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दिव्यास्त्र प्रश्नोत्तर (पेज 2) — 418 प्रश्न

दिव्यास्त्र से जुड़े 418 प्रामाणिक प्रश्नोत्तर पढ़ें। शास्त्रों और पुराणों पर आधारित उत्तर एक ही जगह मिलेंगे।

कुल 418 प्रश्न

वासवी शक्ति का प्रयोग कितनी बार किया जा सकता था?

वासवी शक्ति का प्रयोग केवल एक बार किया जा सकता था। उसके बाद यह इंद्र के पास वापस लौट जाती और कर्ण इससे वंचित हो जाता।

वासवी शक्तिएकल प्रयोगएक बार
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वासवी शक्ति की क्या-क्या शर्तें थीं?

वासवी शक्ति की तीन शर्तें थीं — एक बार ही प्रयोग होगा, केवल जब प्राण संकट में हों, और शर्त तोड़ने पर यह चलाने वाले पर ही चल जाती।

वासवी शक्तिशर्तेंएकल प्रयोग
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वासवी शक्ति का जन्म कैसे हुआ?

कर्ण के अभूतपूर्व त्याग से प्रभावित और लज्जित होकर इंद्र ने वासवी शक्ति दी। यह इंद्र के छल की भरपाई के रूप में दिया गया अस्त्र था।

वासवी शक्तिजन्मकर्ण
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कर्ण ने छल जानते हुए भी कवच-कुंडल क्यों दे दिए?

कर्ण ने छल जानते हुए भी कवच-कुंडल दिए क्योंकि वह अपने दानवीर धर्म और वचन को अपने प्राणों से भी अधिक महत्व देता था।

कर्णदानवीरकवच कुंडल
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इंद्र ने कर्ण को धोखा देने के लिए क्या वेश धारण किया?

इंद्र ने एक वृद्ध ब्राह्मण का वेश धारण करके कर्ण के पास पहुँचकर भिक्षा में उसके दिव्य कवच और कुंडल मांग लिए।

इंद्रब्राह्मण वेशकर्ण
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सूर्य देव ने कर्ण को क्या सलाह दी थी?

सूर्य देव स्वप्न में आकर कर्ण को इंद्र के छल से सावधान किया और कवच-कुंडल न देने की सलाह दी। साथ ही यदि देना पड़े तो बदले में अमोघ अस्त्र मांगने को कहा।

सूर्य देवकर्णसलाह
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इंद्र ने कर्ण का कवच-कुंडल क्यों लिया?

इंद्र ने अपने पुत्र अर्जुन की रक्षा के लिए कर्ण का कवच-कुंडल लिया। कृष्ण की सलाह पर उन्होंने ब्राह्मण वेश में छल से यह दिव्य सुरक्षा कर्ण से मांग ली।

इंद्रकर्णकवच कुंडल
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कर्ण का जन्म किस दिव्य सुरक्षा के साथ हुआ था?

कर्ण का जन्म सूर्य देव के वरदान से प्राप्त दिव्य कवच और कुंडल के साथ हुआ था जो उसके शरीर का ही अंग थे और उसे अजेय बनाते थे।

कर्णकवच कुंडलसूर्य देव
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वासवी शक्ति किस रूप में थी — तलवार, बाण या भाला?

वासवी शक्ति भाले या बर्छी के रूप में थी। एक बार छोड़े जाने के बाद यह लक्ष्य को भेदकर ही वापस इंद्र के पास लौटती थी।

वासवी शक्तिभालाबर्छी
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वासवी शक्ति के दो नामों का क्या अर्थ है?

'वासवी शक्ति' का अर्थ है 'इंद्र की शक्ति' और 'अमोघास्त्र' का अर्थ है 'कभी निष्फल न होने वाला अस्त्र'। दोनों नाम मिलकर इसकी दिव्य प्रकृति और अचूकता को व्यक्त करते हैं।

वासवी शक्तिअमोघास्त्रनाम का अर्थ
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वासवी शक्ति को अमोघास्त्र क्यों कहा जाता है?

वासवी शक्ति को अमोघास्त्र इसलिए कहते हैं क्योंकि इसका वार कभी खाली नहीं जा सकता था। इसकी अचूकता इंद्र के दिव्य वचन से बंधी थी।

वासवी शक्तिअमोघास्त्रअचूक
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वासवी शक्ति क्या है?

