ॐ नमः शिवाय  |  जय श्री राम  |  हरे कृष्ण
काण्ड 1

श्रीरामचरितमानसबाल काण्ड

कुल 1,913 पद/श्लोक

चौपाई 1बाल काण्ड
सब प्रसंगु गिरिपतिहि सुनावा । मदन दहन सुनि अति दुखु पावा ॥
बहुरि कहेउ रति कर बरदाना । सुनि हिमवंत बहुत सुखु माना ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
हृदयँ बिचारि संभु प्रभुताई । सादर मुनिबर लिए बोलाई ॥
सुदिनु सुनखतु सुघरी सोचाई । बेगि बेदबिधि लग्न धराई ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
पत्री सप्तऋषिन्ह सोइ दीन्ही । गहि पद बिनय हिमाचल कीन्ही ॥
जाइ बिधिहि तिन्ह दीन्हि सो पाती । बाचत प्रीति न हृदयँ समाती ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
लगन बाचि अज सबहि सुनाई । हरषे मुनि सब सुर समुदाई ॥
सुमन बृष्टि नभ बाजन बाजे । मंगल कलस दसहुँ दिसि साजे ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
सिवहि संभु गन करहिं सिंगारा । जटा मुकुट अहि मौर सँवारा ॥
कुंडल कंकन पहिरे ब्याला । तन बिभूति पट केहरि छाला ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
ससि ललाट सुंदर सिर गंगा । नयन तीनि उपवीत भुजंगा ॥
गरल कंठ उर नर सिर माला । असिव बेष सिवधाम कृपाला ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
कर त्रिसूल अरु डमरु बिराजा । चले बसहँ चढ़ि बाजहिं बाजा ॥
देखि सिवहि सुरतिय मुसुकाहीं । बर लायक दुलहिन जग नाहीं ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
बिष्णु बिरंचि आदि सुरब्राता । चढ़ि चढ़ि वाहन चले बराता ॥
सुर समाज सब भाँति अनूपा । नहिं बरात दूलह अनुरूपा ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
बर अनुहारि बरात न भाई । हँसी करैहहु पर पुर जाई ॥
बिष्णु बचन सुनि सुर मुसुकाने । निज निज सेन सहित बिलगाने ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
मनहीं मन महेसु मुसुकाहीं । हरि के बिंग्य बचन नहिं जाहीं ॥
अति प्रिय बचन सुनत प्रिय केरे । भृंगिहि प्रेरि सकल गन टेरे ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
सिव अनुसासन सुनि सब आए । प्रभु पद जलज सीस तिन्ह नाए ॥
नाना वाहन नाना बेषा । बिहसे सिव समाज निज देखा ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
कोउ मुखहीन बिपुल मुख काहू । बिनु पद कर कोउ बहु पद बाहू ॥
बिपुल नयन कोउ नयन बिहीना । रिष्टपुष्ट कोउ अति तनखीना ॥
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छंद 92बाल काण्ड
तन खीन कोउ अति पीन पावन कोउ अपावन गति धरें ।
भूषन कराल कपाल कर सब सद्य सोनित तन भरें ॥
खर स्वान सुअर सृकाल मुख गन बेष अगनित को गनै ।
बहु जिनस प्रेत पिसाच जोगि जमात बरनत नहिं बनै ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
जस दूलहु तसि बनी बराता । कौतुक बिबिध होहिं मग जाता ॥
इहाँ हिमाचल रचेउ बिताना । अति बिचित्र नहिं जाइ बखाना ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
सैल सकल जहाँ लगि जग माहीं । लघु बिसाल नहिं बरनि सिराहीं ॥
बन सागर सब नदीं तलावा । हिमगिरि सब कहुँ नेवत पठावा ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
प्रथमहिं गिरि बहु गृह सँवाए । जथाजोगु तहँ तहँ सब छाए ॥
पुर सोभा अवलोकि सुहाई । लागइ लघु बिरंचि निपुनाई ॥
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छंद 93बाल काण्ड
लघु लाग बिधि की निपुनता अवलोकि पुर सोभा सही ।
बन बाग कूप तड़ाग सरिता सुभग सब सक को कही ॥
मंगल बिपुल तोरन पताका केतु गृह गृह सोहहीं ।
बनिता पुरुष सुंदर चतुर छबि देखि मुनि मन मोहहीं ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
हियँ हरषे सुर सेन निहारी । हरिहि देखि अति भए सुखारी ॥
सिव समाज जब देखन लागे । बिडरि चले वाहन सब भागे ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
धरि धीरजु तहँ रहे सयाने । बालक सब लै जीव पराने ॥
गए भवन पूछहिं पितु माता । कहहिं बचन भय कंपित गाता ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
कहिअ काह कहि जाइ न बाता । जम कर धार किधौं बरिआता ॥
बर बौराह बसहँ असवारा । ब्याल कपाल बिभूषन छारा ॥
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छंद 94बाल काण्ड
तन छार ब्याल कपाल भूषन नगन जटिल भयंकरा ।
संग भूत प्रेत पिसाच जोगिनि बिकट मुख रजनीचरा ॥
जो जिअत रहिहि बरात देखत पुन्य बड़ तेहि कर सही ।
देखिहि सो उमा बिबाहु घर घर बात असि लरिकन्ह कही ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
केंचन थार सोह बर पानी । परिछन चली हरहि हरषानी ॥
बिकट बेष रुद्रहि जब देखा । अबलन्ह उर भय भयउ बिसेषा ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
भागि भवन पैठीं अति त्रासा । गए महेसु जहाँ जनवासा ॥
मैना हृदयँ भयउ दुखु भारी । लीन्ही बोलि गिरीसकुमारी ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
अधिक सनेहँ गोद बैठारी । स्याम सरोज नयन भरे बारी ॥
जेहिं बिधि तुम्हहि रूपु अस दीन्हा । तेहिं जड़ बर बाउर कस कीन्हा ॥
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छंद 95बाल काण्ड
कस कीन्ह बर बौराह बिधि जेहिं तुम्हहि सुंदरता दई ।
जो फलु चहिअ सुरतरुहिं सो बरबस बबूरहि लागई ॥
तुम्ह सहित गिरि तें गिरौं पावक जरौं जलनिधि महुँ परौं ।
घर जाउ अपजसु होउ जग जीवत बिबाहु न हौं करौं ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
नारद कर मैं काह बिगारा । भवनु मोर जिन्ह बसत उजारा ॥
अस उपदेसु उमहि जिन्ह दीन्हा । बॉरे बरहि लागि तपु कीन्हा ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
साँचें उन्ह कें मोह न माया । उदासीन धनु धामु न जाया ॥
पर घर घालक लाज न भीरा । बाँझ कि जान प्रसव कै पीरा ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
जननिहि बिकल बिलोकि भवानी । बोलीं जुत बिबेक मृदु बानी ॥
अस बिचारि सोचहि मति माता । सो न टरउ जो रचउ बिधाता ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
करम लिखा जौं बाउर नाहू । तौ कत दोसु लगाइअ काहू ॥
तुम्ह सन मिटहिं कि बिधि के अंका । मातु ब्यर्थ जनि लेहु कलंका ॥
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छंद 96बाल काण्ड
जनि लेहु मातु कलंकु करना परिहरहु अवसर नाहीं ।
दुखु सुखु जो लिखा लिलार हमारे जाइ जहाँ पाउब तहीं ॥
सुनि उमा बचन बिनीत कोमल सकल अबला सोचहीं ।
बहु भाँति बिधिहि लगाइ दूषण नयन बारि बिमोचहीं ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
तब नारद सबही समुझावा । पूरब कथाप्रसंगु सुनावा ॥
मयना सत्य सुनहु मम बानी । जगदंबा तव सुता भवानी ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
अजा अनादि सक्ति अबिनासिनि । सदा संभु अरधंग निवासिनि ॥
जग संभव पालन लय कारिनि । निज इच्छा लीला बपु धारिनि ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
जनमीं प्रथम दच्छ गृह जाई । नामु सती सुंदर तनु पाई ॥
तहँहु सती संकरहि बिबाहीं । कथा प्रसिद्ध सकल जग माहीं ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
एक बार आवत सिव संगा । देखेउ रघुकुल कमल पतंगा ॥
भयउ मोह सिव कहा न कीन्हा । भ्रम बस बेषु सीय कर लीन्हा ॥
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छंद 97बाल काण्ड
सिय बेषु सतीं जो कीन्ह तेहिं अपराध संकर परिहरहीं ।
हर बिरहँ जाइ बहोरि पितु कें जग्य जोगानल जरीं ॥
अब जनमि तुम्हरे भवन निज पति लागि दारुन तपु किया ।
अस जानि संसय तजहु गिरिजा सर्वदा संकरप्रिया ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
तब मयना हिमवंतु अनंदे । पुनि पुनि पारबती पद बंदे ॥
नारि पुरुष सिसु जुबा सयाने । नगर लोग सब अति हरषाने ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
लगे होन पुर मंगल गाना । सजे सबहिं हाटक घट नाना ॥
भाँति अनेक भई जेवनारा । सूपसास्त्र जस कछु ब्यवहारा ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
सो जेवनार कि जाइ बखानी । बसहिं भवन जेहिं मातु भवानी ॥
सादर बोले सकल बराती । बिष्णु बिरंचि देव सब जाती ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
बिबिध पाँति बैठी जेवनारा । लागे परुसन निपुन सुआरा ॥
नारिबृंद सुर जेवंत जानी । लगीं देन गारीं मृदु बानी ॥
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छंद 98बाल काण्ड
गारीं मधुर स्वर देहिं सुंदरि बिंग्य बचन सुनावहीं ।
भोजन करहिं सुर अति बिलंबु बिनोद सुनि सचु पावहीं ॥
जेवंत जो बढ़्यो अनंदु सो मुख कोटिहूँ न परे कहयो ।
अचवाँइ दीन्हे पान गवने बास जहाँ जाको रहयो ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
बोलि सकल सुर सादर लीन्हे । सबहि जथोचित आसन दीन्हे ॥
बेदी बेद बिधान सँवारी । सुभग सुमंगल गावहिं नारी ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
सिंघासनु अति दिब्य सुहावा । जाइ न बरनि बिरंचि बनावा ॥
बैठे सिव बिप्रन्ह सिरु नाई । हृदयँ सुमिरि निज प्रभु रघुराई ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
बहुरि मुनीसन्ह उमा बोलाई । करि सिंगारु सखीँ लै आई ॥
देखत रूपु सकल सुर मोहे । बरनै छबि अस जग कबि को हे ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
जगदंबिका जानि भव भामा । सुरन्ह मनहिं मन कीन्ह प्रनामा ॥
सुंदरता मरजाद भवानी । जाइ न कोटिहुँ बदन बखानी ॥
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छंद 99बाल काण्ड
कोटिहुँ बदन नहिं बने बरनत जग जननि सोभा महा ।
सकुचहिं कहत श्रुति सेष सारद मंदमति तुलसी कहा ॥
