरब तरु भारी ॥
बेगि सो मैं डारिहउँ उखारी । पन हमारे सेवक हितकारी ॥ मुनि कर हित मम कौतुक होई । अवसि उपाय करबि मैं सोई ॥
तब नारद हरि पद सिर नाई । चले हृदयँ अहमिति अधिकाई ॥ श्रीपति निज माया तब प्रेरी । सुनहु कठिन करनी तेहि केरी ॥
रूख बदन करि बचन मृदु बोले श्रीभगवान । तुम्हरे सुमिरन तें मिटहिं मोह मार मद मान ॥ १२८ ॥
बसहिं नगर सुंदर नर नारी । जनु बहु मनसिज रति तनुधारी ॥ तेहिं पुर बसइ सीलनिधि राजा । अगनित हय गय सेन समाजा ॥
सत सुरेस सम बिभव बिलासा । रूप तेज बल नीति निवासा ॥ बिस्वमोहिनी तासु कुमारी । श्री बिमोहु जिसु रूपु निहारी ॥
सोइ हरिमाया सब गुन खानी । सोभा तासु कि जाइ बखानी ॥ करइ स्वयंबर सो नृपबाला । आए तहँ अगनित महिपाला ॥
मुनि कौतुकी नगर तेहिं गयऊ । पुरबासिन्ह सब पूछत भयऊ ॥ सुनि सब चरित भूपगृहँ आए । करि पूजा नृप मुनि बैठाए ॥
बिरचेउ मग महुँ नगर तेहिं सत जोजन बिस्तार । श्रीनिवासपुर तें अधिक रचना बिबिध प्रकार ॥ १२९ ॥
देखि रूप मुनि बिरति बिसारी । बड़ी बार लगि रहे निहारी ॥ लच्छन तासु बिलोकि भुलाने । हृदयँ हरष नहिं प्रगट बखाने ॥
जो एहि बरइ अमर सोई होई । समरभूमि तेहि जीत न कोई ॥ सेवहिं सकल चराचर ताही । बरइ सीलनिधि कन्या जाही ॥
लच्छन सब बिचारि उर राखे । कछुक बनाए भूप सन भाषे ॥ सुता सुलच्छन कहि नृप पाहीं । नारद चले सोच मन माहीं ॥
करौं जाइ सोइ जतन बिचारी । जेहि प्रकार मोहि बरै कुमारी ॥ जप तप कछु न होइ तेहि काला । हे बिधि मिलइ कवन बिधि बाला ॥
आनि देखाई नारदहि भूपति राजकुमारि । कहहु नाथ गुन दोष सब एहि के हृदयँ बिचारि ॥ १३० ॥
हरि सन मागौं सुंदरताई । होइहि जात गहरु अति भाई ॥ मोरे हित हरि सम नहिं कोऊ । एहि अवसर सहाय सोइ होऊ ॥
बहुबिधि बिनय कीन्हि तेहि काला । प्रगटेउ प्रभु कौतुकी कृपाला ॥ प्रभु बिलोकि मुनि नयन जुड़ाने । होइहि काजु हिएँ हरषाने ॥
अति आरति कहि कथा सुनाई । करहु कृपा करि होहु सहाई ॥ आपन रूप देहु प्रभु मोही । आन भाँति नहिं पावौं ओही ॥
जेहि बिधि नाथ होइ हित मोरा । करहु सो बेगि दास मैं तोरा ॥ निज माया बल देखि बिसाला । हियँ हँसि बोले दीनदयाला ॥
एहि अवसर चाहिए परम सोभा रूप बिसाल । जो बिलोकि रीझै कुअँरि तब मेले जयमाल ॥ १३१ ॥
कुपथ माग रुज ब्याकुल रोगी । बैद न देइ सुनहु मुनि जोगी ॥ एहि बिधि हित तुम्हार मैं ठयऊ । कहि अस अंतरहित प्रभु भयऊ ॥
माया बिबस भए मुनि मूढ़ा । समुझी नहिं हरि गिरा निगूढ़ा ॥ गवने तुरत तहँ ऋषिराई । जहाँ स्वयंबर भूमि बनाई ॥
निज निज आसन बैठे राजा । बहु बनाव करि सहित समाजा ॥ मुनि मन हरषि रूप अति मोरें । मोहि तजि आनहि बरिहि न भोरें ॥
मुनि हित कारन कृपानिधाना । दीन्ह कुरूप न जाइ बखाना ॥ सो चरित्र लखि काहूँ न पावा । नारद जानि सबहिं सिर नावा ॥
जेहि बिधि होइहि परम हित नारद सुनहु तुम्हार । सोइ हम करब न आन कछु बचन न मृषा हमार ॥ १३२ ॥
जेहिं समाज बैठे मुनि जाई । हृदयँ रूप अहमिति अधिकाई ॥ तहँ बैठे महेस गन दोऊ । बिप्रबेष गति लखइ न कोऊ ॥
करहिं कूटि नारदहि सुनाई । नीकि दीन्ह हरि सुंदरताई ॥ रीझिहि राजकुँअरि छबि देखी । इन्हहि बरिहि हरि जानि बिसेषी ॥
मुनिहि मोह मन हाथ पराएँ । हँसहिं संभु गन अति सचु पाएँ ॥ जदपि सुनहिं मुनि अटपटि बानी । समुझि न परइ बुद्धि भ्रम सानी ॥
काहूँ न लखा सो चरित बिषेषा । सो सरूप नृपकन्याँ देखा ॥ मर्कट बदन भयंकर देही । देखत हृदयँ क्रोध भा तेही ॥
रहे तहाँ दुइ रुद्र गन ते जानहिं सब भेउ । बिप्रबेष देखत फिरहिं परम कौतुकी तेउ ॥ १३३ ॥
जेहि दिसि बैठे नारद फूली । सो दिसि तेहि न बिलोकि भूली ॥ पुनि पुनि मुनि उकसहिं अकुलाहीं । देखि दसा हर गन मुसुकाहीं ॥
धरि नृपतनु तहँ गयउ कृपाला । कुअँरि हरषि मेलेउ जयमाला ॥ दुलहिनि लै गे लच्छिनिवासा । नृपसमाज सब भयउ निरासा ॥
मुनि अति बिकल मोहि मति नाठी । मनि गिरि गई छूटि जनु गाँठी ॥ तब हर गन बोले मुसुकाई । निज मुख मुकुर बिलोकहु जाई ॥
अस कहि दौड़ भागे भयँ भारी । बदन दीख मुनि बारि निहारी ॥ बेषु बिलोकि क्रोध अति बाढ़ा । तिन्हहि सराप दीन्ह अति गाढ़ा ॥
सखीँ संग लै कुअँरि तब चलि जनु राजमराल । देखत फिरइ महीप सब कर सरोज जयमाल ॥ १३४ ॥
पुनि जल दीख रूप निज पावा । तदपि हृदयँ संतोष न आवा ॥ फरकत अधर कोप मन माहीं । सपदि चले कमलापति पाहीं ॥
देहउँ श्राप कि मरिहउँ जाई । जगत मोरि उपहास कराई ॥ बीचहिं पंथ मिले दनुजारी । संग रमा साँइ राजकुमारी ॥
बोले मधुर बचन सुरसाईं । मुनि कहँ चले बिकल की नाईं ॥ सुनत बचन उपजा अति क्रोधा । माया बस न रहा मन बोधा ॥
पर संपदा सकहु नहिं देखी । तुम्हरें ईरिषा कपट बिसेषी ॥ मथत सिंधु रुद्रहि बौरायहु । सुरन्ह प्रेरि बिष पान करायहु ॥