वासवी शक्ति महाभारत का एक अमोघ दिव्यास्त्र था जिसे केवल एक बार चलाया जा सकता था और जिसका निशाना कभी नहीं चूकता था। यह कर्ण के पास था और इंद्र ने इसे दिया था।

वासवी शक्तिअमोघास्त्रकर्ण
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महाभारत युद्ध के बाद दिव्यास्त्रों का क्या हुआ?

महाभारत युद्ध के बाद द्वापर युग की समाप्ति और कलियुग के आगमन के साथ दिव्यास्त्रों का ज्ञान धीरे-धीरे पृथ्वी लोक से लुप्त हो गया।

दिव्यास्त्रमहाभारतकलियुग
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दिव्यास्त्र प्राप्त करने के लिए क्या-क्या आवश्यक था?

दिव्यास्त्र प्राप्त करने के लिए कठोर तपस्या, गुरु के प्रति अटूट भक्ति और निःस्वार्थ सेवा, और संबंधित देवता का अनुग्रह — तीनों आवश्यक थे।

दिव्यास्त्रप्राप्तितपस्या
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अश्वत्थामा को पर्जन्यास्त्र का ज्ञान कहाँ से मिला?

अश्वत्थामा को पर्जन्यास्त्र का ज्ञान अपने पिता गुरु द्रोणाचार्य से प्राप्त हुआ था। यह उनके विशाल दिव्यास्त्र संग्रह का हिस्सा था।

अश्वत्थामापर्जन्यास्त्रद्रोणाचार्य
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अर्जुन ने भीष्म पितामह की प्यास बुझाने के लिए क्या किया?

अर्जुन ने पर्जन्यास्त्र के सूक्ष्म रूप का आह्वान करके पृथ्वी से गंगाजल की निर्मल धारा उत्पन्न की जो सीधे शरशय्या पर लेटे भीष्म पितामह के मुख में गई।

अर्जुनभीष्मपर्जन्यास्त्र
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अर्जुन ने रंगभूमि में पर्जन्यास्त्र का प्रयोग कैसे किया?

महाभारत के आदि पर्व में हस्तिनापुर की रंगभूमि में अर्जुन ने द्रोणाचार्य की शिक्षा के प्रदर्शन के दौरान पर्जन्यास्त्र से आकाश में बादल उत्पन्न किए थे।

अर्जुनपर्जन्यास्त्ररंगभूमि
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पर्जन्यास्त्र के सूक्ष्म और विराट रूप में क्या अंतर था?

सूक्ष्म रूप में कुछ बूंद जल से भीष्म की प्यास बुझाई जा सकती थी, जबकि विराट रूप में पूरे क्षेत्र में प्रलयंकारी वर्षा कराई जा सकती थी।

पर्जन्यास्त्रसूक्ष्म रूपविराट रूप
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पर्जन्यास्त्र आग्नेयास्त्र का प्रतिकार कैसे करता था?

पर्जन्यास्त्र की मूसलाधार वर्षा आग्नेयास्त्र की विनाशकारी अग्नि को शांत कर देती थी। यह आग्नेयास्त्र का अचूक प्रतिकार था और इसे एक रक्षात्मक अस्त्र भी बनाता था।

पर्जन्यास्त्रआग्नेयास्त्रप्रतिकार
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पर्जन्यास्त्र का मनोवैज्ञानिक प्रभाव क्या था?

काले बादलों का अचानक घिरना, बिजली की कड़क और मूसलाधार वर्षा शत्रु सेना में भय और अनिश्चितता पैदा करती थी जिससे उनका मनोबल टूट जाता था।

पर्जन्यास्त्रमनोवैज्ञानिकभय
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पर्जन्यास्त्र युद्धभूमि में शत्रु सेना को कैसे बाधित करता था?

पर्जन्यास्त्र की वर्षा से रथ के पहिए कीचड़ में धंसते थे, धनुष की प्रत्यंचा ढीली पड़ती थी और सेना का आगे बढ़ना और युद्ध-व्यूह बनाए रखना असंभव हो जाता था।

पर्जन्यास्त्रयुद्धभूमिशत्रु
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पर्जन्यास्त्र की मुख्य शक्ति क्या थी?

