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लोक प्रश्नोत्तर (पेज 4) — 3617 प्रश्न

लोक से जुड़े 3617 प्रामाणिक प्रश्नोत्तर पढ़ें। शास्त्रों और पुराणों पर आधारित उत्तर एक ही जगह मिलेंगे।

कुल 3617 प्रश्न

अमरावती किससे बनी है?

अमरावती विशुद्ध जाम्बूनद स्वर्ण और हीरों से बनी है। इसमें सांसारिक ईंट या पत्थर का उपयोग नहीं हुआ। महलों के खंभे ठोस हीरों से बने हैं।

अमरावतीजाम्बूनद स्वर्णहीरे
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अमरावती का निर्माण किसने किया?

अमरावती का निर्माण देवताओं के सर्वोच्च वास्तुकार विश्वकर्मा (त्वष्टा) ने किया। वे ब्रह्मा जी या कश्यप के पुत्र और देवताओं के महान शिल्पकार हैं।

अमरावतीविश्वकर्मानिर्माण
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अमरावती नगरी क्या है?

अमरावती देवराज इन्द्र की राजधानी है जो 800 मील की परिधि में फैली है। इसे देवपुर और पूषाभासा भी कहते हैं। यह जाम्बूनद स्वर्ण और हीरों से बनी है।

अमरावतीइन्द्रराजधानी
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क्या मनुष्य भी स्वर्ग में रह सकते हैं?

हाँ, पुण्यात्मा मनुष्य स्वर्ग में रह सकते हैं लेकिन यह अस्थायी है। जब तक पुण्य रहें तब तक स्वर्ग का भोग होता है फिर पृथ्वी पर लौटना पड़ता है।

मनुष्यस्वर्गपुण्य
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गंधर्व और अप्सराएं कौन होती हैं?

गंधर्व स्वर्ग के दिव्य गायक और वादक हैं जबकि उर्वशी, रंभा, मेनका जैसी अप्सराएं नृत्य और सौंदर्य के लिए विख्यात हैं। ये देव-उद्यानों में विहार करते हैं।

गंधर्वअप्सराएंस्वर्ग
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स्वर्लोक के अधिपति कौन हैं?

स्वर्लोक के अधिपति देवराज इन्द्र हैं जिन्होंने सौ यज्ञ (शतक्रतु) करके यह पद प्राप्त किया। वे शची सहित अमरावती में स्वर्ण-सिंहासन पर विराजते हैं।

स्वर्लोकइन्द्रअधिपति
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स्वर्लोक की ऊपरी और निचली सीमा क्या है?

स्वर्लोक की निचली सीमा सूर्यमंडल के ऊपर से और ऊपरी सीमा ध्रुवलोक तक है। सूर्य के नीचे भुवर्लोक है और ध्रुव के ऊपर महर्लोक है।

स्वर्लोकसीमासूर्य
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स्वर्लोक क्या है?

स्वर्लोक वह दिव्य सुख का क्षेत्र है जहाँ दुःख, रोग और बुढ़ापा नहीं होते। यह देवों, पुण्यात्माओं और ऋषियों का निवास है जो पुण्य कर्मों से प्राप्त होता है।

स्वर्लोकस्वर्गपरिचय
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भूलोक को 'महा-रंगमंच' क्यों कहा गया है?

भूलोक 'महा-रंगमंच' इसलिए है क्योंकि यहाँ अनगिनत जीवात्माएं अपने कर्मों का नाटक खेलती हैं। देवता भी यहाँ जन्म चाहते हैं क्योंकि केवल यहीं मोक्ष का मार्ग है।

भूलोकमहा रंगमंचजीवात्मा
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गंगा को 'विष्णुपदी' क्यों कहते हैं?