छबिखानि मातु भवानि गवनीं मध्य मंडप सिव जहाँ ।
अवलोकि सकहिं न सकुच पति पद कमल मनु मधुकर तहाँ ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
जसि बिबाह कै बिधि श्रुति गाई । महामुनिन्ह सो सब करवाई ॥
गहि गिरीस कुस कन्या पानी । भवहि समरपीं जानि भवानी ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
पानिग्रहन जब कीन्ह महेसा । हियँ हरषे तब सकल सुरेसा ॥
बेदमंत्र मुनिबर उच्चरहीं । जय जय जय संकर सुर करहीं ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
बाजहिं बाजन बिबिध बिधाना । सुमनबृष्टि नभ भए बिधि नाना ॥
हर गिरिजा कर भयउ बिबाहू । सकल भुवन भरि रहा उछाहू ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
दासीं दास तुरग रथ नागा । धेनु बसन मनि वस्त्र बिभागा ॥
अन्न कनकभाजन भरि जाना । दाइज दीन्ह न जाइ बखाना ॥
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छंद 100बाल काण्ड
दाइज दियो बहु भाँति पुनि कर जोरि हिमभूधर कहयो ।
का देऊँ पूरनकाम संकर चरन पंकज गहि रहयो ॥
सिवें कृपासागर ससुर कर संतोषु सब भाँतिहिं कियो ।
पुनि गहे पद पाथोज मयना प्रेम परिपूरन हियो ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
बहु बिधि संभु सासु समुझाई । गवनी भवन चरन सिरु नाई ॥
जननीं उमा बोलि तब लीन्हीं । लै उछंग सुंदर सिख दीन्हीं ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
करेहु सदा संकर पद पूजा । नारिधर्मु पति देउ न दूजा ॥
बचन कहत भरे लोचन बारी । बहुरि लाइ उर लीन्ह कुमारी ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
कत बिधि सृजीं नारि जग माहीं । पराधीन सपनेहुँ सुखु नाहीं ॥
भै अति प्रेम बिकल महतारी । धीरजु कीन्ह कुसमय बिचारी ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
पुनि पुनि मिलति परति गहि चरना । परम प्रेमु कछु जाइ न बरना ॥
सब नारिन्ह मिलि भेंटि भवानी । जाइ जननि उर पुनि लपटानी ॥
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छंद 101बाल काण्ड
जननिहि बहुरि मिलि चली उचित असीस सब काहूँ दई ।
फिरि फिरि बिलोकति मातु तन तब सखी ले सिव पहिं गई ॥
जाचक सकल संतोषि संकर उमा सहित भवन चले ।
सब अमर हरषे सुमन बरषि निसान नभ बाजे भले ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
जबहीं संभु कैलासहिं आए । सुर सब निज निज लोक सिधाए ॥
जगत मातु पितु संभु भवानी । तेहि सिंगारु न कहउँ बखानी ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
करहिं बिबिध बिधि भोग बिलासा । गनन्ह समेत बसहिं कैलासा ॥
हर गिरिजा बिहार नित नयऊ । एहि बिधि बिपुल काल चलि गयऊ ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
तब जनमेउ षट्बदन कुमारा । तारकु असुर समर जेहिं मारा ॥
आगम निगम प्रसिद्ध पुराना । षन्मुख जन्मु सकल जग जाना ॥
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छंद 102बाल काण्ड
जगु जान षन्मुख जन्मु कर्मु प्रतापु पुरुषारथु महा ।
तेहि हेतु मैं बृषकेतु सुत कर चरित संछेपहिं कहा ॥
यह उमा संभु बिबाहु जे नर नारि कहहिं जे गावहीं ।
कल्यान काज बिबाह मंगल सर्वदा सुखु पावहीं ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
संभु चरित सुनि सरस सुहावा । भरद्वाज मुनि अति सुखु पावा ॥
बहु लालसा कथा पर बाढ़ी । नयनन्हि नीर रोमावलि ठाढ़ी ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
प्रेम बिबस मुख आव न बानी । दसा देखि हरषे मुनि ग्यानी ॥
अहो धन्य तव जन्मु मुनीसा । तुम्हहि प्रान सम प्रिय गौरीसा ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
सिव पद कमल जिन्हहि रति नाहीं । रामहि ते सपनेहुँ न सोहाहीं ॥
बिनु छल बिस्वनाथ पद नेहू । राम भगत कर लच्छन एहू ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
सिव सम को रघुपति ब्रतधारी । बिनु अघ तजी सती असि नारी ॥
पनु करि रघुपति भगति देखाई । को सिव सम रामहि प्रिय भाई ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
मैं जाना तुम्हार गुन सीला । कहउँ सुनहु अब रघुपति लीला ॥
सुनु मुनि आजु समागम तोरें । कहि न जाइ जस सुखु मन मोरें ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
राम चरित अति अमित मुनीसा । कहि न सकहिं सत कोटि अहीसा ॥
तदपि यथाश्रुत कहउँ बखानी । सुमिरि गिरापति प्रभु धनुपानी ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
सारद दारुनारि सम स्वामी । रामु सूत्रधर अंतरजामी ॥
जेहि पर कृपा करहिं जनु जानी । कबि उर अजिर नचावहिं बानी ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
प्रनवउँ सोइ कृपाल रघुनाथा । बरनउँ बिसद तासु गुन गाथा ॥
परम रम्य गिरिबरु कैलासू । सदा जहाँ सिव उमा निवासू ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
हरि हर बिमुख धर्म रति नाहीं । ते नर तहाँ सपनेहुँ नहिं जाहीं ॥
तेहि गिरि पर बट बिटप बिसाला । नित नूतन सुंदर सब काला ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
त्रिबिध समीर सुसीतल छाया । सिव बिश्राम बिटप श्रुति गाया ॥
एक बार तेहि तर प्रभु गयऊ । तरु बिलोकि उर अति सुखु भयऊ ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
निज कर डासि नागरिपु छाला । बैठे सहजहिं संभु कृपाला ॥
कुंद इंदु दर गौर सरीरा । भुज प्रलंब परिधन मुनिचीरा ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
तरुन अरुन अंबुज सम चरना । नख दुति भगत हृदय तम हरना ॥
भुजग भूति भूषन त्रिपुरारी । आननु सरद चंद छबि हारी ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
बैठे सोह कामरिपु कैसेँ । धरें सरीर सांतरसु जैसेँ ॥
पारबती भल अवसर जानी । गई संभु पहिं मातु भवानी ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
जानि प्रिया आदरु अति कीन्हा । बाम भाग आसनु हर दीन्हा ॥
बैठीं सिव समीप हरषाई । पूरब जन्म कथा चित आई ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
पति हियँ हेतु अधिक अनुमानी । बिहसि उमा बोलीं प्रिय बानी ॥
कथा जो सकल लोक हितकारी । सोइ पूछन चह सैलकुमारी ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
बिस्वनाथ मम नाथ पुरारी । त्रिभुवन महिमा बिदित तुम्हारी ॥
चर अरु अचर नाग नर देवा । सकल करहिं पद पंकज सेवा ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
जौं मो पर प्रसन्न सुखरासी । जानिअ सत्य मोहि निज दासी ॥
तौ प्रभु हरहु मोर अग्याना । कहि रघुनाथ कथा बिधि नाना ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
जासु भवनु सुरतरु तर होई । सहि कि दरिद्र जनित दुखु सोई ॥
ससिभूषन अस हृदयँ बिचारी । हरहु नाथ मम मति भ्रम भारी ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
प्रभु जे मुनि परमारथबादी । कहहिं राम कहुँ ब्रह्म अनादी ॥
सेस सारदा बेद पुराना । सकल करहिं रघुपति गुन गाना ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
तुम्ह पुनि राम राम दिन राती । सादर जपहु अनंग आराती ॥
रामु सो अवध नृपति सुत सोई । की अज अगुन अलखगति कोई ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
जौं अनीह ब्यापक बिभु कोऊ । कहहु बुझाइ नाथ मोहि सोऊ ॥
अग्य जानि रिस उर जनि धरहू । जेहि बिधि मोह मिटे सोइ करहू ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
मैं बन दीख राम प्रभुताई । अति भय बिकल न तुम्हहि सुनाई ॥
तदपि मलिन मन बोधु न आवा । सो फलु भली भाँति हम पावा ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
अजहूँ कछु संसउ मन मोरें । करहु कृपा बिनवउँ कर जोरें ॥
प्रभु तब मोहि बहु भाँति प्रबोधा । नाथ सो समुझि करहु जनि क्रोधा ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
तब कर अस बिमोह अब नाहीं । रामकथा पर रुचि मन माहीं ॥
कहहु पुनीत राम गुन गाथा । भुजगराज भूषन सुरनाथा ॥
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दोहा 108बाल काण्ड
जौं नृप तनय त ब्रह्म किमि नारि बिरहँ मति भोरि ।
देखि चरित महिमा सुनत भ्रमति बुद्धि अति मोरि ॥ १०८ ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
जदपि जोषिता नहिं अधिकारी । दासी मन क्रम बचन तुम्हारी ॥
गूढउ तत्त्व न साधु दुरावहिं । आरत अधिकारी जहाँ पावहिं ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
अति आरति पूछउँ सुरराया । रघुपति कथा कहहु करि दाया ॥
प्रथम सो कारण कहहु बिचारी । निर्गुन ब्रह्म सगुन बपु धारी ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
पुनि प्रभु कहहु राम अवतारा । बालचरित पुनि कहहु उदारा ॥
कहहु जथा जानकी बिबाहीं । राज तजा सो दूषन काहीं ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
बन बसि कीन्हे चरित अपारा । कहहु नाथ जिमि रावन मारा ॥
राज बैठि कीन्हीं बहु लीला । सकल कहहु संकर सुखसीला ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
पुनि प्रभु कहहु सो तत्त्व बखानी । जेहिं बिग्यान मगन मुनि ग्यानी ॥
भगति ग्यान बिग्यान बिरागा । पुनि सब बरनहु सहित बिभागा ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
औरउ राम रहस्य अनेका । कहहु नाथ अति बिमल बिबेका ॥
जो प्रभु मैं पूछा नहिं होई । सोउ दयाल राखहु जनि गोई ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
तुम्ह त्रिभुवन गुर बेद बखाना । आन जीव पाँवर का जाना ॥
प्रस्न उमा कै सहज सुहाई । छल बिहीन सुनि सिव मन भाई ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
झूठेउ सत्य जाहि बिनु जानें । जिमि भुजंग बिनु रजु पहिचानें ॥