पर्जन्यास्त्र की मुख्य शक्ति थी अपनी इच्छानुसार घनघोर वर्षा उत्पन्न करना। यह आकाश को काले बादलों से ढककर मूसलाधार वर्षा और जल प्रलय जैसी स्थिति बना सकता था।

पर्जन्यास्त्रमुख्य शक्तिवर्षा
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अथर्ववेद में पर्जन्यास्त्र का क्या उल्लेख मिलता है?

अथर्ववेद में आग्नेयास्त्र और वायव्यास्त्र के साथ पर्जन्यास्त्र का उल्लेख है जहाँ शत्रु को मोहित और नष्ट करने के लिए इन अस्त्रों का आह्वान किया गया है।

अथर्ववेदपर्जन्यास्त्रआग्नेयास्त्र
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पर्जन्यास्त्र कैसे प्राप्त किया जा सकता था?

पर्जन्यास्त्र पर्जन्य देव की कठोर तपस्या करके उनकी कृपा से, या किसी सिद्ध गुरु की शिक्षा और गुरु-शिष्य परंपरा के माध्यम से प्राप्त किया जा सकता था।

पर्जन्यास्त्रप्राप्तितपस्या
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पर्जन्य देव कौन हैं?

पर्जन्य देव वर्षा, मेघ और उर्वरता के अधिपति देवता हैं। ऋग्वेद में उनसे समय पर वर्षा और प्रजा के कल्याण की प्रार्थना की गई है।

पर्जन्य देववर्षा देवताऋग्वेद
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'पर्जन्य' शब्द का क्या अर्थ है?

संस्कृत में 'पर्जन्य' का अर्थ है 'बादल' या 'वर्षा'। इसी से पर्जन्यास्त्र का संबंध पर्जन्य देव से जुड़ता है जो वर्षा और उर्वरता के अधिपति देवता हैं।

पर्जन्यशब्द अर्थबादल
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पर्जन्यास्त्र क्या है?

पर्जन्यास्त्र एक दिव्यास्त्र है जो वर्षा और मेघों का आह्वान करता था। यह पर्जन्य देव से जुड़ा है और जीवन व विनाश दोनों की शक्ति रखता था।

पर्जन्यास्त्रदिव्यास्त्रवर्षा
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ऐंद्रास्त्र का प्रयोग महाभारत में कब हुआ

महाभारत में अर्जुन ने 14वें दिन सुदक्षिण और 17वें दिन संसप्तकों के वध के लिए ऐंद्रास्त्र का प्रयोग किया था। वासवी शक्ति के विपरीत यह बार-बार प्रयोग किया जा सकता था।

ऐंद्रास्त्र महाभारतअर्जुन14वाँ दिन
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ऐंद्रास्त्र क्या है

ऐंद्रास्त्र देवराज इंद्र का दिव्यास्त्र है जो चलाने पर शत्रु-दल पर असंख्य बाण-वर्षा करता है। महाभारत में अर्जुन ने इसका प्रयोग सुदक्षिण और संसप्तकों के विरुद्ध किया था।

ऐंद्रास्त्रइंद्रबाण वर्षा
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क्या संमोहनास्त्र का कोई प्रतिकार था

संमोहनास्त्र का प्रतिकार प्रज्ञास्त्र (विवेक-अस्त्र) था। उच्च आत्मबल वाले और दिव्य योद्धा इसके प्रभाव से स्वयं मुक्त हो सकते थे। ब्रह्मज्ञानियों पर यह प्रभावहीन था।

संमोहनास्त्र काटप्रज्ञास्त्रज्ञानशक्ति
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संमोहनास्त्र चलने पर दुश्मन क्या करने लगता है

संमोहनास्त्र चलने पर शत्रु पर दिव्य मोह छा जाता है — वे निद्रा में जाते हैं, अस्त्र-शस्त्र छोड़ देते हैं और युद्ध करने में असमर्थ हो जाते हैं। यह प्रभाव पूरी सेना पर एक साथ पड़ सकता था।

संमोहनास्त्र प्रभावनिद्राभ्रम
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संमोहनास्त्र किसने चलाया था महाभारत में

महाभारत में कर्ण और द्रोणाचार्य के पास संमोहन-अस्त्रों का उल्लेख मिलता है। यह अस्त्र रामायण में अधिक प्रसिद्ध है — विश्वामित्र ने श्रीराम को दिया था।

संमोहनास्त्र महाभारतकर्णअर्जुन
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संमोहनास्त्र क्या है

