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रामचरितमानस — बालकाण्ड प्रश्नोत्तर (पेज 7) — 320 प्रश्न

रामचरितमानस — बालकाण्ड से जुड़े 320 प्रामाणिक प्रश्नोत्तर पढ़ें। शास्त्रों और पुराणों पर आधारित उत्तर एक ही जगह मिलेंगे।

कुल 320 प्रश्न

खलों (दुष्टों) के स्वभाव की तुलना बालकाण्ड में किस-किस से की गई है?

खलों की तुलना — (1) ओलों से (दूसरों को नष्ट कर स्वयं भी नष्ट), (2) कालनेमि-रावण-राहु से (कपटी वेषधारी), (3) जोंक से (कमल-जोंक एक जल में पर गुण भिन्न), (4) उल्लू से (प्रकाश/सत्संग से कष्ट), (5) हज़ार मुखवाले से (दोष बखानने में)।

बालकाण्डखल स्वभावउपमा
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असंतों की तुलना तुलसीदासजी ने किससे की — कौन सा प्रसिद्ध दोहा है?

असंतों की तुलना ओलों से की (खेती नष्ट कर स्वयं भी गलते हैं), कालनेमि-रावण-राहु से की (वेष बनाते हैं पर कपट अन्त में खुल जाता है)। प्रसिद्ध दोहा — 'उदासीन अरि मीत हित सुनत जरहिं खल रीति' — दुष्ट किसी का भी हित सुनकर जलते हैं।

बालकाण्डअसंतखल स्वभाव
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'संत असंत के लक्षण' — बालकाण्ड में संत और असंत में क्या अंतर बताया गया है?

संत हंस के समान गुणरूपी दूध ग्रहण करते हैं, दूसरों के दोष ढकते हैं, कपास समान निरस और उज्ज्वल हैं। असंत (खल) किसी का भी हित सुनकर जलते हैं, दूसरों के दोष हज़ार आँखों से देखते हैं। दोनों एक ही संसार में उत्पन्न होते हैं पर गुण कमल-जोंक समान भिन्न हैं।

बालकाण्डसंत लक्षणअसंत लक्षण
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तुलसीदासजी ने संतों की तुलना किस फूल से की है?

संतों की तुलना अंजलि (हथेलियों) में रखे शुभ सुमन (सुन्दर फूलों) से की है। जैसे फूल दोनों हाथों को समान सुगन्ध देते हैं, वैसे ही संत सबके प्रति बिना भेदभाव के समान भाव रखते हैं।

बालकाण्डसंतसुमन उपमा
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'बंदउँ संत समान चित हित अनहित नहिं कोइ' — संतों की क्या विशेषता बताई गई?

संतों की विशेषता बताई — उनका चित्त समान है, कोई हितैषी नहीं कोई अहितैषी नहीं। जैसे हथेलियों में रखे फूल दोनों हाथों को समान सुगन्ध देते हैं, वैसे ही संत सबसे समान भाव रखते हैं।

बालकाण्डसंत लक्षणसमदर्शी
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'बिधि हरि हर कबि कोबिद बानी। कहत साधु महिमा सकुचानी' — इसका क्या तात्पर्य है?

तात्पर्य — संतों की महिमा इतनी अपार है कि ब्रह्मा, विष्णु, शिव, कवि और पण्डितों की वाणी भी उसे कहने में सकुचाती है। तुलसीदासजी ने कहा — जैसे सब्ज़ी बेचने वाला मणियों के गुण नहीं बता सकता, वैसे ही मुझसे यह महिमा कही नहीं जाती।

बालकाण्डसंत महिमाब्रह्मा-विष्णु-शिव
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दुष्ट व्यक्ति सत्संग पाकर कैसे सुधरता है — तुलसीदासजी ने कौन सा दृष्टान्त दिया?

पारस पत्थर और लोहे का दृष्टान्त दिया — जैसे पारस के स्पर्श से लोहा सोना बन जाता है, वैसे ही सत्संग से दुष्ट भी सुधर जाता है। उल्टा नहीं होता — सज्जन कुसंगति में भी साँप की मणि समान अपने गुण रखता है।

बालकाण्डसत्संगपारस
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'सठ सुधरहिं सत्संगति पाई। पारस परस कुधात सुहाई' — इसमें सत्संग की तुलना किससे की गई है?