गंगा को विष्णुपदी इसलिए कहते हैं क्योंकि भगवान वामन के त्रिविक्रम स्वरूप के चरण के स्पर्श से कारण-जल गुलाबी आभा से युक्त होकर गंगा बनी। 'विष्णुपदी' = विष्णु के चरणों से उत्पन्न।

गंगाविष्णुपदीवामन अवतार
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भूलोक को ब्रह्मांड का केंद्र बिंदु क्यों कहते हैं?

भूलोक ब्रह्मांड का केंद्र बिंदु है क्योंकि सभी लोकों की यात्रा के बाद जीव यहीं लौटता है, यहीं से मोक्ष मिलता है और यहीं दुःख-सुख के मिश्रण से वैराग्य उत्पन्न होता है।

भूलोककेंद्र बिंदुकर्मभूमि
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भारतवर्ष में जन्म हजारों जन्मों के पुण्यों का फल क्यों माना गया है?

गरुड़ पुराण के अनुसार चौरासी लाख योनियों के बाद भारत में मानव जन्म मिलता है। देवता भी यहाँ जन्म चाहते हैं क्योंकि केवल यहीं मोक्ष संभव है।

भारतवर्षजन्महजारों पुण्य
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भद्राश्व वर्ष में हयग्रीव की उपासना का क्या रहस्य है?

भद्राश्व वर्ष (पूर्व दिशा) में वेद-रक्षक हयग्रीव की उपासना होती है। हयग्रीव ने प्रलय में रसातल से वेदों का उद्धार किया था। पूर्व दिशा (ज्ञान) और वेद-रक्षक का यह समन्वय गहन है।

भद्राश्व वर्षहयग्रीववेद उद्धार
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भूलोक के नीचे के अधोलोकों में आध्यात्मिक उन्नति क्यों संभव नहीं?

अधोलोकों में आध्यात्मिक उन्नति इसलिए नहीं होती क्योंकि वहाँ के जीव माया-अहंकार में डूबे हैं, सूर्य का प्रकाश (ज्ञान) नहीं पहुँचता और वैराग्य उत्पन्न नहीं होता।

अधोलोकआध्यात्मिक उन्नतिमाया
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अन्य वर्षों में छह सिद्धियाँ अपने आप कैसे मिलती हैं?

मार्कण्डेय पुराण के अनुसार अन्य वर्षों में वृक्ष, स्वभाव, भूमि, जल, ध्यान और धर्म — इन छह माध्यमों से बिना प्रयास के सिद्धियाँ मिलती हैं। यह उन वर्षों की भोगभूमि प्रकृति है।

छह सिद्धियाँअन्य वर्षभोगभूमि
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विष्णु पुराण के 'गायन्ति देवाः' श्लोक का क्या अर्थ है?

'गायन्ति देवाः' श्लोक में देवता कहते हैं — भारतवर्ष में जन्म लेने वाले हमसे भी धन्य हैं क्योंकि यह स्वर्ग और मोक्ष दोनों का द्वार है जो हमें भी दुर्लभ है।

गायन्ति देवाःविष्णु पुराणभारतवर्ष
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लोकालोक पर्वत का ब्रह्मांडीय महत्व क्या है?

लोकालोक पर्वत भूलोक की अंतिम भौतिक सीमा है जो प्रकाश और अंधकार को विभाजित करती है। यहाँ स्वयं भगवान विष्णु शंख-चक्र-गदा-पद्म धारण किए लोकों की रक्षा हेतु निवास करते हैं।

लोकालोक पर्वतब्रह्मांडीय महत्वविष्णु
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मार्कण्डेय पुराण में गंगा की चार धाराओं का वर्णन कैसे है?

मार्कण्डेय पुराण में गंगा की चार धाराओं का विस्तृत भौगोलिक मार्ग बताया गया है — सीता (पूर्व-भद्राश्व), अलकनंदा (दक्षिण-भारतवर्ष), चक्षु (पश्चिम-केतुमाल), सोमा (उत्तर-उत्तरकुरु)।

मार्कण्डेय पुराणगंगाचार धाराएँ
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गरुड़ पुराण के अनुसार भूलोक में किए कर्मों का परलोक से क्या संबंध है?