जेहि जानें जग जाइ हेराई । जागें जथा सपन भ्रम जाई ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
बंदउँ बालरूप सोइ रामू । सब सिधि सुलभ जपत जिसु नामू ॥
मंगल भवन अमंगल हारी । द्रवउ सो दसरथ अजिर बिहारी ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
करि प्रनाम रामहि त्रिपुरारी । हरषि सुधा सम गिरा उचारी ॥
धन्य धन्य गिरिराजकुमारी । तुम्ह समान नहिं कोउ उपकारी ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
पूँछेहु रघुपति कथा प्रसंगा । सकल लोक जग पावनि गंगा ॥
तुम्ह रघुबीर चरन अनुरागी । कीन्हिहु प्रस्न जगत हित लागी ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
तदपि असंका कीन्हिहु सोई । कहत सुनत सब कर हित होई ॥
जिन्ह हरिकथा सुनी नहिं काना । श्रवन रंध्र अहिभवन समाना ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
नयनन्हि संत दरस नहिं देखा । लोचन मोरपंख कर लेखा ॥
ते सिर कटु तुंबरी समतूला । जे न नमत हरि गुरु पद मूला ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
जिन्ह हरिभगति हृदयँ नहिं आनी । जीवत सव समान तेई प्रानी ॥
जो नहिं करउ राम गुन गाना । जीह सो दादुर जीह समाना ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
कुलिस कठोर निठुर सोई छाती । सुनि हरिचरित न जो हरषाती ॥
गिरिजा सुनहु राम कै लीला । सुर हित दनुज बिमोहनसीला ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
रामकथा सुंदर कर तारी । संसय बिहग उडावनिहारी ॥
रामकथा कलि बिटप कुठारी । सादर सुनु गिरिराजकुमारी ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
राम नाम गुन चरित सुहाए । जनम करम अगनित श्रुति गाए ॥
जथा अनंत राम भगवाना । तथा कथा कीरति गुन नाना ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
तदपि जथा श्रुत जसि मति मोरी । कहिहउँ देखि प्रीति अति तोरी ॥
उमा प्रस्न तव सहज सुहाई । सुखद संतसंमत मोहि भाई ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
एक बात नहिं मोहि सोहानी । जदपि मोह बस कहेहु भवानी ॥
तुम्ह जो कहा राम कोउ आना । जेहि श्रुति गाव धरहिं मुनि ध्याना ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
अग्य अकोबिद अंध अभागी । काई विषय मुकुर मन लागी ॥
लंपट कपटी कुटिल बिसेषी । सपनेहुँ संतसभा नहिं देखी ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
कहहिं ते बेद असंमत बानी । जिन्ह कें सूझ लाभु नहिं हानी ॥
मुकुर मलिन अरु नयन बिहीना । राम रूप देखहिं किमि दीना ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
जिन्ह कें अगुन न सगुन बिबेका । जल्पहिं कल्पित बचन अनेका ॥
हरिमाया बस जगत भ्रमाहीं । तिन्हहि कहत कछु अघटित नाहीं ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
बातुल भूत बिबस मतवारे । ते नहिं बोलहिं बचन बिचारे ॥
जिन्ह कृत महामोह मद पाना । तिन्ह कर कहा करिअ नहिं काना ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
सगुनहि अगुनहि नहिं कछु भेदा । गावहिं मुनि पुरान बुध बेदा ॥
अगुन अरूप अलख अज जोई । भगत प्रेम बस सगुन सो होई ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
जो गुन रहित सगुन सोई कैसेँ । जलु हिम उपल बिलग नहिं जैसेँ ॥
जासु नाम भ्रम तिमिर पतंगा । तेहि किमि कहिअ बिमोह प्रसंगा ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
राम सच्चिदानंद दिनेसा । नहिं तहाँ मोह निसा लवलेसा ॥
सहज प्रकासरूप भगवाना । नहिं तहाँ पुनि बिग्यान बिहाना ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
हरष बिषाद ग्यान अग्याना । जीव धर्म अहमिति अभिमाना ॥
राम ब्रह्म ब्यापक जग जाना । परमानंद परेस पुराना ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
निज भ्रम नहिं समुझहिं अग्यानी । प्रभु पर मोह धरहिं जड़ प्रानी ॥
जथा गगन घन पटल निहारी । झाँपेउ भानु कहहिं कुबिचारी ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
चितव जो लोचन अँगुलि लाएँ । प्रगट जुगल ससि तेहि के भाएँ ॥
उमा राम बिषयक अस मोहा । नभ तम धूम धूरि जिमि सोहा ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
जगत प्रकास्य प्रकासक रामू । मायाधीस ग्यान गुन धामू ॥
जासु सत्यता तें जड़ माया । भास सत्य इव मोह सहाया ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
एहि बिधि जग हरि आश्रित रहई । जदपि असत्य देत दुख अहई ॥
जौं सपनें सिर काटे कोइ । बिनु जागें न दूरि दुख होइ ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
जासु कृपाँ अस भ्रम मिटि जाई । गिरिजा सोइ कृपाल रघुराई ॥
आदि अंत कोउ जासु न पावा । मति अनुमानि निगम अस गावा ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
बिनु पद चलइ सुनइ बिनु काना । कर बिनु करम करइ बिधि नाना ॥
आनन रहित सकल रस भोगी । बिनु बानी बकता बड़ जोगी ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
तन बिनु परस नयन बिनु देखा । ग्रहइ घ्रान बिनु बास असेषा ॥
असि सब भाँति अलौकिक करनी । महिमा जासु जाइ नहिं बरनी ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
कासीं मरत जंतु अवलोकी । जासु नाम बल करउँ बिसोकी ॥
सोइ प्रभु मोर चराचर स्वामी । रघुबर सब उर अंतरजामी ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
बिबसहुँ जासु नाम नर कहहीं । जनम अनेक रचित अघ दहहीं ॥
सादर सुमिरन जे नर करहीं । भव बारिधि गोपद इव तरहीं ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
राम सो परमतमा भवानी । तहाँ भ्रम अति अबिहित तव बानी ॥
अस संसय आनत उर माहीं । ग्यान बिराग सकल गुन जाहीं ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
सुनि सिव के भ्रम भंजन बचना । मिटि गै सब कुतरक कै रचना ॥
भई रघुपति पद प्रीति प्रतीती । दारुन असंभावना बीती ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
ससि कर सम सुनि गिरा तुम्हारी । मिटा मोह सरदातप भारी ॥
तुम्ह कृपाल सबु संसउ हरेऊ । राम स्वरूप जानि मोहि परेऊ ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
नाथ कृपाँ अब गयउ बिषादा । सुखी भयउँ प्रभु चरन प्रसादा ॥
अब मोहि आपनि किंकरि जानी । जदपि सहज जड़ नारि अयानी ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
प्रथम जो मैं पूँछा सोइ कहहू । जौं मो पर प्रसन्न प्रभु अहहू ॥
राम ब्रह्म चिनमय अबिनासी । सर्व रहित सब उर पुर बासी ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
नाथ धरेउ नरतनु केहि हेतु । मोहि समुझाइ कहहु बृषकेतू ॥
उमा बचन सुनि परम बिनीता । रामकथा पर प्रीति पुनीता ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
सुनु गिरिजा हरिचरित सुहाए । बिपुल बिसद निगमागम गाए ॥
हरि अवतार हेतु जेहि होई । इदमित्थं कहि जाइ न सोई ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
राम अतर्क्य बुद्धि मन बानी । मत हमार अस सुनहि सयानी ॥
तदपि संत मुनि बेद पुराना । जस कछु कहहिं स्वमति अनुमाना ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
तस मैं सुमुखि सुनावउँ तोही । समुझि परइ जस कारन मोही ॥
जब जब होइ धरम कै हानी । बाढ़हिं असुर अधम अभिमानी ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
करहिं अनीति जाइ नहिं बरनी । सीदहिं बिप्र धेनु सुर धरनी ॥
तब तब प्रभु धरि बिबिध सरीरा । हरहिं कृपानिधि सज्जन पीरा ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
सोइ जस गाइ भगत भव तरहिं । कृपासिंधु जन हित तनु धरहीं ॥
राम जनम के हेतु अनेका । परम बिचित्र एक तें एका ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
जनम एक दुइ कहउँ बखानी । सावधान सुनु सुमति भवानी ॥
द्वारपाल हरि के प्रिय दोऊ । जय अरु विजय जान सब कोऊ ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
बिप्र श्राप तें दूनउ भाई । तामस असुर देह तिन्ह पाई ॥
कनककसिपु अरु हाटकलोचन । जगत बिदित सुरपति मद मोचन ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
बिजइ समर बीर बिख्याता । धरि बराह बपु एक निपाता ॥
होइ नरहरि दूसर पुनि मारा । जन प्रह्लाद सुजस बिस्तारा ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
मुकुत न भए हते भगवाना । तीनि जनम द्विज बचन प्रवाना ॥
एक बार तिन्ह के हित लागी । धरेउ सरीर भगत अनुरागी ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
कस्यप अदिति तहाँ पितु माता । दसरथ कौसल्या बिख्याता ॥
एक कलप एहि बिधि अवतारा । चरित पवित्र किए संसारा ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
एक कलप सुर देखि दुखारे । समर जलंधर सन सब हारे ॥
संभु कीन्ह संग्राम अपारा । दनुज महाबल मरइ न मारा ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
तासु श्राप हरि दीन्ह प्रमाना । कौतुकनिधि कृपाल भगवाना ॥
तहाँ जलंधर रावन भयउ । रन हति राम परम पद दयउ ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
एक जनम कर कारन एहा । जेहि लगि राम धरी नरदेहा ॥
प्रति अवतार कथा प्रभु केरी । सुनु मुनि बरनी कबिन्ह घनेरी ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
नारद श्राप दीन्ह एक बारा । कलप एक तेहि लगि अवतारा ॥
गिरिजा चकित भई सुनि बानी । नारद बिष्णुभगत पुनि ग्यानी ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
कारन कवन श्राप मुनि दीन्हा । का अपराध रमापति कीन्हा ॥
यह प्रसंग मोहि कहहु पुरारी । मुनि मन मोह आचरज भारी ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