सत्संग की तुलना पारस पत्थर से की गई है। जैसे पारस के स्पर्श से लोहा सोना बन जाता है, वैसे ही दुष्ट भी सत्संगति पाकर सुधर जाते हैं। सज्जन कुसंगति में भी साँप की मणि समान अपने गुण नहीं छोड़ते।

बालकाण्डसत्संगपारस
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तुलसीदासजी ने सत्संग की महिमा में क्या कहा — 'बिनु सत्संग विवेक न होई' का क्या अर्थ है?

अर्थ — सत्संग के बिना विवेक नहीं होता और राम की कृपा के बिना सत्संग सहज में नहीं मिलता। सत्संगति आनन्द और कल्याण की जड़ है — सत्संग की प्राप्ति ही फल है और बाकी सब साधन फूल हैं।

बालकाण्डसत्संगविवेक
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'बालमीक नारद घटजोनी' — यहाँ घटजोनी कौन हैं?

'घटजोनी' मुनि अगस्त्यजी हैं। उनका जन्म कलश (घड़े) से हुआ था इसलिये उन्हें 'घटजोनी' या 'कुम्भज' कहते हैं। इस चौपाई में वाल्मीकिजी, नारदजी और अगस्त्यजी तीनों का उल्लेख है।

बालकाण्डअगस्त्य मुनिघटजोनी
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बालकाण्ड में तुलसीदासजी ने अपने को क्या कहकर विनम्रता प्रकट की है?

तुलसीदासजी ने स्वयं को 'मति अति नीच' (अत्यन्त नीची बुद्धि वाला), 'मन मति रंक' (मन-बुद्धि से कंगाल), और काव्य ज्ञान से रहित बताकर विनम्रता प्रकट की। कहा कि बुद्धि कंगाल है पर मनोरथ राजा है।

बालकाण्डतुलसीदासविनम्रता
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'श्रीगुर पद नख मनि गन जोती। सुमिरत दिव्य दृष्टि हियँ होती' — इसका क्या अर्थ है?

अर्थ — श्रीगुरु के चरण-नखों की ज्योति मणियों के प्रकाश समान है, जिसके स्मरण करते ही हृदय में दिव्य दृष्टि उत्पन्न हो जाती है। यह प्रकाश अज्ञान रूपी अन्धकार का नाश करता है और जिसके हृदय में आ जाये उसके बड़े भाग्य हैं।

बालकाण्डगुरु वन्दनाचौपाई
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तुलसीदासजी ने गुरु के चरणकमलों की रज को किसका सुन्दर चूर्ण कहा है?

गुरु के चरणों की रज को 'अमिअ मूरिमय चूरन चारू' अर्थात् अमृत मूल (संजीवनी जड़ी) का सुन्दर चूर्ण कहा गया है, जो सम्पूर्ण भवरोगों (संसार के दुखों) के परिवार को नष्ट करने वाला है।

बालकाण्डगुरु वन्दनाचरण रज
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'बंदउँ गुरु पद कंज कृपा सिंधु नररूप हरि' — इसमें गुरु को क्या कहा गया है?

इस दोहे में गुरु को 'कृपा सिंधु' (कृपा का समुद्र) और 'नररूप हरि' (मनुष्य रूप में साक्षात् भगवान विष्णु) कहा गया है। गुरु के वचनों को महामोह रूपी अन्धकार नष्ट करने वाली सूर्य-किरणें बताया गया।

बालकाण्डगुरु वन्दनानररूप हरि
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तुलसीदासजी ने गुरु की वन्दना में गुरु के चरणकमल की तुलना किससे की है?

तुलसीदासजी ने गुरु के चरणकमलों की तीन उपमाएँ दीं — (1) गुरु के वचनों को महामोह-अन्धकार नष्ट करने वाली सूर्य-किरणें, (2) गुरु के चरण-रज को संजीवनी जड़ी (अमृत मूल) का सुन्दर चूर्ण, और (3) गुरु के चरण-नखों को मणियों की ज्योति।

बालकाण्डगुरु वन्दनाचरणकमल
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'कुंद इंदु सम देह उमा रमन करुना अयन' — इसमें किसकी स्तुति है?

यह भगवान शंकरजी (शिवजी) की स्तुति है। अर्थ — जिनका कुन्द और चन्द्रमा समान गौर शरीर है, जो पार्वतीजी के प्रियतम और दीनों पर दया करने वाले हैं, वे कामदेव को भस्म करने वाले शंकरजी मुझपर कृपा करें।

बालकाण्डशिव स्तुतिमंगलाचरण
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'नील सरोरुह स्याम तरुन अरुन बारिज नयन' — यह किसका वर्णन है?

