पिंडदान के अभाव में यममार्ग पर जीव को कुछ नहीं मिलता। वैतरणी में भूख-प्यास से व्याकुल होकर वह रक्त-मांस युक्त नदी का जल पीने पर विवश होता है। इसीलिए पिंडदान अनिवार्य बताया गया है।
वैतरणी नदी रक्त, मांस, मवाद, मल-मूत्र और सड़े-गले पदार्थों से 'दुर्गंधपूर्ण' बताई गई है। केशरूपी सेवार (काई) इसे और दुर्गम बनाती है। यह दुर्गंध पापी जीव के कुकर्मों का प्रतीक है।
वैतरणी नदी में सामान्य जल नहीं है। इसमें रक्त, मांस, कीचड़, मल-मूत्र, चर्बी, मज्जा और अस्थि मिले हैं। पापी को देखते ही यह 'खौलते घी की भाँति' उबलने लगती है।
वैतरणी में सूई-मुख कीड़े (शरीर में चुभते हैं), वज्र-चोंच गीध और कौए (नोचते हैं), वज्रदन्त घड़ियाल (पकड़कर खींचते हैं), महाविषधर सर्प-बिच्छू (डसते हैं) और मांसभक्षी पक्षी — ये सभी पापी जीव को कष्ट देते हैं।
नरक में लोहे की लाठी-मुद्गर-भाला-गदा-मूसल, गर्म तेल का कड़ाह, जंजीर-पाश, कुत्ते-सर्प-गीध, रक्त-भरे गड्ढे, काँटेदार वृक्ष और चट्टानें — ये सब यातना-साधन हैं। हर पाप के लिए अलग साधन।
संजीवन नरक में जीव को पुनः जीवित इसलिए किया जाता है ताकि शेष पापों का दंड भोगा जा सके। 'बिना भोगे कर्म समाप्त नहीं होता' — यही इसका कारण है। यातना-देह यमराज की शक्ति से बार-बार निर्मित होती है।
नरक में जीव को इसलिए मृत्यु नहीं आती क्योंकि 'बिना भोगे कर्म समाप्त नहीं होता।' यातना-देह विशेष रूप से बनी है जो मरती नहीं। संजीवन नरक में मारकर बार-बार पुनः जीवित किया जाता है।
नरक में बार-बार कष्ट इसलिए मिलता है क्योंकि जीवन के हर पाप का अलग दंड है, संजीवन नरक में मारकर पुनः जीवित किया जाता है, यातना-देह पुनः बन जाती है और 'बिना भोगे कर्म समाप्त नहीं होता।'
नरक में जीव 'यातना-शरीर' में होता है जो पिंडदान से बनता है। यह शरीर जंजीरों में बँधा, पिटा हुआ, जला हुआ, काटा हुआ और रक्त वमन करता हुआ होता है। यह मरता नहीं — बार-बार पुनः उत्पन्न होता है।
नरक से जीव इसलिए नहीं भाग सकता क्योंकि यमदूत चारों ओर हैं, जंजीरों में बँधा है, कर्म का नियम है कि फल भोगना अनिवार्य है और 'बिना भोगे कर्म का नाश नहीं होता।'
नरक में असहनीय शारीरिक पीड़ा, अपनों को पुकारने की व्याकुलता और पापों के पश्चाताप की पीड़ा — इन तीनों कारणों से जीव विलाप करता है। यमदूत उस पर कोई दया नहीं करते।
नरक में यमदूत लोहे की लाठी, मुद्गर, भाला, गदा और मूसल से जीव को पीटते हैं। बेहोश होने पर पुनः जीवित करके फिर पीटा जाता है। यह उसी पीड़ा का प्रतिफल है जो जीव ने जीवन में दूसरों को दिया।
गरुड़ पुराण में नरक में जीव को पाश (रस्सी), जंजीर (गले-हाथ-पैर), अंकुश और पीठ पर लोहे के भार से बाँधा जाता है। यह उसी बंधन का प्रतीक है जिसमें वह जीवन भर पापकर्मों से जकड़ा रहा।