होउ निसाचर जाइ तुम्ह कपटी पापी दोउ । हँसेहु हमहि सो लेहु फल बहुरि हँसेहु मुनि कोउ ॥ १३५ ॥
परम स्वतंत्र न सिर पर कोई । भावइ मनहि करहु तुम्ह सोई ॥ भलेहि मंद मंदेहि भल करहु । बिसमय हरष न हियँ कछु धरहु ॥
डहकि डहकि परिचेहु सब काहू । अति असंक मन सदा उछाहू ॥ करम सुभासुभ तुम्हहि न बाधा । अब लगि तुम्हहि न काहूँ साधा ॥
भले भवन अब बायन दीन्हा । पावहुगे फल आपन कीन्हा ॥ बंचेहु मोहि जवनि धरि देहा । सोइ तनु धरहु श्राप मम एहा ॥
कपि आकृति तुम्ह कीन्हि हमारी । करिहहिं कीस सहाय तुम्हारी ॥ मम अपकार कीन्ह तुम्ह भारी । नारि बिरहँ तुम्ह होब दुखारी ॥
असुर सुरा बिष संकरहि आपु रमा मनि चारु । स्वारथ साधक कुटिल तुम्ह सदा कपट ब्यवहारु ॥ १३६ ॥
जब हरि माया दूरि निवारी । नहिं तहँ रमा न राजकुमारी ॥ तब मुनि अति सभीत हरि चरना । गहे पाहि प्रनतारति हरना ॥
मृषा होउ मम श्राप कृपाला । मम इच्छा कह दीनदयाला ॥ मैं दुर्बचन कहे बहुतेरे । कह मुनि पाप मिटिहिं किमि मेरे ॥
जपहु जाइ संकर सत नामा । होइहि हृदयँ तुरत बिश्रामा ॥ कोउ नहिं सिव समान प्रिय मोरें । असि प्रीति तजहु जनि भोरें ॥
जेहि पर कृपा न करहिं पुरारी । सो न पाव मुनि भगति हमारी ॥ अस उर धरि महि बिचरहु जाई । अब न तुम्हहि माया नियराई ॥
श्राप सीस धरि हरषि हियँ प्रभु बहु बिनती कीन्हि । निज माया कै प्रबलता करि कृपानिधि लीन्हि ॥ १३७ ॥
हर गन मुनिहि जात पथ देखी । बिगत मोह मन हरष बिषेषी ॥ अति सभीत नारद पहिं आए । गहि पद आरत बचन सुनाए ॥
हर गन हम न बिप्र मुनिराया । बड़ अपराध कीन्ह फल पाया ॥ श्राप अनुग्रह करहु कृपाला । बोले नारद दीनदयाला ॥
निसिचर जाइ होहु तुम्ह दोऊ । बैभव बिपुल तेज बल होऊ ॥ भुज बल बिस्व जितब तुम्ह जहिआ । धरिहहिं बिष्णु मनुज तनु तहिआ ॥
समर मरन हरि हाथ तुम्हारा । होइहहु मुकुत न पुनि संसारा ॥ चले जुगल मुनि पद सिर नाई । भए निसाचर कालहि पाई ॥
बहुबिधि मुनिहि प्रबोधि प्रभु तब भए अंतरधान । सत्यलोक नारद चले करत राम गुन गान ॥ १३८ ॥
एहि बिधि जनम करम हरि केरे । सुंदर सुखद बिचित्र घनेरे ॥ कल्प कल्प प्रति प्रभु अवतरहीं । चारु चरित नानाबिधि करहीं ॥
तब तब कथा मुनीसन्ह गाई । परम पुनीत प्रबंध बनाई ॥ बिबिध प्रसंग अनूप बखाने । करहिं न सुनि आचरजु सयाने ॥
हरि अनंत हरिकथा अनंता । कहहिं सुनहिं बहुबिधि सब संता ॥ रामचंद्र के चरित सुहाए । कल्प कोटि लगि जाहिं न गाए ॥
यह प्रसंग मैं कहा भवानी । हरिमायाँ मोहहिं मुनि ग्यानी ॥ प्रभु कौतुकी प्रनत हितकारी । सेवत सुलभ सकल दुखहारी ॥
एक कल्प एहि हेतु प्रभु लीन्ह मनुज अवतार । सुर रंजन सज्जन सुखद हरि भंजन भुवि भार ॥ १३९ ॥
सुर नर मुनि कोउ नाहिं जेहि न मोह माया प्रबल । अस बिचारि मन माहिं भजिअ महामाया पतिहि ॥ १४० ॥
अपर हेतु सुनु सैलकुमारी । कहउँ बिचित्र कथा बिस्तारी ॥ जेहि कारन अज अगुन अरूपा । ब्रह्म भयउ कोसलपुर भूपा ॥
जो प्रभु बिपिन फिरत तुम्ह देखा । बंधु समेत धरें मुनिबेषा ॥ जासु चरित अवलोकि भवानी । सती सरीर रहिहु बौरानी ॥
अजहूँ न छाया मिटति तुम्हारी । तासु चरित सुनु भ्रम रुज हारी ॥ लीला कीन्हि जो तेहिं अवतारा । सो सब कहहुँ मति अनुसारा ॥
भरदाज सुनि संकर बानी । सकुचि सप्रेम उमा मुसुकानी ॥ लगे बहुरि बरने बृषकेतू । सो अवतार भयउ जेहि हेतु ॥
स्वायंभू मनु अरु सतरूपा । जिन्ह तें भै नरसृष्टि अनूपा ॥ दंपति धरम आचरन नीका । अजहूँ गाव श्रुति जिन्ह कै लीका ॥
नृप उतानपाद सुत तासू । ध्रुव हरिभगत भयउ सुत जासू ॥ लघु सुत नाम प्रियव्रत ताही । बेद पुरान प्रसंसहिं जाही ॥
देवहूति पुनि तासु कुमारी । जो मुनि कर्दम कै प्रिय नारी ॥ आदिदेव प्रभु दीनदयाला । जठर धरें जेहिं कपिल कृपाला ॥
सांख्य सास्त्र जिन्ह प्रगट बखाना । तत्त्व बिचार निपुन भगवाना ॥ तेहिं मनु राज कीन्ह बहु काला । प्रभु आयसु सब बिधि प्रतिपाला ॥
सो मैं तुम्ह सन कहउँ सव सुभ सुनु मुनीस मन लाइ । राम कथा कलि मल हरनि मंगल करनि सुहाइ ॥ १४१ ॥
होइ न बिषय बिराग भवन बसत भा चौथपन । हृदयँ बहुत दुख लाग जनम गयउ हरिभगति बिनु ॥ १४२ ॥
बरबस राज सुतहि तब दीन्हा । नारि समेत गवन बन कीन्हा ॥ तीरथ बर नैमिष बिख्याता । अति पुनीत साधक सिधि दाता ॥
बसहिं तहँ मुनि सिद्ध समाजा । तहँ हियँ हरषि चलेउ मनु राजा ॥ पंथ जात सोहहिं मतिधीरा । ग्यान भगति जनु घेरें सरीरा ॥
पहुँचे जाइ धेनुमति तीरा । हरषि नहाने निर्मल नीरा ॥ आए मिलन सिद्ध मुनि ग्यानी । धरम धुरंधर नृपरिषि जानी ॥
जहँ जहाँ तीरथ रहे सुहाए । मुनिन्ह सकल सादर करवाए ॥ कृस सरीर मुनिपट परिधाना । सत समाज नित सुनहिं पुराना ॥
करहिं अहार साक फल कंदा । सुमिरहिं ब्रह्म सच्चिदानंदा ॥ पुनि हरि हेतु करन तप लागे । बारि अधार मूल फल त्यागे ॥
