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रामचरितमानस — बालकाण्ड प्रश्नोत्तर (पेज 6) — 320 प्रश्न

रामचरितमानस — बालकाण्ड से जुड़े 320 प्रामाणिक प्रश्नोत्तर पढ़ें। शास्त्रों और पुराणों पर आधारित उत्तर एक ही जगह मिलेंगे।

कुल 320 प्रश्न

सतीजी दक्ष यज्ञ में जाने की जिद क्यों कर रही थीं?

सतीजी ने आकाश में विमान जाते देखे और शिवजी से पूछा। पता चला कि पिता दक्ष के यज्ञ में सब जा रहे हैं। शिवजी द्वारा त्यागे जाने का भारी दुख था, पिता के घर जाने का बहाना मिला। उन्होंने कहा — 'पिता भवन उत्सव परम जौं प्रभु आयसु होइ।'

बालकाण्डसतीदक्ष यज्ञ
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दक्ष प्रजापति ने यज्ञ में किसको नहीं बुलाया?

दक्ष प्रजापति ने शिवजी और सतीजी को नहीं बुलाया। दक्ष ने सब पुत्रियों को बुलाया पर शिवजी से वैर के कारण सतीजी को भुला दिया। शिवजी ने सतीजी को बिना बुलाये जाने से मना किया।

बालकाण्डदक्ष यज्ञशिव अपमान
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सतीजी ने शिवजी की समाधि के दौरान क्या किया?

सतीजी कैलास पर रहती थीं, मन में बड़ा दुख था। 'जुग सम दिवस सिराहिं' — एक-एक दिन युग समान बीतता था। वे सोचती थीं कि मैंने रघुपति का अपमान किया और पति के वचन झूठ माने — उसका फल मिल रहा है। इस रहस्य को कोई नहीं जानता था।

बालकाण्डसतीकैलास
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शिवजी ने सतीजी का त्याग करने के बाद कितने वर्ष तक समाधि लगाई?

शिवजी ने कैलास पर बड़ के पेड़ के नीचे पद्मासन लगाकर 'अखण्ड अपार' समाधि लगाई। सटीक वर्ष संख्या मानस में नहीं है, पर 'अखण्ड अपार' से बहुत लम्बी अवधि ध्वनित होती है। सतीजी के लिये एक-एक दिन युग समान बीतता था।

बालकाण्डशिवजी समाधिअखण्ड
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सतीजी के सीता रूप धारण करने पर लक्ष्मणजी ने क्या किया?

लक्ष्मणजी सतीजी का बनावटी सीता वेष देखकर चकित हो गये, हृदय में भ्रम हुआ। वे बहुत गम्भीर हो गये, कुछ कह नहीं सके — क्योंकि धीरबुद्धि लक्ष्मणजी प्रभु रघुनाथजी के प्रभाव को जानते थे।

बालकाण्डलक्ष्मणसती सीता रूप
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'जलु पय सरिस बिकाइ देखहु प्रीति कि रीति भलि' — इस सोरठा का क्या अर्थ है?

अर्थ — प्रेम की सुन्दर रीति देखो कि जल भी दूध के साथ मिलकर दूध के भाव बिकता है। लेकिन कपटरूपी खटाई पड़ते ही दूध फट जाता है और पानी अलग हो जाता है। तात्पर्य — सतीजी के कपट (सीता रूप) ने शिवजी के प्रेम-बन्धन को तोड़ दिया।

बालकाण्डसोरठाप्रीति रीति
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शिवजी ने सतीजी का मानसिक त्याग क्यों किया?

दो कारण — (1) सीताजी जगन्माता हैं, उनका रूप धारण करने वाली से पति-भाव रखना भक्तिमार्ग के विरुद्ध है, (2) शिवजी ने कहा 'मिटइ भगति पथु होइ अनीती' — भक्तिमार्ग नष्ट हो जायेगा। सतीजी पवित्र थीं इसलिये प्रकट में कुछ नहीं कहा, बस मन में त्याग किया।

बालकाण्डशिव त्याग कारणसीता रूप
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सतीजी द्वारा सीता रूप धारण करने के बाद शिवजी ने क्या निर्णय लिया?

