प्रेतकल्प का श्रवण करना चाहिए — पापों से मुक्ति, मृत आत्मा को सद्गति, विष्णु-प्रदत्त ज्ञान की प्राप्ति, प्रेतत्व से बचाव और परिजनों को कर्तव्य-ज्ञान के लिए।
प्रेतकल्प का अध्ययन करना चाहिए — मृत्यु-भय से मुक्ति, जीवन-दर्शन की समझ, कर्तव्य-बोध, पापकर्म से विरति और आत्म-ज्ञान के लिए। 'पाठ करने वाला यमराज की यातनाओं से मुक्त होता है' — यह गरुड़ पुराण का वचन है।
प्रेतकल्प में मोक्ष का वर्णन — नरक-भय के बाद आशा दिखाने, भक्ति-मार्ग प्रशस्त करने, 'परमात्मा-ध्यान ही सर्वोत्तम उपाय है' बताने और जीवन का परम लक्ष्य स्पष्ट करने के लिए।
प्रेतकल्प में कर्म का वर्णन — कर्म-न्याय सिद्ध करने, जीवन में धर्माचरण की प्रेरणा देने, 'केवल कर्म साथ जाते हैं' यह बताने और पाप-दुष्प्रभाव से बचने के उपाय दिखाने के लिए।
प्रेतकल्प में यममार्ग का वर्णन — मृत्यु के बाद की सच्चाई बताने, दान की आवश्यकता सिद्ध करने, भक्ति की श्रेष्ठता दर्शाने, परिजनों को श्राद्ध का महत्व समझाने और वैराग्य की प्रेरणा जगाने के लिए।
प्रेतकल्प में नरक का वर्णन — धर्माचरण की प्रेरणा के लिए, कर्म-न्याय सिद्ध करने के लिए, आत्म-शुद्धि का उद्देश्य बताने के लिए, पाप-दंड की जानकारी के लिए और मुमूर्षु को पश्चाताप-प्रेरणा के लिए।
प्रेतकल्प में श्राद्ध का वर्णन — प्रेत-मुक्ति की प्रक्रिया बताने के लिए, पितृ-ऋण चुकाने का मार्ग दिखाने के लिए, परिजनों को कर्म-निर्देश देने के लिए और पितर-पुत्र के पारस्परिक कल्याण-संबंध को स्थापित करने के लिए।
प्रेतकल्प में दान का वर्णन — प्रेत-मुक्ति का साधन बताने के लिए, जीवन में दान की प्रेरणा के लिए, परिजनों का कर्तव्य-बोध कराने के लिए और यमलोक में दान की वास्तविकता सिद्ध करने के लिए।
प्रेतकल्प के विषय (35 अध्यायों में) — मृत्यु का स्वरूप, यममार्ग-वैतरणी, नरक वर्णन, प्रेत-योनि, दान महिमा, दशगात्र-षोडश श्राद्ध-सपिंडन, श्राद्ध विधि, उपदेशात्मक कथाएँ और मोक्ष के उपाय।
प्रेतकल्प के मुख्य उद्देश्य — मृत्यु के रहस्य का उद्घाटन, जीवन में धर्माचरण की प्रेरणा, परिजनों को कर्तव्य-बोध, मुमूर्षु को ज्ञान और अंततः परमात्मा-शरण का संदेश।
दान का फल घटता है — अहंकार और दिखावे से, अपात्र को देने से, दान के बाद पछताने से, प्रतिफल की आशा से और दान का बखान करने से। 'सात्विक दान' ही अक्षय है।
दान का फल बढ़ता है — पुण्यकाल (ग्रहण, संक्रांति, पितृपक्ष) में, तीर्थ में (एक गाय = एक लाख का फल), मृत्युकाल में (हजारगुना), सत्पात्र को और श्रद्धापूर्वक देने से।
दान का फल मिलने के तरीके — यममार्ग पर दान 'आगे-आगे उपस्थित होता है', कर्म के रूप में जीव के साथ जाता है, सूक्ष्म रूप में पितरों तक पहुँचता है, तत्काल और अक्षय है। पुण्यकाल में गुणित होता है।
