प्रेत को भूख इसलिए लगती है क्योंकि वह अपनी वासनाएँ और इच्छाएँ शरीर के साथ लेकर जाता है। 'आत्मा शरीर त्यागने पर भूख-प्यास का अनुभव करती है' — यही गरुड़ पुराण का वर्णन है। पिंडदान इसे कम करता है।
प्रेत को — भूख-प्यास, अकेलापन, यमदूत का भय, पापकर्मों का स्मरण, यममार्ग की यातना, परिजनों के रोने का दुख और बिना संस्कार के निर्जन वन में भटकने का कष्ट होता है।
हाँ, गरुड़ पुराण के अनुसार प्रेत-आत्मा 13 दिनों तक परिजनों के पास रहती है। मोहग्रस्त आत्माएँ लंबे समय तक घर के पास भटकती हैं। परिजन उसे देख-सुन नहीं पाते — यही उसकी पीड़ा है।
साधारण मनुष्य प्रेत को नहीं देख सकते — यह सूक्ष्म शरीर में होता है। साधक, योगी और उच्च कोटि के तांत्रिक देख सकते हैं। परिजन स्वप्न में अनुभव कर सकते हैं। मरणासन्न व्यक्ति को दिव्य दृष्टि से दर्शन होता है।
प्रेत की अवधि — सामान्य मृत्यु में 13 दिन, अकाल मृत्यु में शेष आयु तक, बिना संस्कार के कल्पान्त तक। यह जीव के कर्म, मृत्यु की प्रकृति और परिजनों के संस्कारों पर निर्भर है।
प्रेत को मुक्ति मिलती है — दशगात्र-षोडश श्राद्ध से, सपिंडन विधान से, प्रेत घट दान से, नारायण बलि से, गया में पिंडदान से और परिजनों द्वारा किए गए दान-पुण्य से।
श्राद्ध से प्रेत 'पितर' की श्रेणी में आता है, तृप्ति मिलती है और प्रेत योनि से मुक्ति होती है। षोडश श्राद्ध और वार्षिक पितृपक्ष श्राद्ध से प्रेत-आत्मा को सद्गति प्राप्त होती है।
पिंडदान से — प्रेत का शरीर निर्मित होता है, भूख-प्यास कम होती है, यमलोक यात्रा की शक्ति मिलती है और अंततः प्रेत-योनि से मुक्ति होती है। बिना पिंडदान के प्रेत कल्पान्त तक भटकता है।
प्रेत को जल तर्पण से मिलता है — जल और तिल का तर्पण, पिंडदान में जल-तत्व, और जीवन में किए जलदान का फल। तीर्थ में किया जल-तर्पण विशेष रूप से लाभकारी माना गया है।
प्रेत को भोजन पिंडदान से मिलता है। दस दिनों का पिंड शरीर-निर्माण और शक्ति देता है। श्राद्ध में दिया गया अन्न, जल और तर्पण भी पहुँचता है। बिना पिंडदान के प्रेत भूखा-प्यासा भटकता है।
नहीं। पुण्यात्माएँ, भगवद्-भक्त और स्वाभाविक मृत्यु वाले प्रेत नहीं बनते। अकाल मृत्यु, मोह, अधूरे संस्कार और विशेष पापकर्म वाले ही प्रेत योनि में जाते हैं।
प्रेत-शरीर सूक्ष्म, अदृश्य और 'हस्तमात्र' (एक हाथ बराबर) बताया गया है। यह पिंडदान से निर्मित वासनामय शरीर है जिसमें भूख-प्यास और पीड़ा का अनुभव होता है। यमदूत के पाश से बँधा होने के कारण वापस नहीं लौट सकता।
प्रेत अवस्था मृत्यु के तुरंत बाद उत्पन्न होती है। सामान्य मृत्यु में 13 दिन तक, अकाल मृत्यु में शेष आयु तक और बिना संस्कार के कल्पान्त तक रहती है। पिंडदान से यह समाप्त होती है।
प्रेत योनि में जाते हैं — अकाल मृत्यु (दुर्घटना, हत्या, आत्महत्या) वाले, अधूरी इच्छाओं वाले, संसार के मोहग्रस्त, अंतिम संस्कार-विहीन और कुछ विशेष पापी। यमराज का निर्णय अंतिम होता है।
'प्रेत' = 'प्र + इत' = 'आगे गया हुआ।' यह मृत व्यक्ति की आत्मा का नाम है। गरुड़ पुराण में वह आत्मा जो मृत्यु के बाद श्राद्ध-संस्कार की प्रतीक्षा में है — वह प्रेत कहलाती है।
प्रेतकल्प गरुड़ पुराण का द्वितीय भाग है जिसमें 35 अध्याय हैं। इसमें मृत्यु का स्वरूप, यमलोक-प्रेतलोक, श्राद्ध-पिंडदान, प्रेत योनि और मुक्ति के उपायों का विस्तृत वर्णन है।
नरक में यातना उसी रूप में मिलती है जिस रूप में पाप किया था — जलाने वाले को आग, काटने वाले को काटा जाना, जीव मारने वाले को गर्म तेल। 'जैसा बोओगे वैसा काटोगे' — यही नरक का सिद्धांत है।
