यममार्ग की यात्रा लंबी इसलिए होती है क्योंकि पाप का भार जीव को धीमा करता है, 16 नदियाँ पार करनी होती हैं, पापी सूक्ष्म शरीर दुर्बल होता है और प्रत्येक कष्ट स्वयं एक कर्मफल है। कर्म ही यात्रा की अवधि तय करते हैं।
यममार्ग में बेहोशी भूख-प्यास, गर्मी, कोड़ों की मार और मानसिक यातना के संयुक्त प्रभाव से होती है। यह जीवन की उस अचेतनता का भी प्रतीक है जिसमें पापी रहा। बेहोशी में भी यमदूत उठाकर आगे ले जाते हैं — कोई राहत नहीं।
यममार्ग में जीव बार-बार इसलिए गिरता है क्योंकि भूख-प्यास और गर्मी से शक्तिहीन है, मार्ग दुर्गम है, यमदूत बलपूर्वक खींचते हैं और पाप का बोझ उसे कमज़ोर बनाता है। गरुड़ पुराण में यह वर्णन विशेष रूप से मिलता है।
यममार्ग में कुत्तों का काटना पापी जीव की पूर्ण असहायता का प्रतीक है। यह उसके विश्वासघात और अधर्म का परिणाम है। ऋग्वेद में भी यमलोक के द्वारपाल के रूप में कुत्तों का उल्लेख है — ये धर्म के प्रहरी हैं।
यममार्ग में गर्मी और अग्नि पाप-शुद्धि की प्रक्रिया का प्रतीक है। जिसने दूसरों को कष्ट दिया, वह स्वयं गर्मी भोगता है — यह कर्म का न्याय है। पछतावे की आंतरिक अग्नि और बाह्य ताप मिलकर पापी को तपाते हैं।
गरुड़ पुराण के अनुसार यममार्ग पर भूख-प्यास की तीव्र पीड़ा होती है जो सूक्ष्म शरीर में होती है। पिंडदान से यह कुछ कम होती है। जिसने जीवन में अन्न-जल दान किया हो, उसे कम कष्ट होता है। यह दान के महत्व को रेखांकित करता है।
यममार्ग पर पापी को भूख-प्यास, जलती बालू, यमदूतों के कोड़े, कुत्तों का काटना, नरक का भय, बार-बार गिरना, वैतरणी नदी की यातना और अंधकारमय मार्ग — ये सभी कष्ट एक साथ भोगने पड़ते हैं।
गरुड़ पुराण के अनुसार यमदूत जीव के गले में पाश बाँधकर, राजपुरुष की तरह बलपूर्वक घसीटते हुए यममार्ग पर ले जाते हैं। थकने पर पीठ पर कोड़े मारते हैं, गिरने पर भी आगे धकेलते हैं। कोई दया नहीं होती।
गरुड़ पुराण के अनुसार पापी जीव का मृत्यु-भय अत्यंत तीव्र होता है — हृदय विदीर्ण होने जैसा। सौ बिच्छुओं के डंक जैसी पीड़ा, मल-मूत्र विसर्जन, हाय-हाय विलाप। पुण्यात्मा को मृत्यु के समय भय नहीं, दिव्य शांति मिलती है।
गरुड़ पुराण के अनुसार पापी जीव यमदूतों के अत्यधिक भय से मल-मूत्र त्याग देता है। यह उस जीव के अधोमार्ग से प्राण-निर्गमन का संकेत है और पाप के पतनकारी अंत का प्रतीक है। जीवन का अहंकार मृत्यु में हीनता बन जाता है।
यमदूतों को देखकर पापी जीव अत्यंत भयभीत होता है, काँप उठता है, मल-मूत्र त्याग देता है और हाय-हाय करते हुए विलाप करता है। पछतावा होता है परंतु तब कुछ नहीं बदला जा सकता। पुण्यात्मा देवदूतों को देखकर प्रसन्न होता है।
यमदूतों का काला रंग अज्ञान, पाप और अंधकार का प्रतीक है। यह पापकर्मों के परिणाम की दिशा को इंगित करता है। विष्णुदूत प्रकाशमान होते हैं — यह प्रकाश-अंधकार का, पुण्य-पाप का स्पष्ट विभेद है।