गरुड़ पुराण के अनुसार भूलोक में किए गए कर्म ही परलोक की यात्रा तय करते हैं। पाप से नर्क, पुण्य से स्वर्ग। भोग के बाद पुनः भूलोक में जन्म होता है।

गरुड़ पुराणभूलोककर्म
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हरि वर्ष में प्रह्लाद भगवान नृसिंह से क्या माँगते हैं?

हरि वर्ष में प्रह्लाद जी भगवान नृसिंह से अंतःकरण की शुद्धि, मृत्यु-भय से निर्भयता, संसार-आसक्ति से मुक्ति और भक्तों के संग की प्रार्थना करते हैं।

हरि वर्षप्रह्लादनृसिंह
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इलावृत वर्ष में भगवान शिव किसकी उपासना करते हैं और क्यों?

इलावृत वर्ष में भगवान शिव चतुर्व्यूह के चतुर्थ अंश 'संकर्षण' की उपासना करते हैं। यह दर्शाता है कि शिव जी भी भगवान विष्णु के संहार-स्वरूप के उपासक हैं।

इलावृत वर्षभगवान शिवसंकर्षण
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पुष्कर द्वीप में ब्रह्मा जी की उपासना क्यों होती है?

पुष्कर द्वीप सबसे बाहरी और विशाल द्वीप है। यहाँ विशाल कमल पुष्प है और निवासी सृष्टिकर्ता ब्रह्मा जी की उपासना करते हैं। यहाँ केवल दो वर्ष — रमणक और धातकि — हैं।

पुष्कर द्वीपब्रह्माउपासना
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शाक द्वीप में वायु देव की उपासना कैसे होती है?

शाक द्वीप में ऋतव्रत आदि चार वर्ण प्राणायाम और अष्टांग योग द्वारा समाधिस्थ होकर भगवान के वायु स्वरूप (प्राणतत्व) की आराधना करते हैं।

शाक द्वीपवायु देवयोग
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कुश द्वीप में अग्नि देव की उपासना क्यों होती है?

कुश द्वीप के निवासी यज्ञ-परायण हैं और भगवान हरि के अग्नि स्वरूप की पूजा करते हैं। उनका मानना है कि परब्रह्म ही यज्ञों के भोक्ता हैं और अग्नि उनतक आहुति पहुँचाती है।

कुश द्वीपअग्नि देवयज्ञ
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शाल्मलि द्वीप में गरुड़ देव का क्या महत्व है?

शाल्मलि द्वीप में विशाल शाल्मलि वृक्ष पर गरुड़ देव निवास करते हैं और वहाँ से भगवान विष्णु की वेदमयी स्तुति करते हैं। यहाँ के निवासी चंद्र देव की पूजा करते हैं।

शाल्मलि द्वीपगरुड़विष्णु
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प्लक्ष द्वीप में सूर्य देव की उपासना कैसे होती है?

प्लक्ष द्वीप में हंस, पतंग, ऊर्ध्वायन और सत्यांग वर्ण त्रयी विद्या (वेदों) के माध्यम से भगवान के त्रयीमय सूर्य स्वरूप की आराधना करते हैं।

प्लक्ष द्वीपसूर्य देवउपासना
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सप्तद्वीपों की संरचना गणितीय रूप से कैसी है?

सप्तद्वीपों में प्रत्येक द्वीप पूर्ववर्ती से दोगुना बड़ा है। जम्बू 1 लाख से पुष्कर 64 लाख योजन। प्रत्येक द्वीप के बराबर उसका महासागर। कुल विस्तार 50 करोड़ योजन।

सप्तद्वीपगणितीय संरचनादोगुना
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विष्णु पुराण और भागवत पुराण में भूलोक के वर्णन में क्या अंतर है?