दान का मोक्ष में प्रभाव — दान स्वर्ग का मार्ग खोलता है, दान + भक्ति + ज्ञान मोक्ष की ओर ले जाते हैं। वृषोत्सर्ग और गोदान से पितर यमलोक से मुक्त होते हैं। 'आत्म-ज्ञान और परमात्मा-शरण' अंतिम मोक्ष है।
दान का पुनर्जन्म में प्रभाव — श्रेष्ठ कुल में जन्म, स्वाभाविक धन-स्वास्थ्य, सत्पुत्र और गोधन की प्राप्ति। 'दान का फल अक्षय है' — यह इस जन्म से अगले जन्म तक फलता है।
दान का नरक में प्रभाव — पाप नष्ट करके नरक से बचाता है, परिजनों का दान नरक-काल कम करा सकता है, वृषोत्सर्ग से नरक में पड़े पितर 21 पीढ़ियों सहित उद्धार पाते हैं।
दान का यमलोक में प्रभाव — यममार्ग पर पाथेय (भोजन-शक्ति), यमदूतों का सौम्य व्यवहार, वैतरणी पर गाय की पूंछ से पार होना, यमराज के दरबार में अनुकूल स्थिति और पाप-पुण्य के निर्णय में लाभ।
दान का संबंध तीनों लोकों से है — भूलोक में होता है, यमलोक में पाथेय बनता है (वैतरणी पार कराता है), स्वर्ग में देवगण प्रसन्न होते हैं और अंततः मोक्ष का मार्ग खुलता है।
प्रेत को त्याग देते हैं — स्वयं का स्थूल शरीर, परिवार-मित्र-धन-पद सब यहीं छूट जाते हैं। 'केवल कर्म साथ जाते हैं।' यममार्ग पर जीव पूर्णतः एकाकी है — यही गरुड़ पुराण का संदेश है।
प्रेत को भूल जाते हैं — व्यस्त और स्वार्थी परिजन, संपत्ति की लालसा में लिपत लोग, नास्तिक और अधर्मी, और वे जिन्हें श्राद्ध का महत्व ज्ञात नहीं। इसीलिए गरुड़ पुराण पाठ की परंपरा है।
प्रेत को याद करते हैं — प्रेम करने वाले परिजन, पुत्र (श्राद्ध-कर्म से), पितृपक्ष में समस्त परिवार, करुणावान सज्जन जैसे राजा बभ्रुवाहन और स्वयं भगवान विष्णु।
प्रेत को परिवार से अपेक्षा — पिंडदान-श्राद्ध की विधिपूर्वक पूर्णता, नाम पर दान, याद और स्मरण, और उचित संस्कारों का अनुष्ठान। 'पिंडदान न मिले तो कल्पान्त तक भटकन' — यही प्रेत की सर्वोच्च चाहत है।
प्रेत को जल न मिलने पर — यममार्ग पर तृष्णा की असहनीय पीड़ा, मूर्च्छा, वैतरणी में रक्त-मवाद पीने को बाध्य। 'वहाँ कहीं जल नहीं दिखता' — गरुड़ पुराण का यही वर्णन है। तर्पण से यह पीड़ा कम होती है।
प्रेत को भोजन न मिलने पर — असहनीय भूख की पीड़ा, यात्रा में असमर्थता, वैतरणी में रक्त-पान को विवश और यात्रा न कर पाने से दीर्घ भटकन। गरुड़ पुराण में यही दुर्दशा बताई गई है।
पिंडदान न मिलने पर — प्रेत शरीरहीन और असहाय, भूखा-प्यासा, यमदूतों का कठोर व्यवहार और 'कल्पान्त तक निर्जन वन में दुखी भटकन' — यह गरुड़ पुराण का वचन है।
श्राद्ध न करने पर — पितर भूखे-प्यासे लौटते हैं, शाप देते हैं, वंशजों को पितृदोष लगता है, प्रेत कल्पान्त तक भटकता है। 'श्राद्ध न करने वाला पितृघातक है' — गरुड़ पुराण की यही चेतावनी है।