शिवजी ने मन-ही-मन सतीजी का पत्नी रूप में त्याग करने का संकल्प किया — 'एहिं तन सतिहि भेट मोहि नाहीं।' कारण — सतीजी ने सीता रूप धारा, अतः शिवजी की दृष्टि में वे माता समान हो गयीं। प्रकट में कुछ नहीं कहा पर हृदय में बड़ा सन्ताप था।

बालकाण्डशिव त्यागसती
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श्रीरामजी ने सतीजी को सीता रूप में पहचान लिया तो क्या कहा?

सर्वज्ञ भगवान ने सतीजी का कपट तुरन्त जान लिया। हाथ जोड़कर प्रणाम किया, पितासहित अपना नाम बताया और पूछा — 'वृषकेतु (शिवजी) कहाँ हैं? आप वन में अकेली क्यों फिर रही हैं?' — यह सुनकर सतीजी को अत्यन्त लज्जा और संकोच हुआ।

बालकाण्डराम सर्वज्ञसती परीक्षा
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सतीजी ने श्रीराम की परीक्षा लेने के लिये किसका रूप धारण किया?

सतीजी ने माता सीताजी का रूप धारण किया। दोहा — 'पुनि पुनि हृदयँ बिचारु करि धरि सीता कर रूप।' सतीजी ने सोचा कि यदि ये सचमुच परब्रह्म हैं तो सीता रूप पहचान लेंगे।

बालकाण्डसतीसीता रूप
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शिवजी ने सतीजी को राम की परीक्षा लेने से क्यों मना किया?

शिवजी ने कहा — ये मेरे इष्टदेव श्रीरघुवीर हैं, तर्क मत करो। 'होइहि सोइ जो राम रचि राखा' — जो राम ने रचा है वही होगा। शिवजी जानते थे कि परब्रह्म की परीक्षा लेना अनुचित है और इसका परिणाम बुरा होगा, इसलिये मना किया।

बालकाण्डशिव चेतावनीसती
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सतीजी को शिवजी के प्रणाम करने पर क्या संदेह हुआ?

सतीजी को दो संदेह हुए — (1) सर्वव्यापक, मायारहित परब्रह्म मनुष्य कैसे बन सकता है? (2) सर्वज्ञ भगवान अज्ञानी की तरह पत्नी को क्यों खोजेंगे? उन्हें लगा कि शिवजी ने साधारण राजपुत्र को व्यर्थ प्रणाम किया।

बालकाण्डसती संदेहराम परीक्षा
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शिवजी ने श्रीरामजी को देखकर कैसे प्रणाम किया?

शिवजी ने 'सच्चिदानन्द परमधाम' कहकर हृदय से प्रणाम किया। सतीजी से कहा — 'सोइ मम इष्टदेव रघुबीरा' — ये वही मेरे इष्टदेव श्रीरघुवीर हैं जिनकी कथा अगस्त्य ऋषि ने गाई और जिनकी सेवा ज्ञानी मुनि सदा करते हैं।

बालकाण्डशिवजी प्रणामसीय राममय
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शिवजी ने सती से राम को देखकर क्या कहा?

शिवजी ने श्रीरामजी को देखकर 'सच्चिदानन्द परमधाम' कहकर प्रणाम किया और उनकी शोभा में इतने मग्न हो गये कि हृदय में प्रीति रोकने से भी नहीं रुकती। इसी पर सतीजी को संदेह हुआ।

बालकाण्डशिवजीराम दर्शन
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रामचरितमानस में सती और शिवजी कहाँ जा रहे थे जब उन्होंने श्रीराम को देखा?