विष्णु पुराण भारतवर्ष के आध्यात्मिक महत्व और मोक्ष पर बल देता है जबकि भागवत पुराण गणितीय माप, शासकों की वंशावली और प्रत्येक वर्ष के अधिष्ठाता देव का विस्तृत वर्णन करता है।

विष्णु पुराणभागवत पुराणभूलोक
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जम्बूद्वीप में देवी गंगा कहाँ-कहाँ प्रवाहित होती हैं?

गंगा जम्बूद्वीप के चार वर्षों में प्रवाहित होती हैं — सीता (भद्राश्व), अलकनंदा (भारतवर्ष), चक्षु (केतुमाल), सोमा (उत्तरकुरु)। साथ ही चार सरोवरों को भी भरती हैं।

गंगाजम्बूद्वीपचार वर्ष
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भारतवर्ष में चार युग क्यों होते हैं जबकि अन्य वर्षों में नहीं?

भारतवर्ष में चारों युग इसलिए होते हैं क्योंकि यह एकमात्र कर्मभूमि है। अन्य वर्ष केवल भोगभूमि हैं जहाँ सदा त्रेता युग जैसा सुखद वातावरण रहता है।

चार युगभारतवर्षकर्मभूमि
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अधोलोकों को 'बिल-स्वर्ग' क्यों कहते हैं?

अधोलोकों में सर्पों की मणियों का प्रकाश है और असुर-नाग स्वर्ग जैसा भोग करते हैं इसलिए इन्हें 'बिल-स्वर्ग' कहते हैं। पर यहाँ आध्यात्मिक उन्नति नहीं होती।

अधोलोकबिल स्वर्गअसुर
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मेरु पर्वत के पास कौन से चार दिव्य सरोवर हैं?

मेरु पर्वत के पास चार दिव्य सरोवर हैं — अरुणोद, महाभद्र, शीतोद और मानस। इनमें स्नान करने से देवगण अलौकिक आनंद और ऊर्जा प्राप्त करते हैं।

मेरु पर्वतसरोवरअरुणोद
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मेरु पर्वत को सहारा देने वाले चार पर्वत कौन से हैं?

मेरु पर्वत को चार विष्कम्भ पर्वत सहारा देते हैं — पूर्व में मन्दर, दक्षिण में गंधमादन, पश्चिम में विपुल और उत्तर में सुपार्श्व। सभी 10,000 योजन ऊँचे हैं।

मेरु पर्वतविष्कम्भ पर्वतमन्दर
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भगवान वामन के चरण से गंगा का जन्म कैसे हुआ?

भगवान वामन के त्रिविक्रम स्वरूप के बाएं पैर के नाखून से ब्रह्मांड का आवरण टूटा और बाहर का कारण-जल भीतर आया। उस जल पर चरण-स्पर्श से 'विष्णुपदी गंगा' बनी।

वामन अवतारगंगात्रिविक्रम
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अलकनंदा को भागीरथी क्यों कहते हैं?

अलकनंदा को भागीरथी इसलिए कहते हैं क्योंकि महाराज भगीरथ की घोर तपस्या से यह पृथ्वी पर अवतरित हुई और भगीरथ के रथ का अनुसरण करती हुई भारतवर्ष में आई।

अलकनंदाभागीरथीभगीरथ
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गंगा की चार धाराओं के नाम और दिशाएँ क्या हैं?

गंगा की चार धाराएँ — सीता (पूर्व, भद्राश्व), अलकनंदा/भागीरथी (दक्षिण, भारतवर्ष), चक्षु (पश्चिम, केतुमाल), सोमा/भद्रा (उत्तर, उत्तरकुरु)।

गंगाचार धाराएँसीता पूर्व
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उत्तरकुरु वर्ष को भोगभूमि क्यों कहते हैं?