उर अभिलाष निरंतर होई । देखिअ नयन परम प्रभु सोई ॥ अगुन अखंड अनंत अनादी । जेहि चिंतहिं परमारथबादी ॥
नेति नेति जेहि बेद निरूपा । निजानंद निरुपाधि अनूपा ॥ संभु बिरंचि बिष्नु भगवाना । उपजहिं जासु अंस तें नाना ॥
ऐसेउ प्रभु सेवक बस अहई । भगत हेतु लीलातनु गहई ॥ जौं यह बचन सत्य श्रुति भाषा । तो हमार पूजिहि अभिलाषा ॥
द्वादस अक्षर मंत्र पुनि जपहिं सहित अनुराग । बासुदेव पद पंकरुह दंपति मन अति लाग ॥ १४३ ॥
बरष सहस दस त्यागेउ सोऊ । ठाढ़े रहे एक पद दोऊ ॥ बिधि हरि हर तप देखि अपारा । मनु समीप आए बहु बारा ॥
मागउ बर बहु भाँति लुभाए । परम धीर नहिं चलहिं चलाए ॥ अस्थिमात्र होइ रहे सरीरा । तदपि मनाग मनहिं नहिं पीरा ॥
प्रभु सर्वज्ञ दास निज जानी । गति अनन्य तापस नृप रानी ॥ मागु मागु बर भै नभ बानी । परम गभीर कृपामृत सानी ॥
मृतक जिआवनि गिरा सुहाई । श्रवन रंध्र होइ उर जब आई ॥ हृष्ट पुष्ट तन भए सुहाए । मानहुँ अबहिं भवन ते आए ॥
एहि बिधि बीते बरष षट सहस बारि आहार । संवत सत्त सहस पुनि रहे समीर अधार ॥ १४४ ॥
सुनु सेवक सुरतरु सुरधेनू । बिधि हरि हर बंदित पद रेनू ॥ सेवत सुलभ सकल सुखदायक । प्रनतपाल सचराचर नायक ॥
जौं अनाथ हित हम पर नेहू । तौ प्रसन्न होइ यह बर देहू ॥ जो सरूप बस सिव मन माहीं । जेहि कारन मुनि जतन कराहीं ॥
जो भुसुंडि मन मानस हंसा । सगुन अगुन जेहि निगम प्रसंसा ॥ देखहिं हम सो रूप भरि लोचन । कृपा करहु प्रनतारति मोचन ॥
दंपति बचन परम प्रिय लागे । मृदुल बिनीत प्रेम रस पागे ॥ भगत बच्छल प्रभु कृपानिधाना । बिस्वबास प्रगटे भगवाना ॥
श्रवन सुधा सम बचन सुनि पुलक प्रफुल्लित गात । बोले मनु करि दंडवत प्रेम न हृदयँ समात ॥ १४५ ॥
सरद मयंक बदन छबि सींवा । चारु कपोल चिक्कुर दर ग्रीवा ॥ अधर अरुन रद सुंदर नासा । बिधु कर निकर बिनिंदक हासा ॥
नव अंबुज अंबक छबि नीकी । चितवनि ललित भावती जी की ॥ भूकुटि मनोज चाप छबि हारी । तिलक ललाट पटल दुतिकारी ॥
कुंडल मकर मुकुट सिर भ्राजा । कुटिल केस जनु मधुप समाजा ॥ उर श्रीवत्स रुचिर बनमाला । पदिक हार भूषन मणिजाला ॥
केहरि कंधर चारु जनेऊ । बाहु बिभूषन सुंदर तेऊ ॥ करि कर सरिस सुभग भुजदंडा । कटि निषंग कर सर कोदंडा ॥
नील सरोरुह नील मनि नील नीरधर स्याम । लाजहिं तन सोभा निरखि कोटि कोटि सत काम ॥ १४६ ॥
पद राजीव बरनि नहिं जाहिं । मुनि मन मधुप बसहिं जेन्ह माहीं ॥ बाम भाग सोभति अनुकूला । आदिसक्ति छबिनिधि जगमूला ॥
जासु अंस उपजहि गुनखानी । अगनित लच्छि उमा ब्रह्मानी ॥ भूकुटि बिलास जासु जग होई । राम बाम दिसि सीता सोई ॥
छबिसमुद्र हरि रूप बिलोकी । एकटक रहे नयन पट रोकी ॥ चितवहिं सादर रूप अनूपा । तृप्ति न मानहिं मनु सतरूपा ॥
हरष बिबस तन दसा भुलानी । परे दंड इव गहि पद पानी ॥ सिर परसे प्रभु निज कर कंजा । तुरत उठाए करुनापुंजा ॥
तड़ित बिनिंदक पीत पट उदर रेख बर तीनि । नाभि मनोरहर लेति जनु जमुन भँवर छवि छीनि ॥ १४७ ॥
एक लालसा बड़ि उर माहीं । सुगम अगम कहि जाति सो नाहीं ॥ तुम्हहि देत अति सुगम गोसाई । अगम लाग मोहि निज कृपनाई ॥
जथा दरिद्र बिबुधतरु पाई । बहु संपत्ति मागत सकुचाई ॥ तासु प्रभाउ जान नहि सोई । तथा हृदयँ मम संसय होई ॥
सो तुम्ह जानहु अंतरजामी । पुरवहु मोर मनोरथ स्वामी ॥ सकुच बिहाइ मागु नृप मोही । मोरें नहिं अदेय कछु तोही ॥
बोले कृपानिधान पुनि अति प्रसन्न मोहि जानि । मागहु बर जोरि भाव मन महादानि अनुमानि ॥ १४८ ॥
देखि प्रीति सुनि बचन अमोले । एवमस्तु करुनानिधि बोले ॥ आपु सरिस खोजौं कहँ जाई । नृप तब तनय होब मैं आई ॥
सतरूपहि बिलोकि कर जोरें । देबि मागु बर जो रुचि तोरें ॥ जो बर नाथ चतुर नृप मागा । सोइ कृपाल मोहि अति प्रिय लागा ॥
प्रभु परंतु सुठि होति ढिठाई । जदपि भगत हित तुम्हहि सोहाई ॥ तुम्ह ब्रह्मादि जनक जग स्वामी । ब्रह्म सकल उर अंतरजामी ॥
अस समुझत मन संसय होई । कहा जो प्रभु प्रवान पुनि सोई ॥ जे निज भगत नाथ तव अहहीं । जो सुख पावहिं जो गति लहहीं ॥
दानि सिरोमनि कृपानिधि नाथ कहउँ सति भाउ । चाहउँ तुम्हहि समान सुत प्रभु सन कवन दुराउ ॥ १४९ ॥
सुनि मृदु गूढ़ रुचिर बर रचना । कृपासिंधु बोले मृदु बचना ॥ जो कछु रुचि तुम्हरे मन माहीं । मैं सो दीन्ह सब संसय नाहीं ॥
मातु बिबेक अलौकिक तोरें । कबहुँ न मिटिहि अनुग्रह मोरें ॥ बंदि चरन मनु कहेउ बहोरी । अवर एक बिनती प्रभु मोरी ॥
सुत बिषइक तब पद रति होऊ । मोहिं बड़ मूढ़ कहै किन कोऊ ॥ मनि बिनु फनि जिमि जल बिनु मीना । मम जीवन तिमि तुम्हहि अधीना ॥
अस बर मागि चरन गहि रहेऊ । एवमस्तु करुनानिधि कहेऊ ॥ अब तुम्ह मम अनुसासन मानी । बसहु जाइ सुरपति रजधानी ॥
सोइ सुख सोइ गति सोइ भगति सोइ निज चरन सनेहु । सोइ बिबेक सोइ रहनि प्रभु हमहि कृपा करि देहु ॥ १५० ॥
