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दिव्यास्त्र प्रश्नोत्तर (पेज 4) — 418 प्रश्न

दिव्यास्त्र से जुड़े 418 प्रामाणिक प्रश्नोत्तर पढ़ें। शास्त्रों और पुराणों पर आधारित उत्तर एक ही जगह मिलेंगे।

कुल 418 प्रश्न

वासवी शक्ति घटोत्कच पर क्यों चलाई कर्ण ने

14वें दिन रात में घटोत्कच ने कौरव-सेना पर भीषण कहर बरपाया। दुर्योधन के अनुरोध और मित्र-धर्म के लिए कर्ण ने वासवी शक्ति घटोत्कच पर चलाई — घटोत्कच का वध हुआ और अर्जुन बच गया।

घटोत्कच वधकर्ण वासवीरात्रि युद्ध
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कर्ण ने वासवी शक्ति अर्जुन पर क्यों नहीं चलाई

कर्ण अर्जुन के लिए वासवी शक्ति बचाए हुए थे। श्रीकृष्ण ने रात को घटोत्कच को उतारा जो कौरव-सेना पर भीषण कहर बरपा रहा था। दुर्योधन के अनुरोध पर कर्ण को वासवी शक्ति घटोत्कच पर चलानी पड़ी।

वासवी शक्तिकर्ण अर्जुनघटोत्कच
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कर्ण को वासवी शक्ति किसने दी थी

कर्ण को वासवी शक्ति देवराज इंद्र ने दी — कवच-कुण्डल के बदले में। कर्ण ने बिना माँगे यह दान किया था और इंद्र ने प्रसन्न होकर वासवी शक्ति प्रदान की।

वासवी शक्तिइंद्रकर्ण
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वासवी शक्ति क्या है

वासवी शक्ति देवराज इंद्र का अमोघ और अचूक अस्त्र है जिसे कोई नहीं काट सकता। इसे केवल एक बार चलाया जा सकता था — एक बार चलाने पर यह इंद्र के पास लौट जाता था।

वासवी शक्तिइंद्रास्त्रअमोघ
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नागपाश का प्रतिकार क्या है

नागपाश का एकमात्र प्रतिकार गरुड़देव हैं — कोई अस्त्र इसे नहीं तोड़ सकता। गरुड़ नागों के जन्मजात शत्रु हैं। उनके आते ही नाग भाग जाते हैं और नागपाश निष्प्रभावी हो जाता है।

नागपाश काटगरुड़एकमात्र उपाय
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गरुड़ ने नागपाश को कैसे तोड़ा

गरुड़ ने अपनी चोंच से राम-लक्ष्मण से लिपटे सभी नागों को एक-एक करके काट डाला। गरुड़ नागों के जन्मजात शत्रु हैं — उनकी उपस्थिति मात्र से नागपाश का प्रभाव समाप्त हो गया।

गरुड़नागपाशचोंच
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नागपाश से राम और लक्ष्मण कैसे मुक्त हुए

हनुमानजी ने जाना कि केवल गरुड़ ही नागपाश तोड़ सकते हैं। उन्होंने गरुड़ को लाया जिन्होंने चोंच से सभी नागों को काटकर नागपाश तोड़ा और राम-लक्ष्मण को मुक्त किया।

नागपाश मुक्तिगरुड़हनुमान
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मेघनाद ने राम-लक्ष्मण पर नागपाश क्यों चलाया

जब मेघनाद के सभी अस्त्र विफल हो गए तब उसने अदृश्य होकर पीछे से नागपाश चलाया। दोनों भाई मूर्छित होकर मृत्यु की ओर बढ़ने लगे — वानर-सेना में हाहाकार मच गया।

मेघनाद नागपाशराम लक्ष्मणरामायण युद्ध
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नागपाश मेघनाद को किसने दिया था

नागपाश मेघनाद को भगवान शिव की कृपा से वरदान में मिला था। यह ब्रह्मा-निर्मित अस्त्र था जिसे शिव ने मेघनाद की घोर तपस्या से प्रसन्न होकर प्रदान किया था।