हिमगिरि गुहा एक अति पावनि । बह समीप सुरसरि सुहावनि ॥
आश्रम परम पुनीत सुहावा । देखि देवरिषि मन अति भावा ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
निरखि सैल सरि बिपिन बिभागा । भयउ रमापति पद अनुरागा ॥
सुमिरत हरिहि श्राप गति बाधी । सहज बिमल मन लागि समाधी ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
मुनि गति देखि सुरेस डेराना । कामहि बोलि कीन्ह सनमाना ॥
सहित सहाय जाहु मम हेतु । चलेउ हरषि हियँ जलचरकेतू ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
सुनासीर मन महुँ असि त्रासा । चहत देवरिषि मम पुर बासा ॥
जे कामी लोलुप जग माहीं । कुटिल काक इव सबहि डेराहीं ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
तेहि आश्रमहिं मदन जब गयऊ । निज मायाँ बसंत निरमयऊ ॥
कुसुमित बिबिध बिटप बहुरंगा । कूजहि कोकिल गुंजहिं भृंगा ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
चली सुहावनि त्रिबिध बयारी । काम कृसानु बढ़ावनिहारी ॥
रंभादिक सुरनारि नबीना । सकल असमसर कला प्रबीना ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
करहिं गान बहु तान तरंगा । बहुबिधि क्रीडहिं पानि पतंगा ॥
देखि सहाय मदन हरषाना । कीन्हेसि पुनि प्रपंच बिधि नाना ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
काम कला कछु मुनिहि न ब्यापी । निज भयँ डेरउ मनोभव पापी ॥
सीम कि चाँपि सकइ कोउ तासू । बड़ रखवार रमापति जासू ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
मुनि सुसीलता आपनि करनी । सुरपति सभाँ जाइ सब बरनी ॥
सुनि सब कें मन अचरजु आवा । मुनिहि प्रसंसि हरिहि सिर नावा ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
तब नारद गवने सिव पाहीं । जिताकाम अहमिति मन माहीं ॥
मार चरित संकरहि सुनाए । अतिप्रिय जानि महेस सिखाए ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
बार बार बिनवउँ मुनि तोही । जिमि यह कथा सुनायहु मोही ॥
तिमि जनि हरिहि सुनावहु कबहूँ । चलें प्रसंग दुराएहु तबहूँ ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
राम कीन्ह चाहहिं सोइ होई । करै अन्यथा अस नहिं कोई ॥
संभु बचन मुनि मन नहिं भाए । तब बिरंचि के लोक सिधाए ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
एक बार करतल बर बीना । गावत हरि गुन गान प्रबीना ॥
छीरसिंधु गवने मुनिनाथा । जहँ बस श्रीनिवास श्रुतिमाथा ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
हरषि मिले उठि रमानिकेता । बैठे आसन रिषिहि समेता ॥
बोले बिहसि चराचर राया । बहुते दिनन कीन्हि मुनि दाया ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
काम चरित नारद सब भाषे । जद्यपि प्रथम बरजि सिवँ राखे ॥
अति प्रचंड रघुपति कै माया । जेहि न मोह अस को जग जाया ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
सुनु मुनि मोह होइ मन ताकें । ग्यान बिराग हृदय नहिं जाकें ॥
ब्रह्मचरज ब्रत रत मतिधीरा । तुम्हहि कि करइ मनोभव पीरा ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
नारद कहेउ सहित अभिमाना । कृपा तुम्हारि सकल भगवाना ॥
करुनानिधि मन दीख बिचारी । उर अंकुरेउ गरब तरु भारी ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
बेगि सो मैं डारिहउँ उखारी । पन हमारे सेवक हितकारी ॥
मुनि कर हित मम कौतुक होई । अवसि उपाय करबि मैं सोई ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
तब नारद हरि पद सिर नाई । चले हृदयँ अहमिति अधिकाई ॥
श्रीपति निज माया तब प्रेरी । सुनहु कठिन करनी तेहि केरी ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
बसहिं नगर सुंदर नर नारी । जनु बहु मनसिज रति तनुधारी ॥
तेहिं पुर बसइ सीलनिधि राजा । अगनित हय गय सेन समाजा ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
सत सुरेस सम बिभव बिलासा । रूप तेज बल नीति निवासा ॥
बिस्वमोहिनी तासु कुमारी । श्री बिमोहु जिसु रूपु निहारी ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
सोइ हरिमाया सब गुन खानी । सोभा तासु कि जाइ बखानी ॥
करइ स्वयंबर सो नृपबाला । आए तहँ अगनित महिपाला ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
मुनि कौतुकी नगर तेहिं गयऊ । पुरबासिन्ह सब पूछत भयऊ ॥
सुनि सब चरित भूपगृहँ आए । करि पूजा नृप मुनि बैठाए ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
देखि रूप मुनि बिरति बिसारी । बड़ी बार लगि रहे निहारी ॥
लच्छन तासु बिलोकि भुलाने । हृदयँ हरष नहिं प्रगट बखाने ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
जो एहि बरइ अमर सोई होई । समरभूमि तेहि जीत न कोई ॥
सेवहिं सकल चराचर ताही । बरइ सीलनिधि कन्या जाही ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
लच्छन सब बिचारि उर राखे । कछुक बनाए भूप सन भाषे ॥
सुता सुलच्छन कहि नृप पाहीं । नारद चले सोच मन माहीं ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
करौं जाइ सोइ जतन बिचारी । जेहि प्रकार मोहि बरै कुमारी ॥
जप तप कछु न होइ तेहि काला । हे बिधि मिलइ कवन बिधि बाला ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
हरि सन मागौं सुंदरताई । होइहि जात गहरु अति भाई ॥
मोरे हित हरि सम नहिं कोऊ । एहि अवसर सहाय सोइ होऊ ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
बहुबिधि बिनय कीन्हि तेहि काला । प्रगटेउ प्रभु कौतुकी कृपाला ॥
प्रभु बिलोकि मुनि नयन जुड़ाने । होइहि काजु हिएँ हरषाने ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
अति आरति कहि कथा सुनाई । करहु कृपा करि होहु सहाई ॥
आपन रूप देहु प्रभु मोही । आन भाँति नहिं पावौं ओही ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
जेहि बिधि नाथ होइ हित मोरा । करहु सो बेगि दास मैं तोरा ॥
निज माया बल देखि बिसाला । हियँ हँसि बोले दीनदयाला ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
कुपथ माग रुज ब्याकुल रोगी । बैद न देइ सुनहु मुनि जोगी ॥
एहि बिधि हित तुम्हार मैं ठयऊ । कहि अस अंतरहित प्रभु भयऊ ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
माया बिबस भए मुनि मूढ़ा । समुझी नहिं हरि गिरा निगूढ़ा ॥
गवने तुरत तहँ ऋषिराई । जहाँ स्वयंबर भूमि बनाई ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
निज निज आसन बैठे राजा । बहु बनाव करि सहित समाजा ॥
मुनि मन हरषि रूप अति मोरें । मोहि तजि आनहि बरिहि न भोरें ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
मुनि हित कारन कृपानिधाना । दीन्ह कुरूप न जाइ बखाना ॥
सो चरित्र लखि काहूँ न पावा । नारद जानि सबहिं सिर नावा ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
जेहिं समाज बैठे मुनि जाई । हृदयँ रूप अहमिति अधिकाई ॥
तहँ बैठे महेस गन दोऊ । बिप्रबेष गति लखइ न कोऊ ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
करहिं कूटि नारदहि सुनाई । नीकि दीन्ह हरि सुंदरताई ॥
रीझिहि राजकुँअरि छबि देखी । इन्हहि बरिहि हरि जानि बिसेषी ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
मुनिहि मोह मन हाथ पराएँ । हँसहिं संभु गन अति सचु पाएँ ॥
जदपि सुनहिं मुनि अटपटि बानी । समुझि न परइ बुद्धि भ्रम सानी ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
काहूँ न लखा सो चरित बिषेषा । सो सरूप नृपकन्याँ देखा ॥
मर्कट बदन भयंकर देही । देखत हृदयँ क्रोध भा तेही ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
जेहि दिसि बैठे नारद फूली । सो दिसि तेहि न बिलोकि भूली ॥
पुनि पुनि मुनि उकसहिं अकुलाहीं । देखि दसा हर गन मुसुकाहीं ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
धरि नृपतनु तहँ गयउ कृपाला । कुअँरि हरषि मेलेउ जयमाला ॥
दुलहिनि लै गे लच्छिनिवासा । नृपसमाज सब भयउ निरासा ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
मुनि अति बिकल मोहि मति नाठी । मनि गिरि गई छूटि जनु गाँठी ॥
तब हर गन बोले मुसुकाई । निज मुख मुकुर बिलोकहु जाई ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
अस कहि दौड़ भागे भयँ भारी । बदन दीख मुनि बारि निहारी ॥
बेषु बिलोकि क्रोध अति बाढ़ा । तिन्हहि सराप दीन्ह अति गाढ़ा ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
पुनि जल दीख रूप निज पावा । तदपि हृदयँ संतोष न आवा ॥
फरकत अधर कोप मन माहीं । सपदि चले कमलापति पाहीं ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
देहउँ श्राप कि मरिहउँ जाई । जगत मोरि उपहास कराई ॥
बीचहिं पंथ मिले दनुजारी । संग रमा साँइ राजकुमारी ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
बोले मधुर बचन सुरसाईं । मुनि कहँ चले बिकल की नाईं ॥
सुनत बचन उपजा अति क्रोधा । माया बस न रहा मन बोधा ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
पर संपदा सकहु नहिं देखी । तुम्हरें ईरिषा कपट बिसेषी ॥
मथत सिंधु रुद्रहि बौरायहु । सुरन्ह प्रेरि बिष पान करायहु ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
परम स्वतंत्र न सिर पर कोई । भावइ मनहि करहु तुम्ह सोई ॥
भलेहि मंद मंदेहि भल करहु । बिसमय हरष न हियँ कछु धरहु ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
डहकि डहकि परिचेहु सब काहू । अति असंक मन सदा उछाहू ॥
करम सुभासुभ तुम्हहि न बाधा । अब लगि तुम्हहि न काहूँ साधा ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
भले भवन अब बायन दीन्हा । पावहुगे फल आपन कीन्हा ॥