तहँ करि भोग बिसाल तात गएँ कछु काल पुनि । होइहहु अवध भुआल तब मैं होब तुम्हार सुत ॥ १५१ ॥
इच्छामय नरबेष सँवारें । होइहउँ प्रगट निकेत तुम्हारें ॥ अंसन्ह सहित देह धरि ताता । करिहउँ चरित भगत सुखदाता ॥
जे सुनि सादर नर बड़भागी । भव तरिहहिं ममता मद त्यागी ॥ आदिसक्ति जेहिं जग उपजाया । सोउ अवतरिहि मोरि यह माया ॥
पुरउब मैं अभिलाष तुम्हारा । सत्य सत्य पन सत्य हमारा ॥ पुनि पुनि अस कहि कृपानिधाना । अंतरधान भए भगवाना ॥
दंपति उर धरि भगत कृपाला । तेहिं आश्रम निवसे कछु काला ॥ समय पाइ तनु तजि अनयासा । जाइ कीन्ह अमरावति बासा ॥
सुनु मुनि कथा पुनीत पुरानी । जो गिरिजा प्रति संभु बखानी ॥ बिस्व बिदित एक कैकय देसू । सत्यकेतु तहँ बसइ नरेसू ॥
धरम धुरंधर नीति निधाना । तेज प्रताप सील बलवाना ॥ तेहि कें भए जुगल सुत बीरा । सब गुन धाम महा रनधीरा ॥
राज धनी जो जेठ सुत आही । नाम प्रतापभानु अस ताही ॥ अपर सुतहि अरिमर्दन नामा । भुजबल अतुल अचल संग्रामा ॥
भाइहि भाइहि परम समीती । सकल दोष छल बरजित प्रीती ॥ जेठे सुतहि राज नृप दीन्हा । हरि हित आपु गवन बन कीन्हा ॥
यह इतिहास पुनीत अति उमहि कही बृषकेतु । भरद्वाज सुनु अपर पुनि राम जनम कर हेतु ॥ १५२ ॥
नृप हितकारक सचिव सयाना । नाम धरमरुचि सुक्र समाना ॥ सचिव सयान बंधु बलबीरा । आपु प्रतापपुंज रनधीरा ॥
सेन संग चतुरंग अपारा । अमित सुभट सब समर जुझारा ॥ सेन बिलोकि राउ हरषाना । अरु बाजे गहगहे निसाना ॥
बिजय हेतु कटकइ बनाई । सुदिन साधि नृप चलेउ बजाई ॥ जहँ तहँ परीं अनेक लराई । जीते सकल भूप बरिआई ॥
सप्त दीप भुजबल बस कीन्हें । लै लै दंड छाँड़ि नृप दीन्हें ॥ सकल अवनि मंडल तेहि काला । एक प्रतापभानु महिपाला ॥
जब प्रतापरबि भयउ नृप फिरी दोहाई देस । प्रजा पाल अति बेदबिधि कतहुँ नहीं अघ लेस ॥ १५३ ॥
भूप प्रतापभानु बल पाई । कामधेनु भै भूमि सुहाई ॥ सब दुख बरजित प्रजा सुखारी । धरमसील सुंदर नर नारी ॥
सचिव धरमरुचि हरि पद प्रीती । नृप हित हेतु सिखव नित नीति ॥ गुर सुर संत पितर महिदेवा । करइ सदा नृप सब कै सेवा ॥
भूप धरम जे बेद बखाने । सकल करइ सादर सुख माने ॥ दिन प्रति देइ बिबिध बिधि दाना । सुनइ सास्त्र बर बेद पुराना ॥
नाना बापीं कूप तड़ागा । सुमन बाटिका सुंदर बागा ॥ बिप्रभवन सुरभवन सुहाए । सब तीरथन्ह बिचित्र बनाए ॥
स्वबस बिस्व करि बाहुबल निज पुर कीन्ह प्रवेशु । अरथ धरम कामादि सुख सेवइ समयँ नरेसु ॥ १५४ ॥
हृदयँ न कछु फल अनुसंधाना । भूप बिबेकी परम सुजाना ॥ करइ जे धरम करम मन बानी । बासुदेव अर्पित नृप ग्यानी ॥
चढ़ि बर बाजि बार एक राजा । मृगया कर सब साजि समाजा ॥ बिंध्याचल गभीर बन गयऊ । मृग पुनीत बहु मारत भयऊ ॥
फिरत बिपिन नृप दीख बराहू । जनु बन दुरेउ ससिहि ग्रसि राहू ॥ बड़ बिधु नहिं समात मुख माहीं । मनहुँ क्रोध बस उगलत नाहीं ॥
कोल कराल दसन छबि गाई । तनु बिसाल पीवर अधिकाई ॥ घुरघुरात हय आरो पाएँ । चकित बिलोकत कान उठाएँ ॥
जहँ लगि कहे पुरान श्रुति एक एक सब जाग । बार सहस्र सहस्र नृप किए सहित अनुराग ॥ १५५ ॥
आवत देखि अधिक रव बाजी । चलेउ बराह मरुत गति भागी ॥ तुरत कीन्ह नृप सर संधाना । महि मिलि गयउ बिलोक्त बाना ॥
तकि तकि तीर महीस चलावा । करि छल सूअर सरीर बचावा ॥ प्रगटत दूरि जाइ मृग भागा । रिस बस भूप चलेउ संग लागा ॥
गयउ दूरि घन गहन बराहू । जहाँ नाहिन गज बाजि निवाहू ॥ अति अकेल बन बिपुल कलेसू । तदपि न मृग मग तजइ नरेसू ॥
कोल बिलोकि भूप बड़ धीरा । भागि पैठ गिरिगुहँ गभीरा ॥ अगम देखि नृप अति पछिताई । फिरेउ महाबन पेरउ भुलाई ॥
नील महीधर सिखर सम देखि बिसाल बराहू । चपरि चलेउ हय सुटुकि नृप हाँकि न होइ निबाहू ॥ १५६ ॥
फिरत बिपिन आश्रम एक देखा । तहँ बस नृपति कपट मुनिबेषा ॥ जासु देस नृप लीन्ह छड़ाई । समर सेन तजि गएउ पराई ॥
समय प्रतापभानु कर जानी । आपन अति असमय अनुमानी ॥ गयउ न गृह मन बहुत गलानी । मिला न राजहि नृप अभिमानी ॥
रिस उर मारि रंक जिमि राजा । बिपिन बसइ तापस के साजा ॥ तासु समीप गवन नृप कीन्हा । यह प्रतापरबि तेहिं तब चीन्हा ॥
राउ तृषित नहिं सो पहिचाना । देखि सुबेष महामुनि जाना ॥ उतरि तुरग तें कीन्ह प्रनामा । परम चतुर न कहेउ निज नामा ॥
खेद खिन्न छुधित तृषित राजा बाजि समेत । खोजत ब्याकुल सरित सर जल बिनु भयउ अचेत ॥ १५७ ॥
गए श्रम सकल सुखी नृप भयऊ । निज आश्रम तापस लै गयऊ ॥ आसन दीन्ह अस्त रबि जानी । पुनि तापस बोले मृदु बानी ॥
को तुम्ह कस बन फिरहु अकेलें । सुंदर जुबा जीव परहेलें ॥ चक्रबर्ति के लच्छन तोरें । देखत दया लागति अति मोरें ॥
नाम प्रतापभानु अवनीसा । तासु सचिव मैं सुनहु मुनीसा ॥ फिरत अहेरें परेउँ भुलाई । बड़े भाग देखें पद आई ॥