नागपाश दातामेघनादशिव
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नागपाश किसका अस्त्र था

नागपाश भगवान ब्रह्मा का निर्मित अस्त्र था जो मेघनाद (इंद्रजीत) को वरदान में मिला था। मेघनाद इसे अत्यंत कठिन स्थिति में ही प्रयोग करता था क्योंकि यह उसका सर्वाधिक घातक अस्त्र था।

नागपाशमेघनाद इंद्रजीतशिव वरदान
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नागपाश क्या है

नागपाश एक दिव्य बाण है जो छोड़ने पर असंख्य विषैले नागों में बदल जाता है और लक्ष्य को मृत्यु तक नहीं छोड़ता। इसे भगवान ब्रह्मा ने बनाया था। यमपाश से भी अधिक भयंकर अस्त्र।

नागपाशविषैले नागपाश
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मंत्र से अस्त्र कैसे चलाया जाता था

दिव्यास्त्र के लिए देव-संबंधित मंत्र का विधिपूर्वक उच्चारण करते हुए बाण धनुष पर चढ़ाया जाता था। मंत्र से देवता की शक्ति अस्त्र में समाती थी। यह विद्या गोपनीय और गुरु-परंपरा से मिलती थी।

मंत्र अस्त्रदिव्यास्त्र विधिधनुर्वेद
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पर्वतास्त्र और नागास्त्र में क्या अंतर था?

नागास्त्र अचूक निशाना साधता था और सम्मोहनास्त्र सेना को भ्रमित करता था, जबकि पर्वतास्त्र एक अंधाधुंध विनाश का हथियार था जो पूरी सेना पर पर्वत वर्षाता था।

पर्वतास्त्रनागास्त्रअंतर
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पर्वतास्त्र का मनोवैज्ञानिक प्रभाव क्या था?

पर्वतास्त्र शत्रु सेना को स्वयं प्रकृति का प्रकोप प्रतीत होता था। आकाश से पर्वत गिरते देख साधारण सैनिक का मनोबल टूट जाना स्वाभाविक था क्योंकि इसका कोई पारंपरिक उत्तर नहीं था।

पर्वतास्त्रमनोवैज्ञानिक प्रभावभय
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पर्वतास्त्र के प्रयोग से युद्धभूमि पर क्या होता था?

पर्वतास्त्र के प्रयोग से आकाश में विशाल पर्वत और चट्टानें प्रकट होकर शत्रु सेना पर गिरती थीं। पैदल सैनिक, रथ, घुड़सवार और हाथी सभी इनके नीचे कुचल जाते थे।

पर्वतास्त्रप्रभावयुद्धभूमि
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पर्वतास्त्र किस प्रकार का अस्त्र था?

पर्वतास्त्र एक अंधाधुंध विनाश का हथियार था जो शत्रु सेना को एक क्षण में कुचल देता था। इसकी अनियंत्रित प्रकृति के कारण इसे अंतिम उपाय का हथियार माना जाता था।

पर्वतास्त्रअंधाधुंध विनाशसेना
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पर्वतास्त्र नाम का क्या अर्थ है?

'पर्वत' और 'अस्त्र' के मेल से बना यह नाम 'पर्वतों का हथियार' का अर्थ देता है। यह नाम ही इस अस्त्र की भयावह शक्ति का परिचय दे देता है।

पर्वतास्त्रनामअर्थ
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पर्वतास्त्र के अधिष्ठाता देवता कौन हैं?

पर्वतास्त्र के अधिष्ठाता देवता वायु देव हैं। हल्की और निराकार वायु का सबसे भारी पर्वतों पर नियंत्रण — यही वायु देव की असीम शक्ति का प्रमाण है।

पर्वतास्त्रवायु देवअधिष्ठाता
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पर्वतास्त्र क्या है?