नरक में दंड चार रूपों में — शारीरिक (पिटाई, जलाना), पारिस्थितिक (खौलता तेल, अंधकार), जीव-जंतु द्वारा (कुत्ते, सर्प, राक्षस) और मनोवैज्ञानिक (पापों की याद, अकेलापन)।
नरक में जीव पिंडदान से निर्मित 'यातना-देह' में रहता है। यह वासनामय, सूक्ष्म शरीर है जो पूरी पीड़ा अनुभव कर सकता है। यमदूत के पाश में बँधे, भूखे-प्यासे रूप में दंड भोगता है।
नरक में दंड जागृत, बंधन में जकड़ी, भूख-प्यास से व्याकुल अवस्था में दिया जाता है। बेहोश होने पर पुनः होश में लाया जाता है। यातना-देह में पूरी संवेदनशीलता बनी रहती है।
नरक में प्रवेश के बाद दक्षिण द्वार पर प्रथम यातना, नरक के यमदूतों को सौंपना, पापों की याद दिलाना, निरंतर दंड और अंत में पाप-दंड पूर्ण होने पर पुनर्जन्म — यह क्रमबद्ध प्रक्रिया है।
नरक में जीव — जंजीरों में बँधा, पीठ पर लोहे का भार, रक्त वमन करता, निरंतर विलाप करता। मानसिक रूप से भय और पश्चाताप में, आत्मिक रूप से विवश, सामाजिक रूप से पूर्णतः अकेला।
नरक में दंड — शस्त्रों से पिटाई, अग्नि में उबालना, तलवार-पत्तों से काटना, पशुओं-राक्षसों द्वारा नोचना, तप्त लोहे पर रखना, गड्ढों में गिराना, और मनोवैज्ञानिक यातना — ये सब प्रकार हैं।
नरक में दंड का कारण जीव के पापकर्म हैं — 'बिना भोगे कर्म समाप्त नहीं होता।' झूठ, हिंसा, चोरी, दान न देना, पितर-पूजा न करना — इन पापों का दंड मिलता है। दंड का उद्देश्य न्याय और आत्मशुद्धि दोनों है।
नरक में दंड का क्रम — प्रवेश पर प्रथम दंड → पाप की गंभीरता के अनुसार एक नरक से दूसरे नरक → महापापों का पहले, लघु पापों का बाद में। 'एक नरक से दूसरे नरक को' — यही क्रम है।
नरक में जीव को गले-हाथ-पैरों में जंजीरों से, पाश और अंकुश से, लोहे के खंभों से बाँधकर रखा जाता है। यह बंधन जीवन के पाप-बंधनों का स्थूल प्रतिरूप है।
नरक में जीव को वैतरणी नदी में, असिपत्रवन में, अवीचि के पर्वत से नीचे, रक्त के गड्ढों में और अंधकूप में गिराया जाता है। यमदूत 'घोर नरक वाले स्थान में गिराते हैं' — यही शास्त्रोक्त वर्णन है।
नरक में जीव को — यमराज के दरबार में → नरक दर्शन → वापस मृत्युलोक → तेरहवें दिन पुनः → वैतरणी → दक्षिण द्वार → कर्मानुसार नरक में ले जाया जाता है। एक नरक से दूसरे नरक की यात्रा भी होती है।
नरक पृथ्वी के नीचे पाताल लोक में है। जीव को पाप के अनुसार — रक्त के गड्ढों में, मल-मूत्र के कुंड में, जलते अंगारों में, अंधे कुएँ में, तप्त धातु के पात्रों में रखा जाता है।
नरक में मुख्यतः यमदूत दंड देते हैं — लोहे की लाठी, मुद्गर, गदा, मूसल से। प्रत्येक नरक में विशेष यमदूत हैं। भयंकर कुत्ते, सर्प, राक्षस भी माध्यम हैं। सर्वोच्च अधिकार यमराज का है।
नरक में यमराज की आज्ञा सर्वोच्च निर्देश है। नरक के विशेष यमदूत जीव को यातना देने का कार्य करते हैं और उसके पापों की याद दिलाते हैं। चित्रगुप्त के लेखे पर आधारित यमराज का निर्देश अटल है।
नरक में जीव 'यातना-देह' में रहता है जो पिंडदान से बनती है। यातना से क्षत-विक्षत होती है, रक्त वमन होता है। नष्ट होने पर यमराज की शक्ति से पुनः निर्मित होती है — यह पाप-शुद्धि की प्रक्रिया है।
संजीवन नरक में मारकर बार-बार पुनर्जीवित किया जाता है — निश्चित संख्या नहीं। 'बिना भोगे कर्म समाप्त नहीं होता' — जब तक पापों का दंड पूरा न हो, यह चक्र चलता रहता है।
गरुड़ पुराण में 'बार-बार' और 'अत्यधिक' पिटाई का वर्णन है। बेहोश होने पर पुनः होश लाकर पीटा जाता है। निश्चित संख्या नहीं — पाप का दंड पूरा होने तक यह चलता रहता है।