हम कहें दुर्लभ दरस तुम्हारा । जानत हों कछु भल होनिहारा ॥ कह मुनि तात भयउ अँधिआरा । जोजन सत्तरि नगर तुम्हारा ॥
भूपति तृषित बिलोकि तेहि सरवर दीन्ह देखाइ । मज्जन पान समेत हय कीन्ह नृपति हरषाइ ॥ १५८ ॥
तुलसी देखि सुबेषु भूलहिं मूढ़ न चतुर नर । सुंदर केकिहि पेखु बचन सुधा सम असन अहि ॥ १५९ (ख) ॥
भलेहिं नाथ आयसु धरि सीसा । बाँधि तुरग तर बैठ महीसा ॥ नृप बहु भाँति प्रसंसेउ ताही । चरन बंदि निज भाग्य सराही ॥
पुनि बोले मृदु गिरा सुहाई । जानि पिता प्रभु करउँ ढिठाई ॥ मोहिं मुनीस सुत सेवक जानी । नाथ नाम निज कहहु बखानी ॥
तेहि न जान नृप नृपहिं सो जाना । भूप सुहृद सो कपट सयाना ॥ बैरी पुनि छत्री पुनि राजा । छल बल कीन्ह चहइ निज काजा ॥
समुझि राजसुख दुखित अराती । अवाँ अनल इव सुलगइ छाती ॥ सरल बचन नृप के सुनि काना । बयर सँभारि हृदयँ हरषाना ॥
निसा घोर गंभीर बन पंथ न सुनहु सुजान । बसहु आजु अस जानि तुम्ह जाइहु होत बिहान ॥ १५९ (क) ॥
कह नृप जे बिद्यान निधाना । तुम्ह सारिखे गलित अभिमाना ॥ सदा रहहिं अपनपौं दुराएँ । सब बिधि कुसल कुबेष बनाएँ ॥
तेहि तें कहहिं संत श्रुति टेरे । परम अकिंचन प्रिय हरि केरें ॥ तुम्ह सम अधन भिखारि अगेहा । होत बिरंचि सिवहि संदेहा ॥
जोइ सोंइ तब चरन नमामी । मो पर कृपा करिअ अब स्वामी ॥ सहज प्रीति भूपति के देखी । आपु बिषय बिस्वास बिसेषी ॥
सब प्रकार राजहि अपनाई । बोलेउ अधिक सनेह जनाई ॥ सुनु सतिभाउ कहउँ महिपाला । इहाँ बसत बीते बहु काला ॥
कपट बोरि बानी मृदुल बोले जुगुति समेत । नाम हमार भिखारि अब निर्धन रहित निकेत ॥ १६० ॥
तुलसी देखि सुबेषु भूलहिं मूढ़ न चतुर नर । सुंदर केकिहि पेखु बचन सुधा सम असन अहि ॥ १६१ (ख) ॥
तातें गुपुत रहउँ जग माहीं । हरि तजि किमपि प्रयोजन नाहीं ॥ प्रभु जानत सब बिनहीं जनाएँ । कहहु कवन सिधि लोक रिझाएँ ॥
तुम्ह सुचि सुमति परम प्रिय मोरें । प्रीति प्रतीति मोहि पर तोरें ॥ अब जौं तात दुरावउँ तोही । दारुन दोष घटै अति मोही ॥
जिमि जिमि तापस कहउ उदासा । तिमि तिमि नृपहि उपज बिस्वासा ॥ देखा स्वबस कर्म मन बानी । तब बोला तापस बग्यानी ॥
नाम हमार एकतनु भाई । सुनि नृप बोलेउ पुनि सिर नाई ॥ कहहु नाम कर अरथ बखानी । मोहिं सेवक अति आपन जानी ॥
अब लागि मोहि न मिलेउ कोउ मैं न जनावउँ काहू । लोकमान्यता अनल सम कर तप कानन दाहू ॥ १६१ (क) ॥
जनि आचरजु करहु मन माहीं । सुत तप तें दुर्लभ कछु नाहीं ॥ तपबल तें जग सृजइ बिधाता । तपबल बिष्णु भए परित्राता ॥
तपबल संभु करहिं संघारा । तप तें अगम न कछु संसारा ॥ भयउ नृपहि सुनि अति अनुरागा । कथा पुरातन कहे सो लागा ॥
करम धरम इतिहास अनेका । करइ निरूपन बिरति बिबेका ॥ उदभव पालन प्रलय कहानी । कहहिं अमित आचरज बखानी ॥
सुनी महीप तापस बस भयऊ । आपन नाम कहन तब लयऊ ॥ कह तापस नृप जानउँ तोही । कीन्हेहु कपट लाग भल मोही ॥
आदिसृष्टि उपजी जबहीं तब उत्पति भै मोरि । नाम एकतनु हेतु तेहि देह न धरी बहोरि ॥ १६२ ॥
सुनु महीस असि नीति जहाँ तहँ नाम न कहहिं नृप । मोहि तोहि पर अति प्रीति सोइ चतुरता बिचारि तव ॥ १६३ ॥
नाम तुम्हार प्रताप दिनेसा । सत्यकेतु तव पिता नरेसा ॥ गुर प्रसाद सब जानिअ राजा । कहिअ न आपन जानि अकाजा ॥
देखि तात तव सहज सुधाई । प्रीति प्रतीति नीति निपुनाई ॥ उपजि परी ममता मन मोरें । कहउँ कथा निज पूछें तोरें ॥
अब प्रसन्न मैं संसय नाहीं । मागु जो भूप भाव मन माहीं ॥ सुनि सुबचन भूपति हरषाना । गहि पद बिनय कीन्हि बिधि नाना ॥
कृपासिंधु मुनि दरसन तोरें । चारि पदारथ करतल मोरें ॥ प्रभुहि तथापि प्रसन्न बिलोकी । मागि अगम बर होउँ असोकी ॥
कह तापस नृप ऐसेहु होऊ । कारन एक कठिन सुनु सोऊ ॥ कालउ तुअ पद नाइहि सीसा । एक बिप्रकुल छाँड़ि महीसा ॥
तपबल बिप्र सदा बरिआरा । तिन्ह के कोप न कोउ रखवारा ॥ जौं बिप्रन्ह बस करहु नरेसा । तौ तुअ बस बिधि बिष्नु महेसा ॥
चल न ब्रह्मकुल सन बरिआई । सत्य कहउँ दोउ भुजा उठाई ॥ बिप्र श्राप बिनु सुनु महिपाला । तोर नास नहिं कवनेहुँ काला ॥
हरषेउ राउ बचन सुनि तासू । नाथ न होइ मोर अब नासू ॥ तव प्रसाद प्रभु कृपानिधाना । मो कहुँ सर्व काल कल्याना ॥
जरा मरन दुख रहित तनु समर जितै जनि कोउ । एकछत्र रिपुहीन महि राज कल्प सत होउ ॥ १६४ ॥
तातें मैं तोहि बरजउँ राजा । कहें कथा तव परम अकाजा ॥ छठें श्रवन यह परत कहानी । नास तुम्हार सत्य मम बानी ॥
यह प्रगटें अथवा द्विजश्रापा । नास तोर सुनु भानुप्रतापा ॥ आन उपायँ निधन तव नाहीं । जौं हरि हर कोपहिं मन माहीं ॥
सत्य नाथ पद गहि नृप भाषा । द्विज गुरु कोप कहहु को राखा ॥ राखइ गुरु जौं कोप बिधाता । गुरु बिरोध नहिं कोउ जग त्राता ॥