पर्वतास्त्र एक अत्यंत विनाशकारी दिव्यास्त्र है जिसके प्रयोग से आकाश से विशाल पर्वत और चट्टानें प्रकट होकर शत्रु सेना पर गिरती थीं। इसके अधिष्ठाता देवता वायु देव हैं।

पर्वतास्त्रदिव्यास्त्रवायु देव
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अंतर्धान अस्त्र की सच्ची विरासत क्या है?

अंतर्धान अस्त्र की विरासत यह है कि जीत पाशविक बल से नहीं बल्कि बुद्धि और मनोवैज्ञानिक प्रभुत्व से मिलती है। सबसे शक्तिशाली हथियार वह है जिसे दुश्मन कभी आते नहीं देखता।

अंतर्धान अस्त्रविरासतरणनीति
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अर्जुन और मेघनाद के अंतर्धान अस्त्र प्रयोग में क्या अंतर था?

अर्जुन ने अहिंसक प्रदर्शन के लिए अस्त्र प्रयोग किया जबकि मेघनाद ने इसे भय और विनाश के लिए हथियार बनाया। अस्त्र तटस्थ था — उसका स्वभाव धारक के चरित्र से निर्धारित था।

अर्जुनमेघनादअंतर्धान अस्त्र
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मेघनाद को अदृश्यता की शक्ति कहाँ से मिली?

मेघनाद की अदृश्यता का स्रोत विवादित है — एक मत अंतर्धान अस्त्र को श्रेय देता है जबकि अन्य ग्रंथ माया, शिव-ब्रह्मा के वरदान और निकुंभिला यज्ञों को कारण मानते हैं।

मेघनादअदृश्यतामाया
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मेघनाद ने अंतर्धान अस्त्र का प्रयोग कैसे किया?

मेघनाद बादलों में अदृश्य हो जाता था और राम की सेना पर नागपाश और ब्रह्मशिरा अस्त्र बरसाता था। वह छाया से प्रहार करता था और स्वयं सुरक्षित रहता था।

मेघनादअंतर्धान अस्त्रअदृश्य
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अर्जुन को अंतर्धान अस्त्र किन दो स्रोतों से मिला?

अर्जुन को अंतर्धान अस्त्र दो स्रोतों से मिला — गुरु द्रोणाचार्य से और देवता कुबेर से। यह दोहरा शिक्षण उनकी पूर्ण महारत का प्रतीक है।

अर्जुनअंतर्धान अस्त्रद्रोणाचार्य
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अर्जुन ने अंतर्धान अस्त्र का प्रयोग कहाँ किया?

अर्जुन ने अंतर्धान अस्त्र का सबसे प्रमुख प्रयोग हस्तिनापुर की रंगसभा में किया जहाँ उन्होंने अदृश्य होकर और फिर प्रकट होकर अपने कौशल का प्रदर्शन किया।

अर्जुनअंतर्धान अस्त्रहस्तिनापुर
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अंतर्धान अस्त्र इंद्रास्त्र का तोड़ कैसे था?

अंतर्धान अस्त्र इंद्रास्त्र चलाने वाले के मन को भ्रमित कर आक्रमण रोक देता था और इंद्रास्त्र के बाणों को हवा में ही गायब कर सकता था।

अंतर्धान अस्त्रइंद्रास्त्रप्रतिकार
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अंतर्धान अस्त्र मानसिक भ्रम कैसे पैदा करता था?

अंतर्धान अस्त्र शत्रु के मन में गहरा भ्रम पैदा करता था, लड़ने की इच्छा समाप्त करता था और इंद्रास्त्र के धनुर्धर को मन भ्रमित करके आक्रमण से रोक देता था।

अंतर्धान अस्त्रमानसिक भ्रममनोवैज्ञानिक
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अंतर्धान अस्त्र की निद्रा शक्ति क्या होती थी?