यमदूतों के नख 'आयुध जैसे' — यह पाप की अनिवार्य पकड़ का प्रतीक है। दाँतों की कटकटाहट क्रोध और दंड की तत्परता का संकेत है। यह वर्णन पाप के भयावह परिणाम का जीवंत चित्रण है, न कि कोरी कल्पना।
यमदूत पापी जीव को इसलिए बाँधकर ले जाते हैं क्योंकि वह मोह के कारण स्वयं नहीं जाना चाहता और शरीर में लौटने का प्रयास करता है। यह कर्म-न्याय की अनिवार्यता का प्रतीक है। पुण्यात्मा को कभी नहीं बाँधा जाता।
यमदूतों का पाश पापकर्मों का बंधन है, कर्म-न्याय की अनिवार्यता का प्रतीक है और मोह-आसक्ति का स्थूल रूप है। यह बताता है कि कोई भी अपने कर्मफल से नहीं बच सकता। पाश में बँधा जीव शरीर और परिजनों के पास नहीं लौट सकता।
यमदूत पापी जीव को इसलिए डराते हैं क्योंकि यह उसके कर्मों का स्वाभाविक फल है। यह न्याय की प्रक्रिया का अंग है जिससे जीव को पापकर्मों का बोध हो। पुण्यात्मा के लिए आने वाले देवदूत कभी नहीं डराते।
यमदूतों का भयावह स्वरूप पापकर्मों के परिणाम की चेतावनी है, धर्म के निर्मम न्याय का प्रतीक है और जीवित मनुष्यों को सद्कर्म के लिए प्रेरित करने का साधन है। यह काल्पनिक नहीं, आध्यात्मिक सत्य का रूपक है।
हाँ, मृत्यु के बाद सूक्ष्म शरीर के माध्यम से सुख-दुख का अनुभव होता है। पापी को यममार्ग और नरक में यातनाएँ होती हैं, पुण्यात्मा को स्वर्ग में दिव्य आनंद मिलता है। पिंडदान से भूख-तृप्ति का अनुभव भी इसी का उदाहरण है।
नहीं, गरुड़ पुराण के अनुसार सभी जीव समान अनुभव नहीं करते। पुण्यात्मा को देवदूत दिव्य विमान से ले जाते हैं, पापी को यमदूत कष्ट देते हैं। अनुभव पूर्णतः जीवन के कर्मों पर निर्भर है।
गरुड़ पुराण के अनुसार मृत्यु के बाद दीर्घ यात्रा तुरंत नहीं होती। पहले यमलोक जाकर 24 घंटे में वापस आना, 13 दिन परिजनों के पास रहना, फिर पिंडदान के बाद असली यात्रा शुरू होती है जो 17-49 दिन तक चलती है।
हाँ, गरुड़ पुराण के अनुसार मृत्यु के बाद यममार्ग पर जीव को अपने पापकर्म याद आते हैं जिससे वह और अधिक पीड़ित होता है। पुण्यात्मा को सत्कर्मों की स्मृति शांति देती है। यमलोक में भी कर्मों का लेखा-जोखा होता है।
हाँ, गरुड़ पुराण के अनुसार मृत्यु के बाद जीवात्मा 13 दिनों तक परिवार के पास रहकर उन्हें देखती है। वह पुकारती है परंतु परिवार सुन नहीं पाता। परिजनों का विलाप जीव को दुखी करता है — इसीलिए शांत भाव और पिंडदान का विधान है।
हाँ, गरुड़ पुराण के अनुसार जीव शरीर छोड़ते समय अपने घर को देखता है। मृत्यु के बाद 13 दिनों तक घर के आसपास भटकता है, परिजनों को देखता है परंतु वे उसे नहीं देख पाते। यह अनुभव अत्यंत कष्टकारी होता है।
यमदूत पापी जीव को नरक का वर्णन इसलिए सुनाते हैं ताकि उसे अपने कर्मों का बोध हो। यह न्याय-प्रक्रिया का अंग है। साथ ही यह वर्णन जीवित मनुष्यों को पाप से दूर रखने के लिए गरुड़ पुराण का मूल संदेश भी है।
हाँ, गरुड़ पुराण के अनुसार यमदूत यममार्ग पर पापी जीव को तर्जना (धमकाना) करके डराते हैं और नरक की यातनाओं का बार-बार वर्णन सुनाते हैं। यह धर्म के दंड-विधान का भाग है। पुण्यात्मा के साथ ऐसा नहीं होता।