शिवजी अगस्त्य मुनि के आश्रम से रामकथा सुनकर सतीजी के साथ कैलास लौट रहे थे। मार्ग में उन्हें भगवान श्रीराम दण्डकवन में वनवासी वेष में सीताजी की खोज करते दिखे।

बालकाण्डसतीशिवजी
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याज्ञवल्क्यजी ने भरद्वाजजी को वही कथा सुनाई जो किसने किसको सुनाई थी?

वही कथा जो भगवान शिवजी ने माता पार्वतीजी को सुनाई थी। कथा-परम्परा: शिवजी → पार्वतीजी → अगस्त्यजी → याज्ञवल्क्यजी → भरद्वाजजी। इसीलिये मानस की मूल कथाधारा शिव-पार्वती संवाद है।

बालकाण्डकथा परम्पराशिव-पार्वती
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भरद्वाजजी ने रामकथा सुनने की इच्छा क्यों प्रकट की?

भरद्वाजजी के मन में संदेह था — राम दशरथ के पुत्र हैं या परब्रह्म जिन्हें शिवजी जपते हैं? उन्होंने कहा कि गुरु से छिपाव करने से ज्ञान नहीं होता, इसलिये अपना अज्ञान प्रकट करके कृपानिधान से सत्य जानना चाहते हैं।

बालकाण्डभरद्वाजरामकथा
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प्रयाग तीर्थराज में माघ मेले का क्या महत्व बताया गया रामचरितमानस में?

तुलसीदासजी ने संत-समाज को चलता-फिरता तीर्थराज प्रयाग कहा। रामभक्ति = गंगा, ब्रह्मविचार = सरस्वती, कर्मकथा = यमुना। यह तीर्थराज अलौकिक है और तत्काल फल देने वाला है।

बालकाण्डप्रयागमाघ मेला
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याज्ञवल्क्यजी और भरद्वाजजी का मिलन किस अवसर पर हुआ?

माघ मेले (मकर स्नान) के अवसर पर प्रयाग में। हर वर्ष माघ महीने में मुनिगण प्रयाग आकर स्नान करते और लौट जाते। एक बार भरद्वाजजी ने याज्ञवल्क्यजी के चरण पकड़कर उन्हें रोक लिया।

बालकाण्डमाघ मेलाप्रयाग
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मुनि भरद्वाज ने याज्ञवल्क्यजी से क्या प्रश्न किया?

भरद्वाजजी ने पूछा — 'राम कौन हैं? वे अवधेश दशरथ के कुमार जिन्होंने सीता विरह में दुख उठाया और रावण को मारा — वही राम हैं या कोई और परब्रह्म जिनको शिवजी जपते हैं? कृपया विचारकर बताइये।'

बालकाण्डभरद्वाज प्रश्नराम कौन
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रामचरितमानस में याज्ञवल्क्य-भरद्वाज संवाद कहाँ हुआ?

तीर्थराज प्रयाग (प्रयागराज) में, भरद्वाजजी के आश्रम में। माघ मेले के अवसर पर मुनि एकत्र होते थे — एक बार स्नान के बाद भरद्वाजजी ने याज्ञवल्क्यजी को रोककर रामकथा सुनने की प्रार्थना की।

बालकाण्डयाज्ञवल्क्यभरद्वाज
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'कलपभेद हरिचरित सुहाए। भाँति अनेक मुनीसन्ह गाए' — इसका क्या मतलब है?

अर्थ — हर कल्प (ब्रह्मा के दिन) में भगवान की लीला भिन्न होती है, इसलिये मुनियों ने अनेक प्रकार से हरिचरित गाये हैं। इसमें संदेह न करें, प्रेमसे सुनें। वाल्मीकि, तुलसी आदि की रामकथाओं में अन्तर इसी कल्पभेद के कारण है।

बालकाण्डकल्पभेदहरिचरित
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रामकथा को 'सौ करोड़ अपारा' क्यों कहा गया?