अंतर्धान अस्त्र की निद्रा शक्ति से शत्रु को गहरी नींद या बेहोशी में डाला जा सकता था। यह बिना रक्तपात के पूरी सेना को निष्क्रिय करने का अहिंसक तरीका था।

अंतर्धान अस्त्रनिद्रा शक्तिबेहोशी
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अंतर्धान अस्त्र की कितनी शक्तियाँ थीं और क्या-क्या थीं?

अंतर्धान अस्त्र की तीन शक्तियाँ थीं — अदृश्य होने की शक्ति, शत्रु को निद्रा में डालने की शक्ति, और मानसिक भ्रम पैदा करने की शक्ति।

अंतर्धान अस्त्रतीन शक्तियाँअदृश्यता
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कुबेर और अंतर्धान अस्त्र का क्या संबंध है?

कुबेर छिपे खजानों और गुप्त लोकों के स्वामी हैं। अंतर्धान अस्त्र जो छिपाने और भ्रम का हथियार है, उनके अधिकार क्षेत्र का आदर्श प्रतीक है।

कुबेरअंतर्धान अस्त्रगुप्त लोक
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कुबेर ने अंतर्धान अस्त्र के बारे में क्या कहा?

कुबेर ने कहा कि अंतर्धान अस्त्र 'ओज, तेज और कांति' प्रदान करता है और शत्रुओं को ऐसे नष्ट करता है जैसे वे सो रहे हों।

कुबेरअंतर्धान अस्त्रओज तेज कांति
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अर्जुन को अंतर्धान अस्त्र कैसे मिला?

वन पर्व में अर्जुन की तपस्या से प्रसन्न होकर स्वर्गलोक में कुबेर ने उन्हें चारों लोकपालों की दिव्य सभा में अपना परम प्रिय अंतर्धान अस्त्र प्रदान किया।

अर्जुनअंतर्धान अस्त्रकुबेर
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भगवान शिव ने त्रिपुर विनाश में अंतर्धान अस्त्र का प्रयोग क्यों किया?

शिव ने अंतर्धान अस्त्र से असुरों को निद्रा-चेतनाहीन किया ताकि वे रक्षा न कर सकें और पाशुपतास्त्र को अचूक अवसर मिले।

शिवत्रिपुरअंतर्धान अस्त्र
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तारकासुर के तीन पुत्र कौन थे और उन्हें क्या वरदान मिला था?

तारकासुर के तीन पुत्र थे — तारकाक्ष, विद्युन्माली और कमलाक्ष। उन्हें ब्रह्मा से वरदान था कि वे केवल एक बाण से तब मरेंगे जब तीनों नगर एक सीध में हों।

तारकासुरत्रिपुरतारकाक्ष
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अंतर्धान अस्त्र का पहला ज्ञात प्रयोग कब और किसने किया?

अंतर्धान अस्त्र का पहला ज्ञात प्रयोग स्वयं भगवान शिव ने त्रिपुर विनाश के समय किया था। इसका उल्लेख महाभारत के वन पर्व में मिलता है।

अंतर्धान अस्त्रपहला प्रयोगशिव
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अंतर्धान अस्त्र किस श्रेणी का दिव्यास्त्र था?

अंतर्धान अस्त्र रणनीतिक श्रेणी का दिव्यास्त्र था जो माया और मनोवैज्ञानिक प्रभुत्व पर केंद्रित था, विनाश पर नहीं।

अंतर्धान अस्त्ररणनीतिकश्रेणी
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अंतर्धान अस्त्र को कुबेर अस्त्र क्यों कहते हैं?

जब कुबेर ने अर्जुन को अपना परम प्रिय अस्त्र — अंतर्धान अस्त्र — दिया, तब से इसे कुबेर अस्त्र भी कहा जाने लगा।

अंतर्धान अस्त्रकुबेर अस्त्रकुबेर
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अंतर्धान अस्त्र क्या है?

