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लोक प्रश्नोत्तर (पेज 2) — 3617 प्रश्न

लोक से जुड़े 3617 प्रामाणिक प्रश्नोत्तर पढ़ें। शास्त्रों और पुराणों पर आधारित उत्तर एक ही जगह मिलेंगे।

कुल 3617 प्रश्न

प्रलय में महर्लोक के ऋषि कहाँ जाते हैं?

नैमित्तिक प्रलय में भृगु आदि महर्षि महर्लोक छोड़कर जनलोक या सत्यलोक की ओर जाते हैं। ब्रह्मा की रात्रि समाप्त होने पर वे पुनः लौट आते हैं।

प्रलयमहर्लोकजनलोक
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महर्लोक को 'कृतकाकृतक' क्यों कहते हैं?

कृतकाकृतक = आंशिक रूप से विनाशी + आंशिक रूप से अविनाशी। नैमित्तिक प्रलय में महर्लोक भस्म नहीं होता (अकृतक) पर निर्जन हो जाता है (कृतक)।

कृतकाकृतकमहर्लोकविष्णु पुराण
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नैमित्तिक प्रलय में महर्लोक का क्या होता है?

नैमित्तिक प्रलय में महर्लोक भस्म नहीं होता लेकिन संकर्षण की अग्नि के असहनीय ताप से रहने योग्य नहीं रहता। भृगु आदि ऋषि जनलोक की ओर पलायन कर जाते हैं।

नैमित्तिक प्रलयमहर्लोकताप
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सकाम कर्म से महर्लोक मिल सकता है क्या?

नहीं, सकाम कर्म से महर्लोक नहीं मिलता — यह केवल स्वर्लोक तक ले जाता है। महर्लोक के लिए निष्काम तपस्या, वैराग्य और पूर्ण अनासक्ति आवश्यक है।

सकाम कर्ममहर्लोकस्वर्लोक
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योग साधना से महर्लोक कैसे मिलता है?

अष्टांग योग, सिद्धियाँ और संन्यास के माध्यम से सिद्ध योगी अपने प्राणों को स्वेच्छा से महर्लोक में ले जा सकते हैं। भागवत (११.२४.१४) यही कहता है।

योगमहर्लोकअष्टांग योग
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निष्काम यज्ञ से महर्लोक मिलता है क्या?

हाँ, लेकिन निष्काम (बिना फल की इच्छा के) यज्ञ ही महर्लोक दिलाते हैं। सकाम यज्ञ केवल स्वर्लोक तक ले जाते हैं। निष्काम सर्वस्व-अर्पण महर्लोक का द्वार खोलता है।

निष्काम यज्ञमहर्लोकसकाम
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तपस्या से महर्लोक मिलता है क्या?

हाँ, अत्यंत कठोर तपस्या महर्लोक दिलाती है। वानप्रस्थी जो देह को अस्थि-पंजर बना ले और निष्काम भाव से तपस्या करे वह महर्लोक प्राप्त करता है।

तपस्यामहर्लोकवानप्रस्थी
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महर्लोक कैसे प्राप्त होता है?

महर्लोक के लिए — कठोर तपस्या, निष्काम यज्ञ, धर्मार्थ दान, अखंड ब्रह्मचर्य और पूर्ण वैराग्य आवश्यक है। सकाम दान और सामान्य व्रत केवल स्वर्लोक तक ले जाते हैं।

महर्लोकप्राप्तितपस्या
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महर्लोक का भौतिक विस्तार कैसा है?

महर्लोक की संरचना पार्थिव धातु या मिट्टी की नहीं बल्कि विशुद्ध चिन्मय और मनोमय तत्त्वों से बनी है जो ध्यान और संकल्प शक्ति के प्रति संवेदनशील है।

महर्लोकभौतिक संरचनाचिन्मय
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ध्रुवलोक से महर्लोक कितनी दूरी पर है?

महर्लोक ध्रुवलोक से एक करोड़ योजन (1,00,00,000 योजन) ऊपर स्थित है। यह इतनी ऊँचाई पर है कि वहाँ भौतिक वायुमंडल और गुरुत्वाकर्षण का प्रभाव नहीं होता।

ध्रुवलोकमहर्लोकदूरी
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पिण्ड-ब्रह्माण्ड सिद्धांत क्या है?