नरक में तामिस्त्र और अंधतामिस्त्र घोर अंधकार के नरक हैं। अंधकूप में ज्ञान-अहंकारियों को डाला जाता है। नरक का अंधकार जीव के ज्ञान-अभाव और अज्ञान का प्रतीक है।
नरक में कुंभीपाक में गर्म तेल में उबाला जाता है, कालसूत्र में गर्म सलाखों से दंड, तपन और संप्रतापन नरक में चारों ओर आग, जलते अंगारों पर चलाया जाता है। आग पापों के दाहक परिणाम का प्रतीक है।
नरक में कुत्ते (नोचना-काटना), सर्प-बिच्छू (दंश), वज्र-चोंच गीध, राक्षस (खाना), कौए-चील, और सूई-मुख कीड़े जीव को कष्ट देते हैं। प्रत्येक जीव उस पापी के कर्म का प्रतिफल है।
नरक में पापी जीव को स्वच्छ जल नहीं मिलता — प्यास की यातना होती है। कुछ नरकों में रक्त-मिश्रित या विष-युक्त जल मिलता है। जिसने जीवन में जलदान नहीं किया, उसे यह कष्ट विशेष रूप से भोगना पड़ता है।
नरक में जीव को सात्विक भोजन नहीं मिलता। भूख-प्यास की यातना होती है। रक्त-वमन पीने, मल खाने और जहर पीने पर विवश किया जाता है। जिसने जीवन में अन्नदान नहीं किया उसे यह कष्ट सर्वाधिक होता है।
नरक में गर्म तेल में उबाला जाना, गर्म सलाखों से दंड, काँटों पर लटकाना, चट्टानों से कुचलना, कुत्तों द्वारा नोचना, बार-बार मारकर जीवित करना — प्रत्येक पाप के लिए विशेष यातना निर्धारित है।
गरुड़ पुराण में नरक अस्थायी है — पापकर्मों के दंड भोगने तक। साधारण पापों के लिए कम, घोर पापों के लिए हजारों-लाखों वर्षों का दंड। पाप समाप्त होने पर पुनर्जन्म होता है।
नरक का निर्णय यमराज करते हैं — चित्रगुप्त के निष्पक्ष कर्म-लेखे के आधार पर। पाप की प्रकृति और गंभीरता के अनुसार नरक और दंड का समय तय होता है। यह निर्णय अटल और अपरिवर्तनीय है।
नरक में भेजने का निर्णय यमराज (धर्मराज) लेते हैं — चित्रगुप्त का कर्म-लेखा देखकर। यमदूत उनकी आज्ञा से जीव को नरक तक पहुँचाते हैं। बिना यमराज की आज्ञा के कोई नरक नहीं जाता।
गरुड़ पुराण में 84 लाख नरकों का सामान्य उल्लेख है। 21 घोर नरक विशेष रूप से वर्णित हैं जिनमें तामिस्त्र, रौरव, कुंभीपाक, कालसूत्र, अवीचि प्रमुख हैं। 36 नरकों का वर्णन भी कुछ संदर्भों में मिलता है।
नरक में गर्म तेल में उबाला जाना, लोहे की सलाखों से दंड, काँटेदार वृक्षों पर लटकाना, कुत्तों-सर्पों का दंश, चट्टानों से कुचलना, जहरीला द्रव पिलाना — प्रत्येक पाप के लिए अलग यातना निर्धारित है।
नरक उन्हें मिलता है जिन्होंने जीवन में झूठ, हिंसा, चोरी, व्यभिचार, माता-पिता का अपमान और धर्म-विमुखता जैसे पापकर्म किए। गरुड़ पुराण के अनुसार नरक दंड का साथ ही आत्मा-शुद्धि का साधन भी है।
धर्मराज चित्रगुप्त के लेखे से पाप-पुण्य तौलकर नरक का निर्धारण करते हैं। गरुड़ पुराण में 84 लाख नरक हैं — हर पाप के लिए अलग नरक। यह दंड अस्थायी है — पाप-दंड पूरा होने पर पुनर्जन्म होता है।