बंचेहु मोहि जवनि धरि देहा । सोइ तनु धरहु श्राप मम एहा ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
कपि आकृति तुम्ह कीन्हि हमारी । करिहहिं कीस सहाय तुम्हारी ॥
मम अपकार कीन्ह तुम्ह भारी । नारि बिरहँ तुम्ह होब दुखारी ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
जब हरि माया दूरि निवारी । नहिं तहँ रमा न राजकुमारी ॥
तब मुनि अति सभीत हरि चरना । गहे पाहि प्रनतारति हरना ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
मृषा होउ मम श्राप कृपाला । मम इच्छा कह दीनदयाला ॥
मैं दुर्बचन कहे बहुतेरे । कह मुनि पाप मिटिहिं किमि मेरे ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
जपहु जाइ संकर सत नामा । होइहि हृदयँ तुरत बिश्रामा ॥
कोउ नहिं सिव समान प्रिय मोरें । असि प्रीति तजहु जनि भोरें ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
जेहि पर कृपा न करहिं पुरारी । सो न पाव मुनि भगति हमारी ॥
अस उर धरि महि बिचरहु जाई । अब न तुम्हहि माया नियराई ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
हर गन हम न बिप्र मुनिराया । बड़ अपराध कीन्ह फल पाया ॥
श्राप अनुग्रह करहु कृपाला । बोले नारद दीनदयाला ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
निसिचर जाइ होहु तुम्ह दोऊ । बैभव बिपुल तेज बल होऊ ॥
भुज बल बिस्व जितब तुम्ह जहिआ । धरिहहिं बिष्णु मनुज तनु तहिआ ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
समर मरन हरि हाथ तुम्हारा । होइहहु मुकुत न पुनि संसारा ॥
चले जुगल मुनि पद सिर नाई । भए निसाचर कालहि पाई ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
एहि बिधि जनम करम हरि केरे । सुंदर सुखद बिचित्र घनेरे ॥
कल्प कल्प प्रति प्रभु अवतरहीं । चारु चरित नानाबिधि करहीं ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
तब तब कथा मुनीसन्ह गाई । परम पुनीत प्रबंध बनाई ॥
बिबिध प्रसंग अनूप बखाने । करहिं न सुनि आचरजु सयाने ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
हरि अनंत हरिकथा अनंता । कहहिं सुनहिं बहुबिधि सब संता ॥
रामचंद्र के चरित सुहाए । कल्प कोटि लगि जाहिं न गाए ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
यह प्रसंग मैं कहा भवानी । हरिमायाँ मोहहिं मुनि ग्यानी ॥
प्रभु कौतुकी प्रनत हितकारी । सेवत सुलभ सकल दुखहारी ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
अपर हेतु सुनु सैलकुमारी । कहउँ बिचित्र कथा बिस्तारी ॥
जेहि कारन अज अगुन अरूपा । ब्रह्म भयउ कोसलपुर भूपा ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
जो प्रभु बिपिन फिरत तुम्ह देखा । बंधु समेत धरें मुनिबेषा ॥
जासु चरित अवलोकि भवानी । सती सरीर रहिहु बौरानी ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
अजहूँ न छाया मिटति तुम्हारी । तासु चरित सुनु भ्रम रुज हारी ॥
लीला कीन्हि जो तेहिं अवतारा । सो सब कहहुँ मति अनुसारा ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
भरदाज सुनि संकर बानी । सकुचि सप्रेम उमा मुसुकानी ॥
लगे बहुरि बरने बृषकेतू । सो अवतार भयउ जेहि हेतु ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
स्वायंभू मनु अरु सतरूपा । जिन्ह तें भै नरसृष्टि अनूपा ॥
दंपति धरम आचरन नीका । अजहूँ गाव श्रुति जिन्ह कै लीका ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
नृप उतानपाद सुत तासू । ध्रुव हरिभगत भयउ सुत जासू ॥
लघु सुत नाम प्रियव्रत ताही । बेद पुरान प्रसंसहिं जाही ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
देवहूति पुनि तासु कुमारी । जो मुनि कर्दम कै प्रिय नारी ॥
आदिदेव प्रभु दीनदयाला । जठर धरें जेहिं कपिल कृपाला ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
सांख्य सास्त्र जिन्ह प्रगट बखाना । तत्त्व बिचार निपुन भगवाना ॥
तेहिं मनु राज कीन्ह बहु काला । प्रभु आयसु सब बिधि प्रतिपाला ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
बरबस राज सुतहि तब दीन्हा । नारि समेत गवन बन कीन्हा ॥
तीरथ बर नैमिष बिख्याता । अति पुनीत साधक सिधि दाता ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
बसहिं तहँ मुनि सिद्ध समाजा । तहँ हियँ हरषि चलेउ मनु राजा ॥
पंथ जात सोहहिं मतिधीरा । ग्यान भगति जनु घेरें सरीरा ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
पहुँचे जाइ धेनुमति तीरा । हरषि नहाने निर्मल नीरा ॥
आए मिलन सिद्ध मुनि ग्यानी । धरम धुरंधर नृपरिषि जानी ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
जहँ जहाँ तीरथ रहे सुहाए । मुनिन्ह सकल सादर करवाए ॥
कृस सरीर मुनिपट परिधाना । सत समाज नित सुनहिं पुराना ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
करहिं अहार साक फल कंदा । सुमिरहिं ब्रह्म सच्चिदानंदा ॥
पुनि हरि हेतु करन तप लागे । बारि अधार मूल फल त्यागे ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
उर अभिलाष निरंतर होई । देखिअ नयन परम प्रभु सोई ॥
अगुन अखंड अनंत अनादी । जेहि चिंतहिं परमारथबादी ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
नेति नेति जेहि बेद निरूपा । निजानंद निरुपाधि अनूपा ॥
संभु बिरंचि बिष्नु भगवाना । उपजहिं जासु अंस तें नाना ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
ऐसेउ प्रभु सेवक बस अहई । भगत हेतु लीलातनु गहई ॥
जौं यह बचन सत्य श्रुति भाषा । तो हमार पूजिहि अभिलाषा ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
मागउ बर बहु भाँति लुभाए । परम धीर नहिं चलहिं चलाए ॥
अस्थिमात्र होइ रहे सरीरा । तदपि मनाग मनहिं नहिं पीरा ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
प्रभु सर्वज्ञ दास निज जानी । गति अनन्य तापस नृप रानी ॥
मागु मागु बर भै नभ बानी । परम गभीर कृपामृत सानी ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
मृतक जिआवनि गिरा सुहाई । श्रवन रंध्र होइ उर जब आई ॥
हृष्ट पुष्ट तन भए सुहाए । मानहुँ अबहिं भवन ते आए ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
सुनु सेवक सुरतरु सुरधेनू । बिधि हरि हर बंदित पद रेनू ॥
सेवत सुलभ सकल सुखदायक । प्रनतपाल सचराचर नायक ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
जौं अनाथ हित हम पर नेहू । तौ प्रसन्न होइ यह बर देहू ॥
जो सरूप बस सिव मन माहीं । जेहि कारन मुनि जतन कराहीं ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
जो भुसुंडि मन मानस हंसा । सगुन अगुन जेहि निगम प्रसंसा ॥
देखहिं हम सो रूप भरि लोचन । कृपा करहु प्रनतारति मोचन ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
दंपति बचन परम प्रिय लागे । मृदुल बिनीत प्रेम रस पागे ॥
भगत बच्छल प्रभु कृपानिधाना । बिस्वबास प्रगटे भगवाना ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
सरद मयंक बदन छबि सींवा । चारु कपोल चिक्कुर दर ग्रीवा ॥
अधर अरुन रद सुंदर नासा । बिधु कर निकर बिनिंदक हासा ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
नव अंबुज अंबक छबि नीकी । चितवनि ललित भावती जी की ॥
भूकुटि मनोज चाप छबि हारी । तिलक ललाट पटल दुतिकारी ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
कुंडल मकर मुकुट सिर भ्राजा । कुटिल केस जनु मधुप समाजा ॥
उर श्रीवत्स रुचिर बनमाला । पदिक हार भूषन मणिजाला ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
केहरि कंधर चारु जनेऊ । बाहु बिभूषन सुंदर तेऊ ॥
करि कर सरिस सुभग भुजदंडा । कटि निषंग कर सर कोदंडा ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
पद राजीव बरनि नहिं जाहिं । मुनि मन मधुप बसहिं जेन्ह माहीं ॥
बाम भाग सोभति अनुकूला । आदिसक्ति छबिनिधि जगमूला ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
जासु अंस उपजहि गुनखानी । अगनित लच्छि उमा ब्रह्मानी ॥
भूकुटि बिलास जासु जग होई । राम बाम दिसि सीता सोई ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
छबिसमुद्र हरि रूप बिलोकी । एकटक रहे नयन पट रोकी ॥
चितवहिं सादर रूप अनूपा । तृप्ति न मानहिं मनु सतरूपा ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
हरष बिबस तन दसा भुलानी । परे दंड इव गहि पद पानी ॥
सिर परसे प्रभु निज कर कंजा । तुरत उठाए करुनापुंजा ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
एक लालसा बड़ि उर माहीं । सुगम अगम कहि जाति सो नाहीं ॥
तुम्हहि देत अति सुगम गोसाई । अगम लाग मोहि निज कृपनाई ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
जथा दरिद्र बिबुधतरु पाई । बहु संपत्ति मागत सकुचाई ॥
तासु प्रभाउ जान नहि सोई । तथा हृदयँ मम संसय होई ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
सो तुम्ह जानहु अंतरजामी । पुरवहु मोर मनोरथ स्वामी ॥
सकुच बिहाइ मागु नृप मोही । मोरें नहिं अदेय कछु तोही ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
देखि प्रीति सुनि बचन अमोले । एवमस्तु करुनानिधि बोले ॥
आपु सरिस खोजौं कहँ जाई । नृप तब तनय होब मैं आई ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
सतरूपहि बिलोकि कर जोरें । देबि मागु बर जो रुचि तोरें ॥
जो बर नाथ चतुर नृप मागा । सोइ कृपाल मोहि अति प्रिय लागा ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
प्रभु परंतु सुठि होति ढिठाई । जदपि भगत हित तुम्हहि सोहाई ॥
तुम्ह ब्रह्मादि जनक जग स्वामी । ब्रह्म सकल उर अंतरजामी ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