पिण्ड-ब्रह्माण्ड सिद्धांत कहता है — जो ब्रह्माण्ड में है वही मानव शरीर में भी है। देवता, लोक और नक्षत्र सभी शरीर के विभिन्न अंगों में सूक्ष्म रूप में विद्यमान हैं।

पिण्ड-ब्रह्माण्डसिद्धांतगरुड़ पुराण
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महर्लोक को ग्रीवा (गर्दन) क्यों कहते हैं?

जैसे गर्दन धड़ और सिर को जोड़ती है वैसे ही महर्लोक भौतिक त्रैलोक्य और आध्यात्मिक अविनाशी लोकों के बीच सेतु है। इसीलिए विराट पुरुष में इसे ग्रीवा कहते हैं।

महर्लोकग्रीवासेतु
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विराट पुरुष के शरीर में महर्लोक कहाँ है?

भागवत (२.१.२८) के अनुसार विराट पुरुष के शरीर में महर्लोक ग्रीवा (गर्दन) के स्थान पर है। स्वर्लोक छाती पर, जनलोक मुख पर और सत्यलोक सिर पर है।

विराट पुरुषमहर्लोकग्रीवा
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मार्कण्डेय मुनि का महर्लोक से क्या संबंध है?

मार्कण्डेय मुनि अपनी कठोर तपस्या के प्रभाव से महर्लोक के सम्मानित निवासी माने गए हैं। उनकी असीम तपस्या और वैराग्य उन्हें इस दुर्लभ लोक का अधिकारी बनाती है।

मार्कण्डेयमहर्लोकतपस्या
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मन्वन्तर के बाद ऋषि महर्लोक में क्यों आते हैं?

एक मन्वन्तर के बाद सेवानिवृत्त इन्द्र, सप्तर्षि और मनु विश्राम और परब्रह्म-ध्यान के लिए महर्लोक में आते हैं और सत्यलोक की प्रतीक्षा करते हैं।

मन्वन्तरमहर्लोकसप्तर्षि
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वानप्रस्थी को महर्लोक कैसे मिलता है?

वानप्रस्थी जो वन में कठोर तपस्या करे, कंद-मूल पर निर्वाह करे और देह को अस्थि-पंजर बना ले, वह मृत्यु के बाद महर्लोक प्राप्त करता है।

वानप्रस्थीमहर्लोकतपस्या
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ब्रह्मचारी को महर्लोक क्यों मिलता है?

जो विद्यार्थी आजीवन अखंड ब्रह्मचर्य पालन करे, गहन वेदाध्ययन करे और बिना सांसारिक इच्छा के गुरु में समर्पित रहे, वह मृत्यु के बाद सीधे महर्लोक प्राप्त करता है।

ब्रह्मचारीमहर्लोकअखंड ब्रह्मचर्य
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महर्लोक में कौन-कौन से ऋषि रहते हैं?

महर्लोक में महर्षि भृगु, मार्कण्डेय मुनि, भृगु वंश के ऋषि, सिद्ध योगी, नैष्ठिक ब्रह्मचारी और मन्वन्तर के सेवानिवृत्त ऋषि रहते हैं।

महर्लोकऋषिभृगु
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महर्षि भृगु का महर्लोक से क्या संबंध है?

महर्षि भृगु ब्रह्मा के मानस पुत्र और महर्लोक के प्रमुख निवासी हैं। नैमित्तिक प्रलय में वे यहाँ से जनलोक जाते हैं और नई सृष्टि पर पुनः लौट आते हैं।

महर्षि भृगुमहर्लोकप्रजापति
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महर्लोक में कौन से गुण की प्रधानता है?

महर्लोक में विशुद्ध सत्त्वगुण की पूर्ण प्रधानता है। रजोगुण और तमोगुण का यहाँ प्रवेश नहीं। इसीलिए यहाँ रोग, शोक, भूख और क्रोध नहीं होते।

महर्लोकसत्त्वगुणरजोगुण
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महर्लोक का वातावरण कैसा है?

महर्लोक का वातावरण तपस्या, वैराग्य और यज्ञीय ऊर्जा से स्पंदित है। यहाँ विशुद्ध सत्त्वगुण की प्रधानता है। रोग, शोक, थकावट और भूख का पूर्णतः अभाव है।

महर्लोकवातावरणतपस्या
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महर्लोक स्वर्गलोक से कैसे अलग है?