उत्तरकुरु वर्ष निरंतर सुख और आनंद का क्षेत्र है जहाँ पूर्वजन्म के पुण्यों का भोग होता है। यहाँ भूदेवी भगवान वराह की पूजा करती हैं।

उत्तरकुरु वर्षभोगभूमिसुख
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किम्पुरुष वर्ष में हनुमान जी क्या करते हैं?

किम्पुरुष वर्ष (हिमालय और हेमकूट के बीच) में हनुमान जी अन्य किम्पुरुषों के साथ भगवान श्रीराम की निरंतर आराधना और कीर्तन करते हैं।

किम्पुरुष वर्षहनुमानश्रीराम
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भारतवर्ष और अन्य वर्षों में क्या मूलभूत अंतर है?

भारतवर्ष एकमात्र कर्मभूमि है जहाँ चारों युग होते हैं और मोक्ष संभव है। अन्य वर्ष केवल भोगभूमि हैं जहाँ पुण्यों का भोग होता है।

भारतवर्षभोगभूमिकर्मभूमि
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इलावृत वर्ष में पुरुष स्त्री क्यों बन जाते हैं?

देवी भवानी के एक प्राचीन शाप के कारण इलावृत वर्ष में प्रवेश करने वाला कोई भी पुरुष तुरंत स्त्री बन जाता है। केवल भगवान शिव ही यहाँ पुरुष हैं।

इलावृत वर्षपुरुष स्त्रीभगवान शिव
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जाम्बूनद सोना क्या होता है?

जाम्बूनद दिव्य सोना है जो जम्बू वृक्ष के रस के मिट्टी, वायु और सूर्य के ताप से पकने पर बनता है। देवगण इसी से अपने आभूषण बनाते हैं।

जाम्बूनदसोनाजम्बू नदी
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लोक — शास्त्रीय प्रश्नोत्तर संग्रह

पौराणिक पर लोक श्रेणी में आपको सनातन धर्म, वेद, पुराण और शास्त्रों पर आधारित प्रामाणिक प्रश्न-उत्तर मिलेंगे। प्रत्येक उत्तर विद्वानों द्वारा शास्त्रीय प्रमाणों सहित तैयार किया गया है। किसी भी प्रश्न पर क्लिक करें और विस्तृत उत्तर पढ़ें। अन्य विषयों के लिए प्रश्नोत्तरी मुख्य पृष्ठ देखें।

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लोक को गहराई से समझने का तरीका

लोक के पेज 4 प्रश्नोत्तर पेज छोटे उत्तरों को एक साथ रखता है, इसलिए इसे त्वरित समाधान और आगे पढ़ने के प्रवेश-द्वार दोनों की तरह इस्तेमाल किया जा सकता है।

3617 प्रश्न वाले इस पेज पर सबसे अच्छा तरीका यह है कि पहले वही प्रविष्टियाँ पढ़ें जो आपके वर्तमान सवाल से सीधा संबंध रखती हैं, फिर उनसे जुड़े अगले लेख या प्रश्न खोलें ताकि आधी-अधूरी जानकारी के बजाय पूरा संदर्भ बने।

अगर आपको किसी उत्तर का छोटा रूप मिल रहा है, तो उसी विषय के अगले प्रश्न और संबंधित विस्तृत लेख भी देखें। इससे नियम, अपवाद, समय, विधि और शास्त्रीय आधार जैसी बातें स्पष्ट होती हैं।

शुरुआत उन प्रश्न से करें जिनका शीर्षक आपके सवाल या उद्देश्य से सबसे अधिक मेल खाता है।

पढ़ते समय विधि, महत्व, समय और सावधानियों जैसे अलग-अलग पहलुओं को नोट करें, क्योंकि ये अक्सर अलग प्रविष्टियों में बँटे होते हैं।

अगर एक पेज से पूरा उत्तर न मिले, तो उसी संग्रह के अगले लेख या प्रश्न खोलकर संदर्भ पूरा करें।