'नाना भाँति राम अवतारा। रामायन सत कोटि अपारा॥' — भगवान राम अनन्त अवतार लेते हैं, हर कल्प में भिन्न-भिन्न लीला होती है, इसलिये रामायणें सौ करोड़ और उससे भी अपार (अनगिनत) हैं। राम अनन्त, गुण अनन्त, कथा विस्तार असीम।

बालकाण्डरामकथा अनन्तसत कोटि
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मानस सरोवर की उपमा में सात काण्डों को किन सात सीढ़ियों से तुलना की गई?

सात काण्ड = सात सोपान (सीढ़ियाँ)। चौपाई — 'सप्त प्रबंध सुभग सोपाना। ग्यान नयन निरखत मन माना॥' अर्थ — सात काण्ड इस मानस-सरोवर की सुन्दर सात सीढ़ियाँ हैं जिन्हें ज्ञानरूपी नेत्रों से देखते ही मन प्रसन्न हो जाता है।

बालकाण्डसात सोपानसात काण्ड
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तुलसीदासजी ने मानस की तुलना किस सरोवर से की है?

रामचरितमानस की तुलना पवित्र मानसरोवर से की — चार संवाद = चार घाट, सात काण्ड = सात सीढ़ियाँ (सोपान), राम-सीता यश = अमृत जल, चौपाइयाँ = पुरइन (कमलिनी), छन्द-दोहा = कमल।

बालकाण्डमानस सरोवरउपमा
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रामचरितमानस का नामकरण 'मानस' क्यों किया गया?

शिवजी ने इस कथा को अपने मन (मानस) में रचकर रखा था, इसीलिये प्रसन्न होकर इसका नाम 'रामचरितमानस' रखा। 'मानस' के दो अर्थ — (1) मन (शिवजी का मन), (2) पवित्र सरोवर (रामचरित का मानसरोवर)।

बालकाण्डमानस नामकरणशिवजी
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तुलसीदासजी ने संस्कृत में क्यों नहीं लिखा — क्या कारण था?

कथा है कि संस्कृत में लिखा तो रात को सब लुप्त हो जाता। शिवजी ने स्वप्न में जनभाषा में लिखने का आदेश दिया। तुलसीदासजी ने कहा — 'संभु प्रसाद सुमति हियँ हुलसी' — शिवजी की कृपा से ही वे इस ग्रन्थ के कवि बने।

बालकाण्डअवधीशिव आदेश
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रामचरितमानस किस भाषा में लिखी गई?

अवधी भाषा में। तुलसीदासजी ने श्लोक 7 में कहा — 'भाषानिबन्धमतिमञ्जुलमातनोति' अर्थात् रघुनाथजी की कथा को मनोहर भाषारचना में विस्तृत करता है। कथा है कि शिवजी ने स्वप्न में जनभाषा में लिखने का आदेश दिया।

बालकाण्डअवधी भाषातुलसीदास
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रामचरितमानस की रचना किस तिथि को पूरी हुई?

संवत् 1633 (1576 ई.) मार्गशीर्ष शुक्लपक्ष में राम विवाह के दिन पूरी हुई। आरम्भ रामनवमी (जन्म) के दिन और समाप्ति राम विवाह के दिन — कुल 2 वर्ष 7 माह 26 दिन।

बालकाण्डरचना समाप्तिसंवत 1633
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'रामचरितमानस एहि नामा। सुनत श्रवन पाइअ बिश्रामा' — इसका अर्थ क्या है?

अर्थ — इसका नाम 'रामचरितमानस' है, जिसके कानों से सुनते ही शान्ति (विश्राम) मिलती है। विषय-तापसे जलता मनरूपी हाथी इस मानसरूपी सरोवर में आकर सुखी हो जाता है।

बालकाण्डमानस नामकरणचौपाई
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रामचरितमानस को पूरा होने में कितना समय लगा?