यह भगवान विष्णु (नारायण) का वर्णन है। अर्थ — जो नील कमल समान श्यामवर्ण हैं, लाल कमल समान नेत्र हैं और सदा क्षीरसागर में शयन करते हैं, वे भगवान मेरे हृदय में निवास करें।

बालकाण्डभगवान विष्णुमंगलाचरण
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'मूक होइ बाचाल पंगु चढ़इ गिरिबर गहन' — इस दोहे में किसकी कृपा का वर्णन है?

यह दोहा भगवान श्रीराम की कृपा का वर्णन करता है। अर्थ है — जिनकी कृपा से गूँगा सुन्दर बोलने लगता है और लँगड़ा दुर्गम पहाड़ चढ़ जाता है, वे कलियुग के पाप जलाने वाले दयालु भगवान मुझपर दया करें।

बालकाण्डभगवान कृपामंगलाचरण
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'जो सुमिरत सिधि होइ गन नायक करिबर बदन' — यह किसकी स्तुति है?

यह सोरठा श्रीगणेशजी की स्तुति है। इसमें गणेशजी को 'गन नायक' (गणों के स्वामी), 'करिबर बदन' (हाथी के मुखवाले) और 'बुद्धि रासि सुभ गुन सदन' (बुद्धि और शुभ गुणों के धाम) कहा गया है।

बालकाण्डगणेश वन्दनासोरठा
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रामचरितमानस के बालकाण्ड में सबसे पहले किसकी वन्दना की गई है?

बालकाण्ड में संस्कृत श्लोकों में सबसे पहले शिव-पार्वती की वन्दना है। अवधी छन्दों में सबसे पहले श्रीगणेशजी की वन्दना है — 'जो सुमिरत सिधि होइ गन नायक करिबर बदन।'

बालकाण्डमंगलाचरणवन्दना
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रामचरितमानस — बालकाण्ड — शास्त्रीय प्रश्नोत्तर संग्रह

पौराणिक पर रामचरितमानस — बालकाण्ड श्रेणी में आपको सनातन धर्म, वेद, पुराण और शास्त्रों पर आधारित प्रामाणिक प्रश्न-उत्तर मिलेंगे। प्रत्येक उत्तर विद्वानों द्वारा शास्त्रीय प्रमाणों सहित तैयार किया गया है। किसी भी प्रश्न पर क्लिक करें और विस्तृत उत्तर पढ़ें। अन्य विषयों के लिए प्रश्नोत्तरी मुख्य पृष्ठ देखें।

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रामचरितमानस — बालकाण्ड को गहराई से समझने का तरीका

रामचरितमानस — बालकाण्ड के पेज 7 प्रश्नोत्तर पेज छोटे उत्तरों को एक साथ रखता है, इसलिए इसे त्वरित समाधान और आगे पढ़ने के प्रवेश-द्वार दोनों की तरह इस्तेमाल किया जा सकता है।

320 प्रश्न वाले इस पेज पर सबसे अच्छा तरीका यह है कि पहले वही प्रविष्टियाँ पढ़ें जो आपके वर्तमान सवाल से सीधा संबंध रखती हैं, फिर उनसे जुड़े अगले लेख या प्रश्न खोलें ताकि आधी-अधूरी जानकारी के बजाय पूरा संदर्भ बने।

अगर आपको किसी उत्तर का छोटा रूप मिल रहा है, तो उसी विषय के अगले प्रश्न और संबंधित विस्तृत लेख भी देखें। इससे नियम, अपवाद, समय, विधि और शास्त्रीय आधार जैसी बातें स्पष्ट होती हैं।

शुरुआत उन प्रश्न से करें जिनका शीर्षक आपके सवाल या उद्देश्य से सबसे अधिक मेल खाता है।

पढ़ते समय विधि, महत्व, समय और सावधानियों जैसे अलग-अलग पहलुओं को नोट करें, क्योंकि ये अक्सर अलग प्रविष्टियों में बँटे होते हैं।

अगर एक पेज से पूरा उत्तर न मिले, तो उसी संग्रह के अगले लेख या प्रश्न खोलकर संदर्भ पूरा करें।