जौं न चलब हम कहे तुम्हारें । होउ नास नहिं सोच हमारेँ ॥ एकहि डर डरपत मन मोरा । प्रभु महिदेव श्राप अति घोरा ॥
एवमस्तु कहि कपटमुनि बोला कुटिल बहोरि । मिलब हमार भुलाब निज कहहु त हमहि न खोरि ॥ १६५ ॥
सुनु नृप बिबिध जतन जग माहीं । कष्टसाध्य पुनि होहिं कि नाहीं ॥ अहउ एक अति सुगम उपाई । तहँ परंतु एक कठिनाई ॥
मम आधीन जुगुति नृप सोई । मोर जाब तव नगर न होई ॥ आजु लगें अरु जब तें भयउँ । काहू के गृह ग्राम न गयऊँ ॥
जौं न जाउँ तब होइ अकाजू । बना आइ असमंजस आजू ॥ मुनि महीस बोलेउ मृदु बानी । नाथ निगम असि नीति बखानी ॥
बड़े सनेह लघुन्ह पर करहीं । गिरि निज सिरनि सदा तृन धरहीं ॥ जलधि अगाध मौलि बह फेनू । संतत धरनि धरत सिर रेनू ॥
होइ बिप्र बस कवन बिधि कहहु कृपा करि सोउ । तुम्ह तजि दीनदयाल निज हितू न देखउँ कोउ ॥ १६६ ॥
जानि नृपति आपन आधीना । बोला तापस कपट प्रबीना ॥ सत्य कहउँ भूपति सुनु तोही । जग नाहीं दुर्लभ कछु मोही ॥
अवसि काज मैं करिहउँ तोरा । मन तन बचन भगत तैं मोरा ॥ जोग जुगुति तप मंत्र प्रभाऊ । फलइ तबहिं जब करिअ दुराऊ ॥
जौं नरेस मैं करौं रसोई । तुम्ह परसहु मोहि जान न कोइ ॥ अन्न सो जोइ जोइ भोजन करई । सोइ सोइ तव आयसु अनुसरई ॥
पुनि तिन्ह के गृह जेवँ जोऊ । तव बस होइ भूप सुनु सोऊ ॥ जाइ उपाय रचहु नृप एहू । संवत भरि संकल्प करേഹू ॥
अस कहि गहे नरेस पद स्वामी होहु कृपाल । मोहि लागि दुख सहिअ प्रभु सज्जन दीनदयाल ॥ १६७ ॥
एहि बिधि भूप कष्ट अति थोरें । होइहिं सकल बिप्र बस तोरें ॥ करिहहिं बिप्र होम मख सेवा । तेहिं प्रसंग सहजहि बस देवा ॥
और एक तोहि कहउँ लखाऊँ । मैं एहि बेष न आऊब काऊ ॥ तुम्हरे उपरोहित कहुँ राया । हरि आनब मैं करि निज माया ॥
तपबल तेहि करि आपु समाना । रखिहउँ इहाँ बरष परवाना ॥ मैं धरि तासु बेषु सुनु राजा । सब बिधि तोर सँवारब काजा ॥
गै निसि बहुत सयन अब कीजै । मोहि तोहि भूप भेंट दिन तीजै ॥ मैं तपबल तोहि तुरग समेता । पहुँचइहउँ सोवतहि निकेता ॥
नित नूतन द्विज सहस सत बरेंहु सहित परिवार । मैं तुम्हरे संकल्प लगि दिनहिं करबि जेवनार ॥ १६८ ॥
सयन कीन्ह नृप आयसु मानी । आसन जाइ बैठ छलग्यानी ॥ श्रमित भूप निद्रा अति आई । सो किमि सोव सोच अधिकाई ॥
कालकेतु निसिचर तहँ आवा । जेहिं सूकर होइ नृपति भुलावा ॥ परम मित्र तापस नृप केरा । जानइ सो अति कपट घनेरा ॥
तेहि के सत सुत अरु दस भाई । खल अति अजय देव दुखदाई ॥ प्रथमहिं भूप समर सब मारे । बिप्र संत सुर देखि दुखारे ॥
तेहि खल पाछिल बयरु सँभारा । तापस नृप मिलि मंत्र बिचारा ॥ जेहिं रिपु छय सोइ रचेन्हि उपाऊ । भावी बस न जान कछु राजाउ ॥
मैं आउब सोइ बेषु धरि पहिचानेहु तब मोहि । जब एकांत बोलाइ सब कथा सुनावौं तोहि ॥ १६९ ॥
तापस नृप निज सखहि निहारी । हरषि मिलेउ उठि भयउ सुखारी ॥ मित्रहि कहि सब कथा सुनाई । जातुधान बोला सुख पाई ॥
अब साधेउँ रिपु सुनहु नरेसा । जौं तुम्ह कीन्ह मोर उपदेसा ॥ परिहरि सोच रहहु तुम्ह सोई । बिनु औषध बिआधि बिधि खोई ॥
कुल समेत रिपु मूल बहाई । चौथें दिवस मिलब मैं आई ॥ तापस नृपहि बहुत परितोषी । चला महाकपटी अतिरोषी ॥
भानुप्रतापहि बाजि समेता । पहुँचाएसि छन माँझ निकेता ॥ नृपति नारि पहिं सयन कराई । हयगृहें बाँधेसि बाजि बनाई ॥
रिपु तेजसी अकेल अपि लघु करि गनिअ न ताहु । अजहुँ देत दुख रबि ससिहि सिर अवसेषित राहु ॥ १७० ॥
आपु बिरचि उपरोहित रूपा । परेउ जाइ तेहि सेज अनूपा ॥ जागेउ नृप अनभएँ बिहाना । देखि भवन अति अचरज माना ॥
मुनि महिमा मन महुँ अनुमानी । उठेउ गवँहि जेहि जान न रानी ॥ कानन गयउ बाजि चढ़ि तेहीं । पुर नर नारि न जाने केहीं ॥
गएँ जाम जुग भूपति आवा । घर घर उत्सव बाज बधावा ॥ उपरोहितहि देख जब राजा । चकित बिलोकि सुमिरि सोइ काजा ॥
जुग सम नृपति गए दिन तीनी । कपटी मुनि पद रह मति लीनी ॥ समय जानि उपरोहित आवा । नृपहि मते सब कहि समुझावा ॥
राजा के उपरोहितहि हरि लै गयउ बहोरि । लै राखेसि गिरि खोह महुँ मायाँ करि मति भोरि ॥ १७१ ॥
उपरोहित जेवनार बनाई । छरस चारि बिधि जसि श्रुति गाई ॥ मायामय तेहिं कीन्हि रसोई । बिंजन बहु गनि सकइ न कोइ ॥
बिबिध मृगन्ह कर आमिष राँधा । तेहि महुँ बिप्र माँस खल साँधा ॥ भोजन कहुँ सब बिप्र बोलाए । पद पखारि सादर बैठाए ॥
परुसन जबहिं लाग महिपाला । भए अकासबानी तेहि काला ॥ बिप्रबृंद उठि उठि गृह जाहू । है बड़ि हानि अन्न जनि खाहू ॥
भयउ रसोई भूसुर माँसू । सब द्विज उठे मानि बिस्वासू ॥ भूप बिकल मति मोहें भुलानी । भावी बस न आव मुख बानी ॥
नृप हरषे पहिचानि गुरु भ्रम बस रहा न चेत । बरे तुरत सत सहस्र बर बिप्र कुटुंब समेत ॥ १७२ ॥
छत्रबंधु तैं बिप्र बोलाई । घाले लिए सहित समुदाई ॥ ईस्वर राखा धरम हमारा । जैहिसि तैं समेत परिवारा ॥