धर्मराज यमदूत भेजते हैं, चित्रगुप्त के लेखे से कर्म-न्याय करते हैं और जीव को स्वर्ग-नरक-पुनर्जन्म का निर्णय देते हैं। उनका न्याय पूर्णतः निष्पक्ष और अटल है। यमलोक की समस्त व्यवस्था उनके अधीन है।
धर्मराज यमराज का दूसरा नाम है — धर्म और सत्य के राजा। वे भगवान सूर्य के पुत्र हैं, वाहन भैंसा और हाथ में दंड-पाश हैं। वे समस्त प्राणियों के कर्मों का न्याय करते हैं और स्वर्ग-नरक का निर्णय देते हैं।
चित्रगुप्त यमराज (धर्मराज) को रिपोर्ट करते हैं। वे कर्मों का लेखा प्रस्तुत करते हैं, निर्णय यमराज लेते हैं। 'चित्रगुप्त बांचता है, यमराज दंड देते हैं' — यह दोनों की भूमिका का सार है।
चित्रगुप्त जीव से उसके कर्म, दान और धर्म के विषय में पूछते हैं। झूठ बोलने पर कर्मों का दृश्य प्रमाण दिखाते हैं। यमराज को पाप-पुण्य का सटीक विवरण देते हैं — उनके समक्ष कोई बचाव नहीं चलता।
चित्रगुप्त के पास 'अग्रसंधानी' नामक दिव्य पंजिका है जिसमें प्रत्येक जीव के जन्म से मृत्यु तक के समस्त कर्म लिखे रहते हैं। कर्मों की 'फिल्म' भी होती है जो इनकार करने पर दिखाई जाती है।
चित्रगुप्त जीव के मनसा-वाचा-कर्मणा से किए सभी कर्म देखते हैं — प्रकट और गुप्त दोनों। पुण्य और पाप दोनों दर्ज होते हैं। जन्म से मृत्यु तक का एक भी कर्म उनसे छुपा नहीं रहता।
चित्रगुप्त का कार्य प्रत्येक जीव के गुप्त-प्रकट सभी कर्मों का लेखा रखना और यमराज के समक्ष प्रस्तुत करना है। वे निष्पक्ष न्याय के प्रतीक हैं — किसी के लिए कोई पक्षपात नहीं।
चित्रगुप्त ब्रह्मा जी के शरीर से उत्पन्न दिव्य पुरुष हैं जो यमराज के सहायक और समस्त जीवों के कर्मों के लेखाकार हैं। 'चित्र' (दृश्य) + 'गुप्त' (छिपा) — वे प्रत्येक गुप्त कर्म को भी देखते हैं।
यमलोक प्रवेश से पहले वैतरणी नदी पार करनी होती है। फिर चार द्वारों में से कर्मानुसार द्वार मिलता है — पूर्व-पश्चिम-उत्तर पुण्यात्माओं के लिए, दक्षिण द्वार पापियों के लिए। अंदर चित्रगुप्त के सामने कर्मों का लेखा होता है।
मृत्यु के बाद तत्काल यमलोक जाकर वापस आना होता है। असली यात्रा 13वें दिन शुरू होती है जो 17 से 47 दिन या एक वर्ष तक चल सकती है — यह कर्मों पर निर्भर है। पुण्यात्मा शीघ्र पहुँचती है, पापी देर से।
पिंडदान से जीवात्मा का यातना-शरीर बनता है, यममार्ग की भूख-प्यास कम होती है और यमलोक तक यात्रा की शक्ति मिलती है। यह लाभ उसे मिलता है जिसके परिजन विधिपूर्वक 10 दिन तक पिंडदान करते हैं।
पिंडदान के अभाव में जीवात्मा कल्पान्त तक प्रेत बनकर निर्जन वन में भटकती है। यममार्ग पर चलने की शक्ति नहीं मिलती, भूख-प्यास से व्याकुल रहती है। इसीलिए मृत्यु के बाद दस दिन तक पिंडदान का विधान है।