2 वर्ष 7 महीने 26 दिन। आरम्भ — संवत् 1631 चैत्र शुक्ल नवमी (रामनवमी) अयोध्या में। समाप्ति — संवत् 1633 मार्गशीर्ष शुक्लपक्ष, राम विवाह के दिन। अन्त में काशी में भगवान विश्वनाथ के समक्ष समर्पित किया गया।

बालकाण्डरचना कालतुलसीदास
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रामचरितमानस की रचना किस स्थान पर शुरू हुई?

रामचरितमानस की रचना अयोध्या (अवधपुरी) में शुरू हुई — 'अवधपुरीं यह चरित प्रकासा।' तुलसीदासजी ने श्रीराम की जन्मभूमि को ही रचना का आरम्भ स्थान चुना। कुछ भाग काशी में भी लिखा गया।

बालकाण्डअयोध्यारचना स्थान
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'नौमी भौम बार मधुमासा। अवधपुरीं यह चरित प्रकासा' — इसका अर्थ क्या है?

अर्थ — चैत्र मास (मधुमास) की नवमी तिथि, मंगलवार (भौम बार) को अयोध्यापुरी (अवधपुरी) में यह चरित्र (रामचरितमानस) प्रकाशित हुआ। यही रामनवमी का दिन है जब भगवान राम का जन्म हुआ था।

बालकाण्डरचना तिथिअयोध्या
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रामचरितमानस की रचना किस तिथि को शुरू हुई?

चैत्र शुक्ल नवमी (रामनवमी), मंगलवार को। तुलसीदासजी ने लिखा — 'नौमी भौम बार मधुमासा। अवधपुरीं यह चरित प्रकासा।' यह वही तिथि है जिस दिन भगवान राम का जन्म हुआ था।

बालकाण्डरचना तिथिरामनवमी
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'संबत सोरह सै एकतीसा। करउँ कथा हरि पद धरि सीसा' — इसमें कौन सा संवत है?

संवत् 1631 (1574 ईस्वी)। 'सोरह सै' = 1600, 'एकतीसा' = 31, कुल = 1631। अर्थ — संवत् 1631 में श्रीहरि के चरणों पर सिर रखकर कथा आरम्भ करता हूँ।

बालकाण्डसंवत 1631चौपाई
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तुलसीदासजी ने रामचरितमानस की रचना कब शुरू की — कौन सा संवत?

संवत् 1631 (1574 ईस्वी) में। तुलसीदासजी ने लिखा — 'संबत सोरह सै एकतीसा। करउँ कथा हरि पद धरि सीसा।' अर्थात् संवत् 1631 में श्रीहरि के चरणों पर सिर रखकर कथा आरम्भ करता हूँ।

बालकाण्डरचना तिथिसंवत 1631
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'राम चरित जे सुनहिं सुनावहिं' — ऐसे लोगों को क्या फल मिलता है?

जो रामचरित स्नेहसहित कहते-सुनते हैं वे राम चरणों में अनुरागी होंगे, कलियुग के सब पापों से मुक्त और शुभ भाग्यवाले होंगे। रामचरितमानस सुनने से शान्ति मिलती है और विषयरूपी दावानल में जलता मन सुखी हो जाता है।

बालकाण्डरामचरितश्रवण फल
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रामचरितमानस में 'मानस' शब्द का क्या अर्थ बताया गया है?

'मानस' के दो अर्थ हैं — (1) मन — शिवजी ने इस कथा को अपने मन में रचकर रखा था, (2) सरोवर — रामचरित का पवित्र मानसरोवर। शिवजी ने प्रसन्न होकर इसका नाम 'रामचरितमानस' रखा।

बालकाण्डमानस अर्थनामकरण
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'अगुन सगुन दुइ ब्रह्म सरूपा' — इसका क्या अर्थ है?