स्वर्गलोक भौतिक भोग का स्थान है जहाँ पुण्य क्षीण होने पर वापसी होती है। महर्लोक विशुद्ध तपस्या और सत्त्वगुण का लोक है जहाँ एक पूरा कल्प रहा जा सकता है।

महर्लोकस्वर्गलोकअंतर
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महर्लोक के निवासियों की आयु कितनी होती है?

महर्लोक के निवासियों की आयु एक पूर्ण कल्प (ब्रह्मा का एक दिन = 4 अरब 32 करोड़ मानवीय वर्ष) होती है। इतने समय तक वे बिना किसी कष्ट के समाधि में रहते हैं।

महर्लोकआयुकल्प
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महर्लोक में निवासी भोजन कैसे करते हैं?

महर्लोक के निवासी अन्न-जल पर निर्भर नहीं। वे योग-अग्नि और परब्रह्म के ध्यान से ही पोषण प्राप्त करते हैं। यहाँ भूख का पूर्णतः अभाव है।

महर्लोकभोजनयोग-अग्नि
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महर्लोक में प्रकाश का स्रोत क्या है?

महर्लोक में भौतिक सूर्य का प्रकाश नहीं होता। यहाँ ऋषियों और सिद्ध योगियों का आन्तरिक तपोबल और दैवीय प्रकाश ही प्रकाश का स्रोत है।

महर्लोकप्रकाशतपोबल
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महर्लोक में रोग, बुढ़ापा और भूख क्यों नहीं होती?

महर्लोक विशुद्ध सत्त्वगुण से आच्छादित है जहाँ रजोगुण और तमोगुण का प्रवेश नहीं। इसलिए यहाँ रोग, बुढ़ापा, भूख, थकावट और क्रोध का पूर्णतः अभाव है।

महर्लोकरोगबुढ़ापा
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महर्लोक किसका निवास स्थान है?

महर्लोक में महर्षि भृगु जैसे महान प्रजापति, पितृगण, सिद्ध योगी, नैष्ठिक ब्रह्मचारी और मार्कण्डेय मुनि जैसी महान आत्माएं निवास करती हैं।

महर्लोकनिवासीभृगु
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त्रैलोक्य और महर्लोक में क्या अंतर है?

त्रैलोक्य (भूः, भुवः, स्वः) कृतक अर्थात विनाशशील है और सकाम कर्मों का फल-भोग क्षेत्र है। महर्लोक कृतकाकृतक है — आंशिक रूप से अविनाशी और विशुद्ध तपोमयी लोक।

त्रैलोक्यमहर्लोककृतक
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महर्लोक को महः व्याहृति क्यों कहते हैं?

वैदिक सात व्याहृतियों में महः महर्लोक का प्रतीक है। भूः, भुवः, स्वः के बाद महः भौतिक त्रैलोक्य से पहली आध्यात्मिक भूमि का बोध कराता है।

महर्लोकमहःव्याहृति
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महर्लोक के नीचे कौन से लोक हैं?

महर्लोक के नीचे त्रैलोक्य है — भूर्लोक, भुवर्लोक और स्वर्लोक। ये तीनों कृतक अर्थात विनाशशील लोक हैं जो नैमित्तिक प्रलय में नष्ट हो जाते हैं।

महर्लोकस्वर्लोकभुवर्लोक
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महर्लोक ब्रह्मांड के 14 लोकों में कहाँ है?

महर्लोक सात ऊर्ध्व लोकों में चौथे स्थान पर है। यह स्वर्लोक के ऊपर और जनलोक के नीचे है। वैदिक व्याहृतियों में इसे महः कहते हैं।

महर्लोक14 लोकचतुर्थ
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महर्लोक क्या है?

महर्लोक 14 लोकों में चौथा ऊर्ध्व लोक है जो स्वर्लोक के ऊपर और जनलोक के नीचे है। यह विशुद्ध आध्यात्मिक और तपोमयी ऊर्जा का लोक है।

महर्लोकपरिचयवैदिक
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'यद्गत्वा न निवर्तन्ते' और 'क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशन्ति' में क्या मूल अंतर है?