संमोहनास्त्र शत्रु को मारता नहीं — उसकी चेतना, विवेक और युद्ध-क्षमता नष्ट कर देता है। शत्रु भ्रमित, निद्रित या मोहित हो जाता है। यह मानसिक स्तर पर काम करने वाला दिव्यास्त्र है।

संमोहनास्त्रमोह अस्त्रनिद्रा
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वरुणास्त्र और आग्नेयास्त्र में क्या संबंध है

वरुणास्त्र (जल) और आग्नेयास्त्र (अग्नि) प्रकृति के विरोधी तत्वों के दिव्य प्रतीक हैं — जल अग्नि बुझाता है। युद्ध में वरुणास्त्र, आग्नेयास्त्र का सीधा प्रतिकार था।

वरुणास्त्र आग्नेयास्त्रअग्नि जलप्रतिकार संबंध
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वरुणास्त्र की क्या विशेषता थी

वरुणास्त्र की मुख्य विशेषता — भीषण जल-वर्षा और बाढ़ उत्पन्न करना, और आग्नेयास्त्र की दिव्य अग्नि को बुझाना। यह अग्नि-जल के शाश्वत द्वंद्व का दिव्यास्त्रिक रूप था।

वरुणास्त्र विशेषताजल वर्षाआग्नेयास्त्र प्रतिकार
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वरुणास्त्र किस देवता से मिलता है

वरुणास्त्र जल-देवता वरुणदेव से मिलता है। वरुण महासागर, नदियों और वर्षा के अधिपति हैं। उनकी साधना और कृपा से यह अस्त्र प्राप्त होता था।

वरुणास्त्रवरुण देवजल देवता
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वरुणास्त्र क्या है

वरुणास्त्र वरुणदेव का जल-अस्त्र है। इसके प्रयोग से आकाश से भीषण जल-वर्षा और बाढ़ आती है। यह मुख्यतः आग्नेयास्त्र के प्रतिकार के रूप में प्रयोग होता था।

वरुणास्त्रवरुण देवजल अस्त्र
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रामायण में आग्नेयास्त्र का प्रयोग कब हुआ

रामायण में बालकाण्ड में विश्वामित्र ने राम-लक्ष्मण को आग्नेयास्त्र की दीक्षा दी। लंका युद्ध में भी विभिन्न अग्नि-आधारित अस्त्रों का प्रयोग हुआ। यह राम सहित अनेक योद्धाओं के पास था।

आग्नेयास्त्ररामायणश्रीराम
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वैष्णवास्त्र का क्या संदेश है?

वैष्णवास्त्र का संदेश है — अहंकार छोड़ो और ईश्वरीय विधान के प्रति पूर्ण समर्पण करो। प्रतिरोध विनाश लाता है, समर्पण शांति।

वैष्णवास्त्रसंदेशसमर्पण
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वैष्णवास्त्र और नारायणास्त्र में क्या फर्क है?

वैष्णवास्त्र एकल लक्ष्य पर और विष्णु की कृपा से मिलता था, जबकि नारायणास्त्र अनेक लक्ष्यों पर और एक युद्ध में केवल एक बार प्रयोग होता था।

वैष्णवास्त्रनारायणास्त्रअंतर
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कृष्ण की छाती पर वैष्णवास्त्र का क्या हुआ?

कृष्ण की छाती पर आते ही वैष्णवास्त्र एक वैजयंती माला में बदल गया और उनके गले में सुशोभित हो गया क्योंकि कृष्ण स्वयं विष्णु के अवतार थे।

कृष्णवैष्णवास्त्रवैजयंती माला
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कृष्ण ने अर्जुन को बचाने के लिए क्या किया?

जब भगदत्त का वैष्णवास्त्र अर्जुन की ओर आया तो श्री कृष्ण ने अर्जुन की रक्षा के लिए वह अस्त्र स्वयं अपनी छाती पर ले लिया।

कृष्णअर्जुनवैष्णवास्त्र
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भगदत्त को वैष्णवास्त्र कैसे मिला?

भगदत्त को वैष्णवास्त्र वंशानुगत मिला — विष्णु → पृथ्वी देवी → नरकासुर → भगदत्त। यह पीढ़ी दर पीढ़ी हस्तांतरित हुआ।

भगदत्तवैष्णवास्त्रनरकासुर
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भगदत्त ने अर्जुन पर वैष्णवास्त्र क्यों चलाया?