अर्थ — निर्गुण (निराकार) और सगुण (साकार) दोनों ब्रह्म के ही स्वरूप हैं। दोनों अकथनीय, अगाध, अनादि और अनुपम हैं। तुलसीदासजी ने दोनों को एक ही ब्रह्म के दो पहलू बताकर निर्गुण-सगुण विवाद का समाधान किया।

बालकाण्डनिर्गुण सगुणब्रह्म
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तुलसीदासजी ने 'निर्गुण' और 'सगुण' राम में किसे श्रेष्ठ बताया?

तुलसीदासजी ने कहा — 'अगुन सगुन दुइ ब्रह्म सरूपा' — दोनों ब्रह्म के स्वरूप हैं, किसी को बड़ा-छोटा कहना अपराध है। किन्तु सगुण भक्ति (राम की लीला) कलियुग में सुगम मार्ग बताया गया।

बालकाण्डनिर्गुणसगुण
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रामचरितमानस में राम नाम की महिमा कितने दोहों/छन्दों में वर्णित है?

बालकाण्ड में नाम महिमा का वर्णन दोहा 19 से 27-28 तक लगभग 8-10 दोहों और दर्जनों चौपाइयों में फैला हुआ है। इसमें नाम के दो अक्षर, शिवजी का जप, वाल्मीकि का उद्धार, कलियुग में नाम का एकमात्र आधार होना आदि अनेक पक्ष बताये गये।

बालकाण्डनाम महिमाविस्तार
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'राम भगति मनि उर बस जाके' — राम भक्ति की तुलना किससे की गई?

राम भक्ति की तुलना मणि (रत्न) से की गई है। अर्थ — जिसके हृदय में रामभक्तिरूपी मणि बसी है, उसको स्वप्न में भी रत्तीभर दुख नहीं होता।

बालकाण्डराम भक्तिमणि उपमा
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तुलसीदासजी ने राम नाम को शिवजी का प्राणप्रिय क्यों कहा?

शिवजी स्वयं इस महामंत्र का जप करते हैं, काशी में मरने वालों को मुक्ति के लिये यही नाम उपदेश करते हैं, और एक राम नाम को हज़ार नामों के समान मानते हैं। नाम के प्रभाव से ही गणेशजी सबसे पहले पूजे जाते हैं।

बालकाण्डशिवराम नाम
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'सकल कामना हीन जे राम भगति रस लीन' — ऐसे भक्तों की क्या विशेषता बताई?

ऐसे निष्काम भक्तों ने रामनाम के प्रेमरूपी अमृत-सरोवर में अपने मन को मछली बना रखा है — जैसे मछली जल से अलग नहीं हो सकती, वैसे ही वे क्षणभर भी नाम-प्रेम से अलग नहीं होते। वे भोग और मोक्ष दोनों की कामना से रहित हैं।

बालकाण्डनिष्काम भक्तिनाम प्रेम
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कलियुग में मुक्ति का एकमात्र उपाय क्या बताया गया है रामचरितमानस में?

कलियुग में राम नाम ही एकमात्र आधार है। तुलसीदासजी ने कहा — 'नहिं कलि करम न भगति बिबेकू। राम नाम अवलंबन एकू।' कलियुग में न कर्म है, न भक्ति, न ज्ञान — केवल राम नाम ही उपाय है।

बालकाण्डकलियुगराम नाम
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'जपहिं नामु जन आरत भारी। मिटहिं कुसंकट होहिं सुखारी' — चार प्रकार के भक्त कौन हैं?

चार प्रकार के भक्त हैं — (1) अर्थार्थी (धन चाहने वाले), (2) आर्त (संकट निवृत्ति चाहने वाले), (3) जिज्ञासु (भगवान को जानने वाले), (4) ज्ञानी (तत्त्व से जानकर प्रेम से भजने वाले)। चारों को नाम का आधार है, पर ज्ञानी भक्त प्रभु को विशेष प्रिय हैं।

बालकाण्डचार प्रकार भक्तनाम महिमा
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तुलसीदासजी ने राम नाम को निर्गुण और सगुण दोनों से कैसे बड़ा बताया?