'क्षीणे पुण्ये' = स्वर्लोक में पुण्य खत्म होने पर वापसी। 'यद्गत्वा न निवर्तन्ते' = मोक्ष में कोई वापसी नहीं। यही स्वर्लोक (अस्थायी) और परम धाम (नित्य) का मूल अंतर है।

गीता 15.6गीता 9.21स्वर्लोक
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कर्मकांडी और ब्रह्मज्ञानी के दृष्टिकोण में स्वर्लोक को लेकर क्या अंतर है?

कर्मकांडी स्वर्लोक को अंतिम लक्ष्य मानते हैं। ब्रह्मज्ञानी और भक्त इसे अस्थायी मानते हैं और सीधे मोक्ष चाहते हैं। भागवत कहता है — शुद्ध भक्त स्वर्लोक की कामना नहीं करते।

कर्मकांडीब्रह्मज्ञानीस्वर्लोक
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गीता में स्वर्लोक को 'बैंक खाते' जैसा क्यों कहा जाता है?

गीता (9.21) के अनुसार स्वर्ग में जमा पुण्य खर्च होते रहते हैं और समाप्त होने पर वापसी होती है — ठीक बैंक खाते की तरह। पुण्य = बैलेंस, स्वर्ग = सुविधाएं, पुण्य खाली = निष्कासन।

गीतास्वर्लोकपुण्य
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भागवत पुराण के अनुसार स्वर्लोक के सात द्वीपों के निवासियों का जीवन कैसा है?

सात द्वीपों के निवासी बुढ़ापा-रोग-मानसिक कष्ट से मुक्त 1000 वर्षों तक देवों जैसा जीवन जीते हैं। लेकिन यह भोगभूमि है — पुण्य क्षीण होने पर पुनर्जन्म होता है।

सात द्वीपनिवासीस्वर्गिक जीवन
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वृत्रासुर के वध की कथा में स्वर्लोक की राजनीति क्या दर्शाती है?

वृत्रासुर की कथा दर्शाती है कि स्वर्लोक में भी यज्ञ-शक्ति और सैन्य बल के बीच संघर्ष होता है। इन्द्र जैसे शक्तिशाली राजा भी भयभीत हो सकते हैं और संधि के लिए बाध्य हो सकते हैं।

वृत्रासुरस्वर्लोकराजनीति
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शुंभ-निशुंभ के वध के बाद देवताओं को स्वर्ग कैसे मिला?

देवताओं ने हिमालय पर भगवती की स्तुति की। देवी ने कौशिकी और काली रूप में शुंभ-निशुंभ, चंड-मुंड और रक्तबीज का वध किया। इसके बाद देवताओं को स्वर्ग वापस मिला।

शुंभ निशुंभदेवीस्वर्ग वापसी
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स्वर्लोक के लोकालोक पर्वत का क्या महत्व है?

लोकालोक पर्वत स्वर्लोक और भूलोक की सबसे बाहरी सीमा है जो प्रकाश और अंधकार को विभाजित करती है। इसके आगे 'अलोक-वर्ष' है जहाँ कोई जीव नहीं रहता।

लोकालोक पर्वतस्वर्लोकप्रकाश सीमा
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गरुड़ पुराण में पापियों के यमलोक मार्ग का वर्णन कैसे है?

गरुड़ पुराण में पापियों का 86,000 योजन का यमलोक मार्ग अत्यंत भयंकर है — जलती रेत, वैतरणी नदी, यमदूतों के कोड़े। पुण्यात्मा के लिए यही मार्ग सुलभ हो जाता है।

गरुड़ पुराणपापीयमलोक
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पुष्कर द्वीप के मानसोत्तर पर्वत पर किन देवताओं की राजधानियाँ हैं?

मानसोत्तर पर्वत पर इन्द्र (पूर्व), यम (दक्षिण), वरुण (पश्चिम) और चंद्र देव (उत्तर) की राजधानियाँ हैं। यह स्वर्लोक का प्रमुख प्रशासनिक केंद्र है।

मानसोत्तर पर्वतपुष्कर द्वीपइन्द्र
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स्वर्लोक के प्लक्ष द्वीप में सूर्य उपासना की विधि क्या है?

प्लक्ष द्वीप में त्रयी विद्या (ऋक्, साम, यजुर्वेद) के माध्यम से सूर्य देव के त्रयीमय स्वरूप की उपासना होती है जो 'स्वर्ग का द्वार' खोलती है।

प्लक्ष द्वीपसूर्य उपासनात्रयी विद्या
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भागवत पुराण में स्वर्लोक की अनित्यता का क्या संदेश है?