बभ्रुवाहन कथा प्रेतकल्प (गरुड़ पुराण उत्तरखंड) के सातवें अध्याय में है। यह कथा प्रेतकल्प के तीन प्रमुख विषयों — प्रेत-अवस्था, दान-विधि और श्राद्ध-महिमा — का जीवंत उदाहरण है और सिद्धांत को व्यावहारिक धरातल पर सिद्ध करती है।
बभ्रुवाहन कथा में 'परम गति' मिलती है — प्रेत-शरीर से मुक्ति, भगवान विष्णु की कृपा से मोक्ष। यह मुक्ति अनजान व्यक्ति के दान-श्राद्ध से मिली — इसीलिए यह 'और्ध्वदैहिक दान की महिमा' का प्रमाण है।
बभ्रुवाहन कथा में प्रमुख कर्म है 'और्ध्वदैहिक दान' — प्रेत घट दान, शय्यादान, वृषोत्सर्ग और 48 श्राद्ध। इन सबका मूल है राजा की करुणा। 'करुणा + दान + श्राद्ध = प्रेत-मुक्ति' — यही इस कथा का सूत्र है।
बभ्रुवाहन कथा में प्रेत घोर वन में अकेला, संस्कारहीन, भूखा-प्यासा और कष्टग्रस्त था। कोई परिजन नहीं था जो उसके लिए श्राद्ध करे। राजा बभ्रुवाहन ने करुणावश उसके कष्ट देखे और दान-श्राद्ध से मुक्ति दी।
बभ्रुवाहन कथा में श्राद्ध का महत्व — दूसरे का श्राद्ध भी प्रेत मुक्त करता है, 48 श्राद्धों से प्रेत पितर-श्रेणी में आता है, बिना श्राद्ध के प्रेत कुछ प्राप्त नहीं कर सकता। यह कथा श्राद्ध-महिमा का जीवंत प्रमाण है।
बभ्रुवाहन कथा में दान केंद्रीय है — राजा दानी थे, उन्होंने प्रेत के लिए घट दान-शय्यादान-वृषोत्सर्ग किए। 'शय्यादान और वृषोत्सर्ग से प्रेत परम गति पाता है।' यह कथा 'और्ध्वदैहिक दान की महिमा' के लिए ही सुनाई गई।
दान न करने से — यममार्ग पर भूख-प्यास की यातना, यमदूत का उलाहना और अतिरिक्त दंड, वैतरणी में नाक में कांटे से घसीटा जाना, नरक में भोग और परिजन न करें तो प्रेत कल्पान्त तक भटकता है।
दीपदान से यममार्ग के अंधकार में प्रकाश मिलता है। दशगात्र में प्रतिदिन दीप का प्रावधान है। सांयकाल घट पर दीप प्रेत का मार्गदर्शक है। श्राद्ध में जलाया दीप पितर-पथ को प्रकाशित करता है।
भूमिदान से ब्रह्महत्या जैसे महापाप नष्ट होते हैं, राजकीय महापाप केवल इसी से मिटता है, गोचर्म भूमिदान समस्त पापनाशक है और इन्द्रलोक की प्राप्ति होती है। यह अष्टमहादान में सम्मिलित है।
अन्नदान और प्रेत का सीधा संबंध — पिंड (अन्न) से प्रेत-शरीर बनता है, श्राद्ध का अन्न प्रेत को तृप्त करता है और मुक्ति मिलती है। 'अन्न का दान न करने' का उलाहना यमदूत देते हैं — यही अन्नदान का सर्वोच्च प्रमाण है।
जलदान वैतरणी की यातना से बचाता है। जिसने जलदान किया उसे यहाँ राहत मिलती है। न करने वाले को रक्त-मवाद के जल में तृप्त होना पड़ता है। 'जल का दान क्यों नहीं दिया' — यमदूत यही उलाहना देते हैं।
गोदान और यममार्ग का सीधा संबंध — गोदानी की गाय वैतरणी पर प्रकट होती है, जीव उसकी पूंछ पकड़कर पार होता है, यमदूत उसे कष्ट नहीं देते। गरुड़ पुराण में 'वैतरणी पार कराने के लिए गाय की प्रतीक्षा' की प्रार्थना भी है।