अस समुझत मन संसय होई । कहा जो प्रभु प्रवान पुनि सोई ॥
जे निज भगत नाथ तव अहहीं । जो सुख पावहिं जो गति लहहीं ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
सुनि मृदु गूढ़ रुचिर बर रचना । कृपासिंधु बोले मृदु बचना ॥
जो कछु रुचि तुम्हरे मन माहीं । मैं सो दीन्ह सब संसय नाहीं ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
मातु बिबेक अलौकिक तोरें । कबहुँ न मिटिहि अनुग्रह मोरें ॥
बंदि चरन मनु कहेउ बहोरी । अवर एक बिनती प्रभु मोरी ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
सुत बिषइक तब पद रति होऊ । मोहिं बड़ मूढ़ कहै किन कोऊ ॥
मनि बिनु फनि जिमि जल बिनु मीना । मम जीवन तिमि तुम्हहि अधीना ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
अस बर मागि चरन गहि रहेऊ । एवमस्तु करुनानिधि कहेऊ ॥
अब तुम्ह मम अनुसासन मानी । बसहु जाइ सुरपति रजधानी ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
इच्छामय नरबेष सँवारें । होइहउँ प्रगट निकेत तुम्हारें ॥
अंसन्ह सहित देह धरि ताता । करिहउँ चरित भगत सुखदाता ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
जे सुनि सादर नर बड़भागी । भव तरिहहिं ममता मद त्यागी ॥
आदिसक्ति जेहिं जग उपजाया । सोउ अवतरिहि मोरि यह माया ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
पुरउब मैं अभिलाष तुम्हारा । सत्य सत्य पन सत्य हमारा ॥
पुनि पुनि अस कहि कृपानिधाना । अंतरधान भए भगवाना ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
दंपति उर धरि भगत कृपाला । तेहिं आश्रम निवसे कछु काला ॥
समय पाइ तनु तजि अनयासा । जाइ कीन्ह अमरावति बासा ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
सुनु मुनि कथा पुनीत पुरानी । जो गिरिजा प्रति संभु बखानी ॥
बिस्व बिदित एक कैकय देसू । सत्यकेतु तहँ बसइ नरेसू ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
धरम धुरंधर नीति निधाना । तेज प्रताप सील बलवाना ॥
तेहि कें भए जुगल सुत बीरा । सब गुन धाम महा रनधीरा ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
राज धनी जो जेठ सुत आही । नाम प्रतापभानु अस ताही ॥
अपर सुतहि अरिमर्दन नामा । भुजबल अतुल अचल संग्रामा ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
भाइहि भाइहि परम समीती । सकल दोष छल बरजित प्रीती ॥
जेठे सुतहि राज नृप दीन्हा । हरि हित आपु गवन बन कीन्हा ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
नृप हितकारक सचिव सयाना । नाम धरमरुचि सुक्र समाना ॥
सचिव सयान बंधु बलबीरा । आपु प्रतापपुंज रनधीरा ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
सप्त दीप भुजबल बस कीन्हें । लै लै दंड छाँड़ि नृप दीन्हें ॥
सकल अवनि मंडल तेहि काला । एक प्रतापभानु महिपाला ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
भूप प्रतापभानु बल पाई । कामधेनु भै भूमि सुहाई ॥
सब दुख बरजित प्रजा सुखारी । धरमसील सुंदर नर नारी ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
सचिव धरमरुचि हरि पद प्रीती । नृप हित हेतु सिखव नित नीति ॥
गुर सुर संत पितर महिदेवा । करइ सदा नृप सब कै सेवा ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
भूप धरम जे बेद बखाने । सकल करइ सादर सुख माने ॥
दिन प्रति देइ बिबिध बिधि दाना । सुनइ सास्त्र बर बेद पुराना ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
नाना बापीं कूप तड़ागा । सुमन बाटिका सुंदर बागा ॥
बिप्रभवन सुरभवन सुहाए । सब तीरथन्ह बिचित्र बनाए ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
हृदयँ न कछु फल अनुसंधाना । भूप बिबेकी परम सुजाना ॥
करइ जे धरम करम मन बानी । बासुदेव अर्पित नृप ग्यानी ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
चढ़ि बर बाजि बार एक राजा । मृगया कर सब साजि समाजा ॥
बिंध्याचल गभीर बन गयऊ । मृग पुनीत बहु मारत भयऊ ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
फिरत बिपिन नृप दीख बराहू । जनु बन दुरेउ ससिहि ग्रसि राहू ॥
बड़ बिधु नहिं समात मुख माहीं । मनहुँ क्रोध बस उगलत नाहीं ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
आवत देखि अधिक रव बाजी । चलेउ बराह मरुत गति भागी ॥
तुरत कीन्ह नृप सर संधाना । महि मिलि गयउ बिलोक्त बाना ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
तकि तकि तीर महीस चलावा । करि छल सूअर सरीर बचावा ॥
प्रगटत दूरि जाइ मृग भागा । रिस बस भूप चलेउ संग लागा ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
गयउ दूरि घन गहन बराहू । जहाँ नाहिन गज बाजि निवाहू ॥
अति अकेल बन बिपुल कलेसू । तदपि न मृग मग तजइ नरेसू ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
कोल बिलोकि भूप बड़ धीरा । भागि पैठ गिरिगुहँ गभीरा ॥
अगम देखि नृप अति पछिताई । फिरेउ महाबन पेरउ भुलाई ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
फिरत बिपिन आश्रम एक देखा । तहँ बस नृपति कपट मुनिबेषा ॥
जासु देस नृप लीन्ह छड़ाई । समर सेन तजि गएउ पराई ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
समय प्रतापभानु कर जानी । आपन अति असमय अनुमानी ॥
गयउ न गृह मन बहुत गलानी । मिला न राजहि नृप अभिमानी ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
रिस उर मारि रंक जिमि राजा । बिपिन बसइ तापस के साजा ॥
तासु समीप गवन नृप कीन्हा । यह प्रतापरबि तेहिं तब चीन्हा ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
राउ तृषित नहिं सो पहिचाना । देखि सुबेष महामुनि जाना ॥
उतरि तुरग तें कीन्ह प्रनामा । परम चतुर न कहेउ निज नामा ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
गए श्रम सकल सुखी नृप भयऊ । निज आश्रम तापस लै गयऊ ॥
आसन दीन्ह अस्त रबि जानी । पुनि तापस बोले मृदु बानी ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
को तुम्ह कस बन फिरहु अकेलें । सुंदर जुबा जीव परहेलें ॥
चक्रबर्ति के लच्छन तोरें । देखत दया लागति अति मोरें ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
नाम प्रतापभानु अवनीसा । तासु सचिव मैं सुनहु मुनीसा ॥
फिरत अहेरें परेउँ भुलाई । बड़े भाग देखें पद आई ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
हम कहें दुर्लभ दरस तुम्हारा । जानत हों कछु भल होनिहारा ॥
कह मुनि तात भयउ अँधिआरा । जोजन सत्तरि नगर तुम्हारा ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
भलेहिं नाथ आयसु धरि सीसा । बाँधि तुरग तर बैठ महीसा ॥
नृप बहु भाँति प्रसंसेउ ताही । चरन बंदि निज भाग्य सराही ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
पुनि बोले मृदु गिरा सुहाई । जानि पिता प्रभु करउँ ढिठाई ॥
मोहिं मुनीस सुत सेवक जानी । नाथ नाम निज कहहु बखानी ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
तेहि न जान नृप नृपहिं सो जाना । भूप सुहृद सो कपट सयाना ॥
बैरी पुनि छत्री पुनि राजा । छल बल कीन्ह चहइ निज काजा ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
समुझि राजसुख दुखित अराती । अवाँ अनल इव सुलगइ छाती ॥
सरल बचन नृप के सुनि काना । बयर सँभारि हृदयँ हरषाना ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
कह नृप जे बिद्यान निधाना । तुम्ह सारिखे गलित अभिमाना ॥
सदा रहहिं अपनपौं दुराएँ । सब बिधि कुसल कुबेष बनाएँ ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
तेहि तें कहहिं संत श्रुति टेरे । परम अकिंचन प्रिय हरि केरें ॥
तुम्ह सम अधन भिखारि अगेहा । होत बिरंचि सिवहि संदेहा ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
जोइ सोंइ तब चरन नमामी । मो पर कृपा करिअ अब स्वामी ॥
सहज प्रीति भूपति के देखी । आपु बिषय बिस्वास बिसेषी ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
सब प्रकार राजहि अपनाई । बोलेउ अधिक सनेह जनाई ॥
सुनु सतिभाउ कहउँ महिपाला । इहाँ बसत बीते बहु काला ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
तातें गुपुत रहउँ जग माहीं । हरि तजि किमपि प्रयोजन नाहीं ॥
प्रभु जानत सब बिनहीं जनाएँ । कहहु कवन सिधि लोक रिझाएँ ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
तुम्ह सुचि सुमति परम प्रिय मोरें । प्रीति प्रतीति मोहि पर तोरें ॥
अब जौं तात दुरावउँ तोही । दारुन दोष घटै अति मोही ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
जिमि जिमि तापस कहउ उदासा । तिमि तिमि नृपहि उपज बिस्वासा ॥
देखा स्वबस कर्म मन बानी । तब बोला तापस बग्यानी ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
नाम हमार एकतनु भाई । सुनि नृप बोलेउ पुनि सिर नाई ॥
कहहु नाम कर अरथ बखानी । मोहिं सेवक अति आपन जानी ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
जनि आचरजु करहु मन माहीं । सुत तप तें दुर्लभ कछु नाहीं ॥
तपबल तें जग सृजइ बिधाता । तपबल बिष्णु भए परित्राता ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
तपबल संभु करहिं संघारा । तप तें अगम न कछु संसारा ॥
भयउ नृपहि सुनि अति अनुरागा । कथा पुरातन कहे सो लागा ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
करम धरम इतिहास अनेका । करइ निरूपन बिरति बिबेका ॥
उदभव पालन प्रलय कहानी । कहहिं अमित आचरज बखानी ॥
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सोरठा 163बाल काण्ड
सुनु महीस असि नीति जहाँ तहँ नाम न कहहिं नृप ।