भागवत का संदेश है — स्वर्लोक अस्थायी है। शुद्ध भक्त इसकी कामना नहीं करते। पुण्य क्षीण होने पर वापसी निश्चित है। अंतिम लक्ष्य 'यद्गत्वा न निवर्तन्ते' वाला परम धाम है।

भागवत पुराणस्वर्लोकअनित्यता
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गरुड़ पुराण में अजामिल का उदाहरण क्यों दिया गया है?

अजामिल ने मृत्यु के समय अपने पुत्र 'नारायण' को पुकारा था। भगवान के नाम के प्रभाव से विष्णुदूत प्रकट हुए और यमदूतों से बचाकर वैकुंठ भेजा। यह नाम-महिमा का प्रमाण है।

अजामिलगरुड़ पुराणनारायण नाम
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सुधर्मा सभा 'काम-गामिनी' क्यों कहलाती है?

सुधर्मा सभा को काम-गामिनी इसलिए कहते हैं क्योंकि यह स्थिर संरचना नहीं है — यह इच्छानुसार आकाश में तीव्र या मंद गति से विचरण कर सकती है।

सुधर्माकाम-गामिनीआकाश
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स्वर्लोक में श्राद्ध का फल गंधर्व, नाग और पशु योनि में कैसे मिलता है?

गरुड़ पुराण के अनुसार गंधर्व योनि में श्राद्ध कलाओं के रूप में, नाग योनि में वायु के रूप में और पशु योनि में घास के रूप में मिलता है।

श्राद्धगंधर्वनाग
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मीमांसा दर्शन में स्वर्ग की परिभाषा क्या है?

मीमांसा दर्शन के अनुसार स्वर्ग वह सुख है जो दुःख से मिश्रित नहीं है, जिसके बाद कोई पतन नहीं और जो केवल इच्छा करने मात्र से प्राप्त हो जाता है।

मीमांसास्वर्ग परिभाषादुःख मुक्त
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लोक — शास्त्रीय प्रश्नोत्तर संग्रह

पौराणिक पर लोक श्रेणी में आपको सनातन धर्म, वेद, पुराण और शास्त्रों पर आधारित प्रामाणिक प्रश्न-उत्तर मिलेंगे। प्रत्येक उत्तर विद्वानों द्वारा शास्त्रीय प्रमाणों सहित तैयार किया गया है। किसी भी प्रश्न पर क्लिक करें और विस्तृत उत्तर पढ़ें। अन्य विषयों के लिए प्रश्नोत्तरी मुख्य पृष्ठ देखें।

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लोक को गहराई से समझने का तरीका

लोक के पेज 2 प्रश्नोत्तर पेज छोटे उत्तरों को एक साथ रखता है, इसलिए इसे त्वरित समाधान और आगे पढ़ने के प्रवेश-द्वार दोनों की तरह इस्तेमाल किया जा सकता है।

3617 प्रश्न वाले इस पेज पर सबसे अच्छा तरीका यह है कि पहले वही प्रविष्टियाँ पढ़ें जो आपके वर्तमान सवाल से सीधा संबंध रखती हैं, फिर उनसे जुड़े अगले लेख या प्रश्न खोलें ताकि आधी-अधूरी जानकारी के बजाय पूरा संदर्भ बने।

अगर आपको किसी उत्तर का छोटा रूप मिल रहा है, तो उसी विषय के अगले प्रश्न और संबंधित विस्तृत लेख भी देखें। इससे नियम, अपवाद, समय, विधि और शास्त्रीय आधार जैसी बातें स्पष्ट होती हैं।

शुरुआत उन प्रश्न से करें जिनका शीर्षक आपके सवाल या उद्देश्य से सबसे अधिक मेल खाता है।

पढ़ते समय विधि, महत्व, समय और सावधानियों जैसे अलग-अलग पहलुओं को नोट करें, क्योंकि ये अक्सर अलग प्रविष्टियों में बँटे होते हैं।

अगर एक पेज से पूरा उत्तर न मिले, तो उसी संग्रह के अगले लेख या प्रश्न खोलकर संदर्भ पूरा करें।