संवत मध्य नास तव होऊ । जलदाता न रहिहिहि कुल कोऊ ॥ नृप सुनि श्राप बिकल अति त्रासा । भए बहोरि बर गिरा अकासा ॥
बिप्रबृंद श्राप बिचारि न दीन्हा । नहिं अपराध भूप कछु कीन्हा ॥ चकित बिप्र सब सुनी नभबानी । भूप गयउ जहाँ भोजन खानी ॥
तहँ न असन नहिं बिप्र सुआरा । फिरेउ राउ मन सोच अपारा ॥ सब प्रसंग महीसुरन्ह सुनाई । त्रसित परेउ अवनि अकुलाई ॥
बोले बिप्र सकोप तब नहिं कछु कीन्ह बिचारि । जाइ निसाचर होहु नृप मूढ़ सहित परिवार ॥ १७३ ॥
अस कहि सब महीदेव सिधाए । समाचार पुरलोगन्ह पाए ॥ सोचहिं दूषन देवहि देहीं । बिरचत हंस काग किए जेहीं ॥
उपरोहितहि भवन पहुँचाई । असुर तापसहि खबरि जनाई ॥ तेहिं खल जहाँ तहाँ पत्र पठाए । सजि सजि सेन भूप सब धाए ॥
घेरि नगर निसान बजाई । बिबिध भाँति नित होइ लड़ाई ॥ जूझे सकल सुभट करि करनी । बंधु समेत परेउ नृप धरनी ॥
सत्यकेतु कुल कोउ नहिं बाँचा । बिप्रश्राप किमि होइ असाँचा ॥ रिपु जिति सब नृप नगर बसाई । निज पुर गवने जय जसु पाई ॥
भूपति भावी मिटइ नहिं जदपि न दूषन तोर । किएँ अन्यथा होइ नहिं बिप्रश्राप अति घोर ॥ १७४ ॥
काल पाइ मुनि सुनु सोइ राजा । भयउ निसाचर सहित समाजा ॥ दस सिर ताहि बीस भुजदंडा । रावन नाम वीर बरिबंडा ॥
भूप अनुज अरिमर्दन नामा । भयउ सो कुंभकरन बलधामा ॥ सचिव जो रहा धरमरुचि जासू । भयउ बिमात्र बंधु लघु तासू ॥
नाम बिभीषन जेहि जग जाना । बिष्णुभगत बिग्यान निधाना ॥ रहे जे सुत सेवक नृप केरे । भए निसाचर घोर घनेरे ॥
कामरूप खल जिनस अनेका । कुटिल भयंकर बिगत बिबेका ॥ कृपा रहित हिंसक सब पापी । बरनि न जाहिं बिस्व परितापी ॥
भरदाज सुनु जाहि जब होइ बिधाता बाम । धूरि मेरुसम जनक जम ताहि ब्यालसम दाम ॥ १७५ ॥
कीन्ह बिबिध तप तीन्हहुँ भाई । परम उग्र नहिं बरनि सो जाई ॥ गयउ निकट तप देखि बिधाता । मागउ बर प्रसन्न मैं ताता ॥
करि बिनती पद गहि दससीसा । बोलेउ बचन सुनहु जगदीसा ॥ हम काहू के मरिहिं न मारे । बानर मनुज जाति दुइ बारे ॥
एवमस्तु तुम्ह बड़ तप कीन्हा । मैं ब्रह्माँ मिलि तेहि बर दीन्हा ॥ पुनि प्रभु कुंभकरन पहिं गयऊ । तेहि बिलोकि मन बिसमय भयऊ ॥
जौं एहि खल नित करब अहारा । होइहि सब उजारि संसारा ॥ सारद प्रेरि तासु मति फेरी । मागेसि नीद मास षट केरी ॥
उपजे जदपि पुलस्त्यकुल पावन अमल अनूप । तदपि महीसुर श्राप बस भए सकल अधरूप ॥ १७६ ॥
तिन्हहि देइ बर ब्रह्म सिधाए । हरषित ते अपने गृह आए ॥ मय तनुजा मंदोदरी नामा । परम सुंदरी नारि ललामा ॥
सोइ मयँ दीन्हि रावनहि आनी । होइहि जातुधानपति जानी ॥ हरषित भयउ नारि भलि पाई । पुनि दोउ बंधु बिआहेसि जाई ॥
गिरि त्रिकूट एक सिंधु मझारी । बिधि निर्मित दुर्गम अति भारी ॥ सोइ मय दानवँ बहुरि संवारा । कनक रचित मनि भवन अपारा ॥
भोगावति जसि अहिकुल बासा । अमरावति जसि सक्रनिवासा ॥ तिन्ह ते अधिक रम्य अति बंका । जग बिख्यात नाम तेहि लंका ॥
गए बिभीषन पास पुनि कहेउ पुत्र बर मागु । तेहिं मागेउ भगवंत पद कमल अमल अनुरागु ॥ १७७ ॥
हरि प्रेरित जेहिं कल्प जोइ जातुधानपति होइ । सुर प्रतापी अतुलबल दल समेत बस सोइ ॥ १७८ (ख) ॥
रहे तहँ निसिचर भट भारे । ते सब सुरन्ह समर संघारे ॥ अब तहँ रहहिं सक के प्रेरे । रच्छक कोटि जच्छपति केरे ॥
दसमुख कहुँ खबरि असि पाई । सेन साजि गढ़ घेरिसि जाई ॥ देखि बिकट भट बड़ि कटुकाई । जच्छ जीव लै गए पराई ॥
फिरि सब नगर दसानन देखा । गयउ सोचु सुख भयउ बिसेषा ॥ सुंदर सहज अगम अनुमानि । कीन्हि तहँ रावन रजधानी ॥
जेहि जस जोग बाँटि गृह दीन्हें । सुखी सकल रजनीचर कीन्हें ॥ एक बार कुबेर पर धावा । पुष्पक जान जीति लै आवा ॥
खाइ सिंधु गभीर अति चारिहुँ दिसि फिरि आव । कनक कोट मनि खचित दृढ़ बरनि न जाइ बनाव ॥ १७८ (क) ॥
सुख संपति सुत सेन सहाई । जय प्रताप बल बुद्धि बड़ाई ॥ नित नूतन सब बाढ़त जाई । जिमि प्रतिलाभ लोभ अधिकाई ॥
अतिबल कुंभकरन अस भ्राता । जेहि कहुँ नहिं प्रतिमट जग जाता ॥ करइ पान सोवइ षट मासा । जागत होइ तिहुँ पुर त्रासा ॥
जौं दिन प्रति अहार कर सोई । बिस्व बेगि सब चौपट होई ॥ समर धीर नहिं जाइ बखाना । तेहि सम अमित बीर बलवाना ॥
बारिदनाद जेठ सुत तासू । भट महुँ प्रथम लीक जग जासू ॥ जेहि न होइ रन सनमुख कोई । सुरपुर नितहिं परावन होई ॥
कौतुकहीं कैलास पुनि लीन्हेसि जाइ उठाइ । मनहुँ तोलि निज बाहुबल चला बहुत सुख पाइ ॥ १७९ ॥
कामरूप जानहिं सब माया । सपनेहूँ जिन्ह कें धरम न दाया ॥ दसमुख बैठ सभाँ एक बारा । देखि अमित आपन परिवारा ॥
सुत समूह जन परिजन नाती । गने को पार निसाचर जाती ॥ सेन बिलोकि सहज अभिमानी । बोला बचन क्रोध मद सानी ॥
सुनहु सकल रजनीचर जूथा । हमरे बैरी बिबुध बरूथा ॥ ते सनमुख नहिं करहिं लराई । देखि सबल रिपु जाहिं पराई ॥