पुण्यात्मा के लिए देवदूत दिव्य विमान से आते हैं। यात्रा सुखद होती है। वैतरणी नदी गाय या नाव की सहायता से पार होती है। यमलोक में सम्मानित द्वार से प्रवेश और गंधर्व-अप्सराओं का स्वागत मिलता है।
यममार्ग पर पापी जीव भूखा-प्यासा, जलती बालू पर, कोड़े खाता, कुत्तों से काटा, बेहोश होता-उठता चलता है। मन में पछतावा, विलाप और भय है। पाश में बंधा होने से वापस नहीं लौट सकता। कोई सहायता नहीं मिलती।
वैतरणी में पापी को रक्त-मवाद में डूबना, सूई-मुख कीड़ों का दंश, वज्र-चोंच गीधों का आक्रमण, भंवरों में डूबना-उतराना, घड़ियालों का भय और भूख-प्यास — ये सभी यातनाएँ 34-47 दिन तक सहनी पड़ती हैं।
सभी जीव वैतरणी पार कर सकते हैं परंतु कर्मों के अनुसार भिन्न अनुभव से। गौदान-दानी को गाय/नाव की सहायता मिलती है। पापी को नाक में कांटा फंसाकर खींचा जाता है और लंबे समय तक यातना भोगनी पड़ती है।
गौदान करने वाले जीव की गाय वैतरणी पर आती है — जीव उसकी पूंछ पकड़कर पार करता है। दान-पुण्य से नाव मिलती है। जिनके पास कोई पुण्य नहीं उन्हें नाक में कांटा फंसाकर यमदूत खींचकर ले जाते हैं।
वैतरणी नदी इसलिए कठिन है क्योंकि यह रक्त-मवाद-कीड़ों से भरी है, पापी के पास दान का पुण्य नहीं होता और यह 34-47 दिन की यात्रा है। जिसके पास दान नहीं उसे नाक में कांटा फंसाकर खींचा जाता है।
गरुड़ पुराण के अनुसार वैतरणी नदी रक्त, मांस, कीचड़ से भरी, सौ योजन चौड़ी, सूई-मुख कीड़ों और घड़ियालों से पूर्ण है। पापी को देखकर यह खौलने लगती है। इसके तट हड्डियों से बने हैं और ऊपर वज्र-चोंच वाले गीध मंडराते हैं।
वैतरणी नदी मृत्युलोक और यमलोक के बीच स्थित एक भयावह नदी है जो प्रत्येक जीव को पार करनी होती है। 'वैतरणी' नाम दान (वितरण) से जुड़ा है — जिसने जीवन में दान किया, उसके लिए यह पार करना सुगम होता है।
यमदूत नरक का भय बार-बार इसलिए बताते हैं ताकि जीव को कर्म-बोध हो, न्याय की तैयारी हो, मानसिक यातना पूर्ण हो और जीवित परिजन गरुड़ पुराण सुनकर जागरूक हों। यह न्याय-प्रक्रिया और धर्म-शिक्षा दोनों का साधन है।
यममार्ग में कर्मों की याद इसलिए आती है ताकि जीव को कर्म-बोध हो, यमलोक में न्याय की तैयारी हो और पश्चाताप जाग सके। यह पाप की एक आंतरिक यातना भी है। इसीलिए जीवन में ही पछताकर सुधरना श्रेष्ठ है।
यममार्ग पर कोई सहायता नहीं मिलती क्योंकि कर्म का फल स्वयं भोगना होता है, यमराज का न्याय निरपेक्ष है और जिसने जीवन में दूसरों की सहायता नहीं की उसे यहाँ सहायता का अधिकार नहीं। पिंडदान और सत्कर्म ही सच्ची सहायता देते हैं।
गरुड़ पुराण के अनुसार यममार्ग पर जीव अकेला होता है क्योंकि कर्म व्यक्तिगत हैं — फल भी अकेले भोगना होता है। कोई परिजन, धन या मित्र साथ नहीं जाता। केवल अपने सत्कर्म मृत्यु के बाद साथ जाते हैं।