मोहि तोहि पर अति प्रीति सोइ चतुरता बिचारि तव ॥ १६३ ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
नाम तुम्हार प्रताप दिनेसा । सत्यकेतु तव पिता नरेसा ॥
गुर प्रसाद सब जानिअ राजा । कहिअ न आपन जानि अकाजा ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
देखि तात तव सहज सुधाई । प्रीति प्रतीति नीति निपुनाई ॥
उपजि परी ममता मन मोरें । कहउँ कथा निज पूछें तोरें ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
अब प्रसन्न मैं संसय नाहीं । मागु जो भूप भाव मन माहीं ॥
सुनि सुबचन भूपति हरषाना । गहि पद बिनय कीन्हि बिधि नाना ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
कृपासिंधु मुनि दरसन तोरें । चारि पदारथ करतल मोरें ॥
प्रभुहि तथापि प्रसन्न बिलोकी । मागि अगम बर होउँ असोकी ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
कह तापस नृप ऐसेहु होऊ । कारन एक कठिन सुनु सोऊ ॥
कालउ तुअ पद नाइहि सीसा । एक बिप्रकुल छाँड़ि महीसा ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
तपबल बिप्र सदा बरिआरा । तिन्ह के कोप न कोउ रखवारा ॥
जौं बिप्रन्ह बस करहु नरेसा । तौ तुअ बस बिधि बिष्नु महेसा ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
चल न ब्रह्मकुल सन बरिआई । सत्य कहउँ दोउ भुजा उठाई ॥
बिप्र श्राप बिनु सुनु महिपाला । तोर नास नहिं कवनेहुँ काला ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
हरषेउ राउ बचन सुनि तासू । नाथ न होइ मोर अब नासू ॥
तव प्रसाद प्रभु कृपानिधाना । मो कहुँ सर्व काल कल्याना ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
तातें मैं तोहि बरजउँ राजा । कहें कथा तव परम अकाजा ॥
छठें श्रवन यह परत कहानी । नास तुम्हार सत्य मम बानी ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
यह प्रगटें अथवा द्विजश्रापा । नास तोर सुनु भानुप्रतापा ॥
आन उपायँ निधन तव नाहीं । जौं हरि हर कोपहिं मन माहीं ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
सत्य नाथ पद गहि नृप भाषा । द्विज गुरु कोप कहहु को राखा ॥
राखइ गुरु जौं कोप बिधाता । गुरु बिरोध नहिं कोउ जग त्राता ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
जौं न चलब हम कहे तुम्हारें । होउ नास नहिं सोच हमारेँ ॥
एकहि डर डरपत मन मोरा । प्रभु महिदेव श्राप अति घोरा ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
सुनु नृप बिबिध जतन जग माहीं । कष्टसाध्य पुनि होहिं कि नाहीं ॥
अहउ एक अति सुगम उपाई । तहँ परंतु एक कठिनाई ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
मम आधीन जुगुति नृप सोई । मोर जाब तव नगर न होई ॥
आजु लगें अरु जब तें भयउँ । काहू के गृह ग्राम न गयऊँ ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
जौं न जाउँ तब होइ अकाजू । बना आइ असमंजस आजू ॥
मुनि महीस बोलेउ मृदु बानी । नाथ निगम असि नीति बखानी ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
बड़े सनेह लघुन्ह पर करहीं । गिरि निज सिरनि सदा तृन धरहीं ॥
जलधि अगाध मौलि बह फेनू । संतत धरनि धरत सिर रेनू ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
जानि नृपति आपन आधीना । बोला तापस कपट प्रबीना ॥
सत्य कहउँ भूपति सुनु तोही । जग नाहीं दुर्लभ कछु मोही ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
अवसि काज मैं करिहउँ तोरा । मन तन बचन भगत तैं मोरा ॥
जोग जुगुति तप मंत्र प्रभाऊ । फलइ तबहिं जब करिअ दुराऊ ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
जौं नरेस मैं करौं रसोई । तुम्ह परसहु मोहि जान न कोइ ॥
अन्न सो जोइ जोइ भोजन करई । सोइ सोइ तव आयसु अनुसरई ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
पुनि तिन्ह के गृह जेवँ जोऊ । तव बस होइ भूप सुनु सोऊ ॥
जाइ उपाय रचहु नृप एहू । संवत भरि संकल्प करേഹू ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
एहि बिधि भूप कष्ट अति थोरें । होइहिं सकल बिप्र बस तोरें ॥
करिहहिं बिप्र होम मख सेवा । तेहिं प्रसंग सहजहि बस देवा ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
और एक तोहि कहउँ लखाऊँ । मैं एहि बेष न आऊब काऊ ॥
तुम्हरे उपरोहित कहुँ राया । हरि आनब मैं करि निज माया ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
तपबल तेहि करि आपु समाना । रखिहउँ इहाँ बरष परवाना ॥
मैं धरि तासु बेषु सुनु राजा । सब बिधि तोर सँवारब काजा ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
गै निसि बहुत सयन अब कीजै । मोहि तोहि भूप भेंट दिन तीजै ॥
मैं तपबल तोहि तुरग समेता । पहुँचइहउँ सोवतहि निकेता ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
सयन कीन्ह नृप आयसु मानी । आसन जाइ बैठ छलग्यानी ॥
श्रमित भूप निद्रा अति आई । सो किमि सोव सोच अधिकाई ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
कालकेतु निसिचर तहँ आवा । जेहिं सूकर होइ नृपति भुलावा ॥
परम मित्र तापस नृप केरा । जानइ सो अति कपट घनेरा ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
तेहि के सत सुत अरु दस भाई । खल अति अजय देव दुखदाई ॥
प्रथमहिं भूप समर सब मारे । बिप्र संत सुर देखि दुखारे ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
तेहि खल पाछिल बयरु सँभारा । तापस नृप मिलि मंत्र बिचारा ॥
जेहिं रिपु छय सोइ रचेन्हि उपाऊ । भावी बस न जान कछु राजाउ ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
तापस नृप निज सखहि निहारी । हरषि मिलेउ उठि भयउ सुखारी ॥
मित्रहि कहि सब कथा सुनाई । जातुधान बोला सुख पाई ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
अब साधेउँ रिपु सुनहु नरेसा । जौं तुम्ह कीन्ह मोर उपदेसा ॥
परिहरि सोच रहहु तुम्ह सोई । बिनु औषध बिआधि बिधि खोई ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
कुल समेत रिपु मूल बहाई । चौथें दिवस मिलब मैं आई ॥
तापस नृपहि बहुत परितोषी । चला महाकपटी अतिरोषी ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
भानुप्रतापहि बाजि समेता । पहुँचाएसि छन माँझ निकेता ॥
नृपति नारि पहिं सयन कराई । हयगृहें बाँधेसि बाजि बनाई ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
आपु बिरचि उपरोहित रूपा । परेउ जाइ तेहि सेज अनूपा ॥
जागेउ नृप अनभएँ बिहाना । देखि भवन अति अचरज माना ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
मुनि महिमा मन महुँ अनुमानी । उठेउ गवँहि जेहि जान न रानी ॥
कानन गयउ बाजि चढ़ि तेहीं । पुर नर नारि न जाने केहीं ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
गएँ जाम जुग भूपति आवा । घर घर उत्सव बाज बधावा ॥
उपरोहितहि देख जब राजा । चकित बिलोकि सुमिरि सोइ काजा ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
जुग सम नृपति गए दिन तीनी । कपटी मुनि पद रह मति लीनी ॥
समय जानि उपरोहित आवा । नृपहि मते सब कहि समुझावा ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
उपरोहित जेवनार बनाई । छरस चारि बिधि जसि श्रुति गाई ॥
मायामय तेहिं कीन्हि रसोई । बिंजन बहु गनि सकइ न कोइ ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
बिबिध मृगन्ह कर आमिष राँधा । तेहि महुँ बिप्र माँस खल साँधा ॥
भोजन कहुँ सब बिप्र बोलाए । पद पखारि सादर बैठाए ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
परुसन जबहिं लाग महिपाला । भए अकासबानी तेहि काला ॥
बिप्रबृंद उठि उठि गृह जाहू । है बड़ि हानि अन्न जनि खाहू ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
भयउ रसोई भूसुर माँसू । सब द्विज उठे मानि बिस्वासू ॥
भूप बिकल मति मोहें भुलानी । भावी बस न आव मुख बानी ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
छत्रबंधु तैं बिप्र बोलाई । घाले लिए सहित समुदाई ॥
ईस्वर राखा धरम हमारा । जैहिसि तैं समेत परिवारा ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
संवत मध्य नास तव होऊ । जलदाता न रहिहिहि कुल कोऊ ॥
नृप सुनि श्राप बिकल अति त्रासा । भए बहोरि बर गिरा अकासा ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
बिप्रबृंद श्राप बिचारि न दीन्हा । नहिं अपराध भूप कछु कीन्हा ॥
चकित बिप्र सब सुनी नभबानी । भूप गयउ जहाँ भोजन खानी ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
तहँ न असन नहिं बिप्र सुआरा । फिरेउ राउ मन सोच अपारा ॥
सब प्रसंग महीसुरन्ह सुनाई । त्रसित परेउ अवनि अकुलाई ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
अस कहि सब महीदेव सिधाए । समाचार पुरलोगन्ह पाए ॥
सोचहिं दूषन देवहि देहीं । बिरचत हंस काग किए जेहीं ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
उपरोहितहि भवन पहुँचाई । असुर तापसहि खबरि जनाई ॥
तेहिं खल जहाँ तहाँ पत्र पठाए । सजि सजि सेन भूप सब धाए ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
घेरि नगर निसान बजाई । बिबिध भाँति नित होइ लड़ाई ॥
जूझे सकल सुभट करि करनी । बंधु समेत परेउ नृप धरनी ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
सत्यकेतु कुल कोउ नहिं बाँचा । बिप्रश्राप किमि होइ असाँचा ॥
रिपु जिति सब नृप नगर बसाई । निज पुर गवने जय जसु पाई ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
काल पाइ मुनि सुनु सोइ राजा । भयउ निसाचर सहित समाजा ॥
दस सिर ताहि बीस भुजदंडा । रावन नाम वीर बरिबंडा ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
भूप अनुज अरिमर्दन नामा । भयउ सो कुंभकरन बलधामा ॥