तेन्ह कर मरन एक बिधि होई । कहउँ बुझाइ सुनहु अब सोई ॥ द्विजभोजन मख होम सराधा । सब कै जाइ करहु तुम्ह बाधा ॥
कुमुख अकंपन कुलिसरद धूमकेतु अतिकाय । एक एक जग जीति सक ऐसे सुभट निकाय ॥ १८० ॥
मेघनाद कहुँ पुनि हुँकरावा । दीन्ही सिख बलु बयरु बढ़ावा ॥ जे सुर समर धीर बलवाना । जिन्ह कें लरिबे कर अभिमाना ॥
तिन्हहि जीति रन आनेसु बाँधी । उठि सुत पितु अनुसासन काँधी ॥ एहि बिधि सबही अग्या दीन्ही । आपुनु चलेउ गदा कर लीन्ही ॥
चलत दसानन डोलति अवनी । गर्जत गर्भ स्रवहिं सुर रवनी ॥ रावन आवत सुनेउ सकोहा । देवन्ह तके मेरु गिरि खोहा ॥
दिगपालन्ह के लोक सुहाए । सूने सकल दसानन पाए ॥ पुनि पुनि सिंघनाद करि भारी । देइ देवतन्ह गारि पचारी ॥
रन मद मत फिरइ जग धावा । प्रतिभट खोजत कतहुँ न पावा ॥ रवि ससि पवन बरुन धनधारी । अगिनि काल जम सब अधिकारी ॥
किन्नर सिद्ध मनुज सुर नागा । हठि सबहीं के पंथहिं लागा ॥ ब्रह्मसृष्टि जहँ लगि तनुधारी । दसमुख बसवर्ती नर नारी ॥
आयसु करहिं सकल भयभीता । नवहिं आइ नित चरन बिनीता ॥
छुधा छीन बलहीन सुर सहजेहिं मिलिहहिं आइ । तब मारिहउँ कि छाडिहउँ भली भाँति अपनाइ ॥ १८१ ॥
देव जच्छ गंधर्ब नर किंनर नाग कुमारि । जीति बरीं निज बाहुबल बहु सुंदर बर नारि ॥ १८२ (ख) ॥
इंद्रजीत सन जो कछु कहेऊ । सो सब जनु पहिलहिं करि रहेऊ ॥ प्रथमहि जिन्ह कहुँ आयसु दीन्हा । तिन्ह कर चरित सुनहु जो कीन्हा ॥
देखत भीमरूप सब पापी । निसिचर निकर देव परितापी ॥ करहिं उपद्रव असुर निकाया । नाना रूप धरहिं करि माया ॥
जेहि बिधि होइ धरम निर्मूला । सो सब करहिं बेद प्रतिकूला ॥ जेहि जेहि देस धेनु द्विज पावहिं । नगर गाउँ पुर आगि लगावहिं ॥
सुभ आचरन कतहुँ नहिं होई । देव बिप्र गुरु मान न कोई ॥ नहिं हरिभगति जग्य तप ग्याना । सपनेहूँ सुनिअ न बेद पुराना ॥
भुजबल बिस्व बस्य करि राखेसि कोउ न सुतंत्र । मंडलीक मनि रावन राज करइ निज मंत्र ॥ १८२ (क) ॥
जप जोग बिरागा तप मख भागा श्रवन सुनइ दससीसा । आपुनु उठि धावइ रहै न पावइ धरि सब घालइ खीसा ॥ अस भ्रष्ट अचारा भा संसारा धरम सुनिअ नहिं काना । तेहि बहुबिधि त्रासइ देस निकासइ जो कह बेद पुराना ॥
बरनि न जाइ अनीति घोर निसाचर जो करहिं । हिंसा पर अति प्रीति तिन्ह के पापहि कवनि मिति ॥ १८३ ॥
बाढ़े खल बहु चोर जुआरा । जे लंपट परधन परदारा ॥ मानहिं मातु पिता नहिं देवा । साधुन्ह सन करवावहिं सेवा ॥
जिन्ह के यह आचरन भवानी । ते जानेहु निसिचर सब प्रानी ॥ अतिसय देखि धरम के ग्लानी । परम सभीत धरा अकुलानी ॥
गिरि सरि सिंधु भार नहिं मोही । जस मोहि गरुअ एक परद्रोही ॥ सकल धरम देखउँ बिपरीता । कहि न सकउँ रावन भय भीता ॥
धेनु रूप धरि हृदयँ बिचारी । गई तहाँ जहाँ सुर मुनि झारी ॥ निज संताप सुनाइअसि रोई । काहू तें कछु काज न होई ॥
सुर मुनि गंधर्ब मिलि करि सर्व गें बिरंचि के लोका । संग गोतनुधारी भूमि बिचारी परम बिकल भय सोका ॥ ब्रह्माँ सब जाना मन अनुमाना मोर कछू न बसाई । जा करि तैं दासी सो अबिनासी हमरेउ तोर सहाई ॥
धरनि धरहि मन धीर कह बिरंचि हरि पद सुमिरु । जानत जन की पीर प्रभु भंजिहि दारुन बिपति ॥ १८४ ॥
बैठे सुर सब करहिं बिचारा । कहँ पाउ प्रभु करिअ पुकारा ॥ पुर बैकुंठ जान कह कोई । कोउ कह पयोनिधि बस प्रभु सोई ॥
जाके हृदयँ भगति जसि प्रीती । प्रभु तहँ प्रगट सदा तेहि रीती ॥ तेहि समाज गिरिजा मैं रहेऊँ । अवसर पाइ बचन एक कहेऊँ ॥
हरि व्यापक सर्वत्र समाना । प्रेम तें प्रगट होहिं मैं जाना ॥ देस काल दिसि बिदिसिहु माहीं । कहहु सो कहाँ जहाँ प्रभु नाहीं ॥
अग जगमय सब रहित बिरागी । प्रेम तें प्रभु प्रगटइ जिमि आगी ॥ मोर बचन सब के मन माना । साधु साधु करि ब्रह्म बखाना ॥
सुनि बिरंचि मन हरष तन पुलकि नयन बह नीर । अस्तुति करत जोरि कर सावधान मतिधीर ॥ १८५ ॥
जय जय सुरनायक जन सुखदायक प्रनतपाल भगवंता । गो द्विज हितकारी जय असुरारी सिंधुसुता प्रिय कंता ॥ पालन सुर धरनी अद्भुत करनी मरम न जानइ कोई । जो सहज कृपाला दीनदयाला करउ अनुग्रह सोई ॥ जय जय अबिनासी सब घट बासी ब्यापक परमानंदा । अबिगत गोतीतं चरित पुनीतं मायारहित मुकुंदा ॥ जेहि लागि बिरागी अति अनुरागी बिगत मोह मुनिबृंदा । निसि बासर ध्यावहिं गुनगन गावहिं जयति सच्चिदानंदा ॥ जेहिं सृष्टि उपाई त्रिबिध बनाई संग सहाय न दूजा । सो करउ अघारी चिंत हमारी जानिअ भगति न पूजा ॥ जो भव भय भंजन मुनि मन रंजन गंजन बिपति बरूथा । मन बच क्रम बानी छाडि सयानी सरन सकल सुरजूथा ॥ सारद श्रुति सेव ऋषय असेषा जा कहुँ कोउ नहिं जाना । जेहि दीन पिआरे बेद पुकारे द्रवउ सो श्रीभगवाना ॥ भव बारिधि मंदर सब बिधि सुंदर गुनमंदिर सुखपुंजा । मुनि सिद्ध सकल सुर परम भयातुर नमत नाथ पद कंजा ॥