अंतर्धान अस्त्र एक रणनीतिक दिव्यास्त्र है जो अदृश्यता, निद्रा और मानसिक भ्रम की शक्तियों से युद्धभूमि को नियंत्रित करता था। इसके अधिपति देवता कुबेर हैं।

अंतर्धान अस्त्रअदृश्यताकुबेर
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अस्त्र और शस्त्र में क्या अंतर है

शस्त्र = हाथ से पकड़कर या फेंककर चलाए जाने वाले हथियार (तलवार, गदा, त्रिशूल)। अस्त्र = मंत्र-शक्ति या दिव्य-शक्ति से चलाए जाने वाले हथियार (ब्रह्मास्त्र, पाशुपतास्त्र)।

अस्त्र शस्त्र अंतरधनुर्वेददिव्यास्त्र परिभाषा
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हिन्दू पुराणों के अनुसार सबसे शक्तिशाली अस्त्र कौन सा है

हिन्दू पुराणों के अनुसार सर्वाधिक शक्तिशाली अस्त्र 'पाशुपतास्त्र' है — अकाट्य, अमोघ, सर्वसंहारक। पाँच महास्त्रों में — ब्रह्मास्त्र, नारायणास्त्र, पाशुपतास्त्र, वज्र, सुदर्शन — पाशुपतास्त्र को सर्वोच्च माना गया है।

सर्वशक्तिशाली अस्त्रपाशुपतास्त्रहिंदू पुराण
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ब्रह्मास्त्र सुदर्शन चक्र या त्रिशूल में कौन सबसे शक्तिशाली है

तीनों अलग प्रयोजन के हैं। त्रिशूल = शिव की संहार-शक्ति, सुदर्शन = धर्म-रक्षा, ब्रह्मास्त्र = सर्वसंहारक। सर्वश्रेष्ठ पाशुपतास्त्र माना गया है जो अकाट्य है और ब्रह्मास्त्र भी इसे नहीं रोक सकता।

ब्रह्मास्त्र सुदर्शन त्रिशूलतुलनासर्वश्रेष्ठ अस्त्र
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पाशुपतास्त्र का प्रतिकार क्या है

पाशुपतास्त्र का कोई प्रतिकार नहीं है — यह अकाट्य और अमोघ है। इसे कोई अस्त्र नहीं रोक सकता। इसी कारण अर्जुन ने महाभारत में इसका प्रयोग नहीं किया — इसकी सर्वनाशी शक्ति अत्यधिक थी।

पाशुपतास्त्र काटअकाट्यकोई प्रतिकार नहीं
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पाशुपतास्त्र किसके पास था

पाशुपतास्त्र मूलतः शिव के पास था। महाभारत में किरात-परीक्षा के बाद शिव ने अर्जुन को दिया। श्रीराम के पास भी यह था। मेघनाद ने इस पर विजय प्राप्त की थी।

पाशुपतास्त्र धारकअर्जुनराम
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पाशुपतास्त्र क्या होता है

पाशुपतास्त्र शिव का सर्वसंहारक दिव्यास्त्र है जो मन, नेत्र, वाणी या धनुष — किसी से भी चलाया जा सकता है। तीनों लोकों में कोई इससे नहीं बच सकता। कमजोर पर नहीं चलाना — वरना सृष्टि-नाश हो सकता है।

पाशुपतास्त्रशिवअकाट्य
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स्कंद पुराण में कार्तिकेय के अस्त्रों का क्या वर्णन है

स्कंद पुराण में कार्तिकेय का मुख्य अस्त्र वेल (माता-प्रदत्त भाला) है। जन्म से ही उनके हाथ में दिव्य शस्त्र थे। वेल से तारकासुर-वध और सुरपदम का पहाड़-रूप तोड़ा। वे देव-सेनापति हैं।

स्कंद पुराणकार्तिकेय अस्त्रवेल
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कार्तिकेय को वेल किसने दिया था

कार्तिकेय को वेल उनकी माता पार्वती ने दिया था। स्कंद पुराण में वर्णित है — 'माँ पार्वती द्वारा दी गई शक्तियों से परिपूर्ण अस्त्र का नाम वेल है।' यह तारकासुर-वध के लिए था।