असिपत्रवन में तलवार-पत्तों से, स्रपदन्त में नाखूनों से, अनेक नरकों में पशुओं-सर्पों से बार-बार काटा जाता है। निश्चित संख्या नहीं — पाप-दंड पूरा होने तक यातना चलती रहती है।
गरुड़ पुराण में जलाने की निश्चित संख्या नहीं, परंतु यह निरंतर प्रक्रिया है। संजीवन नरक में जलाकर पुनः जीवित करके बार-बार जलाया जाता है। 'प्रलयपर्यंत घोर नरकों में पकते रहते हैं' — यही वर्णन है।
नरक में खौलते लोहे का बर्तन (तप्तकुंभ), तेल से भरी कुंभी (कुंभीपाक), तप्त लोहे का नरक (तप्तलोहमय), गर्म लोहे का बिस्तर और नुकीला लोहे का तीर (महाप्रभ) — ये प्रमुख धातु-पात्र हैं।
नरक में अग्नि के कई रूप हैं — कुंभीपाक में खौलते तेल का कड़ाहा, रौरव में अग्नि-कुंड, तपन में चारों ओर आग, विलेपक में लाख की आग, अंगारोपच्य में अंगारे। हर पाप के लिए अलग प्रकार की अग्नि।
नरक में भेजने की प्रक्रिया है — यमराज का निर्णय → यमदूत द्वारा पकड़कर ले जाना → दक्षिण द्वार से प्रवेश → नरक के यमदूतों को सौंपना → पाप के अनुसार यातना शुरू। एक से अधिक नरकों में क्रमशः दंड हो सकता है।
धर्मराज का दंड-क्रम है — यमलोक पेशी → चित्रगुप्त लेखा → निर्णय → यममार्ग की यातना → वैतरणी → नरक में वास्तविक दंड → पाप-दंड पूरा होने पर पुनर्जन्म।
धर्मराज के आदेश को यमदूत लागू करते हैं — यममार्ग पर ले जाना, नरक पहुँचाना, यातना देना। नरक में विशेष यमदूत होते हैं। द्वारपाल 'धर्मध्वज' प्रवेश की व्यवस्था करते हैं। सभी यमराज की आज्ञा के अधीन हैं।
धर्मराज का निर्णय स्वर्ग, नरक या पुनर्जन्म — इन तीनों में से एक होता है। यह निर्णय निष्पक्ष, अटल और तत्काल प्रभावी है। कोई अपील नहीं। चित्रगुप्त के अचूक लेखे के आधार पर कोई भूल नहीं होती।
धर्मराज के समक्ष जीव को यमलोक के द्वार से लाया जाता है। चित्रगुप्त कर्मों का लेखा प्रस्तुत करते हैं, जीव से पूछताछ होती है, पाप-पुण्य की तुलना की जाती है और यमराज निर्णय सुनाते हैं।
चित्रगुप्त की पंजिका में पाप और पुण्य दोनों समान रूप से लिखे हैं। वे यमराज को तुलनात्मक लेखा देते हैं। गुप्त दान भी उनसे छुपा नहीं — हर पुण्यकर्म उतनी ही निश्चितता से दर्ज है।
चित्रगुप्त अग्रसंधानी पंजिका का लेखा प्रस्तुत करते हैं। इनकार करने पर कर्मों की 'फिल्म' दिखाते हैं। वे स्वयं साक्षी हैं — क्योंकि गुप्त से गुप्त कर्म भी उनसे छुपा नहीं रहा।
यममार्ग में गर्म बालू का मैदान, असिपत्रवन, वैतरणी नदी, सिंह-व्याघ्र-कुत्तों का स्थान, सर्प-बिच्छू क्षेत्र और आग से जलाने वाले स्थान — इन सभी जगहों पर पापी जीव को कष्ट मिलता है।
यममार्ग में जीव को 16 पड़ावों (नगरों) पर, वैतरणी नदी के तट पर और यमलोक के द्वार पर रोका जाता है। प्रत्येक स्थान पर कर्मों का एक भाग देखा जाता है। यह यात्रा 47 दिनों तक चल सकती है।
गरुड़ पुराण के अनुसार यममार्ग 'विश्रामरहित' है — पापी को कहीं रुकने नहीं दिया जाता। पुण्यात्मा और पिंडदान प्राप्त जीव को 16 पड़ावों पर कुछ राहत मिलती है। पापी के लिए यह निरंतर कष्टयात्रा है।
यममार्ग पर स्वच्छ जल का घोर अभाव है। जिसने जीवन में जलदान किया, उसे यहाँ कुछ राहत मिलती है। पापी को कहीं जल नहीं मिलता। वैतरणी का जल रक्त-मवाद से भरा है — वह और यातना देता है।
यममार्ग पर जीव को पिंडदान से भोजन और शक्ति मिलती है। दानी जीवों को अपने जीवन के दान का फल मिलता है। पापी और पिंडदानविहीन जीव को कुछ नहीं मिलता — वह भूखा-प्यासा यातना सहता हुआ चलता है।