यममार्ग में पापी को भूख-प्यास, गर्म बालू, यमदूतों के कोड़े, कुत्तों का काटना, वैतरणी नदी की यातना और नरक का भय — ये सभी कष्ट भोगने पड़ते हैं। यह सब उनके जीवन के पापकर्मों का फल है।
यममार्ग में कष्ट होता है या नहीं — यह कर्मों पर निर्भर करता है। पापी को गर्म बालू, कोड़े, भूख-प्यास और वैतरणी की यातना भोगनी पड़ती है। पुण्यात्मा के लिए देवदूत दिव्य विमान में ले जाते हैं — कोई कष्ट नहीं।
पापियों के लिए यममार्ग अत्यंत कष्टकारी होता है — गर्म बालू, तेज धूप, भूख-प्यास, यमदूतों के कोड़े, कुत्तों का काटना। वैतरणी नदी पार करना असहनीय यातना देती है। यमलोक में दक्षिण द्वार से नरक का प्रवेश होता है।
गरुड़ पुराण के अनुसार पुण्यात्माओं के लिए यममार्ग सुखद होता है। देवदूत दिव्य विमान से आते हैं, कोई बंधन नहीं होता। यमलोक में सम्मानित द्वारों से प्रवेश होता है। वैतरणी भी सहजता से पार होती है।
यममार्ग पापी, धर्म-विमुख और दान-पुण्य रहित जीवात्माओं के लिए अत्यंत कठिन होता है। वे भूख-प्यास से व्याकुल होती हैं, कोड़े खाती हैं, गिरती-पड़ती चलती हैं। पुण्यात्माओं और पिंडदान प्राप्त आत्माओं का यह मार्ग सहज होता है।
यममार्ग वह दुर्गम अध्यात्मिक मार्ग है जिससे जीवात्मा मृत्यु के बाद यमलोक पहुँचती है। यह 99,000 योजन लंबा, बिना छाया-जल वाला और कष्टकारी है। पुण्यात्मा के लिए सुखद, पापी के लिए दुःखद — एक ही मार्ग का भिन्न अनुभव।
यमदूत जीव को यमलोक ले जाते हैं। पहले यमराज के पास कर्मों का लेखा होता है, फिर 13 दिन के लिए मृत्युलोक लौटाया जाता है। तेरहवें दिन फिर यमलोक की यात्रा शुरू होती है जो 17-49 दिन तक चलती है।
हाँ, गरुड़ पुराण के अनुसार यमदूत पापी जीव के गले में पाश (रस्सी) बाँधते हैं। यह पाश पापकर्मों का प्रतीक है। इसी बंधन के कारण जीवात्मा अपने शरीर में वापस नहीं लौट सकती। पुण्यात्मा के लिए कोई बंधन नहीं होता।
गरुड़ पुराण के अनुसार यमदूत पापी जीव को बलपूर्वक पकड़ते हैं — जैसे राजपुरुष अपराधी को। उसे यातना-देह से ढककर गले में पाश बाँध देते हैं। पुण्यात्मा के लिए देवदूत दिव्य विमान से सम्मानपूर्वक ले जाते हैं।
गरुड़ पुराण के अनुसार यमदूतों को देखकर पापी जीव अत्यंत भयभीत होता है, काँप उठता है और मल-मूत्र त्याग देता है। वह हाय-हाय करता हुआ शरीर छोड़ता है। पुण्यात्मा के लिए देवदूत आते हैं जिन्हें देखकर शांति मिलती है।
गरुड़ पुराण के अनुसार यमदूत दाँतों को कटकटाते हुए आते हैं, उनकी बड़ी-बड़ी दाढ़ें होती हैं। उनकी आँखें क्रोध से लाल, गोल और अत्यंत भयावह होती हैं — ये न्याय और दंड के प्रतीक हैं।
गरुड़ पुराण के अनुसार यमदूत कौए के समान काले रंग के होते हैं। यह काला रंग अंधकार, मृत्यु और पाप के लोक का प्रतीक है। इसके विपरीत विष्णुदूत दिव्य और प्रकाशमान वर्ण के होते हैं।