वेल दातामाता पार्वतीकार्तिकेय
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वेल शक्ति क्या है

वेल कार्तिकेय का दिव्य भाला है — कुण्डलिनी शक्ति और अज्ञान-नाश का प्रतीक। माता पार्वती की शक्ति से परिपूर्ण यह अचूक अस्त्र था जिससे तारकासुर का वध हुआ।

वेलकार्तिकेय भालाकुण्डलिनी शक्ति
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कार्तिकेय के अस्त्र का नाम क्या है

कार्तिकेय का प्रमुख अस्त्र 'वेल' है — एक दिव्य भाला जो कुण्डलिनी शक्ति का प्रतीक है। इसी से तारकासुर-वध हुआ और सुरपदम को दो भागों में तोड़ा — एक मोर बना, दूसरा मुर्गा।

कार्तिकेयवेलभाला
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महिषासुर वध में दुर्गा ने कौन से अस्त्र चलाए

महिषासुर-वध में दुर्गा ने त्रिशूल, सुदर्शन चक्र, वज्र, शंख, घंटा, शक्ति और फरसा — समस्त देव-प्रदत्त अस्त्रों का प्रयोग किया। अंतिम वध त्रिशूल से छाती पर प्रहार से हुआ।

महिषासुर वधदुर्गा अस्त्रत्रिशूल
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विष्णु ने दुर्गा माँ को सुदर्शन चक्र क्यों दिया

महिषासुर को पुरुष देवता नहीं मार सकते थे। इसलिए विष्णु ने देवी दुर्गा को सुदर्शन चक्र प्रदान किया। सभी देवताओं की संयुक्त शक्ति से सज्जित होकर देवी ने महिषासुर-वध किया।

विष्णु सुदर्शनदुर्गा चक्रमहिषासुर
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दिव्यास्त्र — शास्त्रीय प्रश्नोत्तर संग्रह

पौराणिक पर दिव्यास्त्र श्रेणी में आपको सनातन धर्म, वेद, पुराण और शास्त्रों पर आधारित प्रामाणिक प्रश्न-उत्तर मिलेंगे। प्रत्येक उत्तर विद्वानों द्वारा शास्त्रीय प्रमाणों सहित तैयार किया गया है। किसी भी प्रश्न पर क्लिक करें और विस्तृत उत्तर पढ़ें। अन्य विषयों के लिए प्रश्नोत्तरी मुख्य पृष्ठ देखें।

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दिव्यास्त्र को गहराई से समझने का तरीका

दिव्यास्त्र के पेज 4 प्रश्नोत्तर पेज छोटे उत्तरों को एक साथ रखता है, इसलिए इसे त्वरित समाधान और आगे पढ़ने के प्रवेश-द्वार दोनों की तरह इस्तेमाल किया जा सकता है।

418 प्रश्न वाले इस पेज पर सबसे अच्छा तरीका यह है कि पहले वही प्रविष्टियाँ पढ़ें जो आपके वर्तमान सवाल से सीधा संबंध रखती हैं, फिर उनसे जुड़े अगले लेख या प्रश्न खोलें ताकि आधी-अधूरी जानकारी के बजाय पूरा संदर्भ बने।

अगर आपको किसी उत्तर का छोटा रूप मिल रहा है, तो उसी विषय के अगले प्रश्न और संबंधित विस्तृत लेख भी देखें। इससे नियम, अपवाद, समय, विधि और शास्त्रीय आधार जैसी बातें स्पष्ट होती हैं।

शुरुआत उन प्रश्न से करें जिनका शीर्षक आपके सवाल या उद्देश्य से सबसे अधिक मेल खाता है।

पढ़ते समय विधि, महत्व, समय और सावधानियों जैसे अलग-अलग पहलुओं को नोट करें, क्योंकि ये अक्सर अलग प्रविष्टियों में बँटे होते हैं।

अगर एक पेज से पूरा उत्तर न मिले, तो उसी संग्रह के अगले लेख या प्रश्न खोलकर संदर्भ पूरा करें।