तुलसीदासजी ने कहा कि राम नाम निर्गुण और सगुण दोनों के बीच 'सुन्दर साक्षी' और 'चतुर दुभाषिया' है — दोनों का ज्ञान कराने वाला। रूप नाम के अधीन है, नाम के बिना रूप का ज्ञान नहीं हो सकता।

बालकाण्डनाम महिमानिर्गुण सगुण
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'राम नाम मनि दीप धरु जीह देहरीं द्वार' — इसमें राम नाम की तुलना किससे है?

राम नाम की तुलना मणि-दीपक से की गई है। अर्थ — यदि भीतर-बाहर दोनों ओर उजाला चाहते हो तो मुखरूपी द्वार की जीभरूपी देहली पर रामनामरूपी मणि-दीपक रख दो।

बालकाण्डराम नाममणि दीपक
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रामचरितमानस में 'राम' नाम को किन दो अक्षरों का बताया गया है?

'राम' नाम दो अक्षरों — 'र' और 'म' का है। ये दो अक्षर अग्नि, सूर्य और चन्द्रमा के बीजरूप हैं तथा ब्रह्मा, विष्णु और शिव — तीनों का प्रतिनिधित्व करते हैं। तुलसीदासजी ने इन्हें सावन-भादों के दो महीनों की उपमा दी।

बालकाण्डराम नामदो अक्षर
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रामचरितमानस — बालकाण्ड — शास्त्रीय प्रश्नोत्तर संग्रह

पौराणिक पर रामचरितमानस — बालकाण्ड श्रेणी में आपको सनातन धर्म, वेद, पुराण और शास्त्रों पर आधारित प्रामाणिक प्रश्न-उत्तर मिलेंगे। प्रत्येक उत्तर विद्वानों द्वारा शास्त्रीय प्रमाणों सहित तैयार किया गया है। किसी भी प्रश्न पर क्लिक करें और विस्तृत उत्तर पढ़ें। अन्य विषयों के लिए प्रश्नोत्तरी मुख्य पृष्ठ देखें।

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रामचरितमानस — बालकाण्ड को गहराई से समझने का तरीका

रामचरितमानस — बालकाण्ड के पेज 6 प्रश्नोत्तर पेज छोटे उत्तरों को एक साथ रखता है, इसलिए इसे त्वरित समाधान और आगे पढ़ने के प्रवेश-द्वार दोनों की तरह इस्तेमाल किया जा सकता है।

320 प्रश्न वाले इस पेज पर सबसे अच्छा तरीका यह है कि पहले वही प्रविष्टियाँ पढ़ें जो आपके वर्तमान सवाल से सीधा संबंध रखती हैं, फिर उनसे जुड़े अगले लेख या प्रश्न खोलें ताकि आधी-अधूरी जानकारी के बजाय पूरा संदर्भ बने।

अगर आपको किसी उत्तर का छोटा रूप मिल रहा है, तो उसी विषय के अगले प्रश्न और संबंधित विस्तृत लेख भी देखें। इससे नियम, अपवाद, समय, विधि और शास्त्रीय आधार जैसी बातें स्पष्ट होती हैं।

शुरुआत उन प्रश्न से करें जिनका शीर्षक आपके सवाल या उद्देश्य से सबसे अधिक मेल खाता है।

पढ़ते समय विधि, महत्व, समय और सावधानियों जैसे अलग-अलग पहलुओं को नोट करें, क्योंकि ये अक्सर अलग प्रविष्टियों में बँटे होते हैं।

अगर एक पेज से पूरा उत्तर न मिले, तो उसी संग्रह के अगले लेख या प्रश्न खोलकर संदर्भ पूरा करें।