सचिव जो रहा धरमरुचि जासू । भयउ बिमात्र बंधु लघु तासू ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
नाम बिभीषन जेहि जग जाना । बिष्णुभगत बिग्यान निधाना ॥
रहे जे सुत सेवक नृप केरे । भए निसाचर घोर घनेरे ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
कामरूप खल जिनस अनेका । कुटिल भयंकर बिगत बिबेका ॥
कृपा रहित हिंसक सब पापी । बरनि न जाहिं बिस्व परितापी ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
कीन्ह बिबिध तप तीन्हहुँ भाई । परम उग्र नहिं बरनि सो जाई ॥
गयउ निकट तप देखि बिधाता । मागउ बर प्रसन्न मैं ताता ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
करि बिनती पद गहि दससीसा । बोलेउ बचन सुनहु जगदीसा ॥
हम काहू के मरिहिं न मारे । बानर मनुज जाति दुइ बारे ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
एवमस्तु तुम्ह बड़ तप कीन्हा । मैं ब्रह्माँ मिलि तेहि बर दीन्हा ॥
पुनि प्रभु कुंभकरन पहिं गयऊ । तेहि बिलोकि मन बिसमय भयऊ ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
जौं एहि खल नित करब अहारा । होइहि सब उजारि संसारा ॥
सारद प्रेरि तासु मति फेरी । मागेसि नीद मास षट केरी ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
तिन्हहि देइ बर ब्रह्म सिधाए । हरषित ते अपने गृह आए ॥
मय तनुजा मंदोदरी नामा । परम सुंदरी नारि ललामा ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
सोइ मयँ दीन्हि रावनहि आनी । होइहि जातुधानपति जानी ॥
हरषित भयउ नारि भलि पाई । पुनि दोउ बंधु बिआहेसि जाई ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
गिरि त्रिकूट एक सिंधु मझारी । बिधि निर्मित दुर्गम अति भारी ॥
सोइ मय दानवँ बहुरि संवारा । कनक रचित मनि भवन अपारा ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
भोगावति जसि अहिकुल बासा । अमरावति जसि सक्रनिवासा ॥
तिन्ह ते अधिक रम्य अति बंका । जग बिख्यात नाम तेहि लंका ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
रहे तहँ निसिचर भट भारे । ते सब सुरन्ह समर संघारे ॥
अब तहँ रहहिं सक के प्रेरे । रच्छक कोटि जच्छपति केरे ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
दसमुख कहुँ खबरि असि पाई । सेन साजि गढ़ घेरिसि जाई ॥
देखि बिकट भट बड़ि कटुकाई । जच्छ जीव लै गए पराई ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
फिरि सब नगर दसानन देखा । गयउ सोचु सुख भयउ बिसेषा ॥
सुंदर सहज अगम अनुमानि । कीन्हि तहँ रावन रजधानी ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
जेहि जस जोग बाँटि गृह दीन्हें । सुखी सकल रजनीचर कीन्हें ॥
एक बार कुबेर पर धावा । पुष्पक जान जीति लै आवा ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
सुख संपति सुत सेन सहाई । जय प्रताप बल बुद्धि बड़ाई ॥
नित नूतन सब बाढ़त जाई । जिमि प्रतिलाभ लोभ अधिकाई ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
अतिबल कुंभकरन अस भ्राता । जेहि कहुँ नहिं प्रतिमट जग जाता ॥
करइ पान सोवइ षट मासा । जागत होइ तिहुँ पुर त्रासा ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
जौं दिन प्रति अहार कर सोई । बिस्व बेगि सब चौपट होई ॥
समर धीर नहिं जाइ बखाना । तेहि सम अमित बीर बलवाना ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
बारिदनाद जेठ सुत तासू । भट महुँ प्रथम लीक जग जासू ॥
जेहि न होइ रन सनमुख कोई । सुरपुर नितहिं परावन होई ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
कामरूप जानहिं सब माया । सपनेहूँ जिन्ह कें धरम न दाया ॥
दसमुख बैठ सभाँ एक बारा । देखि अमित आपन परिवारा ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
सुत समूह जन परिजन नाती । गने को पार निसाचर जाती ॥
सेन बिलोकि सहज अभिमानी । बोला बचन क्रोध मद सानी ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
सुनहु सकल रजनीचर जूथा । हमरे बैरी बिबुध बरूथा ॥
ते सनमुख नहिं करहिं लराई । देखि सबल रिपु जाहिं पराई ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
तेन्ह कर मरन एक बिधि होई । कहउँ बुझाइ सुनहु अब सोई ॥
द्विजभोजन मख होम सराधा । सब कै जाइ करहु तुम्ह बाधा ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
मेघनाद कहुँ पुनि हुँकरावा । दीन्ही सिख बलु बयरु बढ़ावा ॥
जे सुर समर धीर बलवाना । जिन्ह कें लरिबे कर अभिमाना ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
तिन्हहि जीति रन आनेसु बाँधी । उठि सुत पितु अनुसासन काँधी ॥
एहि बिधि सबही अग्या दीन्ही । आपुनु चलेउ गदा कर लीन्ही ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
चलत दसानन डोलति अवनी । गर्जत गर्भ स्रवहिं सुर रवनी ॥
रावन आवत सुनेउ सकोहा । देवन्ह तके मेरु गिरि खोहा ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
दिगपालन्ह के लोक सुहाए । सूने सकल दसानन पाए ॥
पुनि पुनि सिंघनाद करि भारी । देइ देवतन्ह गारि पचारी ॥
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चौपाई 5बाल काण्ड
रन मद मत फिरइ जग धावा । प्रतिभट खोजत कतहुँ न पावा ॥
रवि ससि पवन बरुन धनधारी । अगिनि काल जम सब अधिकारी ॥
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चौपाई 6बाल काण्ड
किन्नर सिद्ध मनुज सुर नागा । हठि सबहीं के पंथहिं लागा ॥
ब्रह्मसृष्टि जहँ लगि तनुधारी । दसमुख बसवर्ती नर नारी ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
इंद्रजीत सन जो कछु कहेऊ । सो सब जनु पहिलहिं करि रहेऊ ॥
प्रथमहि जिन्ह कहुँ आयसु दीन्हा । तिन्ह कर चरित सुनहु जो कीन्हा ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
देखत भीमरूप सब पापी । निसिचर निकर देव परितापी ॥
करहिं उपद्रव असुर निकाया । नाना रूप धरहिं करि माया ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
जेहि बिधि होइ धरम निर्मूला । सो सब करहिं बेद प्रतिकूला ॥
जेहि जेहि देस धेनु द्विज पावहिं । नगर गाउँ पुर आगि लगावहिं ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
सुभ आचरन कतहुँ नहिं होई । देव बिप्र गुरु मान न कोई ॥
नहिं हरिभगति जग्य तप ग्याना । सपनेहूँ सुनिअ न बेद पुराना ॥
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छंद 182बाल काण्ड
जप जोग बिरागा तप मख भागा श्रवन सुनइ दससीसा ।
आपुनु उठि धावइ रहै न पावइ धरि सब घालइ खीसा ॥
अस भ्रष्ट अचारा भा संसारा धरम सुनिअ नहिं काना ।
तेहि बहुबिधि त्रासइ देस निकासइ जो कह बेद पुराना ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
बाढ़े खल बहु चोर जुआरा । जे लंपट परधन परदारा ॥
मानहिं मातु पिता नहिं देवा । साधुन्ह सन करवावहिं सेवा ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
जिन्ह के यह आचरन भवानी । ते जानेहु निसिचर सब प्रानी ॥
अतिसय देखि धरम के ग्लानी । परम सभीत धरा अकुलानी ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
गिरि सरि सिंधु भार नहिं मोही । जस मोहि गरुअ एक परद्रोही ॥
सकल धरम देखउँ बिपरीता । कहि न सकउँ रावन भय भीता ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
धेनु रूप धरि हृदयँ बिचारी । गई तहाँ जहाँ सुर मुनि झारी ॥
निज संताप सुनाइअसि रोई । काहू तें कछु काज न होई ॥
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छंद 183बाल काण्ड
सुर मुनि गंधर्ब मिलि करि सर्व गें बिरंचि के लोका ।
संग गोतनुधारी भूमि बिचारी परम बिकल भय सोका ॥
ब्रह्माँ सब जाना मन अनुमाना मोर कछू न बसाई ।
जा करि तैं दासी सो अबिनासी हमरेउ तोर सहाई ॥
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चौपाई 1बाल काण्ड
बैठे सुर सब करहिं बिचारा । कहँ पाउ प्रभु करिअ पुकारा ॥
पुर बैकुंठ जान कह कोई । कोउ कह पयोनिधि बस प्रभु सोई ॥
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चौपाई 2बाल काण्ड
जाके हृदयँ भगति जसि प्रीती । प्रभु तहँ प्रगट सदा तेहि रीती ॥
तेहि समाज गिरिजा मैं रहेऊँ । अवसर पाइ बचन एक कहेऊँ ॥
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चौपाई 3बाल काण्ड
हरि व्यापक सर्वत्र समाना । प्रेम तें प्रगट होहिं मैं जाना ॥
देस काल दिसि बिदिसिहु माहीं । कहहु सो कहाँ जहाँ प्रभु नाहीं ॥
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चौपाई 4बाल काण्ड
अग जगमय सब रहित बिरागी । प्रेम तें प्रभु प्रगटइ जिमि आगी ॥
मोर बचन सब के मन माना । साधु साधु करि ब्रह्म बखाना ॥
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छंद 185बाल काण्ड
जय जय सुरनायक जन सुखदायक प्रनतपाल भगवंता ।
गो द्विज हितकारी जय असुरारी सिंधुसुता प्रिय कंता ॥
पालन सुर धरनी अद्भुत करनी मरम न जानइ कोई ।
जो सहज कृपाला दीनदयाला करउ अनुग्रह सोई ॥
जय जय अबिनासी सब घट बासी ब्यापक परमानंदा ।
अबिगत गोतीतं चरित पुनीतं मायारहित मुकुंदा ॥
जेहि लागि बिरागी अति अनुरागी बिगत मोह मुनिबृंदा ।
निसि बासर ध्यावहिं गुनगन गावहिं जयति सच्चिदानंदा ॥
जेहिं सृष्टि उपाई त्रिबिध बनाई संग सहाय न दूजा ।
सो करउ अघारी चिंत हमारी जानिअ भगति न पूजा ॥
जो भव भय भंजन मुनि मन रंजन गंजन बिपति बरूथा ।
मन बच क्रम बानी छाडि सयानी सरन सकल सुरजूथा ॥
सारद श्रुति सेव ऋषय असेषा जा कहुँ कोउ नहिं जाना ।
जेहि दीन पिआरे बेद पुकारे द्रवउ सो श्रीभगवाना ॥
भव बारिधि मंदर सब बिधि सुंदर गुनमंदिर सुखपुंजा ।
मुनि सिद्ध सकल सुर परम भयातुर नमत नाथ पद कंजा ॥
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