यमदूत मुख्यतः पाश (फंदा) और दंड (डंडा) धारण करते हैं। पाश से जीवात्मा को बाँधते हैं, दंड से आगे ले जाते हैं। उनके नाखून भी आयुध जैसे तीखे बताए गए हैं। नरक में मुगदर और कोड़ों का भी वर्णन है।
गरुड़ पुराण के अनुसार यमदूत काले, भयावह, नग्न, टेढ़े मुख वाले, लाल नेत्र वाले और खड़े केशों वाले होते हैं। हाथों में पाश-दंड, नाखून शस्त्र जैसे। यह वर्णन पापमार्ग के भयावह परिणाम का प्रतीक है।
गरुड़ पुराण के अनुसार यमदूत काले, भयंकर, विकृत मुख वाले, उठे हुए केशों वाले और क्रोधित नेत्रों वाले होते हैं। हाथों में पाश और दंड होते हैं, नाखून शस्त्र जैसे तीखे होते हैं।
यमदूत पापकर्मी और धर्म-विमुख जीवात्माओं को लेने आते हैं। पुण्यात्मा और भक्तों के लिए विष्णुदूत आते हैं। अजामिल की कथा से सिद्ध है कि ईश्वर-शरण में आने पर यमदूत का अधिकार समाप्त हो जाता है।
गरुड़ पुराण के अनुसार यमदूत यमराज की आज्ञा से आयु पूर्ण होने पर आते हैं। पापी को मृत्यु से लगभग एक पहर पहले उनकी उपस्थिति का भयावह आभास होता है। पुण्यात्मा के लिए विष्णुदूत दिव्य विमान से आते हैं।
दिव्य दृष्टि में व्यक्ति अपना पूरा जीवन एक क्षण में देखता है। पुण्यात्मा को दिव्य प्रकाश और पूर्वज दिखते हैं, पापी को यमदूत और भयावह दृश्य। आत्मा अपने शरीर को बाहर से भी देख सकती है।
दिव्य दृष्टि वह आत्मिक शक्ति है जिससे सूक्ष्म और दैवीय सत्य देखा जाता है। मृत्यु के समय इंद्रियाँ शिथिल होने पर यह स्वतः मिलती है। इसमें व्यक्ति अपना जीवन और आत्मा का वास्तविक स्वरूप देख सकता है।
हाँ, गरुड़ पुराण के अनुसार मृत्यु के अंतिम क्षणों में दिव्य दृष्टि मिलती है। इसमें व्यक्ति अपना पूरा जीवन एक क्षण में देखता है। पुण्यात्मा को दिव्य प्रकाश दिखता है, पापी को यमदूत और नरक।
गरुड़ पुराण और कठोपनिषद के अनुसार मृत्यु के समय दिव्य दृष्टि के रूप में एक अनायास बोध होता है। यह पूर्ण ज्ञान नहीं, परंतु जीवन के सत्य का प्रकाश है। जिसने जीवन में साधना की हो, उसके लिए यह मोक्ष का अवसर बनता है।
गरुड़ पुराण के अनुसार मृत्यु के समय की मानसिक स्थिति कर्मों पर निर्भर है। पुण्यात्मा शांत और ईश्वरोन्मुखी होता है। पापी व्याकुल और भयभीत। गीता के अनुसार अंतिम समय का विचार ही अगला जन्म तय करता है।
गरुड़ पुराण के अनुसार मृत्यु से पहले हथेलियों की रेखाएँ हल्की होती हैं, पूर्वज सपने में आते हैं। मृत्यु के समय वाणी जाती है, इंद्रियाँ शिथिल होती हैं, दिव्य दृष्टि मिलती है। पुण्यात्मा को शांति, पापी को भय होता है।
गरुड़ पुराण के अनुसार प्राण शरीर के नौ द्वारों में से किसी एक से निकलते हैं। नासिका-मुख से निकलना शुभ, आँखों से निकलना मोह का संकेत, उत्सर्जन अंगों से निकलना अशुभ और ब्रह्मरंध्र से निकलना मोक्ष का द्योतक है।
शरीर की चेतना और शक्ति का आधार जीवात्मा है। मृत्यु के समय जीवात्मा शरीर छोड़ती है — इसी प्रक्रिया में प्राण-ऊर्जा हटती जाती है और शरीर निष्क्रिय होता जाता है। जीवात्मा के बिना यह शरीर पाँच तत्वों का जड़ आवरण मात्र रह जाता है।