गरुड़ पुराण में मृत्युकाल के दान का फल हजार गुना है। 'दान रूपी पाथेय से यममार्ग सुखद होता है।' अष्टमहादान (तिल, स्वर्ण, नमक, सप्तधान्य, जलपात्र, लोहा, रुई, भूमि, पादुका) अन्तकाल में अवश्य देने चाहिए।
गरुड़ पुराण में गोदान सर्वश्रेष्ठ दान है — वैतरणी पार कराता है, पाप नष्ट करता है, पितर-मोक्ष देता है। इसके बाद भूमिदान, स्वर्णदान और वृषोत्सर्ग आते हैं। 'गोदान जैसी कोई गति नहीं।'
श्राद्ध में ब्राह्मण — पितरों के प्रतिनिधि, मंत्रोच्चार और विधि-संचालक, दान के पात्र, शुद्धि के साधक और आशीर्वाद-दाता। 'दस दिन तक एक ब्राह्मण को प्रतिदिन मिष्टान्न भोजन कराना चाहिए' — गरुड़ पुराण का आदेश।
श्राद्ध का क्रम — दशगात्र (10 दिन) → एकादशाह (11वाँ दिन) → सपिंडन (12-13वाँ दिन) → मासिक श्राद्ध (1 वर्ष तक) → वार्षिक सापिंडन → गया श्राद्ध। प्रत्येक चरण प्रेत को पितर और मुक्ति की ओर ले जाता है।
पिंडदान = श्राद्ध का एक अंग — केवल अन्न-पिंड अर्पित करना। श्राद्ध = व्यापक पितृ-कर्म जिसमें पिंडदान + तर्पण + ब्राह्मण-भोजन + दान-दक्षिणा सभी शामिल हैं। पिंडदान श्राद्ध के बिना भी हो सकता है, परंतु पूर्ण श्राद्ध में पिंडदान होता ही है।
सपिंडीकरण से — प्रेत 'पितर' बन जाता है, प्रेत-शरीर से मुक्ति मिलती है, पारिवारिक पितर-श्रेणी में प्रवेश होता है और धर्मराज की सभा में आदरपूर्ण स्थान मिलता है।
सपिंडीकरण = मृत्यु के एक वर्ष बाद किया जाने वाला वह श्राद्ध जिसमें 'प्रेत' के पिंड को तीन पितरों के पिंड में मिलाकर उसे 'पितर' की श्रेणी में सम्मिलित किया जाता है। यह प्रेतत्व से मुक्ति का अंतिम और निर्णायक संस्कार है।
एकादशाह का महत्व — दशगात्र की पूर्णता, सर्वाधिक दान (गोदान-शय्यादान-वृषोत्सर्ग), परिवार की सूतक-मुक्ति और प्रेत की यमयात्रा-प्रारंभ। यह प्रेत-मुक्ति-प्रक्रिया का एक निर्णायक पड़ाव है।
एकादशाह = मृत्यु के ग्यारहवें दिन का विशेष श्राद्ध-दान कर्म। गरुड़ पुराण के बारहवें अध्याय में वर्णित। इस दिन शय्यादान, गोदान, वृषोत्सर्ग और अष्टमहादान होते हैं। यह दशगात्र के बाद की अगली अनिवार्य क्रिया है।
दशगात्र और प्रेत का संबंध — दशगात्र के पिंड प्रेत का नया शरीर बनाते हैं, उसका भोजन हैं और यमयात्रा की शक्ति देते हैं। बिना दशगात्र के प्रेत शरीरहीन और असहाय रहता है।
दशगात्र = दस दिनों के पिंडदान से प्रेत के दस अंगों का निर्माण। गरुड़ पुराण के ग्यारहवें अध्याय का विषय। 'हस्तमात्र' यातना-देह इसी से बनती है। यह पुत्र का अनिवार्य कर्तव्य है।
मृत्यु के बाद दस दिन के कर्म इसलिए — प्रेत का यातना-शरीर बनाने के लिए (पिंडों से), यमयात्रा की शक्ति देने के लिए, भूख-प्यास की पीड़ा कम करने के लिए और आत्मा को गरुड़ पुराण के ज्ञान से मार्ग दिखाने के लिए।