भगदत्त ने कुरुक्षेत्र युद्ध में कौरव पक्ष की ओर से लड़ते हुए पांडव योद्धा अर्जुन पर वैष्णवास्त्र चलाया था।

भगदत्तअर्जुनवैष्णवास्त्र
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लक्ष्मण पर वैष्णवास्त्र बेअसर क्यों हुआ?

लक्ष्मण जी आदिशेष के अवतार और विष्णु के अंश थे। विष्णु का अपना अस्त्र अपने ही अंश पर प्रहार नहीं कर सकता था इसलिए वह बेअसर हुआ।

लक्ष्मणवैष्णवास्त्रआदिशेष
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मेघनाद ने लक्ष्मण पर वैष्णवास्त्र चलाया तो क्या हुआ?

मेघनाद का वैष्णवास्त्र लक्ष्मण की परिक्रमा करके वापस लौट आया क्योंकि लक्ष्मण जी स्वयं विष्णु के अंश आदिशेष के अवतार थे।

मेघनादलक्ष्मणवैष्णवास्त्र
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मेघनाद ने हनुमान पर वैष्णवास्त्र चलाया तो क्या हुआ?

ब्रह्मा जी के वरदान के कारण हनुमान जी पर मेघनाद के वैष्णवास्त्र का कोई प्रभाव नहीं पड़ा। दिव्य वरदान ने इस महाशक्तिशाली अस्त्र को भी निष्प्रभावी कर दिया।

मेघनादहनुमानवैष्णवास्त्र
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वैष्णवास्त्र कैसे मिलता था?

वैष्णवास्त्र भगवान विष्णु की प्रत्यक्ष कृपा से मिलता था। यह किसी साधारण तपस्या का फल नहीं बल्कि श्रीहरि की विशेष अनुकंपा थी।

वैष्णवास्त्रप्राप्तिविष्णु कृपा
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वैष्णवास्त्र को कौन निष्प्रभावी कर सकता था?

केवल स्वयं भगवान विष्णु ही वैष्णवास्त्र को निष्प्रभावी कर सकते थे। कोई अन्य दिव्यास्त्र या योद्धा इसका प्रतिकार करने में असमर्थ था।

वैष्णवास्त्रनिष्प्रभावीविष्णु
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दिव्यास्त्र — शास्त्रीय प्रश्नोत्तर संग्रह

पौराणिक पर दिव्यास्त्र श्रेणी में आपको सनातन धर्म, वेद, पुराण और शास्त्रों पर आधारित प्रामाणिक प्रश्न-उत्तर मिलेंगे। प्रत्येक उत्तर विद्वानों द्वारा शास्त्रीय प्रमाणों सहित तैयार किया गया है। किसी भी प्रश्न पर क्लिक करें और विस्तृत उत्तर पढ़ें। अन्य विषयों के लिए प्रश्नोत्तरी मुख्य पृष्ठ देखें।

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दिव्यास्त्र को गहराई से समझने का तरीका

दिव्यास्त्र के पेज 2 प्रश्नोत्तर पेज छोटे उत्तरों को एक साथ रखता है, इसलिए इसे त्वरित समाधान और आगे पढ़ने के प्रवेश-द्वार दोनों की तरह इस्तेमाल किया जा सकता है।

418 प्रश्न वाले इस पेज पर सबसे अच्छा तरीका यह है कि पहले वही प्रविष्टियाँ पढ़ें जो आपके वर्तमान सवाल से सीधा संबंध रखती हैं, फिर उनसे जुड़े अगले लेख या प्रश्न खोलें ताकि आधी-अधूरी जानकारी के बजाय पूरा संदर्भ बने।

अगर आपको किसी उत्तर का छोटा रूप मिल रहा है, तो उसी विषय के अगले प्रश्न और संबंधित विस्तृत लेख भी देखें। इससे नियम, अपवाद, समय, विधि और शास्त्रीय आधार जैसी बातें स्पष्ट होती हैं।

शुरुआत उन प्रश्न से करें जिनका शीर्षक आपके सवाल या उद्देश्य से सबसे अधिक मेल खाता है।

पढ़ते समय विधि, महत्व, समय और सावधानियों जैसे अलग-अलग पहलुओं को नोट करें, क्योंकि ये अक्सर अलग प्रविष्टियों में बँटे होते हैं।

अगर एक पेज से पूरा उत्तर न मिले, तो उसी संग्रह के अगले लेख या प्रश्न खोलकर संदर्भ पूरा करें।